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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

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ख़त्म कर  दो कचरा!
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जितना असह्य है कचरा 
भीतर घर के और पड़ा 
दीवार,अहातों के बाहर इर्द-गिर्द,
गलियों ,सड़कों ,नुक्कड़ ,चौराहों 
गाँव ,शहर सड़ांध फैलाता 
उससे अधिक पल-पल प्राण लेता है 
दिमाग के भीतर बजबजाते और 
फड़फड़ाते चमगीदडों जैसा कुंठित 
संकीर्ण सोच  का कचरा 
सो, ख़त्म कर दो तुरंत 
कचरा अपने दिमाग के  भीतर 
और बाहर का- इसी पल 
वरना भोग रही हैं संत्रास  पीढ़ियां 
इतनी सी  बात नहीं समझे आप!
नहीं है काम सरकार या नेता का 
सिर्फ तय कर ले हर इंसान 
नहीं रहेगा कचरा किसी और 
तभी खिलेगी मुस्कान चहूँ और!



शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

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अनुकाव्य  पाठकों को मेरा प्यार भरा नमस्कार। 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

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गुनगुनाती है कुदरत 

वर्षा गान -   ( INCANTATION FOR RAINS- By -ANONYMOUS)
हरे तीर चीरते हैं धरती का सीना
और बढ़ते हैं स्याह बादलों की ओर 
टपकती है जल  बूँदें टप टप टप टप 
बरसती जल धाराएँ करती हैं शोर
टपकती हैं कोपलों से बूँदें टप टप टप टप 
और हरे तीरों का आवेग लेता है वेग
पिघलने लगता है गहरा कुहासा
बूँदें बनकर टप टप टप टप

ज्वार भाटा     -   (THE TIDE RISES THE TIDE FALLS- By -H.W.LONGFELLOW)
लहरें उठती हैं और गिरती हैं
सांझ के धुंधलके पर लगता है स्याह का कर्फ्यू
तब उत्तेजित समंदर की नम भूरी रेत पर
फिर से लहरें उठती है और गिरती हैं
भागता है पथिक बदहवास शहर की ओर
छोड़ जाता है पदचिन्हों के क्षणिक छाप
फिर नया पथिक... और नए पद चिन्ह
क्योकि लहरें उठती हैं और गिरती हैं

 समंदर का साया     -   ( FROM SEA-By-WITTER  BYNNER  )


पर्णांग की पत्तियों सी पारदर्शी 
स्फटिक से विहंगम में इठलाती
लहराती /लता के तने पर  बलखाती 
उस रही थी एक प्यारी सी तितली
दूर तक पसरे दक्षिणी पोखर की ओर
अब नहीं है आकाश में तैरती सी
वह तितली जो उडी थी आकाश से उत्तरी
अपने पंखों का धनुष उठाये,अनदेखी
पश्चिम में मछुआरी  नौकाओं के दस्ते
लंगर डाले हुए अनेक जहाज़ों के बीच
पूरब में अकेला सारस स्थिति प्रग्य
छिपकर  कर रहा है मत्स्य यग्य 
नहीं है कहीं  पर भी सूखी जमीन/पर
सूरज की गर्म रौशनी के नीचे
 हाथ भर के फासले पर है शांति
निस्तब्धता ,सहज और अनुपम 
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  निद्रारत सुंदरी     THE SLEEPING BEAUTY  BY - SAMUEL ROGERS

स्वर्ग   के   स्वप्न  देखती  है  निद्रारत  सुंदरी 
हंसती है आँखें उसकी पलकों में छिपी
गुलाबी ओंठ मुस्काते हैं मीठी मुस्कान
और थरथराने लगते है गहरी साँसों से
रक्तिम कपोल हैं लज्जा के चुम्बन से
हंसिनी का भास सुराहीदार गर्दन से 
स्पर्श करता है प्रणय अदृश्य ओठों से 
ओठों ही ओठों में गुनगुनाती है कैसे
जानना चाहता हूँ पर डर है  जैसे 
 विस्मृत है देहभान ,देहो के मेल से
सिसकती    है  वह कसमसा कसमसाकर
संगमरमरी हाथ हैं धवल गुम्बदों पर 
हिंडोले में झूलती है अब वह निद्रारानी के
जसे कोई फरिश्ताखोया हो विश्रांति में
खोई रहो स्वप्नों में निद्रालीन इसी तरह
स्वर्ग के नियंत्रण में है भावनाओं का बहर
अदृश्य लोक में छ्पराज दिव्य स्वप्न का
मीठी मुस्कान,तुम्हारी कसमसाहट का

