बुधवार, 6 मई 2015

सेलिब्रेटी और आम आदमी की औकात का फर्क!

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सेलिब्रेटी और आम आदमी की औकात का फर्क!





हैल्लो। । हैल्लो सल्लू बोल रहा हूँ।
1  बजकर 35  मिनट की दोपहर का वक्त.
क्या! मैं चौंक गया। … सेल फोन की स्क्रीन को घूरा। लिखा था दद्दू।
इससे पहले कि मैं कुछ बोलता, दद्दू बोल उठे ," यार अखबार नवीस , सल्लू हिट एंड रन केस में अंदर हो गयेला है। 5 साल की जेल।
"अरे बीड़ू! खाली - पीली आप काहे टेंशन ले रहेले हो!  हो तो दद्दू और खुद को बोल रहे हो सल्लू! आ जाओ। .फुर्सत से बात करते हैं। "... अपने दद्दू तो आज टीवी की स्क्रीन के सामने सोफे पर फेविकोल का जोड़ लगाकर चिपक गए थे। बोले, अपना सल्लू  फिल्म स्टार तो है अपुन का फेवरिट। बड़ा शानदार ,कोई शक नहीं। फिर भी बुर्ज़ -ए -खलीफा की साइज का  सवाल ये है कि -
" .कोई भी अदालती फैसले की घडी और मानवीय भावना के बीच क्या रिश्ता है?फैसले में तरलता के क्या पैरामीटर हैं?क़ानून अँधा क्यों कहा जाता है?तो क्या उसे भावना में बहना चाहिए? सेलिब्रेटी और आम आदमी पर कोर्ट फैसले के वक्त भावनाओं के ज्वार या इमोशनल कोशंट पर जमीर या कॉन्शस या अन्तरात्मा की आवाज का वजूद कितना है या होना चाहिए?"
              "ऐसा है दद्दू सेलिब्रेटी स्टेट्स की चकाचौंध से कइयों की आँखें चुंधिया जाती हैं। " मैंने कहा,"अब तो फैसला आ गया। जेल फिर हाईकोर्ट में बेल की तैयारी। फिर भी एक सवाल मुझे चुभता है.सेलिब्रेटी स्टेटस और आम आदमी की औकात में इतना फर्क क्यों ?आम आदमी के फैसले पर तो काला कुत्ता भी मुंह नहीं उठाता. सिने स्टार या है प्रोफाइल स्टेटस तो तब दमदार-दमदार सभी को "वहां पर"रहमानी कीड़ा काटने लगता है!
           " ठीक कह रहे हो अखबार नवीस,"  दद्दू गम्भीर हो गए,"सितारे के लिए मीडिया की फ़ौज, उपकृत और फैन का जबरदस्त हुजूम और आम आदमी। ।पूरी  तरह बेचारा! "
सोढल साइट्स पर मेरे अनेक साथियों ने अपने नजरिये का कोहराम मचाया।  लेकिन मुझे लगता है यह आम आदमी की रिएक्शन भी बेहद मायने रखती है. एक बानगी देखिए -
"सलमान खान नशे में लोगों की जान लेने का ही नहीं, अदालत में शपथ लेकर झूठ बोलने का भी अपराधी है, 12 साल बाद झूठा (और ग़रीब) गवाह ख़रीद अपने किये के लिये उसे जेल भिजवाने की साज़िश का भी अपराधी है। हद यह कि मुजरिम साबित होने के तुरंत बाद हृदयरोगी होने का सर्टिफ़िकेट पैदा कर देने का भी- वरना जिसके छींकने की खबर तक 'ब्रेकिंग' होती है, उसके बारे में यह बात पता न चलती?
सो वह आदमी कितना भी भला हो- सजा तो बनती है न?-"--समर अनार्य
"उस समय जो सुरक्षाकर्मी साथ था जिसने सलमान के खिलाफ गवाही दी थी वो तो नायगांव के एक कमरे में टीबी से अकेले लड़ते लड़ते गुमनाम मर गया".-प्रेम शुक्ला
" हाँ, बहुत लोग दुखी हैं ,पर इस सजा से बचने के बहुत पैंतरे अपनाए गए . गलती की सजा तो जरूरी है ".-रश्मि रविजा
 और भी अनेकानेक खरी-खरी प्रतिक्रियाएं मेरे मित्र कुनबे की। ।  अपने दिल की बात! ( कितनों के नाम लिखूं ? सब मेरे अपने हैं। जागती आँखों और चौकन्ने दिमाग वाले!
