बुधवार, 20 जनवरी 2016

अमीर और गरीब में असमानता की खाई और भी गहरा गई है।

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अमीर और गरीब में असमानता की खाई और भी  गहरा गई है। लिहाजा अब मसला गरीबी और गरीब नहीं रहा बल्कि अमीरी  की होड़ के चलते  महाअमीर बनने से अमीरो की संख्या कम होने में दिखाई दे रहा है।  ऑक्सफैम रिपोर्ट  मुताबिक़  दुनिया की गरीबतम आबादी की संपत्ति 2010  से अब तक ट्रिलियन डॉलर ( छत्तीस के बाद चौदह शून्य ) घट गई है।  चौंकाने वाली बात यह है की इसी अवधि के दरम्यान विश्व की आबादी में 400  मिलियन की बढ़ोत्तरी हुई।  इसी दौर में दुनिया के अमीरतम 62 रईसों की संपत्ति आधा ट्रिलियन से भी अधिक 1. 76  ट्रिलियन डॉलर बढ़ी।  असमानता की  की वजह से हालिया महामीरों की सूची में शामिल 62   में से सिर्फ 9   ही महिलाएं हैं यानी बाकी 53 पुरुष। दुनियावी स्तर पर अमीर - गरीब खाई  से जुड़ा विमर्श बीती छमाही से जारी है। फिर भी महाअमीर और दीगर दुनिया में नाटकीय रूप से खाई अब ज्वालामुखी का क्रेटर बन चुकी है। बीते बरस दावोस  बैठक में अंदेशा जताया गया था की सारी  संपत्ति दुनिया के सिर्फ 1 फीसदी  महाअमीरों के कब्जे में होगी ,2015 में सही साबित हो गया। अब तक  इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। भारत सरकार की आर्थिक नीतियां मौजूदा केंद्र सरकार के आईने में ग़रीबों के लिए कितनी फायदेमंद हैं ?कितने लाभान्वित हो रहे हैं कार्पोरेट घराने ?क्या देश में अमीरी - गरीबी की खाई कुछ पटने की उम्मीद है?

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

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साहित्य के विकास के लिए मिले साहित्यकार 






बिलासपुर में पिछले कुछ वर्षों से जनवरी महीने की कोई एक सुबह उल्लेखनीय होती है। साहित्य और कला से सम्बंधित लोगों को इस उल्लेखनीय सुबह की प्रतीक्षा हुआ करती है। इस अनौपचारिक आयोजन का यह १० वाँ वर्ष था। 
हिन्दी के एक साहित्यकार सतीश जायसवाल ने अपने कुछ मित्रों के साथ इस अनौपचारिक आयोजन की शुरुआत की थी। उनका कहना है कि यह कोई आयोजन नहीं। बल्कि कुछ ऐसे लोगों का आपस में मिलना-जुलना है जो साहित्य और कला की आपसदारी में भरोसा रखते हैं। और इस समझ को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसकी शुरुआत बिलासपुर के इंडियन कॉफी हॉउस मेँ की गयी थी। कॉफ़ी के साथ किसी एक रचनाकार की कहानी अथवा कविता का पाठ उसमें जोड़ दिया गया। बाद में किसी एक रचनाकार या कलाकार को आमंत्रित किया जाने लगा।  इस वर्ष नगर के एक कलागुरु श्री विसु पिल्लै और ''स्पिकमैके'' के बिलासपुर प्रमुख श्री अजय श्रीवास्तव को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। ''स्पिकमैके'' संगीत और नृत्य कला के क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीय संगठन है। और श्री पिल्लै स्थानीय बच्चों को चित्रकला का निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। 
इस वर्ष यह आयोजन नगर से १० किलोमीटर दूर, बिलासपुर के एक मशहूर अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ० प्रकाश लाडीकर के फ़ार्म हॉउस में सम्पन्न हुआ। डॉ० लाडीकर स्वयं के कवि हैं और कला के प्रति अनुराग रखते हैं। उन्होंने कलागुरु श्री पिल्लै के पास प्रशिक्षण पा रहे बच्चों को लैण्डस्केपिंग के लिए अपने यहां आमंत्रित भी किया। इस अवसर पर उपस्थित, बिलासपुर रेल मण्डल की वरिष्ठ वाणिज्य प्रबंधक श्रीमती रश्मि गौतम ने भी श्री पिल्लै के सामने एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने प्रस्तावित किया कि बिलासपुर रेल मण्डल उनके कलाकारों के लिए एक उपयुक्त स्थान उपलब्ध करायेगा जहां वे अपना काम कर सकेंगे। श्रीमती गौतम न सुझाया कि वहाँ कलाकारों को  काम करता हुआ देखने से नगर में कला चेतना का विकास होगा।  इस अवसर पर बिलासपुर रेलवे ज़ोन के मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक श्री जी० सी० मीणा, चीफ कंट्रोलर श्री विनय चतुर्वेदी, श्री खुर्शीद हयात और भारतीय रेल के श्री तनवीर हसन भी उपस्थित थे। श्री खुर्शीद हयात उर्दू के जाने माने कहानीकार हैं। और श्री तनवीर हसन एक सुलझे हुए कवि हैं। इस अवसर पर उपस्थित वन अधिकारी श्री ओ० पी० चौबे ने भी श्री पिल्लै के कला छात्रों को खोन्ड्रा स्थित नेचर एन्ड एन्वायरनमेंट क्लब भ्रमण के लिए आमंत्रित किया।
हिंदी दैनिक ''बी पी एन टाइम्स'' के राज्य सम्पादक श्री सजीव बिस्वास, पत्रकार श्री अरविन्द शर्मा, श्री रतन जैसवानी, श्री किशोर दिवसे भी इस आयोजन में शामिल थे। एस० ई० सी० एल० के जनसम्पर्क प्रबंधक श्री मिलिंद चहान्डे तथा गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के श्री सत्येश भट्ट इस आयोजन में विशेष आमंत्रित थे। उद्योगपति कवि श्री दलजीत सिंह कालरा, श्री संजय पाण्डेय तथा अरपा फिल्म सोसाइटी के एक संस्थापक सदस्य श्री सुखवंत सिंह भी इस आयोजन में शामिल थे। श्री सिंह ने बिलासपुर में फिल्म दृष्टि के विकास में अरपा फिल्म सोसाइटी के अपने अनुभव सबके साथ साझा किये।

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(रायपुर से प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक ''बी पी एन टाइम्स'' के (बिलासपुर, दिनांक २० जनवरी २०१६ के अंक) में, पृष्ठ १२ पर प्रकाशित यह समाचार, इस अखबार के छत्तीसगढ़ संपादक श्री सजीव बिस्वास के सौजन्य से)। 

सोमवार, 18 जनवरी 2016

कुदरती मधु सर्जक हैं हम....

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कुदरती मधु सर्जक हैं हम....
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उस पंखे पर टंगी है एक
शहद की कुदरती फैक्टरी
न जाने क्यों करती है मजबूर
सोचने पर मुझे आज
जब मैं बैठा हूँ कुछ ही दूर
और छितराई बातों के दरम्यान
सोचने लगते हैं कुछ लोग भी
पर यकायक उठती है एक लहर
उसी हसीं कुदरती फैक्टरी से
आँखें मिलाकर शहदिया कुनबा
पूछने लगता है सरेआम
दोस्त!आखिर इंसान ही रहोगे!
कैसे समझोगे हमारा समर्पण
क्यों सिर्फ खौफज़दा होते हो?
कहीं शिकार न हो जाए कोई बन्दा
अरे!यह भी कभी सोचा तुमने
इंसान तो इंसान के बारे में
बुरा सोचता,करता भी है उसका
बिना जाने और पहचाने भी
शहदिया कुनबा हमारा लेकिन
नहीं देता दंश किसी को भी
जब तक कोई छेड़े न हमें
सो...मत हो ख़ौफ़ज़दा फिजूल
कोई इंसान थोड़े ही हैं हम
मिठास भरते हैं जिंदगी में
कुदरती मधुसर्जक हैं हम
(रविवार 17 january सुबह बिलासपुर में ही डॉ .लाड़ीकर के फार्म हाउस में यह नज़ारा दोस्तों के बीच देखते हुए सोचा था मैंने.....)