खूबसूरत कलियों के नाम -TO THE  VIRGINS  - BY ROBERT HARRICK 

ओ खूबसूरत गुलाब की कलियों !                          
दुपट्टे में समेट लो समय के पाखी को
आज खिलखिलाकर रहे है जो दहक
उड़ जाएगी सदा के लिए  उनकी महक
स्वर्ग का ज्योतिपुंज.. यौवन का सूरज
उठ रहा है अब धीरे-धीरे आकाश पर
आयु का दावानल जब झुलासयेगा तन
 नहीं लौटेगा तब यौवन का मादक मन
रति ताप से जब दहकने लगता है तन
प्रेम की मधुरता से महकता है मन
प्रौढ़ता का प्रतिबिम्ब जब छू लेगा तन
गमकती यादों में रोया करेगा मन
मत बनो लाजवंती,प्रेम की यही है चाह
आसक्त भमर को है मधुरस की आस
कुम्हलाया अगर यौवन पुष्प.मुरझाएंगे टेसू
जीवन भर आँखों में होंगे आंसू आंसू आंसू...


रोजलीन ---- ROSALIN-BY-THOMAS LODGE 

चमकता है आसमान में अप्सराओं सा            
दिव्य रूहों का सौन्दर्य अलौकिक सा  
केशों का मोहपाश है उसका मेघवृन्द  सा
बिखरे या नागिन सी वेणियों में गुम्फित सा 
तुम लावण्यमयी    रति रूपा हो रोजलीन 
उसकी आंख्ने जैसे बर्फ में जड़े हीरे
स्वर्ग का प्रवेशद्वार हैं उसकी गहरी पलकें
आँखों में जब दहकते हैं प्रेम के स्फुल्लिंग
हतप्रभ रह जाते हैं समूह  देवताओं के
क्या तुम सचमुच मेरी हो रोजलीन !
रक्तिम  बनाते  हैं  भोर  के  गुलाबी  चेहरे  को 
कपोलों की रंगत को अरुणिमा देती  सुर्खी को
मेनका सी मुस्कान मोहक है मंद- मंद
यौवन से महकते हैं रोजलीन के अंग-अंग
ओष्ठ युग्म जैसे जोड़ी गुलाब कलियों की
परिधि में है कैद मदनपाश सीमाओं की 
क्या तुम सचमुच मेरी हो रोजलीन!
शाही स्तम्भ हैं उसकी गर्दन सुराहीदार 
स्वयं प्रेम जिसके बंधन में है बेजार
अपनी एक झलक  पाने को आतुर प्रतिपल 
झील सी आँखों में डूबता हर पल
सच! तुम कितनी सुन्दर हो रोजलीन!
आल्हाद के केंद्रबिंदु हैं कुचाग्र  उसके
और उरोज जैसे गुम्बद स्वर्गद्वार के 
जिनके सभी वलयों पर आसक्त प्रकृति 
करती है परावर्तित सूर्य रश्मियाँ भी
सम्मोहन में जिसके मैं हो जाता हूँ लीन
क्या सचमुच तुम मेरी हो रोजलीन!
उज्जवल मोती और रक्तवर्णी माणिक
धवल संगमरमर..नीलम के नीलमणि 
उसके अंग-प्रत्यंगों के सजीव अलंकार
कामदेव की धनु प्रत्यंचा को देते हैं टंकार
रेशम का स्पर्श और मधु की मिठास
रोजलीन! तुम्हारे प्रेम की कैसी है आस!
उर्वशी.. मेनका ..रम्भा या रति की छाया
कामाग्नि का देह-दर्प तुममें ही समाया 
नयन कटाक्ष करते है ईश्वर को आहत 
कामबाण की मूर्छा से मन को है राहत 

जाओ मेरे प्यारे गुलाब!! --   GO LOVELY ROSE--- BY-EDMUND WALLER 

जाओ मेरे प्यार गुलाब 
 उससे कह देना तुम जाकर कि    
गुम हो रहे हैं पल-पल ,छिन-छिन 
क्या ...अब वह नहीं जानती कि 
जब भी मैं कहता हूँ उसे-प्यारे  गुलाब!
महकने लगती है जैसे-खुद ही हो गुलाब !
*****
जाओ मेरे प्यारे गुलाब
!उससे कह देना तुम जाकर कि 
सुमन,सुधा,सुकेशा, सुनयना है वह
सहेजा हैं यौवन जिसने ,स्याह नजरों से बचाने
रति रंग सजे अंग-अंग,इस देह के वीराने
जो तन था एक शून्य बिना प्रेम भ्रमर के
रीता था यह रति धनु,बिना काम बाण के
****
चाहे तो तुम फिर मुरझा जाना गुलाब!
तुम्हारी आँखों में ही पढ़ लेगी  ख्वाब
कि कितने कम थे प्रगाढ़ता के वे पल
कली के खिलने और मुरझाने के बीच
कितने अदभुत!महकते रहे साँसों के बीच
सावन में सारिका के सुरों से गए सींच 

