शनिवार, 20 नवंबर 2010

मेरी अनूदित तीन पुस्तकें

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१.महान विप्लव-१८५७:    १८५७ के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का घटना क्षेत्र और फलक अत्यंत व्यापक था.आज भी इतिहास का वह दौर पूरी तरह सामने नहीं आ सका है.साम्राज्यवाद के खिलाफ यह दुनिया भर में पहला बड़ा संघर्ष था.--भले इसमें शामिल लोग इसे इस रूप में नहीं समझते  थे.भारतीय इतिहास के उन उथल-पुथल भरे दिनों को ब्रिटिश इतिहास लेखक क्रिस्टोफर हिबर्ट की यह पुस्तक प्रमाणिक व् रोचक  ढंग से सामने लती है.दुर्लभ साक्ष्यों और दस्तावेजों के कारण यह पुस्तक न सिर्फ विशिष्ट है बल्कि १८५७ को जानने के लिए विश्वसनीय स्रोत भी.विराट  घटनाक्रम की रोचक ,पठनीय और महाकाव्यात्मक प्रस्तुति.लेखक:क्रिस्टोफर हिबर्ट .अनुवाद किशोर दिवसे (पृष्ठ -472 ) ISBN :978-81-89868-38-3.मूल्य हार्ड बाउंड -550  /-पेपर बैक -250/-
२.विज्ञानं का इतिहास  ISBN :978-81-89868-37-6.मूल्य हार्ड बाउंड -450  /-पेपर बैक -250/ : मनुष्य  की सोच सकने की क्षमता उसे चिंतन तक ले गई.उसने अपने परिवेश को जानना शुरू किया.प्रकृति और ब्रह्माण्ड के बारे में पारी कल्पनाएँ किन.उसका श्रम उसके भौतिक परिवेश को बदल रहा था.बदला हुआ भौतिक परिवेश उसके चिंतन को अमूर्त परिकल्पनाओं से मूर्त विचारों ,परी वेक्षण ,आकलन और सृष्टि व प्रकृति सम्बन्धी ज्ञान में रूपांतरित कर रहा था.यहीं से शुरू हुई विज्ञानं की कहानी.यह यात्रा समय के अनेक पड़ावों से गुजरती जहाँ पहुंची है --वह उपलब्धियों का एक आश्चर्य लोंक है.विज्ञानं का यह सफ़र सिर्फ कुछ प्रतिभाओं के सिद्धांत और अविष्कार भर नहीं हैं .इसमें सभ्यताओं के द्वंद्व ,संस्कृतियों की विरासत और पीढ़ियों की द्वंद्व और मूल्यों -मान्यताओं का तुमुल है.धर्म-संस्थानों और सत्ता के सियाह गलियारे और बलिदान हैं.यह कहानी उतनी ही रोचक है ,जितनी कोई कहानी हो सकती है..लेखक;पी.एन.जोशी .अनुवाद किशोर दिवसे.(.पृष्ठ 368)   ISBN :978-81-89868-37-6.मूल्य हार्ड बाउंड -450  /-पेपर बैक -250/-

 3..देवदासी -देवताओं की  दासी यानी देवदासी.मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठित देवी-देवताओं की आजीवन  सेवा करना ही उसका कर्तव्य है.देवदासी प्रथा के विषय में अनेकानेक बातें कही जाती हैं लेकिन मूलतः इस कुप्रथा की जड़ें धर्म तथा अंध श्रद्धा में धंसी हुई है.मंदिर और देवदासी के बीच में अटूट रिश्ता है इसलिए प्राचीन काल में देवालयों के देवी-देवताओं की सेवा करने महिलाऐं  आम तौर पर रहती थीं.प्रत्येक देवदासी को देवालय में नाचना -गाना पड़ता था.मंदिरों में बाहर से आने वाले खास मेहमानों के साथ शयन करना पड़ता था.इसके एवज में उसे अनाज या धनराशी,प्राप्त होती थी.इस अमानवीय प्रथा के इतिहास और समाज शस्त्र से मुठभेड़ करती यह पुस्तक इस समस्या के निवारण के लिए कई कारगर पहलुओं को सामने रखती है.लेखक :उत्तम काम्बले.अनुवाद किशोर दिवसे. (पृष्ठ -९६)   .ISBN :978-81-89868-32-1.मूल्य हार्ड बाउंड -150  /
 प्रकाशक :संवाद प्रकाशन ,आई-499,शास्त्री नगर ,मेरठ -250004

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4 टिप्‍पणियां:

  1. कार्तिक पूर्णिमा एवं प्रकाश उत्सव की आपको बहुत बहुत बधाई !

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  2. जय राम जी की भइया !कार्तिक पूर्णिमा एवं प्रकाश उत्सव की आपको बहुत बहुत बधाई !

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  3. १८५७ पर आगे चर्चा करूँगा.

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