रविवार, 17 जुलाई 2016

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इंसान अपना मूल स्वभाव पूरी तरह नहीं बदल सकता?
Human being cant completely transform its original behavior


इंसान और संस्कृति के ढांचे के बीच गहरा रिश्ता पहले था, शायद अब भी  है। यही रिश्ता समाज व्यवस्था से  भी उतना ही जटिल  है। इंसान समाज व्यवस्था से समझौता कर उसे स्वीकार कर सकता है। इन समझौतों की प्रक्रिया  दौरान वह खुद को कमजोर  और ,नपुंसक बनाकर आम तौर पर प्रतिक्रिया देता है। बिरले होते हैं जो ऐसे लिजलिजी प्रतिक्रिया  नहीं  देते।  कालांतर में यह  विस्फोटक होती है। इंसान काम वासना का दमन करने और ब्रह्मचर्य की सख्ती सिखाने  वाली संस्कृति से भी समझौता कर सकता है। प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड के मुताबिक़ यह समझौता प्रक्रिया मनोविकार के लक्षण हैं। जिस संस्कृति का ढांचा मानव  के मूल स्वभाव के विरुद्ध होता है उसके खिलाफ बौद्धिक या भावनात्मक आक्रोश मानव की सहज अभिव्यक्ति भी है। आश्चर्य जनक ढंग से इन प्रतिक्रियाओं का पटाक्षेप उस सांस्कृतिक ढाँचे  परखच्चे उड़ने में  .देखा गया है। इसकी बुनियादी वजह यही है कि इंसान अपना मूल स्वभाव पूरी तरह नहीं बदल सकता।
          Homo sapien and culture are integrally related entities .So is the complex relation of human being with social systems .Traditionally its observed that during the process of compromises human beings react in a feeble ,somewhat impotent reaction due to orthodox approaches . Human beings may   due to pressures of traditions ,compromise with the culture that stresses upon suppression of  libido and practicing celibacy. Reknowned psychologist Sigmund Freud opines that such process of  involuntary compromise  results in to symptoms of chronic psychological disorders.
                    The infra structure of society which is tightly interwoven around against  the fundamental nature of human being  commonly observed phenomena is occurance of emotional or intellectual furore  and aggression .The resultant climax is gradual disintegration and rebellion against that societal infrastructure turning it in to mega debries of orthodox hypotheses.The basic cauz of this havoc is the fact that "Human being cant completely transform its original behavior .

बुधवार, 6 जुलाई 2016

Hi folks ...... you must know who were born today

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 Some amazing personalities of the world were born today on july 6th . The first one is Tenzin Gyatso popularly known as Dalai Lama . !4 th Dalai Lama is religious guru and head of Tibbet .He was born on 6th July at Takaster He had received  Nobel prize for peace  Second one is politician ,George Walker Bush (born July 6, 1946) is an American politician who served as the 43rd President of the United States from 2001 to 2009 and 46th Governor of Texas from 1995 to 2000. The eldest son of Barbara and George H. W. Bush, he was born in New Haven, Connecticut.
           Next is Nancy Reagan ,Actress ,wife of American ex-president Ronald Reagan , who wrote some books too.Famous actor  and script writer Sylvestor Stellone was also born today .Painter Frida Kahlo ,Navigator John Paul Jones ,who wrote  Life and correspondence of John Paul Jones were also born today. The most dashing heart throb of Bollywood in India Ranbeer - you must say happy birth day to him today ....right !




तियामत, समंदर की देवी

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तियामत, समंदर की देवी

बेबीलोन के मिथकों में तियामत विशालकाय मादा ड्रेगन है.समंदर के उद्वेग का प्रतीक.समस्त देवताओं और देवियों में आदिकालीन.उसका पति है आपसु,धरती के नीचे ताजा जलराशि का गड्ढा.उन दोनों  के सहवास से देवताओं की पहली जोड़ी पैदा हुई.उनका नाम था लछमू और लछामू.
ये थे अंसार और किसार के माता पिता, यानी अनु और इयार दादा दादी.2000 बीसीई पूर्व लिखे गए अनुमा एलिश नाम के ग्रन्थ में उल्लेख है कि उनकी संतानों ने तियामत और आपसु को अत्यधिक परेशां किया.नतीजतन, लछमू और लछामू ने बच्चों को खत्म करने की साजिश रची.इया को पता चलते ही उसने सोते वक्त आपसु को मार डाला.
गुस्सा भड़का और तियामत ने पति की मौत का बदला लेने की ठानी.उसने दैत्याकार जीवों की सेना तैयार की. तियामत का नया पति किंगू था , वही उसका बेटा भी था.आखिरकार तियामत मर्दुक नाम के ताजा झील वाले बेबीलोन के युवा देवता से हार गई. मर्दुक ने तियामत का शरीर दो टुकड़ों में काट दिया.
जिस्म के ऊपरी हिस्से से आकाश और निचले हिस्से से धरती बनी. तियामत के शरीर के पानी से बादल बने और आँसुओं से टिगरिस और यूफ्रेट्स के जलस्रोत.बाद में किंगू की भी मौत हो गई और उसके रक्त से मर्दुक ने पहले इंसान को बनाया.
तियामत को शैतान ड्रेगनों की रानी ,उसका प्रतीक है पांच सर वाला ड्रेगन.तियामत को कई बार गहरे बालों वाली चुड़ैल की तरह भी दर्शाया गया है.तियामत को आपमे भाई बहामुत का प्रतिद्वंद्वी भी बताया गया है.
तियामत की पूजा करने वाले, शैतान ड्रेगनों से दुनिया को आच्छादित करने का संकल्प लेते हैं.एक कोबोल्ड  मिथक के मुताबिक तियामत ने कुछ अंडे दिए,बुरी तरह जख्मी होने की हालत में  एक अंडे से कुर्तुलमक पैदा हुआ.
मिथकों के मुताबिक़ नौ नरकों और आसमान में तियामत के जाने पर बहामुत ने बंदिश लगा दी थी.अनेक वीडियो गेम्स में भी तियामत का किरदार अपनाया गया है.Dungeons and Dragon टीवी सीरीज में तियामत, वेंगर की कट्टर दुश्मन है जो नायकों को कड़ी चुनौती देती है.

