गुरुवार, 2 जून 2011

आइना छोडिये आईने में क्या रक्खा है?

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आईना छोडिये आईने में क्या रक्खा है?
"लेकिन वह अफसर ईमानदार था "  दद्दू कहने लगे"दफ्तर में चापलूस और बेईमानों के कुनबे ने लगातार उसके खिलाफ साजिशें रची.फिर होना क्या था ... राजनैतिक दाव-पेंच में फंसाकर उसपर ऐसे आरोप साबित किये गए के नौकरी से हाथ धोना पड़ा था उस नादाँ को."
              " वह तो सीधा आदमी  था लेकिन ऐसे कई लोग हैं जो जहाँ रहते हैं करप्ट रहते है और ऊपर से सीधा दिखने का ढोंग करते है. इन्हें पहचानना भी तो मुश्किल है ... बाजार में ऐसे खोटे सिक्के काफी चल रहे हैं "
"ठीक कह रहे हो  यार!आज के ज़माने में किसी पर भी "सीधे आदमी का ठप्पा न लगे.उसे तेज तर्रार और व्यवहारिक होना ही चाहिए. वर्ना दफ्तरों  की पालिटिक्स खा जायेगी ."
" सबसे बेहतर तो ये है कि अपना काम परफेक्ट हो जिससे कोई  भी अंगुली उठाने की जुरअत न कर सके.. . 
खैर!जब भी सीधे इंसान के साथ बेइंसाफी होती है तब ऐसा लगता है कि-
                         वो कत्ल हो गया बदसूरतों की महफ़िल से 
                        जो सारे शहर के आईने साफ़ करता था 
आइना साफ़ कर जैसे ही मेरी नजर उसपर पड़ी एक पल सोचने लगा था ( शायद आपने भी कभी सोचा होगा , अगर नहीं तो सोचिये)कि- कमबख्त ! मुआ आईना सर के बालों से लेकर पैर के नाखूनों तक अंग-अंग की चुगली किये बगैर नहीं मानता.कहते हैं न आईना सच्चाई बयान करता है और हर किसी के सामने एक आईना जरूर होता है.अगर अपने चेहरे के दाग देखकर दिल में घबराहट होने लगे तब गंभीरता से सोचिये अपने दिल-दिमाग के बारे में.चूंके आईना  हकीकत बयां करता है इसलिए 
                         दाग-धब्बे अपने चेहरे के मिटा 
                        आइना धोने की नादानी ना कर
दरअसल नादान और बेअक्ल वे लोग होते है जो इस बात को समझकर भी अनदेखा करते हैं की भला  या बुरा आईना मुंह पे कह देता है .वही  कहता है जो साफ़ और पारदर्शी होता है .कभी-कभी तो अपने भी परायों सा बर्ताव करने लगते हैं तब तन्हाइयों में आईना देखकर तसल्ली होने लगती है कि इस घर में  हमको कोई जानता भी  है . लेकिन जब दिल में खुशियाँ भरी हों और वह भी लम्बे अरसे तक दुःख बर्दाश्त करने के बाद,तब यकीन मानिये आप आईना देखकर गुनगुनायेंगे 
                     अपना हर अंदाज आँखों को तरो-ताज़ा लगा
                     कितने दिन के बाद मुझको आइना अच्छा लगा
आईने में खुद को देखना उनको बड़ा अच्छा लग रहा था .तभी तो न जाने कितनी देर से क्या बातें कर रहे थे अपनी ही आँखों से! और चुपके से  जब मैंने  झिर्रियों से झाँका तब सदके जाऊं!!!.... वो आईने में ऐसे महसूस  हो रहे थे जैसे कोई तस्वीर अंगड़ाई लेकर मीठी-मीठी बातें करने लगी हो.फिर भला हम कैसे खुद को रोक पायें यह कहने से कि-
                      आईने में वो अपनी अदा देख रहे हैं 
                     मर जाये की जी जाये कोई उनकी बला से 
बला बनकर जब कोई किसी की यादों में होती है तब आईने में उसका अक्स दिखाई देने लगता है.यूं की अगर वह कोई " दिलजला "हो तब आईने में अतीत के अनगिनत लम्हे कैद मिलते है.पत्थर की खदान बन जाता है उस दिल जले का दिल जहाँ से रिसते लहू के बीच तलाश करता है  वह अपना  कातिल.लेकिन फौलादी जिगर के लोगों का हौसला बुलंद  होता है -" मैं वो  बला हूँ जो शीशे से पत्थर को तोड़ता हूँ." वे सीना ठोंकने से नहीं चूकते यह कहकर कि  -