शनिवार, 16 जनवरी 2016

"वायुमार्ग " के जरिए विकास सुनिश्चित

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"वायुमार्ग " के जरिए  विकास सुनिश्चित

बलरामपुर- रामानुजगंज  के पास ताम्बेश्वर ग्राम में 13. 32  करोड़ की  लागत से नवनिर्मित्त हवाई पट्टी का लोकार्पण हालिया 14  जनवरी को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने किया है। 1  जनवरी 2012 को अस्तित्व में आया बलरामपुर जिला पहले सरगुजा में शामिल था। तीन वर्ष की अवधि में यहाँ पर हवाई पट्टी  का बनना इस तथ्य को इंगित  करता है कि इस क्षेत्र में विकास  की आवश्यकता को राज्य के राजनैतिक नेतृत्व ने भांप लिया। हवाई पट्टी निहायत जरूरी थी भी क्योंकि 3806  . 08वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पसरा अंबिकापुर ( सरगुजा संभाग ) का यह इलाका धुर नक्सली प्रभावित  रहा है।   यूं तो  सरगुजा में ही नक्सली आमद हो चुकी है  जिसके मद्देनजर बरास्ता हवाई पट्टी तथा शीघ्र ही रेल विस्तार की कार्ययोजना का खाका तैयार किये जाने का  भरोसा मुख्यमंत्री रमन सिंह ने दिया है। वह भी उस वक्त जब वे अपने सम्बोधन में कह रहे थे कि नक्सल समस्या के खात्मे के साथ के साथ विकास हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
          वायुमार्ग ,रेल यातायात  विस्तार तथा सडकों के  आल-जाल की सघनता ही विकास की मुख्यधारा को दूरस्थ ( रिमोट या माइक्रो रिमोट ) क्षेत्र के नजदीक लाती है, यह सिद्धांत विकास पत्रकारिता का सरकारों द्वारा आजमाया गया वैश्विक स्तरीय बुनियादी सिद्धांत है।  लिहाजा रामानुजगंज जिले में हवाई पट्टी का बनना इस क्षेत्र के अलावा निकटवर्ती इलाकों  के विकास को भी गतिशील करेगा। इस तथ्य  में कोई  दो मत नहीं हो सकता। ऐसा इसलिए भी क्योंकि छत्तीसगढ़ का यह उत्तरी क्षेत्र झारखंड की  .सीमा से सटा  हुआ है। रांची तथा रायपुर हवाई अड्डे निकटवर्ती होने की वजह से विकास की संभावना और भी अधिक सुनिश्चित हो जाती है। फिलवक्त  गढवा और अम्बिकापुर  स्टेशन रामानुजगंज जिले के बलरामपुर  हैं। भविष्य की रेल विस्तार योजनाएं निश्चित रूप से प्रभावकारी साबित होंगी।
           समूचा सरगुजा ही  , अपार वन सम्पदा ,ऐतिहासिक पुरावशेषों , खनिज अयस्क ,एडवेंचर स्पोर्ट्स,तथा पर्यटन स्थलों आदि के लिए सर्वानुकूल इलाकों की अवस्थितता की वजह से संसाधन सम्पन्न है। लिहाजा  वायुमार्ग से जुड़ना अवश्य ही विकास को गतिशील करेगा। दरअसल , वायुमार्ग से किसी शहर का जुड़ना इसलिए भी फायदेमंद होता है क्योकि यह उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहित  करता है। अब , यह जवाबदेही सरकार की होगी कि उद्योग ,पर्यावरण सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करें। रोजगार निर्माण के प्रति भी क्षेत्रीय जनमत  का सम्मान करें। बजरिये जनचेतना के उत्प्रेरण ऐसा किया जाना भी चाहिए।
बलरामपुर ही नहीं देश के जिस किसी शहर में वायुमार्ग का विकास हुआ राजनैतिक और समाजार्थिक विकास को भी रफ़्तार मिली. निश्चित रूप से यह भी ध्यान दिया जाना जरूरी होगा कि पुरानी या नयी हवाई पट्टी पर कोई निजी रसूखदार अपना कब्जा नहीं कर सके कर सके। रखरखाव और मॉनिटरिंग भी उतनी मजबूती से  है।
                वायुमार्ग से विकास सुनिश्चित   करने छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि  छत्तीसगढ़ के सभी प्रमुख शहरों को चाहे वे सरगुजा या बस्तर जैसे दूरस्थ  इलाकों में अवस्थित हों या  दीगर औद्योगिक शहर हवाई पट्टियों  के   निर्माण के अलावा रेल यातायात विस्तार की   सुगमता से भी जोड़ें। फिलवक्त रेल-सड़क यातायात विस्तार की अनेक योजनाएं क्रियान्वयन के चरण में हैं। फिर भी ,वायुमार्ग से  राज्य में व्यक्तिगत और सामूहिक विकास सुनिश्चित करने की महती जिम्मेदारी स्थानीय जनप्रतिनिधियों की होगी। जनअपेक्षाओं को मूर्त रूप देने नीति निर्धारकों के जरिये क्रियान्वित कराने की जिम्मेदारी भी उनकी है। यकीनी तौर पर बहुआयामी विकास में वायुमार्गों का व्यवहारिक  रूप से भागीदार होना सुनिश्चित  करने में रचनात्मक जनचेतना का अत्यंत मुखर होना आज सर्वोपरि  है।        

शनिवार, 9 जनवरी 2016

भूख से अब भी तड़पते हैं हजारों इन्सां.......घांस के बाद बिल्ली और कुत्ते भी मारकर खाने लगे है लोग !

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वो शख्स भूख मिटाने के वास्ते
मेरे अलाव की लपटें निगलने लगा है
जर्द  चेहरा , निगाहें भी हैं कितनी परेशां
भूख से अब भी तड़पते हैं हजारों  इन्सां