चांदनी में अभिसारिका ---A THRUSH IN THE MOON LIGHT-BY-WITTER BYNER 

चाँद उतरा आसमान से और
ढांप लिया आश्चर्य  से मुझे 
उसकी निकटता और स्पर्श से 
मैं हो गया सम्मोहित ऐसे 
गूंजने लगे प्रेमगीतों के स्वर जैसे
मेघों की गरज,फिर शीतल फुहारें
मैंने झुकाया सर उस चाँद की ओट में 
बेसुध था उस स्निग्धता से मैं
और चाँद आ गया एकदम पास 
पक्षियों के कलरव ने जगाया देह्भास 
सर उठाया तो निशा ने कहा अलविदा
यामिनी के स्याह को  ले उडी  वे रश्मियाँ 







































रविवार, 14 सितंबर 2014

मैं खिड़की हूँ ……

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मैं खिड़की हूँ …… 
दोनों और निहारती हूँ 
कोई बंद कर लेता है जब 
सोचती हूँ उनके बारे में 
जो होते हैं कमरे के भीतर
पर ठीक उसी वक्त फीडबैक
मिलता है मुझे दुनिया के
विहंगम,विकल -अविकल
विकास और विनाश का भी !
मैं खिड़की हूँ। …
समझो तो एक सेतुबंध
भीतरी/बाहरी दुनिया के बीच
यह तो आपपर है निर्भर
जानना और आत्मसात करना -
खुली खिड़की का ध्रुव सत्य
अगर मन-मेधा की अपने
रखोगे खिड़की खुली
हो जाओगे पूर्णतः अपडेट
समय - सापेक्ष सरोकारों से
वर्ना-मैं रहूंगी चिर मौन !
और आप?-ठहरा हुआ पानी!
अतः सोचो अपने बारे में
मैं खिड़की हूँ। ....

(अपर्णा अनेकवर्णा की भेजी एक पोस्ट के बाद मैंने सोचा-)

शनिवार, 13 सितंबर 2014

गुनगुनाती कुदरत - अध्येता यायावर (SCHOLAR GYPSY-By-MATHEW ARNOLD)

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अध्येता यायावर (SCHOLAR GYPSY- By-MATHEW ARNOLD)


