सोमवार, 24 जनवरी 2011

मिले सुर मेरा तुम्हारा ,तो सुर बने हमारा...

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आज  एकाएक टीवी चैनल पर जब पंडित भीम सेन जोशी के निधन की खबर सुनी .आंखों के सामने उनकी  गीत -संगीत यात्रा चल-चित्र की तरह घूमने लगी.अपनी रूचि के अबूझ पहलुओं को जानने -समझने की उनकी ललक कभी कम नहीं हुई बल्कि सदा बढती ही रही.पंडित जोशी को प्यार से "संगीत का हाई कमिश्नर " कहा जाता था.जीवन और संगीत में उनकी खोजी प्रवृत्ति अनथक जारी रही.होनहार बीरवान के होत चीकने पात- जब तीन बरस के थे पहली बार घर से भागे और मस्जिद के सामने बैठ गए.मुइज्जन की अजान- अल्लाह हो अकबर के अल्फाजो में छिपा संगीत तलाश रहे थे. फिर मंदिरों में गाने वाली भजन मंडलियों और बारातों में गीतों की धुनें भी गहराई से सुनते रहे.उनके भाग  जाने की आदत से परेशां होकर उनके पिता गुरुराज जोशी ने कई बार पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई  . हर बार कोई बन्दा नन्हे भीम को घर लाकर छोड़ देता था.
    ग्यारह बरस की उम्र में भीमसेन फिर घर छोड़  कर भाग गए- वजह थी मां उसे घी-चावल परोसने की हैसियत नहीं रखती थी.भीमसेन की जिन्दगी का यह जबरदस्त मोड़ था.नजदीक की चाय दूकान पर किराना घराने के उस्ताद  अब्दुल करीम खान साहिब का राग झिंझोटी में आबद्ध कोई ग्रामोफोन रिकार्ड सुना और ट्रेन पर बेटिकट ही सवार हो गए.मुसाफिरों से भीख मांगते किसी तरह तीन महीने में अपने गाव कर्नाटक के गदग जिले के रान से पुणे, मुंबई होते हुए ग्वालियर पहुंचे. आख़िरकार उस्ताद करीम (1936 ) से मुलाकात हो ही गई.गुरु-शिष्य परंपरा में पक्का भरोसा रखने वाले पंडित जोशी  कहते थे,"पहले किसी गुरु से सीखना और फिर उसमें अपना हुनर समाहित करना जरूरी है तभी कोई मजबूती से अपनी बात कह सकता है.अपनी संगीत यात्रा के दौरान  किराना   घराने  के परम्परावादी होकर  भी दीगर घरानों के लिए अपनी सोच को उन्होंने पूरी तरह खुला रखा.
       पंडित  भीमसेन जोशी अक्सर कहा करते थे की खुद को दूसरे दर्जे का नकलची बनाने की बजाए अपने गुरु का पहले दर्जे का सुधारक बनना चाहिए. जयपुर के संगीतग्य मल्लिकार्जुन मंसूर और केसर बाई केरकर के प्रति गहरी आस्था उनमें थी.केसर बाई ने एक बार टिप्पणी भी की थी ,: मै जानती हूँ के तुमने मुझसे काफी -कुछ चुरा लिया है.उनके संगीत ने अनेक पहलुओं को उकेरा जिनमें चिन्तन ,मनोरम,अंतर ज्ञान मूलक और अतार्किकता  थी.असफलता के तीव्र अंदेशे को  उन्होंने  कभी अपनी  ललक पर हावी नहीं होने दिया. इसलिए वे किराना घराने के एकमात्र गायक हैं जिन्होंने राग रामकली पर अपनी जिद दिखाई.पंडित भीमसेन ने अपने संगीत में उस्ताद करीम खान,सवाई गन्धर्व ,रोशन आरा बेगम सहित अनेक विभूतियों को जिन्दा रखा.
 1936  में पंडित भीमसेन सवाई गन्धर्व( पंडित राम भाऊ  कुन्दगोलकर ) के शिष्य बन गए थे.गंगू बाई हंगल भी सह-शिष्य थी. वे घर का काम करते और संगीत भी सीखते. 1943 ,में  वे मुंबई पहुच गए और 19 साल की उम्र   में रेडियो  आर्टिस्ट बनकर कन्नड़ और हिंदी गीत गाए .ख्याल,मराठी भजन, अभंग गायन में उन्हें महारत थी.उनको मिले अवार्डों में -पद्मश्री (1972),संगीत नाटक अकादमी अवार्ड(1976),नेशनल फिल्म अवार्ड(1985),पद्मभूषण(1985),पद्मविभूषण(1999),आदित्य विक्रम बिरला अवार्ड(2000),कला   शिखर पुरस्कार(),महाराष्ट्र भूषन(2002,कर्नाटक रत्न(2005),भारत रत्न(2008), लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिल्ली(2009),नारायण स्वामी अवार्ड बेंगलूरू (2010)प्रमुख रहे.
पंडित भीमसेन जोशी के बारे में सारी जानकारियाँ किसी एक लेख में समाहित करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. उनकी संगीत यात्रा " हरी अनंत, हरी कथा  अनंता" है . फिर भी उनका गायन सुनकर तन- मन झूमने लगता है .उनके प्रसिद्द हुए रागों में-सुधा कल्याण,मियां की तोड़ी,पुरिया धनश्री ,मुल्तानी,भीम पलासी,और दरबारी है.उन्होंने बसंत बहार ,बीरबल माई ब्रदर,नोदी  स्वामी नावु इरोधू हीगे,तानसेन तथा अनकही फिल्मो में गीत गाए.हालिया समय में लोगो को उनका गाया " मिले सुर मेरा तुम्हारा  .. तो सुर बने हमारा ...(1985  वीडियो ) बरबस याद आ गया होगा. पंडित भीमसेन जोशी को इस लेख के माध्यम से संगीत साधकों की ओर से श्रद्धा सुमन. उनकी संगीत  साधना के सुर हमारे बीच अमर रहेंगे.
                                                                  किशोर दिवसे
                          

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