सोमवार, 4 जुलाई 2016

बिलासपुर मूल के गायक-संगीतकार अरनब चटर्जी की जिंदगी के साज पर सवालों की आवाज

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" हमारे देश में बहुत गुणी  कलाकार हैं और संगीत को प्रोत्साहन मिलता हुआ देखा जा रहा   है"
बिलासपुर मूल के गायक-संगीतकार अरनब  चटर्जी  की  जिंदगी के साज   पर सवालों की आवाज

"छोटी सी ये दुनिया ,पहचाने रास्ते हैं, कभी तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल...."..किशोर दा  के इस सदाबहार गीत के बरक्स मेरी मुलाक़ात  अरनब चटर्जी से होती है , बिलासपुर का यह संगीत साधक मुंबई में स्थायी होकर  अपना सिक्का जमाने लगा है। अब अरनब से मुलाक़ात हो और उनके संगीत के सफर की यादें ताजा  न हों, यह कैसे हो सकता है?लिहाजा कुछ रू-ब -रू  और कुछ बजरिये ई -मेल, बिलासपुर से माया  नगरी मुंबई तक उनसे संगीत सफर की यादों  के दरीचे खुले। " हमारे देश में बहुत गुणी  कलाकार हैं और संगीत को प्रोत्साहन मिलता हुआ देखा जा रहा   है"-इस कदर हौसला अफ़्जाई से सराबोर उनकी  जिंदगी के शीरीं-तल्ख़ तजुर्बे  से जुड़े  सवालों की सरगम आपके पेश-ए -नजर है -

 किशोर  - संगीत सीखने की  शुरुआत कब की?कैसे ? आपकी प्रेरणा ? परिवार में कोई अन्य इस क्षेत्र में हैं ?
 अरनब -बचपन से ही संगीत सीखने में रूचि थी। लेकिन संगीत सीखना शुरू किया जब मैं कॉलेज में था।सकरी गांव में  दोस्तों के  साथ गाना  गाने गया था। लौटने में काफी देर हो चुकी थी। माँ मेरी चिंतित थी। घर पहुंचकर जब माँ  से कहा कि मैं संगीत सीखना चाहता हूँ , मां ने कहा अगर संगीतकार बनना है तो संगीत सीखो। और , इस प्रकार मेरी यात्रा शुरू हुई। मेरी प्रेरणा गजलगायक  स्व. जगजीत सिंह जी हैं। हमारे परिवार में  हर किसी को कला से लगाव था और आज भी है। माँ , बाबा हमें  बचपन में हर फ़ंक्शन में ले जाया करते थे। चाहे वो नाटक हो ,जात्रा हो ,म्यूजिक हो ,.साहित्य से सम्बंधित कोई कार्यक्रम हो। जिसका फायदा हमें आगे चलकर मिला।


किशोर  -अपनी उपलब्धिया .? पुरस्कार और अवार्ड आदि। कोई खास अनुभव ?कोई समझौते  या डिमोरलाइज़ किये जाने के प्रसंग?

अरनब  -म्यूजिक अल्बम /टीवी सीरियल/फिल्म्स/रेडियो। एचएमवी से देशभक्ति गीत " तेरी जय हो वीर जवान " गायक  साधना सरगम ,जसवंत सिंह ,उद्भव ओझा  , शेखर सेन ,गीतकार अलबेला खत्री ,म्यूजिक अरनब चटर्जी।टी  सीरीज से   भजन " देवो में देव " गायक अनूप जलोटा,गीतकार मदन पाल ,  इखलास खान ,अंशु बख्शी ,संगीत अरनब चटर्जी। टी  सीरीज से गजल " मेरे ख़्वाब"गायक जसवंत सिंह ,गीतकार मदन पाल ,संगीत अरनब चटर्जी।
 मेग्ना साउंड से गुजराती भजन " प्रभु तारा नाम हजार "गायक नितिन मुकेश ,आशित  देसाई ,जसवंत सिंह ,,शेखर सेन शेखर सेन ,बाबुल सुप्रियो ,विनोद राठोड ,,गीतकार यतिन शाह, संगीत अरनब चटर्जी।अबरोल साउंड क्राफ्ट से भजन " विघ्नहर्ता " ,गीतकार सुरेश वाडकर ,साधना सरगम ,सुनील सोनी ,शुरजो  भट्टाचार्य ,गीतकार मदन पाल ,संगीत अरनब चटर्जी। छत्तीसगढ़ी फिल्म " झन  भूलो माँ  बाप ला ",गायक सुनील सोनी ,नारायण ग्वाला ,प्रिया  भट्टाचार्य ,पीटी उल्लास,संजय जैन ,,फिल्म निर्देशक सतीश जैन ,संगीत अरनब चटर्जी। हिंदी  मराठी फिल्म" ब्रेव हार्ट "गायक सुरेश वाडकर ,साधना सरगम ,गीतकार श्रीकांत भोजेवार,फिल्म निर्देशक दास बाबू , संगीत अरनब चटर्जी। शार्ट फिल्म " द ट्रुथ बिहाइंड ",फिल्म निर्माता आशित  चटर्जी ,,पार्श्व संगीत अरनब चटर्जी। डॉक्यूड्रामा फिल्म " सोनू और  सोनपरी "  फिल्म निर्माता दिनेश लखनपाल , संगीत अरनब चटर्जी। डीडी भारती   चैनल पर डॉक्यूमेंटरी फिल्म- वर्ली आर्ट/ बंधनी/थेवा  आर्ट।  फिल्म निर्माता दिनेश लखनपाल ,संगीत अरनब चटर्जी। डीडी सह्याद्री पर मराठी चैनल सांपला /मित्र ह्याला जीवन ऐसे नाव/बामनाश्रम।  निर्देशक दासबाबू ,टाइटल म्यूजिक अरनब  चटर्जी। इनसिंक चैनल मुंबई का एकल गीत वीडियो निर्देशक आशित  चटर्जी , शायर इखलास खान , गायन व् संगीत अरनब चटर्जी। आकाशवाणी" रागम " चैनल भजन , संगीत निर्देशक अरनब चटर्जी।
सम्मान व् सम्मानपत्र
1. छत्तीसगढ़ी फिल्म झन भूलो माँ  बाप ला सिल्वर जुबली ट्रॉफी,बतौर म्यूजिक डायरेकटर  .,फिल्म निर्देशक सतीश जैन
2. चक्रधर समारोह रायगढ़ 2014  में स्मृतिचिन्ह व् सम्मान पत्र
3. छत्तीसगढ़ हेरिटेज महोत्स्व महोत्सव 2015 ,रायपुर में स्मृतिचिन्ह
4. आईएनएस हमला मुंबई ,में देशभक्ति गीत रिलीज होने के वक्त स्मृतिचिन्ह I
5. जादबपुर एलमनी कुवैत चैपटर में कुवैत सऊदी अरब चैप्टर मोमेंटो
6. शार्ट फिल्म द  ट्रुथ बिहाइंड में संगीत सम्मान
7. छत्तीसगढ़ रत्न अवार्ड ,,बिलासपुर सीेएलएसयूएस
8.  रेडियो मुंबई द्वारा अप्रूव  म्यूजिक कम्पोजर