जाओ गडरिये...वे पहाड़ी से तुम्हें बुला रहे हैं...
खोल दो वे जंगले जो टहनियों से बने हैं
लालायित भेड़ों के झुण्ड को भूखा  मत रहने दो 
और मत चीखने दो प्यास से साथी  कुत्तों को
कुतरी घांस के ठूंठों  का मत लगने दो मेला
जब खेत हों खामोश और हो गोधूलि की बेला
........
मजदूर और कुत्ते सब थककर हो गए हों चूर
सिर्फ सफ़ेद भेड़ें नजर आ जाएँ कहीं दूर
चाँद की दूधिया रोशनी में नहाये खेतों के पास
आओ गडरिये...ताजा कर ले किसी के मिलने की आस
.........
कटैया बहता है अपना पसीना  देर तक यहाँ 
छायादार इन खेतों के झुरमुटों में वहां
जहाँ रखा था उसने अपना गमछा,पोटली और सुराही
उगते सूरज के संग बाँधता है फसलों के ढेर
तब थकान से चूर भरता है अपना पेट दोपहर
यहाँ बैठ करूंगा मैं उसकी प्रतीक्षा उस पहर
दूर मैदान से गूंजेगी मेरे कानों में
मिमियाहट.... भेड़ के नन्हे छौने की 
भुट्टों के खेतों में काम करते कटैयों की 
और बेजान सी सरसराहट दुपहरी की 
..........
ऊंचे अधकटे   खेतों का यह छायादार कोना
ओ गडरिये!मैं रहूँगा यहाँ तब  तक 
जब तक आसमान में पसरेगा ,सूर्यास्त का सोना
सर उठाते हैं अहिपुष्प भुट्टे के घने खेतों में 
गोल गहरी जड़ें और सुनहरे मक्के की बालें 
मैं निर्निमेष निहारता हूँ अपलक किस तन्मयता में!
..................
किसलय उभरते हैं हरिणपदी की गुलाबी गोद से
महकती है मंदानिल नीम्बुओं  की गंध से
पुष्पित हैं पारिजात पावसी सम्मोहन से
और रक्षित हैं मन मयूर आदित्य  तप्त ताप से 
दृष्टि यात्रा पसरती है आक्सफोर्ड की अट्टालिकाओं पर
विस्मृत होता है चंचल मन देहभान त्यागकर
.......
देखो!तृणशैया पर रखा है "ग्लानविल का रचना संसार"
पन्नों के पार्श्व पर अंकित अध्येता यायावर का कथा सार
प्रखर मस्तिष्क.. पर गरीबी से थक हारकर'
टूट गया मानव तन विपदा से जूझकर
...
अब सुनो कहानी एक अध्येता यायावर की
गर्मियों की एक सुबह उसने छोड़ी सोहबत दोस्तों की
चला गया यायावरों से सीखने बातें अबूझ तिलस्म की
 चप्पा-चप्पा भटकता रहा दुनिया यायावरों की
जैसे बूझता हो पहेलियाँ,कंजर ... उत्पति गिरोह्जन की 
पर कभी सुध न ली अपने दोस्तों और आक्सफोर्ड की
..........
कई बरसों बाद बन गया एक  संयोग था
अचानक मिले दो साथी जिसे वह जानता था 
दोस्त! कैसे बीत रही है जिंदगी पूछा  उन्होंने
सबको हैरत में दाल दिया अध्येता यायावर की बातों ने
यायावर टोली जानती है तंत्र- मन्त्र -सम्मोहन!
वशीकरण से वश में कर लेना दूसरों का मन
विवश कर देता है इनकी मोहिनी का मोहपाश
जादुई विद्या के जोर पर करते है सर्वनाश...
और मैं.. बोलता रहा वह अध्येता यायावर 
भौचक थे किस्सों से .. अवाक सारे श्रोता थे 
उनकी कला का तिलस्म सीखकर आऊँगा मैं
कैसा है यह जादू दिखलाऊँगा मैं
पर पारंगत होने इस गूढ़ विद्या में 
ईश्वरीय वरदान की चाह  में प्रतीक्षारत हूँ मैं
......
बस इतना कहकर चल पड़ा  वह अध्येता यायावर
पर बात फैली सब और लपटों की तरह सर -सर 
गावों में अरसे से गुम अध्येता यायावर दिखा था आज
कुछ देर बोला पर चिंतित सा .. क्या था इसका राज!
यायावर की तरह  ही बन गया था अध्येता यायावर
वेश था उनके जैसा वैसा ही था उसका परिवेश
चोगा और अजूब टोपी,बस यही रह गया था शेष 
घूमता रहा था अध्येता यायावर कई गाँव कई देश
.



