गुरुवार, 18 सितंबर 2014

हया का रंग निगाहों में उतर आया है...

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हया का रंग निगाहों में उतर आया है...
" शर्म नहीं आती तुझे.. कितनी बार कहा है पढाई में मन लगा ...बारहवीं में अच्छे परसेंटेज  लाना जरूरी है  ... जब देखो तब या तो कम्प्यूटर गेम्स नहीं तो दोस्तों -सहेलियों से साथ खेलने या मटर गश्ती  करने...
मां जमकर घुड़की लगाती है तब अपना पप्पू नीची निगाहें कर चुपचाप खड़ा हो जाता है.यह तो है शर्म से शर्मसार होने का पहला रंग.शरम या हया के कितने रंग पलकें अपने भीतर छिपा लेती हैं इसे भी हम सबने महसूस किया है.सच कहें तो शर्म की परिभाषा को शब्दों में पिरोना अत्यंत कठिन है क्योकि बदलते प्रसंगों में इसके अर्थ भी बदल  जाते हैं.गलत काम करने पर शर्म महसूस होती है  या होनी चाहिए .जब यह शर्म नाजुक पलकों का गुलाबी एहसास बन जाती हैं तब इसमें अनगिनत अगर बत्तियों और इतर -लोबान की खुशबुएँ महकने लगती हैं.-
                               वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
                                  दगा करे  वो किसी से तो शर्म आये मुझे
यह तो  दोस्ती के जूनून का फौलादी  एहसास है जो कतील शिफाई ने बयां किया है-इतनी दोस्ती की उनकी दगाबाजी पर हम शर्मिंदा हों.अरे!शर्म तो उन्हें आनी चाहिए जो वोट बैंक के नाम पर आरक्षण के शोलों की आंच में बेगुनाहों को  झुलसाते हैं.एक और बेशर्म सियासत पूरे टुच्चेपन के साथ स्वार्थ की रोटियां सेकती हैं और दूसरी ओर ऐसी बेशर्मी देख शर्म खुद योग्यता का मास्क पहन कर यीशु की तरह सलीब पर लटका दी  जाती है .पथराई आँखों से आरक्षण से उपजा दावानल देख रहा है समाज जिसे शर्मसार होना चाहिए.
                        शर्मसार तो उन्हें भी होना चाहिए  जो धर्म की शुचिता पर पाखंड की कालिख पोतते हैं.मानवता के मूल मन्त्र से बेखबर ऐसे मठाधीशों के लिए ही मिर्जा ग़ालिब ने कहा है-
                                             काबा तुम किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
                                             शर्म तुमको मगर नहीं आती?
शर्म नहीं आती बाजारयुग के उन सौदागरों को जो ईमान का सौदा करने से भी नहीं चूकते.व्यवहारिक जीवन  में समझौतों की जमीनी मजबूरियों का नीम सच बेशर्मी की परिधि  से पूरी तरह परे है ...इसलिए शर्म और बेशर्मी के बीच नव आधुनिक युग में " लाइन आफ एक्चुअल कंट्रोल काफी हद तक धूमिल हो चुकी है.फिर भी ईमान व्यवहारिक होना मंजूर है पर पूरी तरह बिकाऊ होना बेशर्मी की हद होगी क्योंकि  ऐसा करने वालों पर तोहमत मढ़ दी जाएगी -
                                    दौलत की एवज में कर लिया ईमान का सौदा
                                     कमजर्फ को थोड़ी सी हया भी नहीं आई!
" अब कहे को शर्माते हो!एक ख्यातनाम इतालवी ने अपने नौजवान रिश्तेदार से कहा जिसे उसने वेश्या के कोठे से निकलते हुए देखा था.तुम्हें उस वक्त शर्माना था जब तुम उसके पास गए थे."-एल.ए. सेनेका का नजरिया शर्म से जुड़े कई सवाल  उठाता है.सवाल नहीं पर शर्म से जुदा एक जवाब हमारी सामाजिक व्यवस्था में भी है." आई एम् सारी.. मुझे माफ़ कर दीजिये"... ऐसे शब्द हैं जिसमें अपनी गलती के प्रति शर्म का भाव छिपा हुआ है.क्षमा पर्व अथवा कन्फेशन बिफोर  गाड... अनायास घटित गलतियों पर शर्मसार होने का अवसर है.
                        दद्दू को आश्चर्य तब होता है जब मेहनत का छोटा -मोटा काम करने में भी नौजवान शर्माते हैं." मेहनत में काहे की शर्म!अपराध और बुरी आदतों से शर्म करो! वे कहते हैं ," शर्म और हया तो लड़कियों के जेवर हुआ करते हैं पर वे जेवर भी अब अल्ट्रा माडर्न हो चुके हैं.फिर भी जब किसी की याद में निगाहों में हया के रंग उतारते हैं तब प्यार से महकते गुलाब बहककर कहने लगते हैं-
                            पहले तो मेरी याद से आई उन्हें हया
                            फिर आईने में चूम लिया अपने आपको
 अब भला यह बात कोई किसी को बताएगा थोड़े ही!पर बेखुद देहलवी भी कैसी क़यामत की नजर रखते हैं ....उन्होंने ताड़ लिया की नीची निगाहों में कुछ हया .. कुछ हिजाब...कुछ शोखी...क्या नहीं होता?लेकिन दोस्तों!जब कोई काँटों  से प्यार करता है तब फूल भी शर्मसार होने लगते हैं.
                                 छोडिये भी फूल और काँटों की आपसी तकरार को... ये शायर शर्मीली आँखों में न जाने कहाँ से मौत( कजा)  को खेलते देख लेते हैं.इजहारे मुहब्बत  पर शर्माने वाली आँखों में उन्होंने हया को अंगडाई लेते हुए देखा है.और रही रसभरी आँखों में मौत की बात,वे गुनगुनाने लगते हैं -
                         उन रसभरी आँखों में क्या हया खेल रही है
                          दो जहर के प्यालों में क़ज़ा खेल रही है
क़ज़ा या मौत नहीं... हम जिंदगी की बात करें और अपनी गलतियों पर शर्मसार होकर सुधारने का माद्दा रखें .
               " मैंने पूछा,मैं कौन हूँ तेरा और उसने शर्मा कर झुका लीं नजरें"-नौजवान दोस्त कुछ इस तरह  की बातें करियर की चिंता से थककर फुर्सत के लम्हों में किया करते हैं.लाख छिपा ले कोई पर किसी की आँखों में लहराती हया की चिलमन छुपती नहीं और अपने दद्दू जब आँगन में टहलते हुए पोखर में  हंसों का जोड़ा देखते हैं ,उनकी आँखों के गुलाबी डोरे चुगली कर कह देते हैं -
                                इजहारे मुहब्बत पर  इस तरह  शर्माए
                                सब उनकी हया मेरी आँखों में उतर आई
शर्म और हया के हिजाब पर कभी गौर कीजिए.टीवी पर आपने कई बार देखा  होगा अपराधियों  को हाथों या रूमाल से अपने चेहरे छिपाते हुए.पर ये झुकी-झुकी निगाहें तेरी देखकर मुहब्बत के इकरार से कैसी शर्म!छोडिये भी...गौर से सुनिए...गुलाबी चिलमन की ओत में छिपा चेहरा क्या गुनगुना रहा है-
                             शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा
                             अब हमें आपके पहलू में ही रहना होगा...
                             
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