किशोर - शास्त्रीय और फ़िल्मी संगीत की  वर्तमान दिशा और  दशा।
अरनब --दोनों की दिशा और दशा अच्छी है। जो भी परिवर्तन आज दिखाई दे रहा है उसे यूं समझना चाहिए कि परिवर्तन हमेशा अच्छे के लिए होता है। हमको हमारे जमाने में जो होता है वो अच्छा लगता   है,लेकिन ऐसा नहीं है। आज के जमाने में यंग  स्टार्स शास्त्रीय संगीत बहुत अच्छा गा रहे हैं।   बल्कि शास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत को मंच पर एक साथ प्रस्तुत कर और लोकप्रिय बन रहे हैं। आजकल तरह तरह के एक्सपेरिमेंट होने लगे हैं। जिसका आनंद श्रोता ज्यादा उठाने लगे हैं।  पूरी तरह से कहानी पर निर्भर होता है। उसमें बहुत परिवर्तन आया है। जो आज के बच्चों को बेहद पसंद है।

किशोर --. मुंबई में संघर्ष करने वाले युवा संगीतकारों को मायानगरी कितना प्रोत्साहित करती है?

अरनब ---मायानगरी अर्थात कलाकारों की नगरी। चकाचौंध भरी नगरी।  युवा संगीतकारों को माया  नगरी  वरिष्ठ कलाकारों का प्रोत्साहन मिलना चाहिए जो नहीं मिलता। हर कोई  नया आता है, पहली बार आता हैचीरे धीरे मेहनत करते करते परिपक्व होता जाता है। फिर वह नए संगीतकारों व् कलाकारों को भी उसी कठोर रास्ते से गुजारने पर मजबूर  है। .कुछ लोग चल पाते हैं कुछ लोग लौट जाते हैं। जो लौट जाते हैं उनमे से कुछ महान कलाकार भी होते हैं। जो रह जाते हैं साधारण कलाकार भी होते हैं जैसे मैं। कुल मिलाकर मेरा व्यक्तिगत अनुभव इस मामले में बहुत बुरा है।

किशोर ---संगीत का मनोविज्ञान ,विज्ञानऔर थेरपी (इलाज) से अन्तर्सम्बन्ध?
अरनब ----संगीत साधना की  कला है। ऋषि मुनि भी संगीत साधना किया करते थे। जो संगीत की सच्ची साधना करता है वह ऋषि मुनियों से  कम नहीं। संगीत मन को सुकून देता है। उदासी में संगीत आपकी दवा होती है। जब आप खुश हैं तब संगीत आपका साथी होता  है। आपको पता भी नहीं होता कि कब कहाँ कैसे संगीत आपको बिना बताये दवा और दुआ के रूप में कार्य कर जाता है।

किशोर --- .संगीत  में  " फ्यूजन "के क्षेत्र। …क्या इसे बढ़ावा मिलना चाहिए  ?

अरनब ---संगीत में फ्यूजन का जुड़ना एक नयी शैली जैसा है। जैसे 1. शास्त्रीय संगीत। 2 . अप शास्त्रीय संगीत 3 .सुगम संगीत 4 .फोक संगीत 5 .फ्यूजन संगीत 6 .एक ही थाली में आपको अनेक तरह के व्यंजन प्राप्त होने जैसा है। आजकल श्रोताओं को फ्यूजन  का  आनंद उठाते ज्यादा देखा जाता   है।
किशोर --- . संगीत  , वाद्य और प्रकृति  में क्या अंतर सम्बन्ध आप देखते हैं ?
अरनब ---तीनों में ईश्वर है।

किशोर ----   संगीत  को क्या तनाव शैथिल्य की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जा सकता है?

. अरनब ---मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जो बाथरूम में या अपनी आप ही गाना  गुनगुनाते हैं , चाहे उनकी आवाज अच्छी हो या न हो।वे गाने गुन गुनाकर रिलेक्स महसूस करते हैं। कई ऐसे रागो में आबद्ध गीत हैं जो रक्त चाप को नियंत्रित करने में सहायक हैं। आपको मालूम होगा कि मान की लोरी बच्चे के लिए कितनी सुकून देह होती है ,सुनकर वह सो जाता है। संगीतमय ध्वनियां, गीत , संगीत  निश्चित रूप से तनाव शैथिल्य का कार्य करते  हैं।

किशोर - मुंबई जाकर संगीत के क्षेत्र में अपनी तकदीर आजमाने वाले युवाओं को आपकी सलाह ?
( कोई विशेष सन्देश  )
अरनब ----जरूर मुंबई जाएँ। ,कोशिश करें। मुंबई  जाने से पहले संगीत सीखकर जाएँ। मुंबई जाकर भी संगीत सीखें  ही  कार्य करते रहें। बिलासपुर ,और छत्तीसगढ़ का नाम रोशन करें। सभी संगीत प्रेमियों को मेरी शुभ कामनाएं  .,गुरुजनों को प्रणाम ,छत्तीसगढ़ को नतमस्तक प्रणाम और जय जोहार!-    किशोर दिवसे
गायक-संगीतकार  अरनब  चटर्जी  contact-09892850562

शनिवार, 12 मार्च 2016

नौजवान दिलो की दो धड़कने जिनका जन्म दिन है आज

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नौजवान दिलो की दो धड़कने जिनका जन्म दिन है आज

बैरी पिया..छलक छलक.....तू चाहिए....आ रहा हूँ मैं....