भूख से तड़पने का यह दहशतनाक और  मार्मिक मंजर है सीरिया का . यह पश्चिम एशियाई देश है  जिसकी सरहद पश्चिम में लेबनान, और भू मध्य सागर  से सटी है . उत्तर में तुर्क और दक्षिण में जॉर्डन .वैसे तो सीरिया में उपजाऊ मैदान ,पहाड़ियां  और रेगिस्तान भी हैं .विविधजातीय  बसाहटों में सीरियाई अरब , ग्रीक , आर्मीनियाई,असीरियाई ,कुर्द,सिरकेसियन ,माण्डियन और तुर्क भी शामिल हैं .धर्मावलम्बियों में सुन्नी , अलावित ,ईसाई ,ड्रूज ,माण्डियन  , शिया ,सलाफी और यज़ीदी शामिल हैं .सीरिया में सुन्नी अरबी  बहुसंख्यक हैं .
                       आज के दौर में सीरिया अरसे से जारी गृहयुद्ध की वजह से भुखमरी का शिकार हो चुका है . हालात की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोग पेट की आग बुझाने घास तक खाने को मजबूर हो चुके हैं .आहिस्ता - आहिस्ता तेज होती मौत की दस्तक ने अब तक दमिश्क से लगे शहर मदाय में तेईस  लोगों की जान ले ली.  अमूमन चालीस हजार लोग भुखमरी की कगार पर हैं .भूख से उपजी दहशत का मंजर इस कदर  दर्दनाक है कि  घांस के बाद बिल्ली और कुत्ते जैसे जानवरों को भी मारकर खाने की शुरुआत हो चुकी है . इस समूची आपदा की बुनियादी वजह सिर्फ और सिर्फ सीरियाई गृहयुद्ध और वहां पर जारी  संघर्ष ही है .अमेरिकेयर नाम की संस्था ने सीरियाई में  तथा नजदीकी देशों में रह रहे विस्थापितों को 2012  से आज तक   4 .4 मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता की है .दीगर वैश्विक फोरम भी इस त्रासदी से निपटने खुले दिल से आगे आ रहे हैं .
                      दरअसल मुद्दा आर्थिक मदद का नहीं बल्कि गृह युद्ध से जूझते देश का है  जो लगातार भीतरी संघर्षों  का शिकार होता रहा . ताजातरीन गुहार के असर से लेबनान में विस्थापित  अरसाल शरणार्थी शिविर में शरण लिए सीरियाई बच्चों की मदद के लिए  दो जहाज राहत सामग्री  भेजी जा चुकी है  .मदद का सिलसिला जारी है . फिर भी दुनिया इस मसले पर गंभीरता से सोचने पर  मजबूर हो चुकी है कि कायनात के जितने भी देश गृह युद्ध से जूझ रहे हैं या जातीय अथवा धर्मीय संघर्षों का शिकार हैं वहां पर भी क्या कालांतर में ऐसी  ही परिस्थिति बनने की नौबत आएगी?
                सीरियाई गृह युद्ध दरअसल बहुतरफ़ा सशस्त्र संघर्ष है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय दखलअंदाजियां हो रही हैं .यह अशांति 2011  की गर्मियों के शुरूआती दिनों से ही प्रारम्भ हुई थी .जिसे " अरब स्प्रिंग प्रोटेस्ट " नाम दिया गया था . .यह प्रेसीडेन्ट बशर अली की सरकार  के विरुद्ध देशव्यापी मुखालफत  थी ., सैन्य हस्तक्षेपों के विरोध में यह सामूहिक  जन जिहाद भी था  . दिसंबर 2012 में छपी संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यह संघर्ष घोर पंथिक जिहाद में परिणीत हो गया था .. इसमें अलावित  शासकीय बल ,मिलिशिया और दीगर शिया कुनबे  भिड़ते रहे . हालांकि सरकार और विपक्ष इस सच को नकारती रही .
                  आज की तारीख में सीरिया के  समूचे इलाकों में कुपोषण तो है ही ,जुलाई महीने से प्रेसीडेन्ट बशर अल असद की सेनाओं की घेरेबंदी है .लिहाजा ईंधन , रसद या दवाएं भी नहीं मिल रहीं . अब  तो  विपक्ष में मौजूद राष्ट्रीय गठबंधन ने भी मानवीय त्रासदी की  आवाज बुलंद कर दी है .कुछ इलाके  ऐसे भी हैं जहाँ पर हफ्ते भर से लोग भूख से तड़प रहे हैं .
                        इतिहास के पन्ने पलटे तो हम देखते हैं ,शुरूआती  दौर में तो सीरियाई सरकार अपने  सशस्त्र बल के भरोसे रही . कालांतर में स्थानीय सुरक्षा इकाइयों  के बनने के बाद  उसे  रूस , इरान और ईराक से वित्तीय ,तकनीकी और राजनैतिक मदद मिलने लगी   सन 2013  में  गृहयुद्ध में इरान समर्थित हिजबुल्लाह ने सीरियाई सेनाओं का साथ दिया . सच तो यह भी है कि विदेशी दखल अन्दाजी की वजह से सीरियाई गृहयुद्ध  को " प्रोक्सी वार " भी कहा जाने लगा .सितम्बर 2015  में रूस , इराक , ईरान और सीरिया ने बग़दाद में साझा गतिविधि केंद्र बनाया .बाद में रूस ने सीरिया के ही कहने पर एकतरफा हवाई हमले कर दिए .  नतीजतन अमेरिका- रूस प्रोक्सी वार  की तत्कालीन  स्थिति को  कुछ विश्लेषकों ने " प्रोटो  वर्ल्ड वार "की संज्ञा भी दी . उस दौर में अमूमन दो दर्जन देश  दो समानांतर युद्ध में रत रहे .
          इतिहास गवाह है   1980  के दौर में सीरिया ने रासायनिक शस्त्रों का जखीरा इकठ्ठा किया था . इसकी बुनियादी वजह थी क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं  और इजरायल से इसकी काटो -काट दुश्मनी . 1967  और 1973  में मिली शिकस्तों ने  सीरिया को आइना दिखा दिया था .
                   दुनियावी संगठनों ने सीरियाई  सरकारऔर विपक्षी दलों पर कुछ मानव अधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया है . गृह युद्ध की वजह से आबादी व्यापक रूप से विस्थापित भी हुई .लिहाजा अमेरिका ,यूरोपीय संघ ,रूस,चीन और  मध्य पूर्व के कुछ अन्य देशों (तुर्क, इजिप्ट सऊदी अरब और पहली दफे ईरान ने भी शान्ति वार्ता की पहल की है  जिससे  पीड़ादायक गृह युद्ध की समाप्ति हो सके . चौकाने वाला तथ्य यह है  कि  सरकार विरोधी  सशस्त्र  संघर्षों की वजह से बीते साढ़े चार बरसों में सीरिया में  250,000  से ज्यादा सीरियाई अपनी जान गवां बैठे हैं .आज की तारीख में वही संघर्ष  गृह युद्ध की शक्ल अख्तियार कर चुका है.  आज वक्त का तकाजा है  कि  सारी दुनिया इस मसले पर फौरी तरीके से हस्तक्षेप करे. सारे दुनियावी फोरम भूख से तड़पते सीरिया ही नहीं वरन सभी ऐसे देशों की पीड़ित मानवता के लिए एकजुट हों. जब मसला भूख का होता है तब पेट या आंतें चीखकर यही कहती हैं -
         

भीड़ से छिटककर आता हूँ मैं
किसी परछाई की तरह /और
बैठ जाता हूँ हर इंसान की बाजू में
कोई भी नहीं देखता मुझे/पर
सभी देखते हैं एक-दूसरे का चेहरा
वे जानते हैं की मैं वहां पर हूँ
मेरा मौन है किसी लहर की ख़ामोशी
जो लील लेता है बच्चों का खेल मैदान
धीमी रात्रि में गहराते कुहासे की तरह
आक्रान्ता सेनाएं रौंदती,मचाती हैं तबाही
धरती और आसमान में गरजती बंदूकों से
लेकिन मैं उन फौजों से भी दुर्दांत
गोले बरसाती तोपों से भी प्राणान्तक
राजा और शासनाध्यक्ष देते हैं आदेश
पर मैं किसी को नहीं देता हुक्म
सुनाता हूँ मैं राजाओं से अधिक
और भावपूर्ण वक्ताओं से भी
निः  शपथ करता हूँ शब्दों  को
सारे उसूल हो जाते हैं असरहीन
नग्न सत्य अवगत हैं मुझसे
जीवितों को महसूस होने वाला
प्रथम और अंतिम शाश्वत हूँ मैं
भूख हूँ मैं... भूख हूँ मैं!
(राबर्ट बिनयन की मेरे द्वारा अनूदित  कविता
.
                    

