गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा

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कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा




मान लो के दुनिया अगर समंदर है तब आप और हम कश्तियाँ ही तो हुए !हमारा जमीर पतवार की भूमिका अदा करता  है .खुदा  और नाखुदा (नाविक )की अपनी-अपनी अहमियत होती है.किसी की भी हो ,जिन्दगी है तब समंदर की तरह उसमें तूफ़ान आयेंगे ही.और यही वक्त होता है जब हम सब ईश्वर या खुदा तथा नाखुदा को जिन्दगी के आईने में कुछ इस तरह देखने लगते हैं-
                     खुदा और नाखुदा मिलकर डुबो दे  ये तो मुमकिन है 
                     फकत तूफ़ान मेरी वजहें तबाही नहीं हो सकता 
यकीनन जब भी किसी कि जिन्दगी में तूफ़ान आते हैं देर -सबेर कश्तियाँ साहिल पर पहुँचती ही हैं.हौसला अफ़ज़ाई  करने हम एक-दूसरे से कहते भी है ,"नाखुदा जिनका ना हो उनका खुदा होता है "यह बात अलग है कि जिन्दगी के सफ़र में खुद से कोई लुट जाता है तो किसी को नाखुदा  ही लूट लेता है.दरअसल आपने भी कभी महसूस किया होगा हमारे जीवन में कुछ तूफ़ान ऐसे भी आते हैं जो खुद-ब खुद हमें किनारा सौंप देते हैं.
                      " पर अखबारनवीस ... जिन्दगी में कुछ लोग खुशामद करना नही जानते.उनकी खुद्दारी उन्हें व्यावहारिक नहीं बनने देती है.-दद्दू भावावेश में बहने लगे थे." लेकिन ऐसे लोग प्रैक्टिकल न होने की वजह से कभी-कभी सफल नहीं हो पाते.
पारदर्शी प्रशंसा और फूहड़ चाटुकारिता में जमीन-आसमान का फर्क है और यही पर कोई खुद्दार अपनी औक़ात पर कुछ इस तरह उतरता है -
                         नाखुदा मुझसे न होगी खुशामद तेरी 
                         मै वो खुद्दार हूँ ,कश्ती से उतर जाऊंगा 
जिद होनी चाहिए कि कश्ती  है तब सफ़र करना ही है चाहे कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न हो भला कश्ती का ऐसा कोई मुसाफिर होगा जिसने समंदर नहीं देखा होगा? भाई!जिन्दगी को पूरी संवेदना ,गहराई और चौकस नजरिये से देखना और समझना होगा वर्ना कश्ती के ड़ूब जाने का ख़तरा  नहीं मंडराएगा  क्या?
                        प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने संजीदा होकर कहा,"' अखबार नवीस! कभी कोई कश्ती ड़ूब जाती है तब आसानी से तूफ़ान की खबर हो जानी चाहिए लेकिन चाहे इसे खुदा की गफलत कहें या जिंदगी के सफ़र में हमारी अपनी असावधानियाँ ,साहिलों से टकराकर कई नौकाएं टूट जाती हैं.इसलिए जिन्दगी को पूरी गंभीरता से हर अंदाज समझकर जीना चाहिए."
                     " जिंदगी के दौरान जीवन  क़ी धूप,तल्खियों या जिम्मेदारियों से  कुछ लोग भागना चाहते है.आंधियां आने पर अपनी कमजोरियां एक-दूसरे पर टालने क़ी कोशिश भी करते हैं .एक खूबसूरत साकी ने जिसकी कश्ती साहिल पर ही टूट गई थी अपनी आँखों में कशिश लिए हुए मुझसे कहा था-
                            खुदा क़ी गफलत भी क्या से क्या दिखाती है
                            साहिलों से टकराकर नाव भी टूट जाती है 
यकीन मानिये ,जीवन में हर पल नाखुदा (नाविक )को बाखबर रहना होता है.नदी क़ी शांत लहरों  पर तैरते हुए दीये से भी सवाल किए जाते होंगे ,ऐ  मौजों (लहरों ) वो कौन लोग है जो कश्तियाँ डुबोते हैं?" आचार्य विनोबा ने कहा है , ' संघर्ष और उथल-पुथल के बिना जीवन बिलकुल नीरस बनकर रह जाता है.इसलिए जीवन में आने वाली विषमताओं को सह कर उससे सीखना ही समझदारी है.
                                कल रात को जब मैं सोया था,सपने में जिन्दगी को देखा
"I slept and dreamt that life was beauty.I woke and found that life was duty."
आप तो मेरे अपने हैं .जिन्दगी के समंदर में जब आप और हम कश्तियाँ हैं खुदा ...नाखुदा ... साहिल और समंदर क़ी चढ़ती -उतरती लहरों में भीगी-भीगी एक बात मुझे अक्सर याद आया करती है
                                 उसकी कश्ती को हवादिस ने दिया है साहिल
                                बढ़ के जो वक्त के तूफ़ान से टकराया है
                                                                                           अभी इतना ही... अपना ख्याल रखिए
                                                                                                     किशोर  दिवसे

                       
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