सोमवार, 27 जून 2011

हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं...

Posted by with No comments





धू-धू कर जलती चिता... शोक संतप्त  जनों को ढाढस बंधाते शब्द और मृत्यु को प्राप्त इंसान के जीवन की यादों से जुड़े पहलुओं के बीच ही कहीं से जन्म लेता है शमशान वैराग्य.सच कहें तो मौत के एहसास से चोली-दामन का साथ है जिंदगी का.शायद जीवन के होने का अभिप्राय बोध भी करा जाता है -"मौत " इन  दो शब्दों के भीतर छिपा गूढार्थ .हर अच्छे और बुरे व्यक्ति की सिर्फ अच्छाइयों को याद कर शमशान वैराग्य का प्रवाह हमसे कहलवा जाता है -"बाबू मोशाय.. हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर  ऊपर वाले हाथों में है.कब कौन किस वक्त....
                और यह श्मशान  वैराग्य भी देखिये किस हाई  -टेक हो गया है इन दिनों!बातें शुरू होती है .. मौत तो सिर्फ एक बहाना है भैया.. जिसका समय आ गया उसका खेल ख़त्म .फिर घर परिवार की बात... अचानक मोबाइल घनघनाते है और कोई बिजनेस की बाते करते  है तो कोई अपने धंधे  की.हंसी- मजाक और मसखरी से बोझिल वातावरण हल्का-फुल्का होने लगता है.अच्छा है... यह जरूरी भी है.
                  झूले से लेकर काठी तक ज्यादा देर नहीं लगती ,क्या आप जानते हैं की   कितना फासला है जिंदगी और मौत के बीच! कोई नहीं जनता .पर तय होता है हरेक के लिए की उसे इस नाटक में  कितना अभिनय कहाँ और कैसे करना है.कोई कहता है," जिंदगी प्यार की दो-चार घडी होती  है"किसी दार्शनिक ने यह भी कहा है,LIFE IS TOO LONG  TO LIVE BUT  TOO SHORT TO LOVE"   लेकिन इसे मानने या समझने की कोशिश कौन करता है.जीवन और मृत्यु के बीच चल रहे इस प्रहसन के दौरान अंधी सुरंग में दौड़ रहे हैं हम सब.धन-पिपासा ,उच्चा कांक्षा ,बच्चों के बीच संपत्ति के विवाद  ... गलाकाट रंजिश,सुखों के अनंत  आकाश को समेट लेने की छीना-झपटी के बीच हम सबने कहीं न कहीं पर महसूस किया होगा अपनों को दुत्कारने का सायास षड्यंत्र.लहू लुहान रिश्तों की चीख -पुकार के बीच कभी यह भी हुआ की आम इंसान सोचता रह गया की कोई भरोसा नहीं जिंदगी का क्यों न हम प्यार से रहें और अनायास ही ऊपर वाले ने डोर खींची और कठपुतली लुढ़क गई.         जिंदगी का सफ़र है ये किस सफ़र
               कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं     
जब यह सच मालूम है तब क्यों हम सब गलतियों पर गलतियाँ किये जाते हैं?धन पिपासा  की होड़ में भागते वक्त पल भर रुककर  क्या यह सोचा  होगा की सुख बटोरने की हवस में हम उन सुखों का उपभोग करने के लिए अनफिट तो नहीं हो गए है?इस शहर  में कई लोग ऐसे है जिनके पास बेपनाह दौलत है प़र न चैन से खा -पी सकते हैं न सो सकते हैं बीमारियों ने जकड़ लिया और किसी काम के लायक नहीं रहे-हीरे, मोती, सिक्के और करेंसी चबाकर पेट नहीं भरा जा सकता.एकाएक सुबहअखबारों में पता चलता है दौलतराम चल बसे.न तो उनहोंने सुखों का उपभोग किया .उलटे प्रापर्टी के नाम से परिवार में हो गई कुत्ता घसीटी शुरू!इस पर हम सब सोचते क्यों नहीं'
                   क्या यह कम आश्चर्य की बात है की लोगों को लगातार दुनिया से जाते हुए सीखकर भी यह मन संसार की  मोह-माया छोड़ नहीं पाता!-संस्कृत सूक्ति
                  मरने पर छः फुट जमीन हमें काफी हो जाती है लेकिन जीते-जी हम सारी दुनिया को पा लेना चाहते हैं-फिलिप 