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

नए साल में हम करें एक नयी शुरुआत आओ कस कर थाम लें उम्मीदों के हाथ

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नए साल में हम करें एक नयी शुरुआत
आओ कस कर थाम लें उम्मीदों के हाथ


अंदाज हर बरस के बीतने का कुछ अलहदा होता है .इस बरस के बीतने की दुपहरी छत्तीसगढ़ के निकाय चुनावों के सिलसिले में टीवी स्क्रीन पर  नज़रे गड़ाए गुजर  रही थी .  भाजपा का भगवा रंग धूमिल होने और कांग्रेस के चेहरे पर मुस्कान इंच -दर-इंच बढ़ने की खबर गरमाते जाने से सूपड़ा साफ़ होने और हौसला अफजाई के अक्स भी पारदर्शी होने लगे थे .कहीं ख़ुशी ... कहीं गम !
                   मोबाइल की स्क्रीन पर वैलकम 2016 , और अलविदा 2015  के संदेशे आने -जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी था .उम्मीद ... उल्लास ... ऊर्जावान ... खुश रहने की दुआएं और शुभकामनाएं आखों की पुतलियों से सामने से गुजर रही थी असहिष्णुता  ... सहिष्णुता ....आरोप - प्रत्यारोप .....मजहबी  अतिरेक के भोंडे प्रदर्शन की बढ़ती भावना के जूनून  का  रंग- बदरंग ......हमेशा की तरह नजर आया .इसी बीच अनुप्रिया के सन्देश  ने कुछ हौसला बढ़ाया-और वर्ष 2015 की विदाई की दुपहरी में मैं यही दुहराने लगा -

नए साल में हम करें एक नयी शुरुआत
आओ कस कर थाम लें उम्मीदों के हाथ
हर शख्स की उम्मीद का आसमान अलग होता है .... सपनों की मानिंद .ह़र किसी का अपना अलहदा अंदाज होता है बीते बरस को अलविदा कहने का.वर्ष 2015 की विदाई और2016 का  स्वागत करने प्लानिंग अमूमन पहले से ही हो जाया करती है.कईयों ने सोचा की आउटिंग कर ऐश करे और रात दारू-शारू के साथ मजे लें. जीत की ख़ुशी के जाम , हार के गम के भी जाम ...... अंगूर की बेटी तो हर मूड में ओठों से लगने को बेताब हुई जाती है, क्यों!
              नव- धनाढ्यों  का कुनबा बड़ी होटलों में साल की विदाई पार्टी के साथ "रात रंगीन " करने शराब -शबाब के पॅकेज डील कर चुका होता है.बीते बरस भी ३१ की रात को सुरूर में पहले तो तेज रफ़्तार सडको पर कुछ नौजवान घूमे फिर उनमें से कुछ अस्पताल में भी नजर आए.यह  हकीकत  थी ,है और शायद रहेगी भी!
                        वर्ष 2015 की रात को भी बारह बजे शहर जवान हो कर मस्ती में बल्ले-बल्ले कर रहा था. अपनी- अपनी सोच और नसीब के चक्कर में बीते साल की विदाई का अंदाज भी मजदूरों, मिडिल क्लास और रईसों की तकदीर- तदबीर के पारदर्शी अक्स दिखा जाता है.कहीं खुशी .. कहीं गम ...कहीं जोश-ऍ- जूनून तो कहीं झुंझलाहट नजर आती है.रात में टीवी के सामने " हात एंड मसाला कार्यक्रमों को देखने वालों का तबका भी होता है.युवा होस्टलों में जश्न का अलग अंदाज तो जिनकी एग्जाम चल रही है वे थोडा  सा एन्जॉय कर ज्यादा टाइम खोटी नहीं करना चाहते.
                               आज रात भी यही सब होगा . पिछले बरस अपने दद्दू ने टिप्पणी की थी ,"दोस्त! बाजार और नई हवा के इशारे पर ही सही लोग अब अवसरों को बिंदास तरीके से जीने की जीवनशैली अपना चुके हैं.यह बात अलग है की  जिंदगी में मिली सौगातें अपने-अपने पुरुषार्थ और नसीब का मिला-जुला फलादेश है.कुछ लोग नए वर्ष पर जश्न के साथ कोई रिसोलुशन भी लेते हैं . हाँ! कौन निभाता है कौन नहीं यह अपनी जिद की बात है.
                           " संकल्प के लिए नए बरस की शुरुआत की मोहताजग़ी   क्यों ? क्या हम साल भर उत्सव की तरह नए  संकल्पों के साथ नहीं मना सकते? "क्यूँ नहीं!नए वर्ष का सन्देश है परिवर्तन.हमसे जुडी  व्यवस्थाओं के प्रति जाग्रति,सच्चे ज्ञान ,प्रेम और खुशियाँ बाटने का संकल्प  कर हम साल भर उसपर अमल कर सकते हैं.रात गई, बात गई कहकर एक दिनी हुल्लड़ और अय्याशी से कुछ नहीं होने का.फिर भी टेंशन भरी जिंदगी में हम लोग फुल -टू मनोरंजन का कोई भी मौका नहीं चूकते..चूकना भी नहीं चाहिए.
       बीते बरस की विदाई और नए वर्ष के स्वागत को एक दिनी जश्न मानने वालों के अलावा बच्चे से बूढ़े तक के लिए नए वर्ष का समूचा अजेंडा  गुरुदेव रवीन्द्र नाथ  टेगोर की " गीतांजलि" में इन पंक्तियों से प्रतिध्वनित होता है-
                                जहाँ पर मस्तिष्क हो निर्भय,
                                  और भाल सदा गर्वोन्मत्त
                                  जहां  हो ज्ञान का मुक्त भंडार,
                                 जहाँ न हो विश्व विभाजित
                                  संकीर्ण सरहदी दीवारों से
                                    जहाँ सदा जन्म लें अक्षर
                                  ध्रुव सत्य की कोख से
                                 जहाँ अनथक  परिश्रम आतुर हो
                                  उत्कर्ष का आलिंगन करने
                                    जहाँ निरंतर प्रयोजन के स्रोत
                                   स्वार्थ मरू में न हो गए हो लुप्त
                                     जहाँ मेधा इन सत्य पुष्पों से
                                    सदैव हो परिचालित,विचारवान
                                     मेरे पिता!जागने दो मेरे देश  को!
चलिए छोड़िए.... बीते बरस की विदाई में जुट जाएँ  अपने- अपने तरीके से.कल सुबह कोई मंदिर जाएगा  भगवान से आशीर्वाद लेने ... आराध्य  से नया वर्ष सुखद होने की कामना करेंगे.कोई देर सुबह तक हैंगओवर के चलते उनींदा सा होगा. सो फिलवक्त l  मैं  आपका नया वर्ष खूब प्यार और खुशहाली भरा होने की कामना करता हूँ..
                           
                                     खुश रहिए ... खुश रखिए...और अपना ख्याल रखिएगा...
                                                                             किशोर दिवसे
                                                                               मोबाईल -09827471743                              
                                      

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

मोदी बन गए बेनजीर ! या अँधेरे में तीर !

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मोदी  बन गए बेनजीर   ! या अँधेरे में तीर !



