शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

दिल में मेरे है दिल में मेरे है दर्दे डिस्को.....दर्दे डिस्को.....दर्दे डिस्को....!

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दिल में मेरे है दिल में मेरे है दर्दे डिस्को.....दर्दे डिस्को.....दर्दे डिस्को....!


दर्दे दिल दर्दे जिगर दिल में जगाया आपने
पहले तो मैं शायर था आशिक बनाया आपने
कुछ इधर की कुछ उधर की.. पर चर्चा के दौरान विविध भारती में बज रहे इस रोमांटिक गीत पर एकाएक हम दोनों का ध्यान एक साथ गया.सुनहरा मौका ताड़कर दद्दू तपाक से बोले, " यार अखबार नवीस !ये मुहावरों की दुनिया भी कितनी निराली होती है?"
"हाँ...बात तो पते की है और मुहावरे भी जिंदगी के रंगों की ओर इशारा करते हैं .क्या तुम इस वक्त मुहावरों को किसी खास नजरिए से देखना छह रहे हो ?  "इशारा समझकर  भी मुद्दे की बात मैं दद्दू के मुहं से सुनना चाह रहा था." मैं सोच रहा था फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी गीतों की तरह दिल के कितने करीब हैं ये मुहावरे ?दद्दू ने बात कुछ और साफ की.
          दिल का मामला .. दिल से दूर...दिल में चोर...दिल हिला देना...पत्थर दिल...आदि-आदि.फेहरिस्त का पहला पन्ना मैंने दद्दू के सामने खोलकर कुछ इबारतें पढ़ीं." हाँ ssss   अख़बार नवीस किसी का दर्द महसूस कर दिल रो पड़ना ...दिल तोडना ...शेर दिल.. बुझ दिल...दिल भर कर रोना भी दिल से जुड़े बेहतरीन मुहावरें है." दद्दू ने दिल से जुड़े मुहावरों की फेहरिस्त से कुछ और इबारतें पढ़ीं.
                   " अंकल...दिल से जुडी फिल्मों के नाम बताऊँ ? पप्पू अचानक बीच में टपक पड़ा.जैसे ही उसने नाम गिनाना शुरू किया -दिल वाले दुल्हनिया ... दिल से ... दिल में मेरे है दिल में मेरे है दर्दे डिस्को.मैंने उसको टोककर कहा ,"" ओये .. चुप कर यार !तुम लोग आपस में जब दोस्तों के साथ बैठोगे तब इस दिल के मामले पर बतिया लेना.हम लोगों की बातचीत सुन रही बबली भी कहाँ खामोश रहने वाली थी? बोली ," अंकल आज हम सब सहेलियां मिलकर एक ऐसी कम्पीटीशन करेंगे जिसमें सभी गाने "दिल" से शुरू होंगे..इतना कहकर वह फुर्र हो गई.इसी बीच एक नए गीत के बोल गूंजने लगे थे.
             दिल है के मानता नहीं...
दिल की बात जुबान पर ... लाने के बाद कोई किसी को दिल दे बैठता है.अगर दो दिल मिल रहे हैं ... तब तो ठीक है वर्ना दिल छोटा करना मजबूरी बनकर सामने आ जाता है.
 दिल की ये आरजू थी कोई दिलरूबा मिले.  ..         ...
भटको मत... लौट आओ दद्दू,हम लोग दिल से जुड़े मुहावरों की बात कर रहे हैं.दद्दू अपनी दुनिया में लौट आए और कहने लगे "अंग्रेजी में दिल यानी heart  से जुड़े मुहावरें कई हैं.Bleeding heart   ...Be at heart ... Bare your heart  और भी कई हैं लेकिन अपने दद्दू ह़र  किसी को यही सलाह देते हैं   Never break anybody's heart  .
                           दिल की बात सुने दिलवाला...
ओल्ड इज गोल्ड- पुराना फ़िल्मी गीत याद करते हुए नौजवान दोस्तों की चकल्लस का ख्याल हो आता है.बंटी अपने फ्रेंड से कह रहा था," Be a lion hearted yaar!!!!"   दो सहेलियां आपस में एक-दूसरे की प्रशंसा कर रही थी,"  You have a heart of gold dear!... You too....!
                मेरे कालेज की डायरी के पन्नों में दबा हुआ है एक सुर्ख गुलाब का फूल.नीचे एक इबारत लिखी है," दिल क्या चीज है आप मेरी जान लीजिए ..." दद्दू के हाथों में जब एक रोज डायरी लगी थी तब मुस्कुराकर बिना कुछ पूछे बहुत कुछ समझ गए थे ...
                           खैर ... दद्दू एक बार फिर समझाइश देने के मूड में आते है." अख़बारनवीस ! मुझे लगता है इंसान का साफ दिल और रहमदिल होना जरूरी है.वो शख्स इन्सान ही नहीं जो पत्थर दिल हो.बचपन में माँ का का दिल वाली कहानी सुनी थी, याद है?रूठे दिलों को कैसे भी कर मना लीजिए.आपके शब्द ऐसे हों जो किसी के भी दिल पर लगे जख्मों पर मरहम का काम करें.बेंजामिन फ्रेंकलिन ने कहा है," The heart of a fool is in his mouth but the mouth  of wise man is in his heart."
                        अब आप अपने दिल पर हाथ रखकर कहिए के कभी कोई काम अधूरे दिल से नहीं करेंगे.ह़र काम होगा पूरे दिल से....!सिर्फ दिल  से जुड़े मुहावरे पढ़ने  और समझने से कुछ नहीं होगा.एक बात चलते-चलते आपके यानी मेरे अपनों के लिए कह रहा हूँ -- छोडो  ज़माने की बात... दिल की बात समझो वर्ना हम तो आपके लिए यही कहेंगे -
                                  तुम ज़माने की राह से आए
                                 वर्ना सीधा  था रास्ता दिल का
                                                                                                    किशोर   दिवसे                                                                    
                      
