शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

ठिठुरती रात की बात

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जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया  ये सर्द रात ,ये आवारगी,ये नींद का बोझ हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते बढ़ते शहर में मौसम को जीने का अंदाज भी चुगली कर जाता है.या फिर यूँ कहिये के बदलते वक्त में मौसम को जीने की स्टाइल भी "अपनी अपनी उम्र" की तर्ज पर करवटें बदलने लगती हैं.सर्दियों...

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

और मजमा फिट हुआ...

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मक्खन... मिर्च और मठा... दुखवा मैं कासे कहूं? " बहुत दिनों बाद मजमा फिट किया है उस्ताद !" -जम्हूरे ने पूछा .हाँ जम्हूरे! एक ठो फार्मूला सोचने में भिड़ा था... मिल गया तो अपुन का मजमा फिर तैयार -उस्ताद ने अपनी बच्चनिया दाढ़ी  खुजाते हुए कहा."लेकिन उस्ताद ,सामने जो तीन डिब्बे रखे हैं उनमें क्या है?बात कुछ हजम नहीं हुई कहकर जम्हूरे ने उस्ताद से फिर पूछा.बीडू....चल.तू अपुन का खास आदमी है इसलिए पहले...

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

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सर जी , आपने भी  दिल के तहखाने में  यादों के कुछ लम्हे छिपाकर रखे होंगे ....जब ऊपरी होठो पर मूछों की लकीर उभरी होगी ... किसी को देखकर नींद गायब  हुई होगी  और बिस्तर की सलवटो ने आपसे ही चुगली कर दी होगी उनींदा उठने पर. ये अलग बात है कि अब नींद उड़ने के लिए जिम्मेदारिया भी असरदार होती है . फिर भी हम वक्त गुजरने के साथ साथ  नींद लेना सीख जाते है.पर सच बताइए कि क्या आपने उन लम्हों...

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

तेरे बगैर नींद न आई....

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तेरे बगैर नींद न आई तमाम रात .... "यार नींद नहीं आती आजकल " दद्दू उस रोज शिकायत कर रहे थे ,"कभी तनाव ज्यादा रहता है तब  नींद नहीं  आती और कभी तो समझ में ही नहीं आता के नींद क्यों नहीं आती.बस सारी रात करवटें बदलते हुए गुजर जाती है."नींद और ख्वाब पर छिड़ी बहस के दौरान अपनी दलील रखते हुए...

दशहरे की रात..

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पापा रावण तो जल गया ... पापा....रावण देखने चलो न...आ गए रावण मारकर... सीमोल्लंघन हो गया! रुको जरा आरती कर लेने दो. बरसों से परंपरा निभाते आ रहे हैं हम सब लोग.मानसिकता के केंद्र में रावण लेकिन राम चिंतन कौन करे?हाई प्रोफाइल बना दिया है रावण को लेकिन राम हाशिए पर! कर्म कान्दियों  की साजिश ने महापंडित रावण के चरित्र की अधमता को नमक-मिर्चें लगाकर बुरे का कालजयी प्रतीक बना दिया लेकिन राम की...

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

गुंचा और गुल..

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जो बाग़ बहार में उजड़े उसे कौन खिलाए...   क्या मुसीबत है सच लिखना भी!लोग बर्दाश्त नहीं कर सकते और उनके "वहाँ" पर मिर्ची लग जाती है.मीठा -मीठा गप गप और कडवा -कडवा  आक थू!!!सच चाहे इंसान के अपने निजी हों या समाज के ,कमजोरियों पर आँख मिलकर बात करने का साहस जुटाना हर किसी के बूते की बात नहीं होती."  खैर... छोडो भी अखबार नवीस किस-किस को रोइएगा ...! दद्दू ने समझाइश देते हुए कहा " हर...

ममता का आँचल

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सच्ची पापा ... मैंने आप में देवदूत को देखा था.... ईश्वर का रूप भी आपसे अलग नहीं समझा था मैंने.... फिर   क्यूँ आपने मुझे नहीं बताया के मैं गोद ली हुई बेटी हूँ! क्या आपकी बेटी इतनी कमजोर थी कि वह इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी या आपके ही मन में कहीं यह डर था मुझे खो देने का? पापा... आपने...

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

दीपाक्षर -3

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किसी के घर में अँधेरा न हो ख्याल रहे... ! धन लक्ष्मी का वाहन तैयार है सुसज्जित होकर वैभव की देवी को हम सबके घर लाने के लिए.   .बिजली के बल्बों की झालरें कुछ घरों में सेहरा बनकर  जगमगाने लगी हैं तो कई जगह अब-तब में लग जाएँगी.मिटटी के दीये अपने गोद में तेल का तालाब बनाकर अग्निशिखा से रौशनी बिखेरने कसमसा रहे हैं.करेंसी के रिंग मास्टर बाज़ार के हाथों में किसम -किसम के चाबुक हैं.इसके मायावी...

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

दृष्टि दिवस पर विशेष ....

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तुमने देखा एक नजर और दिल तुम्हारा हो गया.... " बुरी नजर वाले तेरा मुहं काला" - किसी ट्रक के पिछवाड़े में लिखी यह इबारत क्या पढ़ी की अपने दद्दू शुरू हो गए .वैसे भी अपने दद्दू की खोपडिया में फिट राडार कब किस बात पर सिग्नल  देना शुरू कर दे भगवान मालिक है.क्या यह जरूरी है कि बुरी नजर वाले का मुहं...

दीपाक्षर -2

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....और मैं ही बन गया दीप पर्व का दीप     नारायण... नारायण... नारायण.... नारायण.... चौंककर नारद जी ने देखा और उनसे रहा न गया.उनहोंने पल भर काबू रहने के बाद पूछ ही लिया " यह क्या त्राटक सीख रहे हो जो जलते दीये कि लौ को एकाग्र होकर घूरे जा रहे हो!किसी के आने का आभास भी नहीं?" "नहीं देवर्षि ....दीये को जलता हुआ देखकर यों ही मन में विचार आया कि क्या हम भी इस दीये कि तरह नहीं हैं!ऊपर...

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

आईला .....! हॉट सीट पर गणपति बाप्पा ....!

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आईला .....! हॉट सीट पर गणपति बाप्पा ....! चकाचौंध  भरे  “ कौन  बनेगा  करोडपति  के  फ्लोर  पर  एकबारगी  सुखकर्ता  – दुःख हरता   भगवन  श्रीगणेश  को  देखकर  कार्यक्रम  के  प्रस्तुतकर्ता  महानायक  अमिताभ  बच्चन  खुद  भौचक  थे .बुद्धि    के देवता  को  अपने...

खौफ जदा रहा जब तक जिंदगी से मुहब्बत ना हुई ....

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किसी भी इंसान का मन सागर की तरह होता है .कभी शांत -अबूझ तो कभी भावनाओं का ज्वार - भाटा  उद्दाम लहरों के रूप में जिंदगी की चुनौतियाँ बनकर जूझने पर मजबूर कर देता है.चक्रवात, तूफ़ान,बवंडर .भूडोल और भावनाओं के अनगिनत सुनामी और कटरीना के साथ ही खुशियों की ता- ता-  थैया के अवसर हम सबका मानसिक धरातल सुनिश्चित करते हैं.यही होता है हमारा मेंटल मेक- अप जिसके किसी कोने में छिपे रहते हैं अपने -अपने...