शुक्रवार, 8 मई 2015

सच पूछो तो सब ही मुजरिम हैं कौन यहाँ किसकी गवाही दे?

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सच पूछो तो सब ही  मुजरिम हैं
कौन यहाँ किसकी गवाही दे?



* भारत की न्यायपालिका ने अपनी असलियत इस तरह खुल के कभी नहीं बताई थी. बिकने के लिए होड़ मचाये चार खम्भों वाले लोड-तंत्र में स्वागत है.
The justice has gone to dogs, so is republic.-समर अनार्य
* दुखद तो है मगर सलमान को सजा जरुर मिलेगी,-प्रकाश कुकरेती
राष्‍ट्रीय आपदा समाप्‍त.
(न्‍यूज़ चैनलों वाले अपने-अपने काम धंधों पर लौटे ही समझो. )-काजल कुमार
* सोचता हूँ संजय को क्यों नहीं मिली?-टीएस दराल
जो लोग सलमान खान के लिए संवेदना की नदी बहा रहे हैं । उन्हें इनकी मौत और इनके परिवार बाले की दुर्दशा पर भी कुछ फील होता है ??? अतुल्य भारत...!-अजय आनंद
* क्या दबंग का चुलबुल पाण्डेय एक रईसजादे और फ़िल्मी स्टार को इतनी आसानी से जाने देता. ये सच्चाई जानने के बाद की इस रईसजादे ने नशे की हालत में चार लोगो को कुचल दिया. इसमें एक की मृत्यु हो गयी. एक पुलिस वाले को तिल तिल कर मरने पर मजबूर का दिया. वो पुलिसवाला इस मामले में गवाह था. अगर नहीं तो क्या भारतीय कानून व्यस्था इस दो कौड़ी की फिल्म के पुलिस वाले से भी बदतर है?-कुंदन पाण्डेय
क्या दबंग का चुलबुल पाण्डेय एक रईसजादे और फ़िल्मी स्टार को इतनी आसानी से जाने देता. ये सच्चाई जानने के बाद की इस रईसजादे ने नशे की हालत में चार लोगो को कुचल दिया. इसमें एक की मृत्यु हो गयी. एक पुलिस वाले को तिल तिल कर मरने पर मजबूर का दिया. वो पुलिसवाला इस मामले में गवाह था. अगर नहीं तो क्या भारतीय कानून व्यस्था इस दो कौड़ी की फिल्म के पुलिस वाले से भी बदतर है?
* चिल्लाते रहो तुम। सच में "बड़ा दबंग" है सल्लू भाई।-अलोक कुमार
* अँधा कानून और मिलेंगी  तो बस "तारीख पे तारीख"-तारस पाल मान
                          सलमान खान क्या सजा निलंबित होने पर सोशल साइट्स पर प्रतिक्रियाओं का तूफान मचा .और भी ढेर सारी। .... बतौर फैन और आलोचक भी।  फिर भी  कुछ सवाल और भी  उठ खड़े होते हैं?
1 अगर अदालत ने आरोपी के नैतिक अधिकार के तहत किया तो क्या गलत किया?लेकिन आम  आदमी को यही छूट मिलती?
2 जो लोग सलमान की सजा माफ़ी पर जैकपॉट मिलने की तरह खुश हो रहे है वे क्या तब भी यही सोचते अगर सलमान की कार से कुचलकर उनका  बाप,माँ बेटा  ,बेटी या रिश्तेदार   तड़पकर मर जाता?
3. अमूमन सभी सिस्टम बिकाऊ हैं, बिक रहे हैं-आम नजरिया है। विशवास का संकट.
4 .     क्या अब भी आपको भरोसा है कि   समाज में जमीर लहूलुहान नहीं ,पूरी तरह चंगा है?
                           एक बड़े से विज्ञापन पर मेरी निगाह पड़ती है- मजमून है-" बिकाऊ हैं इंसान का जमीर और देश के सभी सिस्टम।  खरीदने वाले को निःशर्त लोड़तंत्र ( लोकतंत्र? ) के चारों खम्बों में से किसी में भी नीति निर्धारक कुर्सी प्रदान की जायेगी। योग्यता -एक्सरे रिपोर्ट में रीढ़ न होना जरूरी। उनके नल से करेंसी बहती हो।
             लहूलुहान रूह का साया मेरे चेहरे के आसपास मंडराता है.यकीनन हिट एंड रन केसेस में मरे किसी बन्दे की होगी। दर्द भरी आवाज में कराह -
मैं कहाँ से पेश करता एक भी सच्चा गवाह
जुर्म भी आपका था और  आपकी सरकार थी!
 उस रूह की कराह के जवाब में सिक्कों की खनखनाहट का कानफाडू कोहराम मचता है।   हड़बड़ाकर मेरी नींद खुलती है. ओह! तो यह सपना था ?
कितना सच। .... कितना झूठ!
मुझे काविश हैदरी याद आते हैं -
सच पूछो तो सब ही  मुजरिम हैं
कौन यहाँ किसकी गवाही दे?
बॉलीवुड की अगली  फिल्म में आप सलमान के मुह से यह डॉयलोग सुन सकते हैं-कुछ तो हालात ने मुजरिम हमें ठहराया है,और कुछ आप भी इल्जाम दिए जाते हैं?तराजू के दो पलड़े हैं। एक और स लमान दूसरी और ज्यूडिशियरी . अदृश्य रूप से अंतरात्मा!     
खामोश। … खामोश …। क्या मरने वालों की रूहों  या फिर उनके लिए आंसूं बहाने वालों के लिए कोई सोच रहा है? जिसने सोचा  सिर्फ वही मुजरिम नहीं। ......

             
                                             











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