शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

कांच के आदमी

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कांच के आदमी      दरअसल इस शीर्षक की कविता का जन्म एक छोटे से किस्से से हुआ . मेरे एक मित्र स्व. प्रो. रघुनाथ प्रधान चौकसे इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाते थे. अपने आठ साल के बेटे को वे नवभारत प्रेस ,बिलासपुर ला रहे थे. उसने पूछा , " पापा मुझे कहाँ  ले जा रहे हो?" " चल तुझे...

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन -2

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न हारा है इश्क ,न दुनिया थकी है दीया जल रहा है ,हवा चल रही है चरागों के बदले मकां जल रहे हैंनया है जमाना ,तो नई रौशनी है  खुमार बाराबंक्वी के इस अलमस्त मौजूं शेर ने क्या समां बंधा है! वेलेंटाइन  दिवस पर अखबारों में दिलों को कभी गुदगुदाते तो क्स्भी गुस्सा दिलाते प्रेम-संदेशों की लाइनें...

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन -1

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मै किस्से को हकीकत  में बदल बैठा तो हंगामा.... ! जींस -टॉप..कार्गो टी शर्ट...फंकी-शंकी लुक वाले  नौजवान छोकरों और बोल्ड ,ब्यूटीफुल और बिंदास लड़कियों से घिरा था मैं.भाई, कुछ भी बोलो मुझे तो आज की नई जनरेशन बेहद पसंद है ... बिलकुल मीठे-नमकीन बिस्कुट फिफ्टी-फिफ्टी या फिर खट्टी-मीठी इमली की तरह.आज...