रविवार, 12 जून 2011

तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...

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तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...

 कभी कभी तेरे ओठों की मुस्कुराहट से 
मुझे बहार  की आहट सुनाई देती है

यूं क़ि कितना  करीबी रिश्ता है मुस्कुराहट और बहार की आहट का.अगर ये कहें की किसे पसंद है मनहूस और सूजे हुए चेहरे?यकीनन कोई भी पसंद नहीं करेगा .चलिए ,खड़े हो जाइए आईने के सामने और मुंह लटका लीजिये.फिर मुस्कुराइए... और..थोडा और ...अब तो समझ गए न ! वाकई जैसे ही कोई हमसे मिलता है या हम किसी से मिलते है अपने ओठों पर  मुस्कान उस इबारत पर मुहर होती है जिसमें बिना कुछ लिखे यह लिखा होता है ," आपसे मिलना हमें सचमुच अच्छा लगा."
                       चाहे कोई भी हो किसी भी उम्र का हो कितना अच्छा लगता है जब कोई मुस्कुराता है .खास तौर पर किसी मासूम बच्चे की मुस्कान.पालने में सोया छौना जब नींद में मुस्कुराता है तब उसे देखकर भी लगता है मानों तपती लू में शीतल हवा का झोंका .कितनी मनुहार करते हैं रोते बच्चे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने  के लिए ?रोते हुए बच्चे के चेहरे पर तबस्सुम लाने की जिद भी किसी इबादत से कम नहीं.इसीलिए सच कहा गया है -
                     मंदिर और मस्जिद यहाँ से है बहुत दूर
                      चलो किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
जब कोई मुस्कान दिल को छू लेती है तब उसे मिलियन डालर स्माइल कहते हैं.लखटकिया मुस्कान के लिए अब तो बकायदा प्रशिक्षण भी मिलने लगा है.वैसे तो टूथ पेस्ट वालों ने मुस्कुराहट को बिनाका और कोलगेट स्माइल बना दिया है .फिर भी मुस्कान सहज होनी चाहिए,उसे नकली कतई न बनने दें.चुनाव नजदीक आने पर किसी नेता की मुस्कान का अंदाज  भी आपने लगाया होगा.छीछा लेदर करती पब्लिक के सामने नेताओं की मुस्कराहट के छिपे हुए मायने भला आपसे कहाँ छिपे हैं?लेकिन ऐसे भी लोग  हैं जिनके ओठों के तबस्सुम का बोझ आँखें नहीं उठा पातीं और वे आंसू छलकाने लगती हैं.
                          माना की जिंदगी इन दिनों काफी तल्ख़ हो चुकी है.कुछ लोग शिकायती अंदाज में " इस सदी में हंसने वाले को पत्थर का कलेजा"कहकर अपना रोना भी रो लिया करते हैं फिर भी टाप-जींस पहनने वाले बंटी और बबली के हम उम्र दोस्तों का अंदाज -ए- बयां भी यही होता है-
                        तबस्सुम और फिर उनके लबों पर
                        चमन की हर कली शरमा रही है
कलियों के शर्माने या मुस्कुराने का अंदाज वही होता है जो फूल बनने से पहले कली के चटखने का.दिल-ए- आशना की निगाहों में सुबह-सुबह के वक्त चेहरे का तबस्सुम यह कहने पर मजबूर कर देता है ," सुबह के तारों ने भी अपनी जान तक कर दी निसार.( न्यौछावर)".फानी ने अपने खूबसूरत अंदाज में किसी ओठों की मुस्कुराहट को हजरत मूसा के सामने तूर नामक पहाड़ी पर लहराई हुई बिजली की मानिंद बताया है.मुस्कराहट की वजह से खुलने वाले ओठों को धडकते दिलों ने गुलिस्तान ( बगीचा ) कहा है.कुछ लोगों को यह भी कहते सुना है ," हमसे तबस्सुम की ख़ुशी क्या पूछते हो ,हमको तो मुस्कुराये हुए जमाना गुजर गया."
                        दद्दू गए थे अपने बीमार रिश्तेदार को देखने .उसके चेहरे पर मुस्कुराहट देखकर मन ही मन सोचने लगे," मिजाज पूछने वाले की आबरू रख ली."उसे देखकर लौट रहे थे दद्दू .हलके अंधियारे में लैम्प  पोस्ट के नीचे अपनी फटेहाली ओढ़कर एक दिलजला  लुढका हुआ था.सीने के भीतर शीशा-ए-दिल के टुकड़े और फर्श पर शराब की बोतल का चूर चूर शीशा.किताब में रखे हुए सुर्ख गुलाब को हाथों में लिए हुए गुनगुनाने लगा.-
               हमने एक हसरत-ए तबस्सुम को 
               कितने आंसूं पिला के पाला है 

बहरहाल,खुद भी मुस्कुराइए और मुस्कुराते रहने का सन्देश भी दीजिये.मय कशीं में जब   कुछ लोगों के होश फना हो जाते है तब हाथों में शराब का प्याला लिए अपनी रूह के जगमगाने का दावा करते हैं पर हकीकत में होता यह है की उनकी अक्ल सर्द हो चुकी होती है.बागबान को कहते सुना है कि फूलों के खिलने या मुस्कुराने की सजा है मुरझाना .पर यह सच नहीं.मुस्कुराना हँसी की पहली पायदान है जो बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी निहायत जरूरी है.हाँ -एक बात और ...." उनसे " जब कभी तकरार हो जाए तो रूठकर नाराज होने वाले को फ़ौरन कह दीजिये -
                           कितने शीरीं हैं लब तेरे कि
                              गालियाँ खा के भी बेमजा न हुआ.
                                                                                    अपना ख्याल रखिये... मुस्कुराते रहिये...
                                                                                                       किशोर दिवसे 
                            



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