शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

तुम शीशे का प्याला नहीं झील बन जाओ..

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तुम शीशे का प्याला नहीं झील बन जाओ..

अब तो दादा -दादी या नाना -नानी के मुंह  से कहानियां सुनने का फैशन ख़त्म ही हो गया है.आजकल के बच्चों  के पास इसके लिए वक्त ही नहीं होता. न वे इसमें रुचि ही लेते हैं.कम्प्यूटर तो बस बहाना है .इन्ही कहानी-किस्सों के जरिये बच्चों के मन में संस्कार डाले जाते थे. फिर भी पढने वाले लोग या तो किताबें लेकर बैठते है  या हाईटेक  पीढ़ी की तरह डिजिटल हो गए हैं..यदा-कदा हम सब किसी बचपन को देखकर लौटते हैं अपने बचपन में तब अनायास ही वे कहानियां याद आने लगती हैं जो कभी हमारे बुजुर्ग सुनाया करते थे  . वे कहानियां कभी-कभार किताबों में भी मिल जाया करती हैं.
                     मुझे याद है की  यह किस्सा सोने के वक्त जिद कर पलकें मूंदते तक सुनने वाला नहीं था.बचपन में ही सही नानी ने मुझसे कहा,"जाओ...शीशे का प्याला लेकर आओ".नानी ने प्याले में पानी डाला और मुझसे कहा ," डाल दो इसमें मुट्ठी भर नमक". मैंने वैसा ही किया.फिर नानी ने मुझसे कहा," बेटा जरा इसका स्वाद बताना"."छी !!!!! कितना नमकीन!.. मैंने मुंह  बनाकर थूक दिया.. पिच्च...!
                   नानी ने मुझसे कहा ," चलो बेटा ...जरा झील तक घूम आते हैं".मैं  हाथ पकड़कर उसे झील तक ले गया.फिर उसने कहा,' बेटा !सामने वाली दुकान से मुट्ठी भर नमक ले आना" मैं दौड़कर ले आया.नानी ने मुझसे वह नमक ले लिया और झील में डाल दिया."अब तुम इस झील का पानी पीकर बताओ." नानी ने मुझसे कहा.




                     जैसे ही अंजुली भर तालाब का पानी मैंने पीया नानी ने मुझसे पूछा,बेटा पानी का स्वाद बताना."" अच्छा लग रहा है नानी." मैंने कहा." नमकीन तो नहीं लग रहा है न?" नानी ने पूछा.मैंने जवाब दिया,"बिल्कुल  नहीं नानी."
                     मैं और नानी झील के किनारे बने मंदिर के चबूतरे पर बैठे थे.नानी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और कहा,"" बेटा! जिन्दगी में जो तकलीफें हैं वे भी इसी नमक की तरह हैं.न ज्यादा न कम.परेशानियाँ अपने जीवन में वही रहती हैं लेकिन उन तकलीफों का अहसास इस पर निर्भर करता है की हमने उन्हें किस नजरिये से देखा है."
                   इसलिए बेटा ... " जब भी जीवन में तुम्हें परेशानियाँ हों तुम सिर्फ  इतना ही करना की जीवन  को समझने का नजरिया व्यापक बना लेना." आसान शब्दों में समझना है तब मैं एक ही बात कहती हूँ,' तुम शीशे का प्याला नहीं झील बन जाओ.!हालाकि उस बात का मतलब मैं उतनी गहराई से नहीं समझ पाया  था क्योंकि उस समय मैं मात्र नौवी का छात्र था.आज इस किस्से को याद कर जिन्दगी के अक्स हकीकत के आईने में दिखाई देते है और ताजा हो जाती है नानी की यादें.

                          ***********
गर्मियों की छुट्टियों में नानी और मैं फुटपाथ से होकर गुजर रहे थे.सड़क पर भीड़ थी.तेज रफ़्तार दौडती गाड़ियों , बाइक और उनके हॉर्न तथा साइरन  का कानफाडू शोर गूँज रहा था.अचानक नानी ने मुझसे कहा," बेटा!मुझे झींगुर की आवाज सुनाई दे रही है."
                       मैंने कहा," आप भी सठिया गई हो नानी.आप इतने शोर-गुल के बीच झींगुर की आवाज कैसे सुन सकती हो:" नहीं मैं सच कह रही हूँ..नानी ने कहा,"मैंने झींगुर की आवाज सुनी है." " सचमुच.. आपका दिमाग  चल गया है नानी." मैंने मजाक उड़ाया.अचानक मैंने अपने कानों पर जोर दिया और फुटपाथ के कोने में उगी झाड़ी देखी.मैं उसके नजदीक गया तब पता चला की झाड़ी के भीतर एक टहनी पर झींगुर बैठा था." यह तो बड़े कमाल की बात है नानी." मैंने नजरें  झुकाकर कहा," लगता है आपके कानों में कोई अलौकिक शक्ति है"
                        " बिलकुल गलत बेटा,यह कोई अलौकिक-वलौकिक शक्ति नहीं है.मेरे कान भी तुम्हारे जैसे ही हैं.मैंने झींगुर की किर्र-किर्र सुन ली.यह तो तुमपर निर्भर करता है कि तुम क्या सुनना चाहते  हो.?
                       " लेकिन यह कैसे  हो सकता है नानी!" मैंने हैरत से पूछा," आखिर इतने कानफाडू शोर  में  मैं छोटे से झींगुर की आवाज सुन ही नहीं सकता." " हाँ! ठीक कह रहे हो बेटा." नानी ने मुझे समझाया,"सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे लिए क्या महत्वपूर्ण है.देखो...मैं  तुम्हे इसे सच साबित करके बताती हूँ."
                     नानी ने अपनी कमर में खोंसकर रखा नन्हा सा बटुआ निकला.उसमें से कुछ सिक्के निकाले और चुपचाप सड़क के किनारे बगैर किसी के ध्यान में आये डाल दिए." चलो.अब कोने में खड़े रहकर तमाशा देखते हैं." नानी मुझे एक कोने में ले गई.  

                                        

                    सड़क पर गुजरती गाड़ियों का कोलाहल अब भी उतना ही था.हम दोनों ने देखा कि जो  भी धीमी रफ़्तार से गुजरता उनके अलावा अधिकांश राहगीर अमूमन बीस फीट दूरी से मुड़कर यह देखते कि नीचे पड़े चमकने वाले सिक्के कहीं उनकी जेब से तो नहीं गिरे हैं!" क्यों बेटा!बात तुम्हारी समझ में आई?
                   " हाँ नानी ! आप  सच कहती थी.... सब कुछ इस बात पर निर्भर  करता है कि सभी बातों के बीच आपकी बुद्धि किस बात को महत्त्व देती है.आपको क्या जरूरी लगता है."नानी की वह बात आज ही मुझे याद है.अरे... वह देखो!!!!सड़क पर गिरे सिक्कों को देखकर न जाने कितने लोगों के हाथ अचानक अपनी जेब छूने लगे हैं!                                            आज बस इतना ही .. शब्बा खैर ... शुभ रात्रि... अपना ख्याल रखिये...
                                                                                   किशोर दिवसे.

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