संगीत और गायकी की कोई सरहद नहीं होती.न ही किसी भौगोलिक बंधन का मोहताज होता है वह.संगीत और गायकी की फिजाँ भी ऐसी ही होती है जो सुनने वालों को मदहोश कर देती है.गायकी न जात देखती है न पूछती है ,बन्दे!तुम्हारा मादरे वतन क्या है? सम्मोहन सुगंध से सराबोर श्रोता गाफिल होकर बस खो बैठते है अपनी सुध-बुध -और हो जाते है आवाज के जादू में गुम.
यह अफ़साना बयां
किया जा रहा है गायन के क्षेत्र में महारत हासिल दो युवा दिलो की धड़कन का..... ,समूचा युवा वर्ग जिनके गीत बजते ही नाचता ,थिरकता ,फुदकता और रूमानियत के एहसास से अपने ही भीतर खो जाता है दिल के तहखाने में!
श्रेया घोषाल इन दोनों में से एक का नाम है,दूसरा दिलकश है आतिफ़ असलम.कैसा खूबसूरत संयोग है कि दोनों का ही जन्मदिन एक ही रोज यानी 12 मार्च को आता है. एक भारतीय तो दूसरा पाकिस्तानी. सिर्फ एक ही बरस का फ़र्क है श्रेया और असलम की उम्र में.
पहले बात करते हैं श्रेया घोषाल की,1984 में पश्चिम बंगाल के बरहामपुर में पैदा हुई श्रेया मूलतः राजस्थान के रावतभाटा की है,श्रेया के पति उनके बचपन के दोस्त शिलादित्य मुखोपाध्याय हैं.श्रेया बॉलीवुड फिल्मो की मशहूर प्ले बैक सिंगर हैं जिन्हें अब तक 4 नेशनल फ़िल्म अवार्ड 6 फ़िल्म फेयर अवार्ड 5 बेस्ट फीमेल प्ले बैक अवार्ड ,आर डी बर्मन अवार्ड (न्यू म्यूजिक टेलेंट अवार्ड 2003),8 दक्षिण भारतीय फ़िल्म फेयर अवार्ड मिल चुके हैं.
चार बरस की उम्र से ही श्रेया ने गाना शुरू कर दिया था.सोलह बरस की उम्र में उन्हें सा रे ग म प रियलिटी शो में संजय लीला भंसाली ने सबसे पहले नोटिस किया और फ़िल्म देवदास में उनके गाये गीत बैरी पिया.... को फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला.
श्रेया के सदाबहार गीत हैं-अगर तुम मिल जाओ....,बरसो रे...,ये इश्क़ हाय...,छलक छलक.,मोरे पिया,सिलसिला ये चाहत का,डोला रे डोला रे, डोला रे....,उनके बांगला अल्बम बेहद मशहूर हुए.
और भी ढेर सारी फिल्मो में श्रेया ने गीत गाये.जॉयलुकास ज्यूलरी का ब्रांड एम्बेसेडर भी बनीं श्रेया.वाणी जयरामऔर मन्ना दा ने भी श्रेया की प्रशंसा की है.अमेरिकी स्टेट ओहियो के गवर्नर टेड स्ट्रिक्ट लैंड ने 26 जून 2010 को श्रेया घोषाल दिवस आयोजनपूर्वक मनाया. 
युवाओं में उनके गाये गीत बेहद लोकप्रिय हैं.
लोकप्रियता का दूसरा नाम है पाकिस्तान के हर दिल अजीज़ युवा गायक आतिफ़ असलम.वे आकर्षक अभिनेता भी हैं. वजीराबाद में आतिफ़ का जन्म 1983 में हुआ.,जिनके शरीक-ए-हयात का नाम है सारा भरवाना .आतिफ असलम के मशहूर गीत है -ताजदार ए हरम,जिन्दगी आ रहा हूँ मैं,मर जाएँ,लवशुदा,तू जाने ना ,तू चाहिए,कुछ इस तरह, दूरी, बेइन्तहां,पहली नजर मैं रंग शरबतों का, होना था प्यार, तेरे बिन,मेरी कहानी ....और न जाने कितने रोमांटिक गीतों की फेहरिस्त है आतिफ़ असलम के खाते में. पहला डेब्यू परफॉर्मेंस था बोल फ़िल्म में.सावन-इन्डियन म्यूजिक स्ट्रीमिंग सर्विस 2013 के सबसे पॉपुलर गायक बने आतिफ़ असलम. वे तमगा-ए-इम्तियाज हासिल करने वाले सबसे नौजवान पाकिस्तानी गायक हैं.
आतिफ़ असलम,नुसरत फतह अली खान और आबिदा परवीन के फैन हैं.तेज गेंदबाज होना और अंडर
19 ट्रायल्स में चयन क्रिकेट के लिए उनकी दीवानगी को दर्शाता है.
जलपरी के अलावा अपनी पॉकेट मनी से आतिफ ने 'आदत'की रिकार्डिंग कराई,भीगी यादें,एहसास,माही वे,आँखों से,और जलपरी भी दुनिया भर में सुपर हिट रहे.
बताने लायक खास बात यह है कि श्रेया घोषाल और आतिफ असलम ने एक साथ मार्च 2010 में अमेरिका और कनाडा में 10 शो करना तय किया था ,यह जोड़ी इस कदर नौजवान ही नहीं वरन हर दिलो पर छा गई कि 6 शो और बढ़ाये गए.
कहने को तो और भी बहुत कुछ है लेकिन फिलहाल आज के रोज श्रेया घोषाल और आतिफ असलम दोनों को ही गीतों भरी जिंदगी के साथ साथ जन्मदिन भी मुबारक!
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* किशोर दिवसे,KISHORE DIWASE,BILASPUR ,CHHATTISGARH, 

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

क्या विज्ञान या रसायन शास्त्र के किसी छात्र या विज्ञान महाविद्यालय को याद है?