                 सभी ने यह मृत्यु दर्शन पढ़ा और सुना है लेकिन शायद समझकर नासमझ बने रहने  का नाम ही जिंदगी है.जिंदगी और मौत के दर्शन पर सारे लोग बातें कर रहे हैं तरह-तरह की.अलविदाई के मौके पर भी मौत के सामने जिंदगी के अनेक रंग बातचीत की शक्ल में उभर रहे हैं .जितने मुहं उतनी बातें पर श्मशान वैराग्य का भाव कहीं न कहीं पर हावी है.यह बात भी उतनी है सच है की छोटे शहरों की सोच अभी तक कर्मकांडों के मामले में उतनी प्रगतिशील नहीं हो पाई है.फिर भी कुछ समाजों ने व्यवहारिक आवश्यकतानुसार इन्हें सीमित करने का प्रशंसनीय कार्य किया है.कुछ परम्पराओं को आज के परिप्रेक्ष में औचित्य की कसौटी पर अपडेट किया जाना  ही चाहिए.बाकी पुरातनपंथी समाजो को सीखना चाहिए उनसे  जो आज के सच को समझ कर चल रहे हैं.
                  हर किसी  को एक न एक दिन जाना ही है.... हम सब क्या लेकर इस दुनिया में आये और क्या लेकर जायेंगे?गीता ,कुरान बाइबल और गुरु ग्रंथ साहिब में जीवन -मृत्यु पर अच्छी बातें लिखी हैं पर इन सबके बीच कडवा सच एक ही है-
                      हंस रहा था अभी वो ,अभी मर गया
                    जीस्त और मौत का फासला देखिये!
  मेरा मानना है की लाख शिकायतें हों जिन्दगी से पर मौत का सच सामने रखकर जिंदगी को यह सोचकर जियो की " जियो और जीने दो"और " जीवन चलने का नाम ,चलते रहो सुबह  शाम" यही नहीं ," कल क्या होगा किसको पता ,अभी जिन्दगी का ले लो मजा". पर मजे लेते वक्त कोई यह न भूले की अनजाने में हम किसी को दुःख  तो नहीं पहुंचा रहे है ? क्योंकि जिंदगी और मौत के बीच का फासला इस कदर अबूझ है की कहीं ऐसा न हो दुःख पहुँचाने  के बाद सुख देने के लिए प्रायश्चित्त करने का मौका भी हाथ से निकल जाये और हाथ मलने के सिवाय कुछ न बचे.
                 अफ़सोस भरे शब्दों में सिर्फ  यही कहना नसीब  में रह जायेगा की काश!हम अपने माता -पिता को प्यार और सम्मान दे पाते....क्यूं भोंक दिया अपने दोस्त की पीठ पर छुरा?...रिश्तों के साथ बेईमानी और बेइंसाफी क्यों की?. मौत की अदृश्य -दृश्य शक्लें देखने के बाद हम सबको कहीं न कहीं यह जरूर लगना चाहिए की जीवन और मौत के बीच हमने क्या किया.समाज और परिवार ही नहीं देश के ऋणानुबंध से क्या हम मुक्त हो पाए?दोस्ती और इंसानियत के सारे फर्ज हमने अपनी जिन्दगी के दौरान पूरे किये या नहीं?क्योंकि मृत्यु शाश्वत है इसलिए -
                      जिंदगी ऐसे जियो जैसे सब तुम्हारा है
                     मरो तो ऐसे  की तुम्हारा कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं और सब कुछ के बीच श्मशान वैराग्य का आखिरी पड़ाव.कर्मकांड पूरे होते है. परम्पराओं और उत्तर आधुनिकता  के बीच दो पीढ़ियों  के द्वंद्व सामने  होते है. रस्म अदायगियां  और " . राम नाम सत्य..ओम शांति . "के बाद जीवन पर मृत्यु का रेड सिग्नल  हरी झंडी में बदल जाता है.ठहरा सा विचार प्रवाह फिर गतिमान होता है हरेक की अपनी जिंदगी के ताने-बाने होते हैं .जीवन -मृत्यु के शाश्वत चक्र के बीच एक ही बात याद रहती है -वक्त हरेक जख्म पर मरहम है.समय ही सारी गुत्थियों का सुलझाव.... जीवन चलने का ही नाम है...चरैवेति... चरैवेति .मैं अपनी आँखों की छल छलाह्त को छिपाकर अपनी भावनाओं  का मन ही मन इजहार कुछ इस तरह से करता हूं.-
                   उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
                    न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये
                                                                                                 खुश रहें और खुश रखें ...
                                                                                                        किशोर दिवसे 
                           

                     
Reactions:

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें