राबर्ट बिनयन की एक(अनूदित ) कविता
भूख हूँ मैं...
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भीड़ से छिटककर आता हूँ मैं
किसी परछाई की तरह /और
बैठ जाता हूँ हर इंसान की बाजू में
कोई भी नहीं देखता मुझे/पर
सभी देखते हैं एक-दूसरे का चेहरा
वे जानते हैं की मैं वहां पर हूँ
मेरा मौन है किसी लहर की ख़ामोशी
जो लील लेता...
सबसे खूबसूरत दिल वही जो बाँटता है प्यार...
" कुछ लोग तो ऊपर से बड़ी चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं लेकिन उनके मन में जहर भरा होता है.ऐसे मिठलबरा इंसानों के पेट में दांत होते हैं"
" ठीक कह रहे हो .. कुछ तो नारियल की तरह होते हैं ...ऊपर से सख्त लेकिन भीतर से उतने ही नर्म और कोमल"
"" सच कहा,हरेक...
खबरदार .. पंखदार अफवाहें गिराती हैं बिजलियाँ....
किटी पार्टी में श्रीमती बडबोले ने एक अफवाह मिसेज मंथरा के कानों में कही.कुछ ही दिनों के बाद वह अफवाह समूची कालोनी में फ़ैल गयी.जिसके बारे...
ख़ुशी का पैगाम कहीं कहीं दर्दे जाम लाया!!.
शायद इस बूढ़े बाप को मनी आर्डर भेजा हो बेटे ने....मेरा इंटरव्यू काल लेटर होना चाहिए....पप्पू ने सोच ... बलम परदेसिया को दुखियारी बिरहन की यादे हो........
जुल्म सहना भी जुर्म है यारों।
हर तरफ जुर्म ही जुर्म।.. प्रिंट मिडिया हो या इलेक्ट्रानिक मिडिया क्यूं बनती जा रही है सुर्खियाँ जुर्म की?क्या ही गया है इस समाज को?बच्चे भटककर जुर्म की राह पकड़ रहे हैं।बेरोजगार युवा अपराध की दुनिया में उतरने पर क्यूं मजबूर हैं?समाज में अपराधियों की बात तो दूर सफेदपोशों की जमात भी गुनाहों के दलदल में इतनी धंस गयी...
तेरे आंगन से मुहब्बत की वो खुशबू निकले।.
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दीवार ...दरवाजा और दहलीज ।..!
भला यह भी कोई बात करने या लिखने का टापिक हुआ?नहीं।.. पर क्यूं नहीं हो सकता?बातें तो किसी भी चीज पर की जा सकती हैं। लेकिन जरा सोचिये...
किस्सा बाबा चतुरानन्द और टुन्नी राम का ...!
" यार अखबारनवीस!लोग आजकल इतने मतलब परस्त हो गए हैं की तभी मिलेंगे जब कोई काम होगा।एक-दुसरे से सुख-दुःख की बातों का रिश्ता ही नहीं रहा।"-दद्दू आज कुछ दुखी होकर बोल रहे थे।
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क्यूं अखबारनवीस! खुदा ने अपनी जुबान में हड्डी क्यूं नहीं दी?"- दद्दू ने एकाएक मुझपर सवाल की मिसाइल दागी।खुद को संयत करते हुए मैंने कहा,"शायद उसे किसी के भी बयां में सख्ती पसंद नहीं होगी इसलिए जुबान में हड्डी नहीं दी।"फिर भी नेताओं की कौम है की भड़काऊ बयां लगातार और हर वक्त दिए जाते है।बात ...
उजड़े चमन बनाम तेरी जुल्फों की याद आई
उन्होंने अपनी गंजी चाँद पर प्यार से हाथ फेरा और दसों अँगुलियों के नाखूनों को रगड़ते हुए बापू की फ्रेम की और देखकर लगे थे कुछ सोचने।" क्या बात है दद्दू!बाबा रामदेव का फार्मूला...
यारों खुदा न बन जाऊं थोडा सा पाप करता हूँ...
"क्यों दद्दू!समाज में भ्रष्टाचार और अपराध चरम पर हैं....नैतिक मूल्यों की गिरावट ने बाजार के इशारे पर इंसान को करेंसी कमाने की मशीन में बदल कर रख दिया है.कुछ उम्मीद थी आध्यात्म से पर क्या लगता है आपको?ग़रीबों के सामाजिक सरोकारों और...
आज का दिन मेरे लिए कहानियों को याद करने का दिन है.मंटो का जन्म दिन आज है.उनकी जन्म शती मनाई जा रही है. सदाअत हसन मंटो की कहानिया आज भी दिल को उसी हद तक छू लेती हैं जितना अरसे पहले जब उन्हें पहली बार पढ़ा था.मंटो ने उन सभी को झिडक दिया जो उन्हें प्रगतिशील कहते...