            दुश्मनों में रहकर भी अज्में जवां रखता हूँ मैं
             पत्थर का शहर ,शीशे का   मकान रखता हूँ मैं
वैसे बात न तो पत्थर  के शहर की थी या शीशे के मकान की.दद्दू को चिढ उन  लोगो पर आती है जो आईने में खुद अपना चेहरा नहीं देखते ( या देखकर भी पूरी बेशर्मी से इनकार करते हैं अपनी बदशक्ली से.वे दूसरों को आइना दिखने  की बात करते हैं.खुद बनेंगे धन पिशाच और दूसरों को देंगे सादगी  की शिक्षा.अपने दद्दू कहते हैं" दर्पण झूठ न बोले.आइना हमेशा सच ही बोलेगा.किसी दुसरे को आइना दिखने से पहले अपनी शक्ल आईने में देखना जरूरी है.ठीक उसी तरह जैसे हम जब एक अंगुली किसी की तरफ दिखाते है तब तीन अंगुलियाँ हमारी तरफ  होती है. ब्वायज एंड गर्ल्स... आप लोगों को तो एक-दूसरे की आँखें ही आईना नजर आती है... ऐसा क्यों न हो! उम्र का तकाजा भी है...फ़िल्मी गीतों में कहा गया है- आईना वही रहता है, चेहरे बदल जाते हैं.....कुमार शानू ने अपने खूबसूरत अंदाज में गाया है-
                  आईने के सौ टुकड़े करके हमने देखे हैं
                      एक में  भी तनहा थे सौ में भी अकेले हैं 
                                       खैर इस मांमले में तो कई लोग किसी भी उम्र में हसीं आँखों को आईना बना लेते हैं. फिर भी  हर उम्र का बंदा इस बात को अपने दिल में लाक कर ले कि-
                  किरदार अपना पहले बनाने की बात क़र
                 फिर आइना किसी को दिखने की बात कर
यह आज का सच है - हम लोग नई लाइफ स्टाइल में इतने ब्यूटी कांशस हो गए हैं कि आईने के बगैर काम ही नहीं चल सकता.सजना संवरना भी तो जरूरी है की नहीं... प्रेसेंटेबल भी तो बनाकर रखना होगा न!
                 लो!... भला यह क्या बात हुई ?आईने की बाते क्या चली की आप खुद आईने में अपना ही चेहरा देखने लगे!" क्या कहा? अखबारनवीस  ! आप हमें समझाइश देने वाले कौन होते हो?हम आपके हैं कौन?"अरे अरे.. नाराज क्यों होते हो?मैंने तो आपको अपना समझकर कहा था.यकीन नहीं आता?जरा अपने कान इधर लाना सुनो मैं तुम्हारे कानों में कहता हूँ-
                     आपको मैंने  निगाहों में बसा रक्खा है
                     आइना छोडिये, आईने में क्या रक्खा है?
                                                                                                 
                                                                                  अपना ख्याल रखिये...
                                                                                                  किशोर दिवसे 
             


                     

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3 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय किशोर दिवसे जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !
    नमस्कार !

    रोचक पोस्ट के लिए आभार और बधाई !

    एक शे'र हमारा भी झेलिएगा :)
    शाइरों की सोच का सामान तो नहीं ?
    आइनों में देखिए हैवान तो नहीं ?


    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. सिर झुकाया और झांक लिया.

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  3. आईना हूं तेरा, क्यूं इतना कतरा रहे हो..

    सच ही कहूंगा, क्यूं इतना घबरा रहे हो..

    #अंकित_आजाद_गुप्ता

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