गुरुवार, 18 सितंबर 2014

ख़ौफ़ज़दा रहा जब तक जिंदगी से मुहब्बत ना हुई .

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ख़ौफ़ज़दा  रहा जब तक जिंदगी से मुहब्बत ना हुई ...

किसी भी इंसान का मन सागर की तरह होता है .कभी शांत -अबूझ तो कभी भावनाओं का ज्वार - भाटा  उद्दाम लहरों के रूप में जिंदगी की चुनौतियाँ बनकर जूझने पर मजबूर कर देता है.चक्रवात, तूफ़ान,बवंडर .भूडोल और भावनाओं के अनगिनत सुनामी और कटरीना के साथ ही खुशियों की ता- ता-  थैया के अवसर हम सबका मानसिक धरातल सुनिश्चित करते हैं.यही होता है हमारा मेंटल मेक- अप जिसके किसी कोने में छिपे रहते हैं अपने -अपने डर .उहापोह से उपजी झिझक डर बनकर हमारी सोच पर अक्सर हावी होती है.परिवर्तन की चुनौतियों से डरकर खुद को यथा स्थिति में बनाए रखना ही दद्दू और उनके मित्र बुद्धिजीवी के बीच हुई बातचीत का सार है.प्रस्तुत है रिकार्ड की गई उनकी बातों का सारांश .-
 दद्दू:                हर समय भीड़ के बावजूद मेरे मन में अकेलेपन का डर तब तक बना रहा जब तक मैंने स्वयं को पहचानना                          नहीं सीख लिया 
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बुद्धिजीवी:          मुझे भी हमेशा किसी काम में असफल होने का डर रहता था.लेकिन यह डर उस समय दूर हो गया जब यह एहसास हुआ की मै विफल तभी होता हूँ जब सही कोशिश नहीं करता.
दद्दू:                  लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे इस बात का डर मेरे मन में बना रहता था .यह सोच उस वक्त समाप्त हो गई जब मैंने स्वयं तय किया कि लोग तो अपना-अपना नजरिया रखेंगे ही ,मुझे भी तो आगे बढ़ना ही है.फिर क्या था, लोगों के सोचने का डर ख़त्म!
बुद्धिजीवी:            पहले मुझे इस बात का डर था कि कहीं मैं ठुकरा न दिया जाऊं .जब मेरे मन में आत्मविश्वास  बढ़ा अपने " रिजेक्शन  का डर काफूर हो गया.
ददू:                   कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है.इस लोकोक्ति पर मुझे तब भरोसा हो गया जब मैंने सबसे पहले अपने आप पर ही भरोसा करना  सीखा .आत्मविश्वास से उपजा डर तब मिट गया जब यह सोच बनी " विकास करने के लिए किसी न किसी स्तर पर दर्द या तकलीफें बर्दाश्त करनी पड़ती हैं.
बुद्धिजीवी:              आज के ज़माने की अनेक सच्चाइयों से मैं पहले तो डरता रहा झूठ के मुखौटे  के भीतर छिपी  बदसूरती का जब अनुभव हुआ मेरे मन में दो-टूक सच कहने का डर जाता रहा.
दद्दू:                       जानते हो बुद्धिजीवी! जिंदगी के रंग अनगिनत हैं.कभी समाप्त नहीं होंगे.चुनौतियों से डरकर में जिंदगी से ही घबराने लगा था.मैंने की कि अपने आसपास ही ढेर सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने कड़ी मेहनत से चैलेन्ज  स्वीकारे और उनकी जिंदगी में सुख- सम्पन्नता की खूबसूरती छा गई है.बस! उसी पल जिंदगी से घबराना छोड़ दिया.
बुद्धिजीवी:                दद्दू ! यूँ ही एक बार मेरे मन में मौत की अन्जान दहशत समां गई थी.कहीं मैं मर गया तब? लेकिन कुछ पुस्तकें पढने और कुछ अनुभवों से सीखकर यह जान गया कि मौत,जीवन की समाप्ति नहीं यह तो नई जिंदगी की शुरुवात है.अब मेरे मन में यह विचार नहीं आता " मैं अचानक मर गया तब"?   
दद्दू :                         मरने की बात कायर लोग करते हैं.पुराने ज़माने में बुजुर्ग कहा करते थे " पता नहीं मेरे भाग्य में क्या  लिखा है? कम्युनिकेशन स्किल और व्यक्तित्व विकास के जरिए मैंने कुछ बातें समझीं हैं.अब नई जनरेशन से यही कह सकता हूँ          " अपने भाग्य का विधाता इंसान खुद होता है." मैंने तो भाग्य से डरना  कब से छोड़ दिया है.अपनी जिंदगी बदलने की क्षमता इन्सान में बुनियादी रूप से होती है.आवश्यकता मात्र उसे पहचानने की  है.
बुद्धिजीवी:                   दद्दू!   मैं जवान था तब " प्यार" शब्द से  पहले - पहले घबराता था." उसके  प्यार ने " मेरे दिल में वो रेशमी एहसास जगाया की मेरे भीतर का अँधेरा दूर हो गया और जिंदगी प्यार से तर- ब-तर हो गई.
दद्दू;                         जब मैं छोटा था मुझे लोगों के उपहास का डर था- सोचता था, " कहीं लोग मुझ पर हसेंगे तो नहीं? " यह डर ख़त्म हो गया जब मैंने अपने आप पर हँसना सीख लिया.
बुद्धिजीवी;                अपने अतीत से डरता था में जब भरोसा हो गया के मेरे वर्तमान को वह नुकसान नहीं पहुँचाएगा ,वह आखिरी डर भी समाप्त हो गया.झिलमिलाते सितारों की रौशनी का सौन्दर्य ,चाँद की मौजूदगी में निहारने के बाद ही अब मुझे अँधेरे से जरा भी डर नहीं लगता.अब आप ही बताइए कि अपने बारे में क्या ख्याल है आपका?
                                          अपना ख्याल रखिए           
                                                                                  किशोर दिवसे  
                                                                                  मोबाईल; 9827471743             
                                                     
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