बुधवार, 10 नवंबर 2010

अगर तुम....

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मेरे बच्चे तुम भी बन जाओगे एक इंसान ...!

कोई मजहम ऐसा भी यहाँ चलाया जाए 
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए 
 सोलह आना सच कहा है कवी नीरज ने .दो टूक ऐसी बात जो नीम सच है  और एकदम सामयिक भी.पर आज यहाँ हम इंसान को इंसान नहीं वरन नौजवान को इंसान बनाने की बात करेंगे.जातक कथाएँ और फेबल्स से लेकर दादी- नानी की कहानियों ,पंचतंत्र,सिंहासन बत्तीसी और संस्कार व् दर्शन के माध्यम से भी बेटे -बेटी को श्रेष्ठ बनाने के सूत्र व् मन्त्र जीवनोपयोगी बनाये गए हैं.
          पुत्र/पुत्री के प्रति पिता का कर्तव्य यही है कि वह उसे सभा में प्रथम पंक्ति में बैठने लायक बना दे-तिरुवल्लुवर ने कहा था .अंग्रेजी में भी कहावत है,"LIKE FATHER,LIKE SON".शेक्सपीयर ने भी माता-पिता को यह समझाइश दी ,"IT IS WISE FATHER THAT KNOWS HIS CHILD "यानि बच्चे को  जानना और समझना अगर जरूरी है तो उसे समझाना भी आवश्यक है.हालाँकि जार्ज  हर्बर्ट के मुताबिक ,"सौ स्कूली शिक्षकों की तुलना में एक पिता की भूमिका अधिक मूल्यवान होती है. यानी  संस्कार अपनी जगह अहमियत रखते हैं लेकिन परिवार संस्कारों की पहली पाठशाला है.
                      "अख़बार नवीस ! ऐसा कहा जाता है की माँ बच्चे को पहला संस्कार देती है"-दद्दू बोले."बरसों पहले सिर्फ यही सच था लेकिन आज्ञ के समय में माता और पिता दोनों  की ही भूमिका बराबरी की है.संस्कारवान बनाने में पिता की भी उतनी ही  महत्वपूर्ण एवं गंभीर भूमिका है " मैंने दद्दू की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा.
                    "एक बात और भी है जिसे आप दोनों भूल रहे हैं" प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने दार्शनिक अंदाज में घडी की सूइयों को घूरकर हमारी ओर अपनी दृष्टि लौटते हुए कहा,"कोचिंग संस्थानों में भी नौजवान युवक-युवतियों का व्यक्तित्व विकास किया जाता है."बुल्स आई "  के दरवाजे पर रुडयार्ड किपलिंग की कविता "इफ ",फलसफे को शीशे की तरह जीवन में उतारने के लिए प्रेरित करती है.कविता को जीवन दर्शन बनते देखना भी एक अद्भुत अनुभव है.
   हालाँकि अंग्रेजी पढने वालों के लिए यह कविता अच्छी तरह जानी -पहचानी है लेकिन अनेक लोग रुडयार्ड की इस कविता में छिपे ऊर्जा भंडार से अछूते हैं.सारांश यही है की हर एक बच्चे से लेकर युवा अथवा माता -पिता के लिए यह कविता " IF  "यानि "अगर "  की भावनाओं को समझना किसी पूजा या इबादत से कम नहीं होगा. सो, प्रस्तुत है रुडयार्ड किपलिंग की कविता "इफ " का भावानुवाद जो मैंने स्वयं किया है तथा वास्तव में यह एक पिता की बेटे के लिए भी खरी-खरी है-
  
अगर  तुम ...


अगर तुम अपना मस्तिष्क संतुलित रख सकते हो 
जब,सभी आपा खोने लगे हों और 
तुम्हें ठहरा रहे हों इसके लिए दोषी!
अगर तुम कर सकते हो स्वतः पर विश्वास 
जब सभी करते हों तुम पर अविश्वास 
और दे सकते हो इसकी अनुमति भी !
अगर तुम कर सकते हो इसकी प्रतीक्षा 
वह भी विलम्ब की थकान से दूर 
या कर सकते हो झूठ का सामना 
और नहीं शामिल होते हो छद्म -तंत्र में 
या घृणित माने जाकर भी रहते हो
तुम इससे पूर्णतः  अविचलित 
फिर भी नहीं दिखते हो श्रेष्ठि और  
न प्रस्तुत करते हो स्वयं को स्वयं को स्वयंभू 
अगर तुम बन सकते हो स्वप्नद्रष्टा 
नहीं बनने देते हो सपनों को नियंता
 अगर तुम सोच सकते हो निरंतर 
और सिर्फ विचारों को नहीं बनाते लक्ष्य 
अगर तुम सामना करते हो जय-पराजय का 
और रखते हो दोनों-छलावों को समकक्ष 
अगर तुममें साह्स है सुनने का 
जिसे तुमने कहा था वही सत्य 
पर धूर्तों ने बना  दिया उसे असत्य 
बिछाने एक जाल मूर्खों के लिए 
या उन कर्मों पर निगरानी करने 
जो तुमने किए हैं समर्पित ,और 
आबाद किया अपने जर्जर औजारों से 
वंचितों और सीमांत लोगों का जीवन
अगर तुम बना सकते हो एक गट्ठर 
अपनी तमाम विजय और उपलब्धियों का 
और लगा सकते हो ततखन उसे दांव पर 
सब खोकर शुरू कर सकते हो शून्य से यात्रा !
वह भी दीर्घ निःश्वास भर शब्द उच्चारे बिना!
अगर तुम रख सकते हो नियंत्रित हृदय 
मस्तिष्क और अपनी मांस पेशियों को 
चुकने के बाद भी बहाते हो परिहास धारा
और.. सहेजकर रख लेते हो सब कुछ 
जब तुम्हारा अंतस है ख़ाली,नहीं है कुछ 
बाकि रह गई है एक अलौकिक वसीयत 
जो सबसे कहती है "प्रभावशाली रहो"
अगर तुम कर सकते हो भीड़ को संप्रेषित 
और जीवंत रख सकते हो सदाचार ,सदगुण 
या राजाओं के साथ-साथ  रहकर भी 
नहीं भूलते हो आम आदमी की संवेदना 
अगर तुम नहीं होते हो किंचित भी प्रभावित 
अपने शत्रु या मित्रों के विकिरण से 
अगर तुममें  है भाव समानता का 
नहीं है किसी के प्रति पक्षपात 
अगर तुम किसी के लिए न रुकने वाले 
निर्मम पल के मिनट की दूरी 
साथ सेकण्ड की तदित आपाधापी से 
कर लेते हो यदि पूर्ण फतह ....
तब वह सब कुछ तुम्हारा है 
धरती  और भीतर -बाहर समाहित संसार 
और उससे भी कहीं पारदर्शी सत्य -
मेरे बेटे!तुम बन जाओगे एक इंसान !

                                             शब्बा खैर.. शुभ रात्रि ... अपना ख्याल रखिए...
                                                                     किशोर दिवसे .... मोबाईल -09827471743 




  
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1 टिप्पणी:

  1. रोचक पोस्ट है यह . किपलिंग की कविता प्रेरक और उपयोगी है.

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