गुरुवार, 18 नवंबर 2010

जिंदगी थी कोई अनारकली.......वक्त बेरहम मुगले आजम था...

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..अब बूढी हो गई हूँ बेटा...क्या पता कब ऊपर से बुलावा आ जाए !बस... एक ही इच्छा रह गई है मन में .बहू की गोद भर जाए और नन्हा मुन्ना आँगन में खेलने लग जाए.ख़ुशी-ख़ुशी आँखे मूँद लूंगी अपनी.ब्याह के बाद बेटे और बहू के सामने अक्सर चुकती उम्र की माताएं कहा करती है.किलकारियों की ख्वाहिश होती हैं हर बुजुर्ग माँ की.
                 शब्द अलग होते हैं पर बातचीत का एक अहम् बिंदु पति-पत्नी के बीच "दो से तीन "होने का ही रहता है.
"देखो जी!अभी-अभी शादी हुई है एकाध दो बरस घूम-फिर लेते हैं.बच्चे की जिम्मेदारी बढ़ने के बाद फिर कहाँ?मान-मनुहार,ना
नुकुर और आपसी मशविरे के बाद "बच्चे का मुद्दा नितांत निजी फैसला बनकर रह जाता है.लेकिन किसी भी वजह से पति-पत्नी के दो से तीन होने की गुंजाईश न रहे तब!
                 "बाँझ कहीं की... करमजली ... निपूती...मेरे बेटे की किस्मत फूटी थी जो तुझ जैसी अभागन गले पड़ी."सास सारा जहर उगलती है अपनी बहू पर .और एक बार नहीं बार -बार .तिल-तिल कर मरने लगते हैं ... नोंच-खसोटकर मर्म को लहू-लूहान कर देते हैं कुनैन में डूबे व्यंग्य बाण. निष्पाप, निरपराध  बहू को न जीने देते हैं न मरने.एक बात है -बंजर जमीन या बाँझ कोख.करुण क्रंदन एक सा है.बीज को गर्भ में रखकर अंकुर न दे सकने वाली भूमि और किसी अभागन की सूनी कोख का..
       बर्ट्रेंड रसल ने कहा है , Marriage is not for the pro-creation of a child but it is to prevent the sin of fornications ."
 कई तरह की व्याख्याएँ हो सकती हैं इसकी गहराई में जाना बेकार है.क्यों न यथार्थ पर सोचें!
        सूनी कोख वाली अधूरी औरत का पति पूर्ण-पुरुष का दंभ भरता है .ऐसे    Male Chauvinist pigs    घोर पर-पीडक भूमिका में आकर छलावा करने लगते है.पहले से ही ऐसी  मानसिकता में जीती औरत के साथ  कई शिखंडियों को मैंने देखा है छद्म-मर्दानगी की जोर आजमाइश करते हुए.औरत के आंसू तो अपने भीतर छिपे सवालों से ही गरम  होकर उबलते हैं.घुटती तमन्नाओं के बारे में पूछने-बताने का गिला-शिकवा भी जिंदगी का एक सच्चा रंग है.गोया--
                      जो तमन्ना थी दिल ही दिल में घुटकर रह गई
                      उसने पूछा भी नहीं ,हमने बताया भी नहीं
नहीं पर यह तो बुरी बात है.पति-पत्नी के पूछने -बताने का सिलसिला चलेगा तभी तो किलकारियां सुनने की उनके क्षणों की आस पूरी होगी!तेजी से बदलता वक्त, विज्ञानं के पंखों पर नए समाधानों के विकल्प लेकर आता है.नहीं, आया भी है.-निःसंतान लोग बच्चे गोद नहीं ले सकते हैं!सवाल सोच और नीयत का है.
                  मैंने देखा है एक ऐसा इंसान....दिन रात शराब के नशे में चूर .निःसंतान होने के दुःख से उबरने का यह कौन सा सोल्यूशन है ? हद दर्जे की काम-अकली है यह.ऐसे लोग बच्चे गोद क्यों नहीं लेते?जिम्मेदारी सम्हालने तथा वाहियात परम्पराओं का  दुर्गन्ध भरा लबादा चीरने की औकात बनाने में पति-पत्नी तालमेल क्यों नहीं बना पाते?औरतों की अधूरी कोख भी उन्हें झिंझोडती नहीं क्या ?अरे!बच्चा तो बच्चा होता है.अपना कोख जना हो या गोद लिया.हाड़-मांस का वह भी और यह भी.मेडिकल साइंस कहता है ... सच भी है " जींस "से माता -पिता और बच्चे में कई शारीरिक या मानसिक गुन  मिल जाते हैं .पर आज की जिंदगी का यह भी एक सच है कि  गोद लिए बच्चे पर भी पालक मां-बाप के अक्स उभरकर अमिट हो जाते हैं.
                        एक लैटिन मुहावरा  है  Nesessitas nohabet legen    यानी आवश्यकता के लिए कोई नियम नहीं.स्त्री-पुरुष को पूर्णता का एहसास दिलाने के साथ जिम्मेदारियों के बंधन में बांधता है बच्चा .ऐसी स्थितियों में संतान प्राप्ति का अंतिम विकल्प गोद लेना क्यों नहीं होना चाहिए?विशेषग्य चिकिसकों से भी विमर्श के लिए प्रेरक लोग या संगठनों की  या शिक्षित करने की आवश्यकता है.
                           अजीब और घटिया किस्म के विरोधाभासों से अटा-पटा है  हमारा देश.किसी घर में बच्चों की कतारें.भगवान का आशीर्वाद है बच्चे.. यही कहते है लोग.हलाकि इस सोच में कुछ सुधर आया है फिर भी हद  हो गई बेशर्मी की.करतूत इंसान की और ठीकरा भगवान के सर पर काहे फोडोगे?सड़कों पर भीख मांगते ... जूठन पर पलते ... वासना कांड  और नशे की लत का शिकार होते बच्चे....पर समाज का दिल पत्थर और र्दिमाग फौलाद है.तभी तो कुत्तों के पिल्लै ऐशो-आराम से अमीरों के घर पलते हैं और मासूम अभिशप्त बच्चे कुत्तों से बदतर जिंदगी घिसट -घिसट कर जीते है....गन्दी नाली के कीड़ों की तरह बिलबिलाते . समाज में पाखंड की स्थिति करेले पर नीम चढ़े जैसी है तभी तो संपन्न  धन-पिशाच   धर्म स्थलियाँ बनाने के नाम पर पैसा पानी की तरह बहते है लेकिन समाज के इस नासूर को समाप्त करने के नाम पर बेशर्मी से अपना पिछवाडा दिखाने लग जाते है..समाज की छाती फट क्यों नहीं जाती?क्या समाज के ही "आंखों वाले अंधे "बन  गए लोग अपने लिए भी एब बच्चे को गोद नहीं ले सकते?
                                       काश इन बच्चों को गोद मिलती.सूनी कोख क्या इनके स्नेह से हरी-भरी नहीं हो जाती?एक मासूम की जिंदगी के स्याह रंग घुलकर उसपर हमेशा के लिए सुरक्षा के इन्द्र धनुषी रंगों की मेहराब नही बन जाती?आखिर क्या कर रहे हैं हमारे सामाजिक संगठन?इन बच्चों को गोद लेने के लिए जनचेतना की अलख जगाने वाले कार्यक्रम क्यों नहीं करते?दांत निपोरकर फोटो खिंचवाने और अख़बारों में वाहवाही लूटने वाले "कास्मेटिक संगठनों के लिए किटी पार्टी और फैशन शो अधिक जरूरी है.भाड़ में जाएँ बेसहारा बच्चे.. उन्हें गोद मिले न मिले क्या फर्क पड़ता है!
                           दद्दू इस मसले पर काफी सोचते है.उनका कहना है,"कानून हैं पर इतने जटिल कि लोग परेशां हो जाते हैं प्रक्रिया पूरी करने में.इसे सरल बनाया जाना चाहिए."गोद लिए बच्चो की परवरिश भी अहम् मसला है.किसी बच्चे के मुंह से ये शब्द,"मुझे गोद लिया है न ... मेरी किस्मत में कहाँ  इतना प्यार मिलेगा ... पालक माता  -पिता के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता.फिर भी यह कोई ऐसा मसला नहीं जो हल न किया जा सके.गोद लेने के मामले में समाज  में व्याप्त भ्रांतियां  भी मिटनी चाहिए.अपने ही समाज में आपने और हमने देखा है रक्त सम्बन्ध से पैदा हुए बेटे को पितृ या मातृ  हन्ता बनते.और यह भी देखा है कि  कोई मासूम श्रवण कुमार बनकर माता-पिता के बुढ़ापे को अपने विश्वास की कांवड़ से पार करा रहा है.
                          वैसे तो पति -पत्नी  की जिंदगी अनारकली की मानिंद होती है.लेकिन अगर प्रारब्ध ने आँचल सूना रखकर कोख को रुलाया है तब उस आँचल को थमने वाले पुरुष का यह कर्तव्य हो जाता है की वह संतान गोद ले.जब बच्चा गोद लेकर जिन्दगी को संवारने का विकल्प मौजूद है तब यह शिकायत और कोसते रहना पूरी तरह बेमानी हो जाता है कि -
        जिंदगी थी कोई अनारकली और वक्त बेरहम मुगल-ऍ- आजम था ....
                                                                             मुस्कुराते रहिए... अपना ख्याल रखिए...
                                                                            किशोर दिवसे
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