बिरियानी टू बर्थ डे डिप्लोमेसी..,गुडविल दौरा..गिफ्ट और .सरप्राइज डिप्लोमेसी ...ब्रेकफास्ट काबुल में , लाहौर में चाय ,.....क्रिसमस के दिन चौकाने वाली यात्रा के बरक्स सचमुच का बड़ा दिन .....और अपने -अपने नजरिये का तूफ़ान  और जिन लाहौर नहीं देख्यां ...उसने क्या जिया  ......न जाने कितने जुमले पीएम मोदी की चौकाने वाली हवाई यात्रा से उड़कर दिमागों में तूफ़ान मचा गए .सोचने वाली बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी की पाक यात्रा के रोज नवाज शरीफ की नातिन का ब्याह, खुद शरीफ का जन्मदिन  अटल बिहारी वाजपेयी  और पाकिस्तान के   संस्थापक   मुहम्मद अली जिन्नाह का भी जन्मदिन था . जिन्ना का जिक्र किसी ने नहीं किया!मोदी- शरीफ मुलाक़ात पर  हर तरफ बवाल के बादल गरज रहे हैं .
                      वाह रे कुदरत! २५ तारीख यानी जुम्मे और पूर्ण चन्द्र की यामिनी में  ही अफ़ग़ान , पाकिस्तान और दिल्ली के कुछ इलाकों में भी भूकम्प के झटके महसूस किये जाएंगे इसका अंदाज किसी को नहीं था . प्रकृति जनित भूकम्प का केंद्र अफ़ग़ान था लेकिन यकीनन हर सोच के पंथियों ने अपने भीतर महसूस किया .और यकीनन यह भी सवाल किया अपनी सोच के आईने को देखकर की क्या " शरीफ के घर जाकर क्या पीएम मोदी खुद ही बेनजीर हो गए?सभी को मालूम है की मोदी रूस और अफ़ग़ान के दौरे पर थे और यकायक पाकिस्तान उसमें जुड़ गया .
                 पी एम मोदी की अचानक    पाकिस्तान यात्रा को    ऐतिहासिक इस  लिहाज से भी कहा जा रहा है कि ११ बरस बाद कोई भारतीय पीएम पाकिस्तान की यात्रा पर बवालिया स्टाइल में पहुंचा था ..पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अमृतसर से लाहौर गए थे ., मोदी काबुल से गए .फिर भी  यह सच है कि  अपनी शोमैन शिप के चलते    चौकाने की यह हैट्रिक   बनाई है मोदी ने .                
               .पहली दफे नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाकर ,दुसरे बार पेरिस की जयवायु कॉन्फ्रेंस में फौरी बात कर . और अब यह तीसरी .बार .बोलने को टू पीएम के लाहौर जाने की जानकारी किसी को नहीं थी . होती भी कैसे ? पहली बात वो कोई आम आदमी तो हैं  नहीं. दूसरे- पीएम का विशेषाधिकार  और शीर्ष सुरक्षा मसला . तीसरे- अगर पहले से ही लाहौर जाने का ऐलान कर देते तो प्रतिक्रियावादियों का कोहराम कितना गूंजता . उन रिएक्शनरियों में  पाकिस्तान के कठमुल्लई नजरिये  वाला कुनबा और भारत के कान फाडू शोर मचाने वाले दक्षिणपंथी सियासी गिरोह भी क्या शामिल नहीं हो जाते?फिर भी जो प्रतिक्रियाएं हुई वो आपने देखी और सुनी भी .
                       अचानक लाहौर यात्रा का मतलब क्या?-शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने कहा .आश्चर्यजनक तरीके से माकपा अगुवाई के वाम मोर्चा ने इसका स्वागत  किया .भाकपा के डी. राजा ,और  कश्मीर के सीएम उम्र अब्दुल्ला ने भी सकारात्मक राय दी ..अमरीका ने मोदी और शरीफ़ की बातचीत का स्वागत कर कहा कि दोनों पड़ोसी देशों के रिश्ते सुधरना दक्षिण एशिया के हित में है.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने भी इसका स्वागत करते हुए उम्मीद जताई कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता आगे बढ़ेगी.'द वॉशिंगटन पोस्ट' के मुताबिक़ मोदी ने परमाणु शक्ति संपन्न भारत-पाक के गर्म-ठंडे रिश्तों पर रीसेट बटन दबाकर अगले महीने होने वाली समग्र वार्ता का मार्ग प्रशस्त कर दिया है.'द शिकागो ट्रिब्यून' की रिपोर्ट कहती है कि अचानक हुआ
मोदी का यह दौरा इस बात की तरफ़ इशारा भारत-पाक रिश्तों में गर्माहट आ रही है.
श्रीलंकाई अख़बार 'श्रीलंका गार्डियन' का कहना है कि शांति चाहने वाले भारत और पाकिस्तान के नागरिकों की कामना होगी कि अगला साल दोनों देशों के बीच शांति और सौहार्द लेकर आए.
                        जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की औचक पाकिस्तान यात्रा को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है।कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने मोदी की पाक यात्रा की आलोचना करते हुए कहा है कि मोदी और शरीफ के बीच मुलाकात एक उद्योगपति ने पहले से ही तय कर रखी थी।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा पहले से ही एक उद्योगपति की पहल पर तय होने के कांग्रेस के दावे पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में ऐसा विपक्ष है जो हर सकारात्मक प्रयास में नकारात्मक ही देखता है।
                              मोदी के पाकिस्तान दौरे से आतंकी हाफिज़ सईद बौखला उठा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उसने कहा है कि नवाज़ ने दुश्मन का स्वागत किया है और इसके लिए उन्हें पाकिस्तान की जनता को सफाई देनी चाहिए।हाफिज़ ने कहा कि पाकिस्तान को अपना सबसे
 बड़ा वकील समझने वाले कश्मीरी, पाकिस्तान में मोदी के स्वागत को देखककर रो रहे हैं।              
                      यात्रा को लेकर दक्षिण एशिया मामलों के जानकार सुशांत सरीन की राय:" इस तरह सबको अचंभित कर देना एक तरह से नरेंद्र मोदी की कूटनीति को परिभाषित करने वाली शैली बन गई है.वे ख़ुद ही निर्णय लेते हैं कि क्या करना है. किसी को कुछ पता नहीं होता  इसलिए सारे लोग
 अंधेरे में तीर चलाते रहते हैं लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री को पता हो कि वे क्या कर रहे हैं.जहां तक ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी के अंधेरे में तीर चलाने की संभावना है तो वो ऐसा करने
वाले पहले प्रधानमंत्री नहीं है. इससे पहले भी, पाकिस्तान को लेकर भारत के प्रधानमंत्रियों ने अंधेरे तीर चलाया है. लेकिन इससे कुछ हासिल होता नहीं है.
                  अब देखिये किस तरह के सवाल उठा करते हैं ..भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेहतरी के लिए जो बातचीत चल रही है, ये साफ़ है कि उसमें पाकिस्तानी सेना की सहमति शामिल है.पाकिस्तानी सेना भी समझती है कि रिश्तों को बेहतर करना चाहिए लेकिन उसकी आशंका
 इस बात को लेकर रहती है कि बातचीत केवल चरमपंथ तक ही सीमित न रह जाए और कश्मीर का मुद्दा पीछे छूट जाए.यह सवाल उठा कि क्या पाकिस्तानी सेना को मोदी
  के इस दौरे के बारे में मालूम था सरकार के लोगों का कहना है कि सेना की रजामंदी के बिना इतना
 बड़ा फ़ैसला नहीं लिया जा सकता.चूंकि यह भी सच है कि मोदी के लाहौर सफर के रोज पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन  भी था .क्या किसी को  इस मोदी एपिसोड में वाजपेयी  की  विदेश नीति के अक्स का टुकड़ा नजर आया?
                      वरिष्ठ आतंरिक सुरक्षा विशेषज्ञ आलोक बंसल ने भी अपनी  आशंका जाहिर कि है .एक तो क्या पाक सेना मोदी की यूनिक अग्रेसिव डिप्लोमेसी में रुचि लेगी ? दूसरे क्या एक नई सुबह होगी यह कहना फिलहाल मुश्किल  है .    इससे भी गम्भीर सवाल यह भी है कि इस दौरे के पीछे कोई अमेरिकी दबाव तो नहीं? पाकी जनरल राहील शरीफ को अमेरिका ने क्या हो सकता है यह ताकीद भी की थी .तालिबानी और कट्टरपंथियों के सैन्य अभियान पाक के सिरदर्द बने हुए हैं .
      दरअसल  पाक पर भारत से वार्ता करने जबरदस्त दबाव है .अमूमन यही स्थिति भारत के भी साथ है .शायद सुपर पावर्स अमेरिका- चीन- रूस के दरम्यानी  खींचतान  का एक अनिवार्य  हिस्सा  भी! सुपर पावर्स की खींचतान इस लिहाज   से भी एक तरफ तो अमेरिका परस्ती आज की मौजूदा एक-ध्रुवीय दुनिया की जरूरत बन गयी है .. दूसरी तरफ बकलम मीडिया गुरु रमेश नैयर ,"मोदी की काबुल और मास्को यात्रा में विशवास और आत्मीयता बढ़ने की ललक थी  और लाहौर औपचारिकता .चीन बहुत बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकत भी है . मोदी को अंतस की यात्रा पर निकलने का समय निकालना होगा ."
                  मैं तो व्यापारी हूँ - मोदी खुद क़ुबूल करते हैं . इस लिहाज से  स्टील कारोबारी सज्जन जिंदल की मोदी के साथ मौजूदगी क्या इशारा करती है?वे शरीफ और मोदी दोनों के ही करीबी हैं .अब मोदी की इस यात्रा से भारत के लिए बरास्ता  पाकिस्तान अफ़ग़ान और मध्य एशिया जाने का रास्ता खुल जाएगा .वहां की खनिज सम्पदा से भारत लाभान्वित होगा ,बड़े बाजार का रास्ता खुलेगा यह खुशफहमी जो वरिष्ठ आतंरिक सुरक्षा विशेषज्ञ आलोक बंसल ने जाहिर की है अगर   हकीकत में बदल जाती है तो वाह वाह !
                        बहरहाल अगर आम आदमी के मनोविज्ञान की बरक्स सोचा जाये तो दुश्मन  से भी अगर मुलाकातें अनायास या सायास भी होती रहें तो बुराई क्या है?मुलाकातों की ऊष्मा कभी  न कभी कठोर रिश्ते की पिघलती बर्फ के दरम्यान  मसलों के हल की राह दिखाती ही  है  .विदेश  नीति और मसले इतने  सहज नहीं जो अलादीन के चिराग घिसकर समाधान निकाल दें .बंद दरवाजे खोलने का साहस और दिलदारी सभी को दिखानी होगी . यकीनी तौर पर कहावत सही है ," रोम वाज़ नॉट बिल्ट इन अ डे बट आफ्टर  आल इट वाज़ बिल्ट! लिहाजा .जारी रखी जानी चाहिए कोशिशों की नजीरों का बनना.  लब्बो लुबाब यह कि वक्त ही तय करेगा कि कायनात अँधेरे में  तीरों का उड़ना देख रही है या फिर मोदी बन गए बेनजीर!