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क्या विज्ञान या रसायन शास्त्र के किसी छात्र या विज्ञान महाविद्यालय को याद है? 9 वी क्लास  से कॉलेज तक रसायन शास्त्र में सभी छात्रों ने आवर्त तालिका (periodic table) पढ़ी होगी। एक रूसी रसानज्ञ और आविष्कारक थे डेमीत्रि इवानोविच मेडेलीफ़  इनका जन्म  8 फ़रवरी 1834 – 2 फ़रवरी 1907 को हुआ था । उन्होंने तत्वों के आवर्त वर्गीकरण का प्रतिपादन किया। इस सारणी का प्रयोग कर उन्होंने उन तत्वों के गुणों का भी पता लगाया जिसकी उसने समय तक खोज नहीं हो सकी थी।
मेंडलीफ का जन्म साइबीरिया प्रदेश के टोबोल्स्क नगर में हुआ था। इनके पिता का नाम इवान पोल्वोविच मेंडलीफ और माता का नाम मारिया दमित्रीयेवना मेंडलीफ था। उनके दादा पावेल मैक्सीमोविच सोकोलोव, रूस के एक चर्च में पादरी थे।

उनकी आरम्भिक शिक्षा टोबोल्स्क जिमनाजियम (विद्यालय) में हुई। मात्र तेरह वर्ष की उम्र में उनके पिता गुजर गए और उनकी फैक्ट्री आग में जल गई। संपत्ति नष्ट होने के कारण उनके परिवार को 1849 में सेंट पीटर्सबर्ग में शरण लेना पड़ा, जहां मेंडलीफ ने मेन पेडागोगियल इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया। १८५७ ई० में मेंडेलीफ़ पीटर्सबर्ग से स्नातक परीक्षा में उतीर्ण हुए और इन्हें एक स्वर्णपदक मिला। स्नातक के बाद उन्हें टीबी हो गया, जिसके कारण वे क्रिमन प्रायद्वीप पर आ गए। फिर, 1857 में स्वस्थ होकर सेंट पीटर्सबर्ग लौटे। इसके बाद दो वर्ष इन्होंने सिमफरोपोल और फिर ओडेसा के जिमनाज़ियमों में अध्यापन कार्य किया। १८५९ ई० में इन्होंने मास्टर ऑव् साइंस की उपाधि के लिये 'विशिष्ट आयतन' विषयक निबंध लिखा। इसके बाद ये दो वर्ष के लिये एक वैज्ञानिक कमिशन के साथ विदेश यात्रा के लिये निकले और १८६० ई० में इन्होंने एर्ल्सरूका में होने वाले 'विश्व रसायन सम्मेलन' में भाग लिया। यात्रा से लौटने पर इन्हें पीटर्सबर्ग टेकनोलौजिकल इंस्ट्टियूट में प्रोफेसर का पद मिला और दो वर्ष बाद ये पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय में रसायन के प्रोफेसर हो गए। यहाँ रहकर इन्होंने २३ वर्ष वैज्ञानिक कार्य और अध्यापन किया। १८९३ ई० में मेंडेलीफ़ की नियूक्ति 'ब्यूरों ऑव् वेट्स ऐंड मेज्हर्स' (तौल माप संस्थान) के Does any student pr professor of science ,particularly Chemistry , or any Science College  remembered Dmitri Ivanovich Mendeleev 
? -( 8 February 1834 – 2 February 1907 O.S. 27 January 1834 – 20 January 1907) . He was a Russian chemist and inventor. He formulated the Periodic Law, created a farsighted version of the periodic table of elements, and used it to correct the properties of some already discovered elements and also to predict the properties of eight elements yet to be discovered..

बुधवार, 20 जनवरी 2016

अमीर और गरीब में असमानता की खाई और भी गहरा गई है।

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अमीर और गरीब में असमानता की खाई और भी  गहरा गई है। लिहाजा अब मसला गरीबी और गरीब नहीं रहा बल्कि अमीरी  की होड़ के चलते  महाअमीर बनने से अमीरो की संख्या कम होने में दिखाई दे रहा है।  ऑक्सफैम रिपोर्ट  मुताबिक़  दुनिया की गरीबतम आबादी की संपत्ति 2010  से अब तक ट्रिलियन डॉलर ( छत्तीस के बाद चौदह शून्य ) घट गई है।  चौंकाने वाली बात यह है की इसी अवधि के दरम्यान विश्व की आबादी में 400  मिलियन की बढ़ोत्तरी हुई।  इसी दौर में दुनिया के अमीरतम 62 रईसों की संपत्ति आधा ट्रिलियन से भी अधिक 1. 76  ट्रिलियन डॉलर बढ़ी।  असमानता की  की वजह से हालिया महामीरों की सूची में शामिल 62   में से सिर्फ 9   ही महिलाएं हैं यानी बाकी 53 पुरुष। दुनियावी स्तर पर अमीर - गरीब खाई  से जुड़ा विमर्श बीती छमाही से जारी है। फिर भी महाअमीर और दीगर दुनिया में नाटकीय रूप से खाई अब ज्वालामुखी का क्रेटर बन चुकी है। बीते बरस दावोस  बैठक में अंदेशा जताया गया था की सारी  संपत्ति दुनिया के सिर्फ 1 फीसदी  महाअमीरों के कब्जे में होगी ,2015 में सही साबित हो गया। अब तक  इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। भारत सरकार की आर्थिक नीतियां मौजूदा केंद्र सरकार के आईने में ग़रीबों के लिए कितनी फायदेमंद हैं ?कितने लाभान्वित हो रहे हैं कार्पोरेट घराने ?क्या देश में अमीरी - गरीबी की खाई कुछ पटने की उम्मीद है?

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

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साहित्य के विकास के लिए मिले साहित्यकार 