 इसी मसले पर मेरे मन के  विचार मैंने दद्दू के सामने कहे   "यार दद्दू!एक बड़ा संजीदा मसला है.कोई भी अदालती फैसले की घडी और मानवीय भावना के बीच क्या रिश्ता है?फैसले में तरलता के क्या पैरामीटर हैं?क़ानून अँधा क्यों कहा जाता है?तो क्या उसे भावना में बहना चाहिए? सेलिब्रेटी और आम आदमी पर कोर्ट फैसले के वक्त भावनाओं के ज्वार या इमोशनल कोशंट पर जमीर या कॉन्शस या अन्तरात्मा की आवाज का वजूद कितना है या होना चाहिए?  
              दद्दू! देखो मेरी वॉल  पर विदूषी पुष्पा तिवारी  का नजरिया-   "कानून तो लिखी हुई इबारत है । जो परेशानी में है उसकी मानसिकता अलग है वकील की अलग ।सारा दारोमदार तीसरे पर वह कितना अच्छा हो सकता है यह उसकी लियाकत और ईमानदारी पर है । जब अब समय ही सब ( ईमानदारी भावना आत्मा ) शब्दों को व्यथॆ बना रहा है तो अदालत भी तो इंसानों का जमावड़ा है ।" संत राम थवाईत ने कहा- सेलिब्रेटी की पल पल खबर और आम आदमी!
               " बात तो सोलह आना सच है." दद्दू सहमत थे। पर मेरे मन का गुस्सा कम नहीं हो रहा था- मैंने दद्दू से कहा -
" यार दद्दू! लायसेंस ले लो लायसेंस!अक्खे समाज में दूकाने खुल चुकी है.तमाम धार्मिक सिंबल अपने जिस्म पर चिपकाइये और पूरी बेशर्मी से अपराध करने का परमानेंट लायसेंस लीजिये.छद्म धार्मिकता का मुखौटा लगाइये और खुलकर अपराध कीजिए. नौ दिन नवरात्रि में पूजा करो और दसवे दिन फाटे तक दारू पियो!  चैरिटी का ढोंग करते रहिये अपराध पर सजा कम करने कई मगरमच्छ आंसू बहायेंगे.मैं उन कथित छदमवादियो से पूछता हूँक़ि अगर हिट एंड रन  हादसे में आपका कोई बेटा बहन भाई पिता या माँ मर गई होती तब आप क्या सोचते?चैरिटी करना क्या सजा कम करने का सबब हो सकता है?क्या कभी आम आदमी के मामले में "बीइंग ह्यूमन "मुद्दे पर इतनी गहराई से सोचा जाता है?या सब कुछ सेलिब्रेटी के लिए?दो कौड़ी का आम आदमी जाये भाड़ में!  दद्दू का मुंह खुला का खुला था।
            मैंने दद्दू से पूछा।  फिल्म स्टार राजकुमार के बेटे पुरू राजकुमार का भारत का पहला हिट एंड रन केस ( सेलिब्रेटी सन्दर्भ , यूं को कई लोग कीड़े-मकोड़ो की तरह हादसों में मरकर दफन-ए -फ़ाइल भी हो जाते हैं). उस मामले में 1990 में देर रात पुरू ने सड़क पर सोते गरीबो पर कार चढा  दी।  दो  लोग कुचलकर मर गए।  स्टार पुत्र पुरू राजकुमार
खुशकिस्मत था। उसे न जेल हुई न होमीसाइड का आरोप लगा। एक-एक लाख दिया और मामला फिस्स। .
कोर्ट ने मृतको  के परिजनों को 30000 प्रत्येक का मुआवजा दिया। आहत को 5000 .
               सलमान या सेलिब्रेटी के मामले में मीडिया पर भी अंगुलिया उठती हैं।  हादसों में मृतकों या आहटों की सुध क्यों नहीं ली जाती? सभी चोंचले स्टार के लिए? खैर! सलमान को सजा के ऐलान के बाद अनेक सवाल। . कयास। … कोशिशें। । रिएक्शन के दौरों का जलजला चलेगा।  देखते हैं तब तक।  " लेकिन अखबार नवीस ! ये कोर्ट के फैसले  इतनी देरी से क्यों आते हैं?
              "सल्लू के केस पर फैसला आने में 13 साल लगे.... ऐसा कब तक चलेगा? अदालती फैसला सर आँखों  पर  लेकिन अगर न्याय जल्दी मिले और वह भी पूरी पारदर्शिता से ,तब न्याय व्यवस्था पर आम आदमी का भरोसा और भी बढ़ जाएगा, ऐसा  मुझे लगता है। "- दद्दू ने दो-टूक बात कही।
 " सच्ची बात दद्दू !    इस मसले पर तो समूचे भारत को सोचना चाहिए। … तब तक किसी को भी अगर ये वाला उपन्यास मिलेगा
Doctor jekyll and mister hyde  तो  जरूर पढियेगा। फिर मिलते हैं। ..... 
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