               
             

                         



मोदी बन गए बेनजीर ! या अँधेरे में तीर !

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 मोदी  बन गए बेनजीर   ! या अँधेरे में तीर !


बिरियानी टू बर्थ डे डिप्लोमेसी..,गुडविल दौरा..गिफ्ट और .सरप्राइज डिप्लोमेसी ...ब्रेकफास्ट काबुल में , लाहौर में चाय ,.....क्रिसमस के दिन चौकाने वाली यात्रा के बरक्स सचमुच का बड़ा दिन .....और अपने -अपने नजरिये का तूफ़ान  और जिन लाहौर नहीं देख्यां ...उसने क्या जिया  ......न जाने कितने जुमले पीएम मोदी की चौकाने वाली हवाई यात्रा से उड़कर दिमागों में तूफ़ान मचा गए .सोचने वाली बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी की पाक यात्रा के रोज नवाज शरीफ की नातिन का ब्याह, खुद शरीफ का जन्मदिन  अटल बिहारी वाजपेयी  और पाकिस्तान के   संस्थापक   मुहम्मद अली जिन्नाह का भी जन्मदिन था . जिन्ना का जिक्र किसी ने नहीं किया!मोदी- शरीफ मुलाक़ात पर  हर तरफ बवाल के बादल गरज रहे हैं .
                      वाह रे कुदरत! २५ तारीख यानी जुम्मे और पूर्ण चन्द्र की यामिनी में  ही अफ़ग़ान , पाकिस्तान और दिल्ली के कुछ इलाकों में भी भूकम्प के झटके महसूस किये जाएंगे इसका अंदाज किसी को नहीं था . प्रकृति जनित भूकम्प का केंद्र अफ़ग़ान था लेकिन यकीनन हर सोच के पंथियों ने अपने भीतर महसूस किया .और यकीनन यह भी सवाल किया अपनी सोच के आईने को देखकर की क्या " शरीफ के घर जाकर क्या पीएम मोदी खुद ही बेनजीर हो गए?सभी को मालूम है की मोदी रूस और अफ़ग़ान के दौरे पर थे और यकायक पाकिस्तान उसमें जुड़ गया .
                 पी एम मोदी की अचानक    पाकिस्तान यात्रा को    ऐतिहासिक इस  लिहाज से भी कहा जा रहा है कि ११ बरस बाद कोई भारतीय पीएम पाकिस्तान की यात्रा पर बवालिया स्टाइल में पहुंचा था ..पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अमृतसर से लाहौर गए थे ., मोदी काबुल से गए .फिर भी  यह सच है कि  अपनी शोमैन शिप के चलते    चौकाने की यह हैट्रिक   बनाई है मोदी ने .                  
               .पहली दफे नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाकर ,दुसरे बार पेरिस की जयवायु कॉन्फ्रेंस में फौरी बात कर . और अब यह तीसरी .बार .बोलने को टू पीएम के लाहौर जाने की जानकारी किसी को नहीं थी . होती भी कैसे ? पहली बात वो कोई आम आदमी तो हैं  नहीं. दूसरे- पीएम का विशेषाधिकार  और शीर्ष सुरक्षा मसला . तीसरे- अगर पहले से ही लाहौर जाने का ऐलान कर देते तो प्रतिक्रियावादियों का कोहराम कितना गूंजता . उन रिएक्शनरियों में  पाकिस्तान के कठमुल्लई नजरिये  वाला कुनबा और भारत के कान फाडू शोर मचाने वाले दक्षिणपंथी सियासी गिरोह भी क्या शामिल नहीं हो जाते?फिर भी जो प्रतिक्रियाएं हुई वो आपने देखी और सुनी भी .
                       अचानक लाहौर यात्रा का मतलब क्या?-शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने कहा .आश्चर्यजनक तरीके से माकपा अगुवाई के वाम मोर्चा ने इसका स्वागत  किया .भाकपा के डी. राजा ,और  कश्मीर के सीएम उम्र अब्दुल्ला ने भी सकारात्मक राय दी ..अमरीका ने मोदी और शरीफ़ की बातचीत का स्वागत कर कहा कि दोनों पड़ोसी देशों के रिश्ते सुधरना दक्षिण एशिया के हित में है.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने भी इसका स्वागत करते हुए उम्मीद जताई कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता आगे बढ़ेगी.'द वॉशिंगटन पोस्ट' के मुताबिक़ मोदी ने परमाणु शक्ति संपन्न भारत-पाक के गर्म-ठंडे रिश्तों पर रीसेट बटन दबाकर अगले महीने होने वाली समग्र वार्ता का मार्ग प्रशस्त कर दिया है.'द शिकागो ट्रिब्यून' की रिपोर्ट कहती है कि अचानक हुआ
मोदी का यह दौरा इस बात की तरफ़ इशारा भारत-पाक रिश्तों में गर्माहट आ रही है.
श्रीलंकाई अख़बार 'श्रीलंका गार्डियन' का कहना है कि शांति चाहने वाले भारत और पाकिस्तान के नागरिकों की कामना होगी कि अगला साल दोनों देशों के बीच शांति और सौहार्द लेकर आए.
                        जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की औचक पाकिस्तान यात्रा को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है।कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने मोदी की पाक यात्रा की आलोचना करते हुए कहा है कि मोदी और शरीफ के बीच मुलाकात एक उद्योगपति ने पहले से ही तय कर रखी थी।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा पहले से ही एक उद्योगपति की पहल पर तय होने के कांग्रेस के दावे पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में ऐसा विपक्ष है जो हर सकारात्मक प्रयास में नकारात्मक ही देखता है।