बिलासपुर में पिछले कुछ वर्षों से जनवरी महीने की कोई एक सुबह उल्लेखनीय होती है। साहित्य और कला से सम्बंधित लोगों को इस उल्लेखनीय सुबह की प्रतीक्षा हुआ करती है। इस अनौपचारिक आयोजन का यह १० वाँ वर्ष था। 
हिन्दी के एक साहित्यकार सतीश जायसवाल ने अपने कुछ मित्रों के साथ इस अनौपचारिक आयोजन की शुरुआत की थी। उनका कहना है कि यह कोई आयोजन नहीं। बल्कि कुछ ऐसे लोगों का आपस में मिलना-जुलना है जो साहित्य और कला की आपसदारी में भरोसा रखते हैं। और इस समझ को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसकी शुरुआत बिलासपुर के इंडियन कॉफी हॉउस मेँ की गयी थी। कॉफ़ी के साथ किसी एक रचनाकार की कहानी अथवा कविता का पाठ उसमें जोड़ दिया गया। बाद में किसी एक रचनाकार या कलाकार को आमंत्रित किया जाने लगा।  इस वर्ष नगर के एक कलागुरु श्री विसु पिल्लै और ''स्पिकमैके'' के बिलासपुर प्रमुख श्री अजय श्रीवास्तव को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। ''स्पिकमैके'' संगीत और नृत्य कला के क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीय संगठन है। और श्री पिल्लै स्थानीय बच्चों को चित्रकला का निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। 
इस वर्ष यह आयोजन नगर से १० किलोमीटर दूर, बिलासपुर के एक मशहूर अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ० प्रकाश लाडीकर के फ़ार्म हॉउस में सम्पन्न हुआ। डॉ० लाडीकर स्वयं के कवि हैं और कला के प्रति अनुराग रखते हैं। उन्होंने कलागुरु श्री पिल्लै के पास प्रशिक्षण पा रहे बच्चों को लैण्डस्केपिंग के लिए अपने यहां आमंत्रित भी किया। इस अवसर पर उपस्थित, बिलासपुर रेल मण्डल की वरिष्ठ वाणिज्य प्रबंधक श्रीमती रश्मि गौतम ने भी श्री पिल्लै के सामने एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने प्रस्तावित किया कि बिलासपुर रेल मण्डल उनके कलाकारों के लिए एक उपयुक्त स्थान उपलब्ध करायेगा जहां वे अपना काम कर सकेंगे। श्रीमती गौतम न सुझाया कि वहाँ कलाकारों को  काम करता हुआ देखने से नगर में कला चेतना का विकास होगा।  इस अवसर पर बिलासपुर रेलवे ज़ोन के मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक श्री जी० सी० मीणा, चीफ कंट्रोलर श्री विनय चतुर्वेदी, श्री खुर्शीद हयात और भारतीय रेल के श्री तनवीर हसन भी उपस्थित थे। श्री खुर्शीद हयात उर्दू के जाने माने कहानीकार हैं। और श्री तनवीर हसन एक सुलझे हुए कवि हैं। इस अवसर पर उपस्थित वन अधिकारी श्री ओ० पी० चौबे ने भी श्री पिल्लै के कला छात्रों को खोन्ड्रा स्थित नेचर एन्ड एन्वायरनमेंट क्लब भ्रमण के लिए आमंत्रित किया।
हिंदी दैनिक ''बी पी एन टाइम्स'' के राज्य सम्पादक श्री सजीव बिस्वास, पत्रकार श्री अरविन्द शर्मा, श्री रतन जैसवानी, श्री किशोर दिवसे भी इस आयोजन में शामिल थे। एस० ई० सी० एल० के जनसम्पर्क प्रबंधक श्री मिलिंद चहान्डे तथा गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के श्री सत्येश भट्ट इस आयोजन में विशेष आमंत्रित थे। उद्योगपति कवि श्री दलजीत सिंह कालरा, श्री संजय पाण्डेय तथा अरपा फिल्म सोसाइटी के एक संस्थापक सदस्य श्री सुखवंत सिंह भी इस आयोजन में शामिल थे। श्री सिंह ने बिलासपुर में फिल्म दृष्टि के विकास में अरपा फिल्म सोसाइटी के अपने अनुभव सबके साथ साझा किये।

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(रायपुर से प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक ''बी पी एन टाइम्स'' के (बिलासपुर, दिनांक २० जनवरी २०१६ के अंक) में, पृष्ठ १२ पर प्रकाशित यह समाचार, इस अखबार के छत्तीसगढ़ संपादक श्री सजीव बिस्वास के सौजन्य से)। 

सोमवार, 18 जनवरी 2016

कुदरती मधु सर्जक हैं हम....

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कुदरती मधु सर्जक हैं हम....
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उस पंखे पर टंगी है एक
शहद की कुदरती फैक्टरी
न जाने क्यों करती है मजबूर
सोचने पर मुझे आज
जब मैं बैठा हूँ कुछ ही दूर
और छितराई बातों के दरम्यान
सोचने लगते हैं कुछ लोग भी
पर यकायक उठती है एक लहर
उसी हसीं कुदरती फैक्टरी से
आँखें मिलाकर शहदिया कुनबा
पूछने लगता है सरेआम
दोस्त!आखिर इंसान ही रहोगे!
कैसे समझोगे हमारा समर्पण
क्यों सिर्फ खौफज़दा होते हो?
कहीं शिकार न हो जाए कोई बन्दा
अरे!यह भी कभी सोचा तुमने
इंसान तो इंसान के बारे में
बुरा सोचता,करता भी है उसका
बिना जाने और पहचाने भी
शहदिया कुनबा हमारा लेकिन
नहीं देता दंश किसी को भी
जब तक कोई छेड़े न हमें
सो...मत हो ख़ौफ़ज़दा फिजूल
कोई इंसान थोड़े ही हैं हम
मिठास भरते हैं जिंदगी में
कुदरती मधुसर्जक हैं हम
(रविवार 17 january सुबह बिलासपुर में ही डॉ .लाड़ीकर के फार्म हाउस में यह नज़ारा दोस्तों के बीच देखते हुए सोचा था मैंने.....)

शनिवार, 16 जनवरी 2016

"वायुमार्ग " के जरिए विकास सुनिश्चित

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"वायुमार्ग " के जरिए  विकास सुनिश्चित

