मंगलवार, 23 सितंबर 2014

घर को लगी आग घर चिराग से

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 ये लो इसे  कहते हैं घर को लगी आग घर  चिराग से। पीएमओ और मीडिया के रिश्ते में खटास की खबर तो काफी पुरानी हो चुकी थी। मीडिया की बौखलाहट   इस मुद्दे पर भी थी कि  पीएम मीडिया को उतनी तवज्जो क्यों नहीं दे रहे है जितनी अमूमन प्रत्येक प्रधानमंत्री दिया करते थे .।  पीएम के विदेश दौरे पर मीडिया दिग्गजों और कुछ अखबार मालिक भी साथ हुआ करते थे। अब अचानक क्या हुआ कि  पीएम की रणनीति बदल गयी? इसका हिडन एजेंडा क्या हो सकता है? यह दूरी बनाने का राज! वो क्या कहते हैं-  किसकी दाढ़ी में तिनका!
              खैर पीएम की माया पीएम जानें।   देखिये-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनसंपर्क कार्यालय की कार्यशैली पर संघ परिवार के ही सदस्य संगठन-अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने सवाल उठा दिया है। पंचायत ने कहा है कि यह कैसा कार्यालय है जहां आवेदनों की न रिसीविंग दी जा रही है और न किसी प्रकार की सूचनाएं मिल रहीं हैं! समस्याओं को लेकर पहुंच रही जनता कार्यालय के कामकाज के ढंग से निराश दिख रही है। यह निराशा धीरे-धीरे तीखी प्रतिक्रिया में बदल सकती है। यह भाजपा के लिए घातक हो सकता है।

ग्राहक पंचायत के तीखे पत्र से भाजपा में हड़कंप की स्थिति है। 14 सितंबर को काशी आए आरएसएस के पूर्व प्रवक्ता और वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने भी हिदायत दी थी। उन्होंने कहा था कि कार्यालय सिर्फ आवेदनों का संग्रहालय बन कर न रह जाए। लोगों को कुछ होने का आभास भी होना चाहिए। वैसे, खुलने के 3२-३3 दिनों के बाद कार्यालय अपनी छाप नहीं छोड़ पाया है। समस्याओं के संबंध में सिर्फ आवेदन बटोरे और पीएमओ को संदर्भित किए जा रहे हैं। उनका फॉलोअप नहीं हो रहा है। आवेदक के लिए मालूम करना कठिन है कि उसकी समस्या के समाधान की दिशा में क्या प्रयास हो रहे हैं।

इस बार ग्राहक पंचायत के अध्यक्ष संजीव कुमार गुप्ता ने शहर में बिजली संकट के बहाने कार्यालय पर सवाल उठाया है। वह खोजवां में रहते हैं। शहर के प्राचीन मोहल्लों में एक खोजवां संघ और भाजपा का गढ़ माना जाता है। गुप्ता के पत्र के अनुसार, लोगों को प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में रहने का आभास नहीं हो रहा है। गंदगी, अतिक्रमण, जाम और बिजली-पानी की समस्याएं पहले जैसी ही हैं।
भाजपा के कार्यकर्ताओं व समर्थकों को विपक्षी ताना मारते हैं-अरे, हम तो मोदी जी के गांव में रह रहे हैं। ऐसी बिजली कटौती तो गांव में होती है। पंचायत ने पीएम से समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी हस्तक्षेप पर जोर दिया है ताकि जनता का विश्वास भाजपा पर बना रहे। आरएसएस ने ग्राहक पंचायत की स्थापना उपभोक्ता कानून और अधिकारों के प्रति जनसामान्य में जागरूकता के लिए की।

आमतौर पर ग्राहक पंचायत 'लाइम-लाइट' में नहीं रहती लेकिन देश के आर्थिक सामाजिक परिदृश्य में बदलाव के बाद उसकी सक्रियता बढ़ी है। बाजारवाद के दौर में उपभोक्ता हितों के संरक्षण के लिए यह आरएसएस का पहरुआ संगठन है।संघ के पहरुआ संगठन में यदि इस तरह का नैराश्य है तब तो भाई खतरे  घंटी बजनी शुरू समझो। अब नजर ऊँट की करवट पर!

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