                              मोदी के पाकिस्तान दौरे से आतंकी हाफिज़ सईद बौखला उठा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उसने कहा है कि नवाज़ ने दुश्मन का स्वागत किया है और इसके लिए उन्हें पाकिस्तान की जनता को सफाई देनी चाहिए।हाफिज़ ने कहा कि पाकिस्तान को अपना सबसे
 बड़ा वकील समझने वाले कश्मीरी, पाकिस्तान में मोदी के स्वागत को देखककर रो रहे हैं।                
                      यात्रा को लेकर दक्षिण एशिया मामलों के जानकार सुशांत सरीन की राय:" इस तरह सबको अचंभित कर देना एक तरह से नरेंद्र मोदी की कूटनीति को परिभाषित करने वाली शैली बन गई है.वे ख़ुद ही निर्णय लेते हैं कि क्या करना है. किसी को कुछ पता नहीं होता  इसलिए सारे लोग
 अंधेरे में तीर चलाते रहते हैं लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री को पता हो कि वे क्या कर रहे हैं.जहां तक ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी के अंधेरे में तीर चलाने की संभावना है तो वो ऐसा करने
वाले पहले प्रधानमंत्री नहीं है. इससे पहले भी, पाकिस्तान को लेकर भारत के प्रधानमंत्रियों ने अंधेरे तीर चलाया है. लेकिन इससे कुछ हासिल होता नहीं है.
                  अब देखिये किस तरह के सवाल उठा करते हैं ..भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बेहतरी के लिए जो बातचीत चल रही है, ये साफ़ है कि उसमें पाकिस्तानी सेना की सहमति शामिल है.पाकिस्तानी सेना भी समझती है कि रिश्तों को बेहतर करना चाहिए लेकिन उसकी आशंका
 इस बात को लेकर रहती है कि बातचीत केवल चरमपंथ तक ही सीमित न रह जाए और कश्मीर का मुद्दा पीछे छूट जाए.यह सवाल उठा कि क्या पाकिस्तानी सेना को मोदी
  के इस दौरे के बारे में मालूम था सरकार के लोगों का कहना है कि सेना की रजामंदी के बिना इतना
 बड़ा फ़ैसला नहीं लिया जा सकता.चूंकि यह भी सच है कि मोदी के लाहौर सफर के रोज पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन  भी था .क्या किसी को  इस मोदी एपिसोड में वाजपेयी  की  विदेश नीति के अक्स का टुकड़ा नजर आया?
                      वरिष्ठ आतंरिक सुरक्षा विशेषज्ञ आलोक बंसल ने भी अपनी  आशंका जाहिर कि है .एक तो क्या पाक सेना मोदी की यूनिक अग्रेसिव डिप्लोमेसी में रुचि लेगी ? दूसरे क्या एक नई सुबह होगी यह कहना फिलहाल मुश्किल  है .    इससे भी गम्भीर सवाल यह भी है कि इस दौरे के पीछे कोई अमेरिकी दबाव तो नहीं? पाकी जनरल राहील शरीफ को अमेरिका ने क्या हो सकता है यह ताकीद भी की थी .तालिबानी और कट्टरपंथियों के सैन्य अभियान पाक के सिरदर्द बने हुए हैं .
      दरअसल  पाक पर भारत से वार्ता करने जबरदस्त दबाव है .अमूमन यही स्थिति भारत के भी साथ है .शायद सुपर पावर्स अमेरिका- चीन- रूस के दरम्यानी  खींचतान  का एक अनिवार्य  हिस्सा  भी! सुपर पावर्स की खींचतान इस लिहाज   से भी एक तरफ तो अमेरिका परस्ती आज की मौजूदा एक-ध्रुवीय दुनिया की जरूरत बन गयी है .. दूसरी तरफ बकलम मीडिया गुरु रमेश नैयर ,"मोदी की काबुल और मास्को यात्रा में विशवास और आत्मीयता बढ़ने की ललक थी  और लाहौर औपचारिकता .चीन बहुत बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकत भी है . मोदी को अंतस की यात्रा पर निकलने का समय निकालना होगा ."
                  मैं तो व्यापारी हूँ - मोदी खुद क़ुबूल करते हैं . इस लिहाज से  स्टील कारोबारी सज्जन जिंदल की मोदी के साथ मौजूदगी क्या इशारा करती है?वे शरीफ और मोदी दोनों के ही करीबी हैं .अब मोदी की इस यात्रा से भारत के लिए बरास्ता  पाकिस्तान अफ़ग़ान और मध्य एशिया जाने का रास्ता खुल जाएगा .वहां की खनिज सम्पदा से भारत लाभान्वित होगा ,बड़े बाजार का रास्ता खुलेगा यह खुशफहमी जो वरिष्ठ आतंरिक सुरक्षा विशेषज्ञ आलोक बंसल ने जाहिर की है अगर   हकीकत में बदल जाती है तो वाह वाह !
                        बहरहाल अगर आम आदमी के मनोविज्ञान की बरक्स सोचा जाये तो दुश्मन  से भी अगर मुलाकातें अनायास या सायास भी होती रहें तो बुराई क्या है?मुलाकातों की ऊष्मा कभी  न कभी कठोर रिश्ते की पिघलती बर्फ के दरम्यान  मसलों के हल की राह दिखाती ही  है  .विदेश  नीति और मसले इतने  सहज नहीं जो अलादीन के चिराग घिसकर समाधान निकाल दें .बंद दरवाजे खोलने का साहस और दिलदारी सभी को दिखानी होगी . यकीनी तौर पर कहावत सही है ," रोम वाज़ नॉट बिल्ट इन अ डे बट आफ्टर  आल इट वाज़ बिल्ट! लिहाजा .जारी रखी जानी चाहिए कोशिशों की नजीरों का बनना.  लब्बो लुबाब यह कि वक्त ही तय करेगा कि कायनात अँधेरे में  तीरों का उड़ना देख रही है या फिर मोदी बन गए बेनजीर!

                 
               

                           












                         
                  

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

किसान नेता शरद जोशी होने का मतलब....