बलरामपुर- रामानुजगंज  के पास ताम्बेश्वर ग्राम में 13. 32  करोड़ की  लागत से नवनिर्मित्त हवाई पट्टी का लोकार्पण हालिया 14  जनवरी को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने किया है। 1  जनवरी 2012 को अस्तित्व में आया बलरामपुर जिला पहले सरगुजा में शामिल था। तीन वर्ष की अवधि में यहाँ पर हवाई पट्टी  का बनना इस तथ्य को इंगित  करता है कि इस क्षेत्र में विकास  की आवश्यकता को राज्य के राजनैतिक नेतृत्व ने भांप लिया। हवाई पट्टी निहायत जरूरी थी भी क्योंकि 3806  . 08वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पसरा अंबिकापुर ( सरगुजा संभाग ) का यह इलाका धुर नक्सली प्रभावित  रहा है।   यूं तो  सरगुजा में ही नक्सली आमद हो चुकी है  जिसके मद्देनजर बरास्ता हवाई पट्टी तथा शीघ्र ही रेल विस्तार की कार्ययोजना का खाका तैयार किये जाने का  भरोसा मुख्यमंत्री रमन सिंह ने दिया है। वह भी उस वक्त जब वे अपने सम्बोधन में कह रहे थे कि नक्सल समस्या के खात्मे के साथ के साथ विकास हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
          वायुमार्ग ,रेल यातायात  विस्तार तथा सडकों के  आल-जाल की सघनता ही विकास की मुख्यधारा को दूरस्थ ( रिमोट या माइक्रो रिमोट ) क्षेत्र के नजदीक लाती है, यह सिद्धांत विकास पत्रकारिता का सरकारों द्वारा आजमाया गया वैश्विक स्तरीय बुनियादी सिद्धांत है।  लिहाजा रामानुजगंज जिले में हवाई पट्टी का बनना इस क्षेत्र के अलावा निकटवर्ती इलाकों  के विकास को भी गतिशील करेगा। इस तथ्य  में कोई  दो मत नहीं हो सकता। ऐसा इसलिए भी क्योंकि छत्तीसगढ़ का यह उत्तरी क्षेत्र झारखंड की  .सीमा से सटा  हुआ है। रांची तथा रायपुर हवाई अड्डे निकटवर्ती होने की वजह से विकास की संभावना और भी अधिक सुनिश्चित हो जाती है। फिलवक्त  गढवा और अम्बिकापुर  स्टेशन रामानुजगंज जिले के बलरामपुर  हैं। भविष्य की रेल विस्तार योजनाएं निश्चित रूप से प्रभावकारी साबित होंगी।
           समूचा सरगुजा ही  , अपार वन सम्पदा ,ऐतिहासिक पुरावशेषों , खनिज अयस्क ,एडवेंचर स्पोर्ट्स,तथा पर्यटन स्थलों आदि के लिए सर्वानुकूल इलाकों की अवस्थितता की वजह से संसाधन सम्पन्न है। लिहाजा  वायुमार्ग से जुड़ना अवश्य ही विकास को गतिशील करेगा। दरअसल , वायुमार्ग से किसी शहर का जुड़ना इसलिए भी फायदेमंद होता है क्योकि यह उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहित  करता है। अब , यह जवाबदेही सरकार की होगी कि उद्योग ,पर्यावरण सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करें। रोजगार निर्माण के प्रति भी क्षेत्रीय जनमत  का सम्मान करें। बजरिये जनचेतना के उत्प्रेरण ऐसा किया जाना भी चाहिए।
बलरामपुर ही नहीं देश के जिस किसी शहर में वायुमार्ग का विकास हुआ राजनैतिक और समाजार्थिक विकास को भी रफ़्तार मिली. निश्चित रूप से यह भी ध्यान दिया जाना जरूरी होगा कि पुरानी या नयी हवाई पट्टी पर कोई निजी रसूखदार अपना कब्जा नहीं कर सके कर सके। रखरखाव और मॉनिटरिंग भी उतनी मजबूती से  है।
                वायुमार्ग से विकास सुनिश्चित   करने छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि  छत्तीसगढ़ के सभी प्रमुख शहरों को चाहे वे सरगुजा या बस्तर जैसे दूरस्थ  इलाकों में अवस्थित हों या  दीगर औद्योगिक शहर हवाई पट्टियों  के   निर्माण के अलावा रेल यातायात विस्तार की   सुगमता से भी जोड़ें। फिलवक्त रेल-सड़क यातायात विस्तार की अनेक योजनाएं क्रियान्वयन के चरण में हैं। फिर भी ,वायुमार्ग से  राज्य में व्यक्तिगत और सामूहिक विकास सुनिश्चित करने की महती जिम्मेदारी स्थानीय जनप्रतिनिधियों की होगी। जनअपेक्षाओं को मूर्त रूप देने नीति निर्धारकों के जरिये क्रियान्वित कराने की जिम्मेदारी भी उनकी है। यकीनी तौर पर बहुआयामी विकास में वायुमार्गों का व्यवहारिक  रूप से भागीदार होना सुनिश्चित  करने में रचनात्मक जनचेतना का अत्यंत मुखर होना आज सर्वोपरि  है।        

शनिवार, 9 जनवरी 2016

भूख से अब भी तड़पते हैं हजारों इन्सां.......घांस के बाद बिल्ली और कुत्ते भी मारकर खाने लगे है लोग !

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वो शख्स भूख मिटाने के वास्ते
मेरे अलाव की लपटें निगलने लगा है
जर्द  चेहरा , निगाहें भी हैं कितनी परेशां
भूख से अब भी तड़पते हैं हजारों  इन्सां