...................
वसंत की एक भोर ... मिला वह दरख्तों के नीचे
जलते अलावों के पास था वह यायावरों के पीछे 
असभ्य किन्तु अनुरागी,अनाडी लोगों के पास 
जैसे ही वे चीखते चिल्लाते और मचाते शोर
अध्येता यायावर यक्ष- प्रश्न लेकर निकलता किसी और
जीवंत  अंदाज उसका ऐसा खूब समझता था मैं
क्योकि लगता था की अगर वहां पर होता मैं
तो सरपट भाग निकलता कहाँ-कहाँ पर मैं
.........
पूछता था सभी से अपना चेहरा दिखाकर
बोलो देखा है ऐसे चेहरे वाले को तुमने कहीं पर!
पूछता था मैं खेतों पर बैठे रखवालों को
बोलो!वीराने रास्तों से गुजरते देखा है किसी को?
...
क्या अब मैं लेट जाऊं अपनी इस नौका में 
समुद्र तट पर तैरती जो अटकी है लंगर में !
सूरज की रोशनी से चमकते चारागाह के निकट 
और तकता रहूँ हरी चादर ओढ़े पहाड़ियों को विकट
इस उधेड़बुन में खोया हाकी वह अध्येता यायावर
क्या आया होगा इस अप्रतिम,अबूझ ठिकाने पर!
.....
वे हरफनमौला यायावर अक्सर यहीं डालते हैं डेरा
इसी जगह को कभी जंगलों और जानवरों ने था घेरा
यहीं उस अध्येता यायावर को मिली थी शांति की राह
आततायी विद्रूपता से विमुख होने विरक्ति की चाह 
आक्सफोर्ड के छात्र यहीं करते थे नौकायन
ग्रीष्म यामिनी में घर लौटकर करने से पहले शयन
अपनी अँगुलियों से नदी की शीतल जलधारा को सहलाते
जैसे ही लंगर से छूटकर घूमती थी उनकी नौका
पीछे झुककर झूलने लगते थे स्वप्न का झोंका
उस्न्की गोद में रहते थे ढेर सारे फूल झर झरकर 
छायादार शीतल ठौर,खेतों में लदी फसलों की सरसर 
तकते रहते चन्द्रप्रभा से आल्हादित झरनों की कलकल 
........
पर हाय!आक्सफोर्ड के छात्रो ने पार कर ली थी नदी
चप्पा-चप्पा ढूँढा,अध्येता यायावर नहीं मिला कहीं
बालाएं जो आकर करती थीं नृत्य जहाँ-जहाँ
सांझ ढले हिरनी बनी गाँव की गोरियां वहां-वहां
अठखेलियों के साथ उन्होंने भी पार कर ली थी वह बाड
शायद! देखा होगा उन्होंने कहीं उस अध्येता यायावर को
जो भर देता था उनके आंचल में ढेर सारे  फूलों को
पर कभी नहीं लाता था जुबान पर अपने मन की बातों को
..........
पुष्प-पवन पुष्प और नील घंटिका के
भोर के तुषार बिन्दुओं में भीगे-भीगे से
नीलवर्णी आर्किड,लुभावनी पत्तियों के 
कोई न जान सका ठिकाने अध्येता यायावर के
......
घूमने लगा काल चक्र और बीतता गया हर प्रहार
लू की लपटों से सहमता रहा रपटा दोपहर
सूखी घांस के गट्ठर लहराते थे लहर-लहर
और चमकने लगे रोशनी के टुकड़े दरान्तियों पर
सरसराते खेतों से जाया करते थे खेतिहर
वहीँ पर उतरते थे अबाबीलों  के स्याह पर
थककर चूर,अठखेलियाँ -कल्लोल करते थे जहाँ पर
हाय! उसी डोह में कोई नहीं आता था वहां पर
...............
अचानक ही उनका मलिन मुख मुस्काया
सोचा!कितनी  प्रतीक्षा के बाद अध्येता यायावर को पाया
उफनती नदी के तट पर बैठा था वह स्थिति प्रग्य
अजूबा सा परिधान पहने जारी था उसका भाव-यग्य 
गहरी खोई सी आँखों में थी सपनों  की छाया
दूर...से देखकर उसे, सबका मन हर्षाया
पर हाय! नियति को उनका सुख न भाया
जाकर वहां देखा तो उसे कहीं न पाया
गुम हो चुका था "अध्येता यायावर  का साया
सोच उन सबने होगी यह ईश्वर की माया
.................
नहीं! वह दिखाई दे जाता था कहीं न कहीं पर
क्यूमर पहाड़ी की वीरानी में बसे किसी फ़ार्म हाउस पर
अपनी झलक दिखा देता था वह अध्येता यायावर
किसी प्रतीक्षारत गृहिणी को खुले दरवाजे पर
कोठारो पर जो गंधाते थे काई से
निहारत था वह थ्रेशर को अपलक नेत्रों से
मिलता था उन छौनों से जो विचरते थे ढलानों  पर 
और चनसुर की तलाश में भटकते थे सोतों पर
........
सचमुच...उन्होंने ही देखा था उस अध्येता यायावर को
अपलक निहारते दूब की चादर  ओढ़े  खेतों को 
खिलाता था वह चारा अक्सर भूखी गायों को 
और प्रफुल्लित हो मुस्कान से खिला लेता ओठों को
गर्मियों में वह निकल पड़ता था वीरान जंगलों की ओर
पगडंडियों के किनारे बसे थे वहीँ यायावर तम्बू दोनों ओर
........
हां .. आता था यायावर उन अबूझ बस्तियों में
 चीथड़े और पैबंद थे जहाँ पर हर झाडी में  
मीलों पसरी भूमि के ऊपर सारे जंगल में 
कस्तूरक पक्षी      दबाकर दाना अपनी चोंच में 
विहार करते थे निडर, यायावरों की उपस्थिति में 
निर्भय थे  सभी ,ममतामयी प्रकृति की गोद में 
.....
 अक्सर सैलानी बन घूमता था वह अध्येता यायावर
सूखी टहनी घुमाते अपने हाथों पर 
उस अलौकिक क्षण के लिए प्रतीक्षा रत था चेहरा 
सर पर जब उसके सजेगा ...सफलता का सेहरा