बुधवार, 17 सितंबर 2014

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किस्सा बाबा चतुरानन्द और टुन्नी राम का ...!
" यार अखबारनवीस!लोग आजकल इतने मतलब परस्त हो गए हैं की तभी मिलेंगे जब कोई काम होगा।एक-दुसरे  से सुख-दुःख की बातों का रिश्ता ही नहीं रहा।"-दद्दू आज कुछ दुखी होकर बोल रहे थे।
              " हाँ दद्दू!तभी तो जिधर देखो हर इंसान आपा आपा-- धापी में दिखाई देता है।बैठकर सुकून से घर-परिवार की बातें करने की फुर्सत किसी को नहीं।एक तो वैसे ही जिंदगी की रफ़्तार पहले से काफी तेज हो चुकी है ,उसपर "टीवी मेनिया" ने बतरसिया जमात को न जाने कहाँ गुम  कर दिया है!किस्सागोई जो किसी वक्त हर लिहाज से रिश्ते मजबूत बनाने और समझाइश देने की कड़ी  हुआ करती थी उसके लिए किसी के पास वक्त नहीं।"- मैंने दद्दू की बात पर हामी भरी।" इसका यह मतलब नहीं की काम छोड़कर गप्पें हांकने लग जाये।जैसा की अक्सर " आफिस-आफिस " में दिखाई देता है।फिर भी मतलब के साथी या सेल्फसेंटर्ड होने होने के बदले आपस में कभी-कभार किस्सागोई का सिलसिला चलते रहना चाहिए।"
                         हम दोनों ने एक-एक किस्सा सुनने की ठानी और पहली बारी थी दद्दू की- बाबा चतुरानन्द एक बार मूसलाधार बारिश में फस गए थे।कुछ घंटों मने पता चला की जिस होटल में वे रुके हुए थे वह  पानी से घिर गया है।घबराकर बाबा चतुरानन्द उस होटल की छत पर  चढ़कर भगवान्  से प्रार्थना करने लगे।-" हे भगवान् ... मेरी जान बचा लो!मेरी जान बचेगी तभी तो मैं लोगों को धर्म के उपदेश दे सकूंगा!"कुछ ही मिनटों के भीतर एक लाइफबोट उनके निकट पहुंची।खिड़की से झाँककर  जीवन रक्षक बोला," बाबा चतुरानन्द जी!बाढ़ का पानी बढ़ रहा है।.. अभी वक्त है आ जाइये।"
                           " नहीं नहीं।.. मैं यहीं पर रुकूंगा" बाबा चतुरानन्द बोले," भगवान् मेरी रक्षा  करेंगे"..बारिश अभी भी जारी थी।तकरीबन एक घंटे बाद दूसरी नाव  वहां पहुंची। पानी छत पर पहुँचने को ही था।" बाबा चतुरानन्द जी!बाढ़ का पानी बढ़ रहा है।.. अभी वक्त है आ जैसी।"
                       नहीं नहीं।.. तुम्हारा कल्याण हो।भगवान् मुझे इस संकट से छुटकारा दिलाएंगे।" बाबा चतुरानन्द अब भी अपनी बात पर  अडिग थे.शाम तक बाढ़ का पानी छत पार कर चूका था।बाबा छत पर बने बुर्ज के ऊपर जा पहुंचे।चौंककर बाबा चतुरानन्द  ने ऊपर देखा।शासकीय हेलीकाप्टर बुर्ज के चारों  और चक्कर लगा रहा था।
                  " बाबा चतुरानन्द जी!... हम सीधी नीचे लटका रहे हैं।इससे हम आपको ऊपर खींच लेंगे।इसके बाद आपको बचने कोई नहीं आएगा।
" मैं ठीक हूँ" आसमान की और देखकर उन्होंने कहा," मैं जानता हूँ भगवन मुझे अवश्य आसरा देंगे".नौकाएं चली गयी।...हेलीकाप्टर भी उड़ गया।यकायक छत पर बिजली गिरी और बाबा चतुरानन्द " खर्च " हो गए।स्वर्ग के  चमचमाते  दरवाजे पर पहुंची बाबा चतुरानन्द की आत्मा।गुस्से से उबल रही थी।" आखिर में हुआ क्या!" आत्मा चीख पड़ी ," मैंने सोचा था भगवान् मुझे बचने आएंगे".भगवान् बड़े व्यंग्य से मुस्कुराये।.. इतने में ही दिव्य आकाशवाणी आसमान में गूंजने लगी-" ओह! बाबा चतुरानन्द ...मैंने ही आपके लिए मनुष्यों के माध्यम  से दो नौकाएं और एक हेलीकाप्टर भिजवाया था।!
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अब मेरी बारी थी, सो एक किस्सा मैंने भी ढील दिया।टुन्नी राम आदतन शाम के बाद से टुन्न थे।फिर भी एकाध पेग की तलब हुई और पहुँच गए बार में।टुन्नी राम की टेबल पर पेग रखा हुआ था और सुकराती  स्टाइल में कहीं शून्य में घूर रहे थे।आधा घंटा यूं ही गुजर गया।
                        यकायक ट्रक  ड्राइवर संता सिंह उसी टेबल  पर पहुंचे जहाँ टुन्नी राम पर फिलासफर की आत्मा सवार  थी।आव न देखा  ताव,बांह चढ़ाई और एक ही सांस में संता सिंह ने हलक में उड़ेल लिया वह पेग।टुन्नी राम अपने आप में लौटा।.." आप मेरा पेग  चढ़ा गए पापे!!आप पैसे वाले हो ... ये आपने क्या किया?"
ओये!! रोता क्यूं है बादशाहों!एक पेग की ही तो बात है... तेरे लिए अभी मंगा देता हूँ"-संता सिंह मूंछों पर ताव देते हुए बोले।टुन्नी राम का नशा हिरन हो गया  था।," बात वो नहीं है पाजी!आज मेरी जिन्दगी  का सबसे मनहूस दिन है।पहली बात-मैं आज देर  तक सोता रहा।देर से दफ्तर पहुंचा तो बॉस ने जमकर बत्ती दी और एक दिन की छुट्टी करवा दी।दफ्तर के बाहर आया तो स्टैंड के बाहर रखी  स्कूटर चोरी हो गयी।रिक्शे से घर पहुंचा ,उसे पैसे दिया और पर्स रिक्शे में ही गिर गया।.. घर के भीतर गया तो देखा..घर खुला हुआ था।पडोसी ने बताया ...बीबी किसी के साथ भाग...!वहां  से बार पहुँचने से पहले मैंने तय कर रखा था ,"अब जहर खाकर मर जाऊंगा।अपने पेग में मैंने जहर डाल  दिया था और अपने बारे में सोच रहा था ...आप आये और बिना पूछे वह पेग चढ़ा लिया।..!!!                  

 अपना ख्याल रखिये।..
                      किशोर दिवसे 
                                                     





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