भूख से तड़पने का यह दहशतनाक और  मार्मिक मंजर है सीरिया का . यह पश्चिम एशियाई देश है  जिसकी सरहद पश्चिम में लेबनान, और भू मध्य सागर  से सटी है . उत्तर में तुर्क और दक्षिण में जॉर्डन .वैसे तो सीरिया में उपजाऊ मैदान ,पहाड़ियां  और रेगिस्तान भी हैं .विविधजातीय  बसाहटों में सीरियाई अरब , ग्रीक , आर्मीनियाई,असीरियाई ,कुर्द,सिरकेसियन ,माण्डियन और तुर्क भी शामिल हैं .धर्मावलम्बियों में सुन्नी , अलावित ,ईसाई ,ड्रूज ,माण्डियन  , शिया ,सलाफी और यज़ीदी शामिल हैं .सीरिया में सुन्नी अरबी  बहुसंख्यक हैं .
                       आज के दौर में सीरिया अरसे से जारी गृहयुद्ध की वजह से भुखमरी का शिकार हो चुका है . हालात की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोग पेट की आग बुझाने घास तक खाने को मजबूर हो चुके हैं .आहिस्ता - आहिस्ता तेज होती मौत की दस्तक ने अब तक दमिश्क से लगे शहर मदाय में तेईस  लोगों की जान ले ली.  अमूमन चालीस हजार लोग भुखमरी की कगार पर हैं .भूख से उपजी दहशत का मंजर इस कदर  दर्दनाक है कि  घांस के बाद बिल्ली और कुत्ते जैसे जानवरों को भी मारकर खाने की शुरुआत हो चुकी है . इस समूची आपदा की बुनियादी वजह सिर्फ और सिर्फ सीरियाई गृहयुद्ध और वहां पर जारी  संघर्ष ही है .अमेरिकेयर नाम की संस्था ने सीरियाई में  तथा नजदीकी देशों में रह रहे विस्थापितों को 2012  से आज तक   4 .4 मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता की है .दीगर वैश्विक फोरम भी इस त्रासदी से निपटने खुले दिल से आगे आ रहे हैं .
                      दरअसल मुद्दा आर्थिक मदद का नहीं बल्कि गृह युद्ध से जूझते देश का है  जो लगातार भीतरी संघर्षों  का शिकार होता रहा . ताजातरीन गुहार के असर से लेबनान में विस्थापित  अरसाल शरणार्थी शिविर में शरण लिए सीरियाई बच्चों की मदद के लिए  दो जहाज राहत सामग्री  भेजी जा चुकी है  .मदद का सिलसिला जारी है . फिर भी दुनिया इस मसले पर गंभीरता से सोचने पर  मजबूर हो चुकी है कि कायनात के जितने भी देश गृह युद्ध से जूझ रहे हैं या जातीय अथवा धर्मीय संघर्षों का शिकार हैं वहां पर भी क्या कालांतर में ऐसी  ही परिस्थिति बनने की नौबत आएगी?
                सीरियाई गृह युद्ध दरअसल बहुतरफ़ा सशस्त्र संघर्ष है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय दखलअंदाजियां हो रही हैं .यह अशांति 2011  की गर्मियों के शुरूआती दिनों से ही प्रारम्भ हुई थी .जिसे " अरब स्प्रिंग प्रोटेस्ट " नाम दिया गया था . .यह प्रेसीडेन्ट बशर अली की सरकार  के विरुद्ध देशव्यापी मुखालफत  थी ., सैन्य हस्तक्षेपों के विरोध में यह सामूहिक  जन जिहाद भी था  . दिसंबर 2012 में छपी संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यह संघर्ष घोर पंथिक जिहाद में परिणीत हो गया था .. इसमें अलावित  शासकीय बल ,मिलिशिया और दीगर शिया कुनबे  भिड़ते रहे . हालांकि सरकार और विपक्ष इस सच को नकारती रही .
                  आज की तारीख में सीरिया के  समूचे इलाकों में कुपोषण तो है ही ,जुलाई महीने से प्रेसीडेन्ट बशर अल असद की सेनाओं की घेरेबंदी है .लिहाजा ईंधन , रसद या दवाएं भी नहीं मिल रहीं . अब  तो  विपक्ष में मौजूद राष्ट्रीय गठबंधन ने भी मानवीय त्रासदी की  आवाज बुलंद कर दी है .कुछ इलाके  ऐसे भी हैं जहाँ पर हफ्ते भर से लोग भूख से तड़प रहे हैं .
                        इतिहास के पन्ने पलटे तो हम देखते हैं ,शुरूआती  दौर में तो सीरियाई सरकार अपने  सशस्त्र बल के भरोसे रही . कालांतर में स्थानीय सुरक्षा इकाइयों  के बनने के बाद  उसे  रूस , इरान और ईराक से वित्तीय ,तकनीकी और राजनैतिक मदद मिलने लगी   सन 2013  में  गृहयुद्ध में इरान समर्थित हिजबुल्लाह ने सीरियाई सेनाओं का साथ दिया . सच तो यह भी है कि विदेशी दखल अन्दाजी की वजह से सीरियाई गृहयुद्ध  को " प्रोक्सी वार " भी कहा जाने लगा .सितम्बर 2015  में रूस , इराक , ईरान और सीरिया ने बग़दाद में साझा गतिविधि केंद्र बनाया .बाद में रूस ने सीरिया के ही कहने पर एकतरफा हवाई हमले कर दिए .  नतीजतन अमेरिका- रूस प्रोक्सी वार  की तत्कालीन  स्थिति को  कुछ विश्लेषकों ने " प्रोटो  वर्ल्ड वार "की संज्ञा भी दी . उस दौर में अमूमन दो दर्जन देश  दो समानांतर युद्ध में रत रहे .
          इतिहास गवाह है   1980  के दौर में सीरिया ने रासायनिक शस्त्रों का जखीरा इकठ्ठा किया था . इसकी बुनियादी वजह थी क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं  और इजरायल से इसकी काटो -काट दुश्मनी . 1967  और 1973  में मिली शिकस्तों ने  सीरिया को आइना दिखा दिया था .
                   दुनियावी संगठनों ने सीरियाई  सरकारऔर विपक्षी दलों पर कुछ मानव अधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया है . गृह युद्ध की वजह से आबादी व्यापक रूप से विस्थापित भी हुई .लिहाजा अमेरिका ,यूरोपीय संघ ,रूस,चीन और  मध्य पूर्व के कुछ अन्य देशों (तुर्क, इजिप्ट सऊदी अरब और पहली दफे ईरान ने भी शान्ति वार्ता की पहल की है  जिससे  पीड़ादायक गृह युद्ध की समाप्ति हो सके . चौकाने वाला तथ्य यह है  कि  सरकार विरोधी  सशस्त्र  संघर्षों की वजह से बीते साढ़े चार बरसों में सीरिया में  250,000  से ज्यादा सीरियाई अपनी जान गवां बैठे हैं .आज की तारीख में वही संघर्ष  गृह युद्ध की शक्ल अख्तियार कर चुका है.  आज वक्त का तकाजा है  कि  सारी दुनिया इस मसले पर फौरी तरीके से हस्तक्षेप करे. सारे दुनियावी फोरम भूख से तड़पते सीरिया ही नहीं वरन सभी ऐसे देशों की पीड़ित मानवता के लिए एकजुट हों. जब मसला भूख का होता है तब पेट या आंतें चीखकर यही कहती हैं -
         

भीड़ से छिटककर आता हूँ मैं
किसी परछाई की तरह /और
बैठ जाता हूँ हर इंसान की बाजू में
कोई भी नहीं देखता मुझे/पर
सभी देखते हैं एक-दूसरे का चेहरा
वे जानते हैं की मैं वहां पर हूँ
मेरा मौन है किसी लहर की ख़ामोशी
जो लील लेता है बच्चों का खेल मैदान
धीमी रात्रि में गहराते कुहासे की तरह
आक्रान्ता सेनाएं रौंदती,मचाती हैं तबाही
धरती और आसमान में गरजती बंदूकों से
लेकिन मैं उन फौजों से भी दुर्दांत
गोले बरसाती तोपों से भी प्राणान्तक
राजा और शासनाध्यक्ष देते हैं आदेश
पर मैं किसी को नहीं देता हुक्म
सुनाता हूँ मैं राजाओं से अधिक
और भावपूर्ण वक्ताओं से भी
निः  शपथ करता हूँ शब्दों  को
सारे उसूल हो जाते हैं असरहीन
नग्न सत्य अवगत हैं मुझसे
जीवितों को महसूस होने वाला
प्रथम और अंतिम शाश्वत हूँ मैं
भूख हूँ मैं... भूख हूँ मैं!
(राबर्ट बिनयन की मेरे द्वारा अनूदित  कविता
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