गुरुवार, 18 सितंबर 2014

Posted by with No comments



गुनगुनाती है कुदरत 

वर्षा गान -   ( INCANTATION FOR RAINS- By -ANONYMOUS)
हरे तीर चीरते हैं धरती का सीना
और बढ़ते हैं स्याह बादलों की ओर 
टपकती है जल  बूँदें टप टप टप टप 
बरसती जल धाराएँ करती हैं शोर
टपकती हैं कोपलों से बूँदें टप टप टप टप 
और हरे तीरों का आवेग लेता है वेग
पिघलने लगता है गहरा कुहासा
बूँदें बनकर टप टप टप टप

ज्वार भाटा     -   (THE TIDE RISES THE TIDE FALLS- By -H.W.LONGFELLOW)
लहरें उठती हैं और गिरती हैं
सांझ के धुंधलके पर लगता है स्याह का कर्फ्यू
तब उत्तेजित समंदर की नम भूरी रेत पर
फिर से लहरें उठती है और गिरती हैं
भागता है पथिक बदहवास शहर की ओर
छोड़ जाता है पदचिन्हों के क्षणिक छाप
फिर नया पथिक... और नए पद चिन्ह
क्योकि लहरें उठती हैं और गिरती हैं

 समंदर का साया     -   ( FROM SEA-By-WITTER  BYNNER  )


पर्णांग की पत्तियों सी पारदर्शी 
स्फटिक से विहंगम में इठलाती
लहराती /लता के तने पर  बलखाती 
उस रही थी एक प्यारी सी तितली
दूर तक पसरे दक्षिणी पोखर की ओर
अब नहीं है आकाश में तैरती सी
वह तितली जो उडी थी आकाश से उत्तरी
अपने पंखों का धनुष उठाये,अनदेखी
पश्चिम में मछुआरी  नौकाओं के दस्ते
लंगर डाले हुए अनेक जहाज़ों के बीच
पूरब में अकेला सारस स्थिति प्रग्य
छिपकर  कर रहा है मत्स्य यग्य 
नहीं है कहीं  पर भी सूखी जमीन/पर
सूरज की गर्म रौशनी के नीचे
 हाथ भर के फासले पर है शांति
निस्तब्धता ,सहज और अनुपम 
====

Reactions:

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें