बुधवार, 10 नवंबर 2010

.क्षितिज की कसक

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अब तक है जलजले में जमीं आसमान की

क्या क्या हुआ है  जुनूं में हमसे न पूछिए
उलझे कभी जमीं से कभी आसमान से हम
दरअसल जिंदगी ही अपने-आपमें एक बेहद खूबसूरत जुनूं है .ये अलग बात है की कभी ख़ुशी कभी गम के दौर में आप और हम कभी जमीं तो कभी आसमां से उलझने लग जाते हैं.और अगर ना भी उलझे तो यकीन मानिए इस जिंदगी का जमीन और आसमान से बेहद करीबी रिश्ता है.
                 अपने दद्दू इस मसले की लट को यूँ सुलझाते हैं ,"अखबार नवीस !वैसे भी यह कहा जाता है की हर कोई इंसान जो आसमान में उड़ता है उसे अपनी जमीन कभी भूलनी नहीं चाहिए क्योंकि-
                   शोहरत की बुलंदी पल भर का तमाशा है
                    जिस शाख पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
चलना भले जमीन पर लेकिन ख्वाहिशें आसमान की बुलंदियां छूने की जरूर होनी चाहिए.खुद का हर लिहाज से आंकलन कर अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करना ही आसमान छूने की जिद कहलाता है.जमीन से अपने लक्ष्य के आसमान को हासिल करने के सफ़र में रुक जाना ही सपनों की मौत है .इसलिए अपनी जमीन मजबूत बनाकर नए आसमान की हर पल तलाश आज की जरूरत है.
                कभी कभी किसी इंसान का कद आसमान की तरह होता है .मगर वह यूँ सर झुके होता है की किसी को उसके कद का अंदाज ही नहीं हो पता है.और हाँ,अपनी जमीनी सचाइयों को न भूलने की बात इसलिए भी चेतावनी के तौर पर कही जाती है क्यूंकि                      मिली हवा में उड़ने की ये सजा यारों
                                 की मैं जमीं के रिश्ते से कट गया यारों
आखिर नौबत ही क्यों आए ऐसी?जब जमीनी मसलों की बात की जाती है ,वो मसले जो घर -परिवार ,रोजमर्रा की जिंदगी और प्रोफेशन से भी जुड़े होते हैं तब आसमान में उड़ने वालों से भी ये अपेक्षा की जाती है कि वे सही  जमीनी सचाइयों का अहसास करें, कुछ इस अंदाज में -    
                                          तुम आसमान की बुलंदियों से जल्दी लौट आना
                                         हमें जमीं के मसएल पर बात करनी है
मसलों पर अगर समय रहते बात नहीं होगी तब वे नासूर बन जाएँगे.हकीकत में जमीनी मसलों पर सही वक्त के सही फैसले नहीं लेने की वजह ही हमें आसमान छूने के लिए होने वाली मेराथन रेस में पीछे कर देती है.कुछ लोगों की बात अलग है जो जमीं पर भी सलीके से नहीं चल सकते लेकिन डींगे मरने के नाम पर आसमान छूने की बात करते हैं .मगर अपना आत्म विश्वास ऐसा होना चाहिए की हम जोश से कह सकें -
                                       मैं आसमान-ओ- जमीं की हद    मिला देता
                                        कोई सितारा अगर झुक के चूमता मुझता
कोई न कोई सितारा जरूर चूमेगा ... वक्त आने पर!लेकिन आपने कभी जमीन की कोख से निकलते चश्मों (जलधाराओं ) को उबलते हुए देखा है?जमीन से उबलते इन चश्मों को देखकर कहा जाता है-
                                         जमी का दिल भी किसी ने यकीनन तोडा है
                                         बिला सबब तो ये चश्मे उबल नहीं सकते!
छोडी उबलते चश्मों की बात,कभी किसी आबो-हवा में जहर घुला होता है ,ऐसे हालात में फ़ौरन नई जमीन और नया आसमान तलाश करें.पर जब जूनून जवानी के जोश का हो तब किसी के लरजते हुए ओठों ने अगर किसी का नाम लिया तब मुहब्बत के ख्वाबों में दिल यूँ उड़ने लगता है मानों कह रहा हो ,"मुझे जमीं ने चूम लिया, आसमान ने थाम लिया.  धडकते हुए दिल कूकने लगते हैं -               उतर भी आओ कभी आसमान के जीने से
                            तुम्हे खुदा ने हमारे लिए बनाया है
"यकीनन खुदा ने जमीन और आसमान हमारे लिए ही बनाए हैं" दद्दू कहते हैं ,"अपनी काबिलियत की जमीन और लक्ष्य के आसमान में सही संतुलन ही कामयाबी की आतिशबाजियां दिखलाता है."
"ठीक कह रहे हो दद्दू " मैं उनसे विदा लेते हुए कहता हौं ,"एक अख़बार नवीस इतना वायदा जरूर कर सकता है -
                           कलम की नोंक से मैं आसमान छू लूँगा
                           मुझे जमीन पे रहने को एक मकां तो दो!
                                                   मुस्कुराते रहिए....
                                                                                      किशोर दिवसे

                              
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