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किसान नेता शरद जोशी होने का मतलब....
निधन पर विशेष



जुझारू किसान नेता शरद जोशी नहीं रहे .वैसे भी देश में कृषि और किसानों की दिशा और दशा के मद्देनजर जमीनी स्तर के किसान  नेताओं का टोटा महसूस किया जा रहा था..... यह कमी अब भी है . . फिर भी हर पल उन्होंने बतौर किसान नेता अपनी जवाबदेहिया व्यापक रूप से बखूबी निबाही . महाराष्ट्र ही नहीं देश में  कृषि से जुड़ा विचार -केन्द्रों  का जर्रा -जर्रा शरद जोशी से वाकिफ है .
          गाँवों की संख्या घटती जा रही है . किसान खुद्कुशियां कर रहे हैं.जल जंगल और जमीन के मसले गहरा चुके हैं .समर्थन मूल्य से लेकर तमाम किसानी मुद्दे कृषि की रीढ़ तोड़ चुके हैं .जमीनी स्तर के किसान  नेताओं की जरूरत अब शिद्दत से महसूस की जाने लगी है .कृषि अब भी वरीयता के अजेंडे में उतनी  पुख्ता स्थिति में नहीं है जितनी होनी चाहिए .
              सारी जिंदगी किसानों के लिए शरद जोशी संघर्ष करते रहे .सरकार की किसान विरोधी नीतियों की मुखालफत की वजह से लोग उन्हें किसान नेता मानते थे .शरद जोशी महाराष्ट्र में किसान आंदोलन के प्रणेता और सांसद थे . .वे स्वतंत्रता भारत  पक्ष पार्टी और शेतकारी संघटना के संस्थापक  भी रहे . .वे अकेले सांसद थे जिन्होंने संसद में महिला आरक्षण के खिलाफ मतदान किया .विश्व बैंक के अधिकारी की भूमिका भी उन्होंने भी सक्षमता से निबाही   .
       अंग्रेजी अखबारों में सम्पादकीय के माध्यम से शरद जोशी ने किसानों की बेहतरी के लिए बुनियादी तौर पर सोचा .किसानों और बुद्धिजीवियों के बीच वैचारिक संघर्ष से वे अक्सर आहत होते थे .उनकी स्पष्ट राय थी कि अगर किसानो से हमेशा संवाद होगा तब बुद्धिजीवी तथ्यों को समझ सकेंगे .विश्व बैंक के अधिकारी होने की वजह से उनकी सोच में मौलिकता थी .
               आज कृषि क्षेत्र की हकीकत क्या है? आज किसानों को जागरूक करना जरूरी है ताकि  देश का किसान अपनी बात को हुक्मरानों को कह सके। आज किसान में  जागरूकता का स्तर हर राज्य  में अलहदा है .  उत्पीड़न के खिलाफ आये दिन किसान सड़कों पर अपनी आवाज बुलन्द कर रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की एकता में आयी कमी के कारण किसान खेती किसानी के मुद्दों पर हारी हुई जंग लड़ रहा है।
                    महाराष्ट्र में लंबे समय तक किसानों का बड़ा आंदोलन चलाने वाले शेतकारी संगठना के नेता शरद जोशी हमेशा कहते रहे  कि यदि सरकार खेती में हस्तक्षेप बंद कर दे और किसानों को खुली मंडी में अपनी उपज बेचने दे तो न किसान आत्महत्या करेंगे और न बदहाल रहेंगे। शरद जोशी की कृषि उत्थान के क्षेत्र में बेहतरी में निबाही गई भूमिका के मद्देनजर ऐसा लगता है कि भारत के हर राज्य को शरद जोशी जैसे दमदार  किसान नेता की जरूरत है .किसानों में जन चेतना जगाने का अभी  सही वक्त भी है .

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

आज से मेरे फन का मकसद है जंजीरें पिघलाना , आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊँगा

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आज से मेरे फन का मकसद है जंजीरें पिघलाना
  आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊँगा


चुनौती भरे 1095  दिन
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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राज्य  के अगुवा  की हैसियत से शनिवार को 12 बरस पूरे कर लिए .निश्चित रूप से यह  लम्हा  उनके  लिए " क्या पूरा किया,क्या बचा और क्या करना है "इस मसले पर मंथन का है .2003  में जब रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ की सत्ता सम्हाली थी परिदृश्य कुछ  अलहदा था .आज मुख्यमंत्री और नागरिकों का साझा अनुभव तो यही दर्शाता है कि राज्य में काफी कुछ  सकारात्मक हुआ और जो न हो सका उसपर रुदन और भड़ास  के बजाये ,बजरिये हर नागरिक की भागीदारी पूरा किया जाना चाहिए .समग्र मीडिया की डेवलपमेंटल थ्योरी का बुनियादी सिद्धांत भी यही है .
                सूखा-  हालातों के  बरक्स जश्न न मनाने का फैसला श्लाघ्य है .फिर भी किसानों की बुनियादी समस्याओं का हल उनकी सक्रिय भागीदारी से लघु व् दीर्घ कालिक योजना बनाकर उनपर फौरी अमल से किया जाना वक्ती मांग है .रहा सवाल छत्तीसगढ़ की पुरानी  और वर्तमान  अपेक्षाओं ,अधूरे सपनों और जनाकांक्षाओं के अक्षयपात्रों  का ,इसपर सोचने  और अमल की प्रक्रिया फिलवक्त यही स्फटिक संकेत  देती  है  कि इस मुद्दे पर ठोस पहल करने हर सकारात्मक व्यक्ति  के लिए - गेट, सेट एंड गो!
                   अधूरे काम पूरे न होने या गड़बड़झालों के लिए बहाने अनेक बनाये जा सकते हैं . आरोप  की सुई मॉनिटरिंग की कमी, अफसरशाहों  या अमल करने वाली एजेंसियों की ढिलाई ,फंड की कमी, सियासी इच्छा शक्ति का टोटा या नागरिकों की गैर जिम्मेदारी को भी इंगित कर सकती है .छोड़िये इन बातों को -अब समूचे छत्तीसगढ़ को ही विजन रखना होगा - FOCUS ON MULTI - DIMENTIONAL DEVELOPMENT .
                     निश्चित तौर  पर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसी वजह से कनेक्टिविटी पर ही फोकस किया है .जिस राज्य की अधो संरचना शहरी . ग्रामीण और  ख़ास तौर पर " मीडिया डार्क एरियाज " में बराबरी से पुख्ता होती है वह बहुआयामी विकास की मैराथन में आगे ही आगे बढ़ता है .इसके बरक्स रेल , सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी  को रमन सिंह अपनी तीसरी पारी में सर्वोच्च वरीयता पर रखते हैं , तब  राज्य का विकास खुद ब खुद  अपना बयान - ए- हकीकत -करेगा .बस्तर , सरगुजा और छत्तीसगढ़ के दीगर सीमावर्ती और माइक्रोरिमोट  क्षेत्रों के लिहाज से से इन मुद्दों पर फौरी कार्ययोजना -अमल निहायत अव्वल दर्जे का एजेंडा होना भी चाहिए .
                    बेनज़ीर "प्रतिपक्ष साधक "  मुख्यमंत्री  रमन सिंह को स्पेशल 12 + क्लब में शामिल होने पर बधाइयां .अब तीसरी पारी यानी 15  साल  की मियाद पूरी होने में महज 1095 दिन बाकी रह गए हैं .मार्क्स तूलियस सिसेरो ने कहा है,"A MAN OF COURAGE IS ALWAYS FULL OF FAITH ". अगर विकास की नीयत से वाजिब प्रशासनिक सख्ती बरतनी जरूरी होती है तब ऐसा करना भी मौजूं होगा , बकौल साहिर लुधियानवी -
                         आज से मेरे फन का मकसद है जंजीरें पिघलाना
                         आज से मैं शबनम के बदले अंगारे बरसाऊँगा


 लक्ष्य साफ़ है  पर हर- पल सामने है चुनौती -जेहन में पैबस्त अधूरे सपने पूरे करने की.....आम जन को विकास की आत्मा से  जोड़कर जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की .......नौकरशाहों का " इगो" साधने की....न तो यह असाध्य लक्ष्य है न ही नामुमकिन.सियासी इच्छा शक्ति और जवाबदेह जनमानस   बनाने  के कारगर अस्त्रों से यह निश्चित रूप से काबिल -ए -हासिल है .