          

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा

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कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा




मान लो के दुनिया अगर समंदर है तब आप और हम कश्तियाँ ही तो हुए !हमारा जमीर पतवार की भूमिका अदा करता  है .खुदा  और नाखुदा (नाविक )की अपनी-अपनी अहमियत होती है.किसी की भी हो ,जिन्दगी है तब समंदर की तरह उसमें तूफ़ान आयेंगे ही.और यही वक्त होता है जब हम सब ईश्वर या खुदा तथा नाखुदा को जिन्दगी के आईने में कुछ इस तरह देखने लगते हैं-
                     खुदा और नाखुदा मिलकर डुबो दे  ये तो मुमकिन है 
                     फकत तूफ़ान मेरी वजहें तबाही नहीं हो सकता 
यकीनन जब भी किसी कि जिन्दगी में तूफ़ान आते हैं देर -सबेर कश्तियाँ साहिल पर पहुँचती ही हैं.हौसला अफ़ज़ाई  करने हम एक-दूसरे से कहते भी है ,"नाखुदा जिनका ना हो उनका खुदा होता है "यह बात अलग है कि जिन्दगी के सफ़र में खुद से कोई लुट जाता है तो किसी को नाखुदा  ही लूट लेता है.दरअसल आपने भी कभी महसूस किया होगा हमारे जीवन में कुछ तूफ़ान ऐसे भी आते हैं जो खुद-ब खुद हमें किनारा सौंप देते हैं.
                      " पर अखबारनवीस ... जिन्दगी में कुछ लोग खुशामद करना नही जानते.उनकी खुद्दारी उन्हें व्यावहारिक नहीं बनने देती है.-दद्दू भावावेश में बहने लगे थे." लेकिन ऐसे लोग प्रैक्टिकल न होने की वजह से कभी-कभी सफल नहीं हो पाते.
पारदर्शी प्रशंसा और फूहड़ चाटुकारिता में जमीन-आसमान का फर्क है और यही पर कोई खुद्दार अपनी औक़ात पर कुछ इस तरह उतरता है -
                         नाखुदा मुझसे न होगी खुशामद तेरी 
                         मै वो खुद्दार हूँ ,कश्ती से उतर जाऊंगा 
जिद होनी चाहिए कि कश्ती  है तब सफ़र करना ही है चाहे कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न हो भला कश्ती का ऐसा कोई मुसाफिर होगा जिसने समंदर नहीं देखा होगा? भाई!जिन्दगी को पूरी संवेदना ,गहराई और चौकस नजरिये से देखना और समझना होगा वर्ना कश्ती के ड़ूब जाने का ख़तरा  नहीं मंडराएगा  क्या?
                        प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने संजीदा होकर कहा,"' अखबार नवीस! कभी कोई कश्ती ड़ूब जाती है तब आसानी से तूफ़ान की खबर हो जानी चाहिए लेकिन चाहे इसे खुदा की गफलत कहें या जिंदगी के सफ़र में हमारी अपनी असावधानियाँ ,साहिलों से टकराकर कई नौकाएं टूट जाती हैं.इसलिए जिन्दगी को पूरी गंभीरता से हर अंदाज समझकर जीना चाहिए."
                     " जिंदगी के दौरान जीवन  क़ी धूप,तल्खियों या जिम्मेदारियों से  कुछ लोग भागना चाहते है.आंधियां आने पर अपनी कमजोरियां एक-दूसरे पर टालने क़ी कोशिश भी करते हैं .एक खूबसूरत साकी ने जिसकी कश्ती साहिल पर ही टूट गई थी अपनी आँखों में कशिश लिए हुए मुझसे कहा था-
                            खुदा क़ी गफलत भी क्या से क्या दिखाती है
                            साहिलों से टकराकर नाव भी टूट जाती है 
यकीन मानिये ,जीवन में हर पल नाखुदा (नाविक )को बाखबर रहना होता है.नदी क़ी शांत लहरों  पर तैरते हुए दीये से भी सवाल किए जाते होंगे ,ऐ  मौजों (लहरों ) वो कौन लोग है जो कश्तियाँ डुबोते हैं?" आचार्य विनोबा ने कहा है , ' संघर्ष और उथल-पुथल के बिना जीवन बिलकुल नीरस बनकर रह जाता है.इसलिए जीवन में आने वाली विषमताओं को सह कर उससे सीखना ही समझदारी है.
                                कल रात को जब मैं सोया था,सपने में जिन्दगी को देखा
"I slept and dreamt that life was beauty.I woke and found that life was duty."
आप तो मेरे अपने हैं .जिन्दगी के समंदर में जब आप और हम कश्तियाँ हैं खुदा ...नाखुदा ... साहिल और समंदर क़ी चढ़ती -उतरती लहरों में भीगी-भीगी एक बात मुझे अक्सर याद आया करती है
                                 उसकी कश्ती को हवादिस ने दिया है साहिल
                                बढ़ के जो वक्त के तूफ़ान से टकराया है
                                                                                           अभी इतना ही... अपना ख्याल रखिए
                                                                                                     किशोर  दिवसे

                       

ममता का आँचल

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ममता  का  आँचल


सच्ची पापा ... मैंने आप में देवदूत को देखा था.... ईश्वर का रूप भी आपसे अलग नहीं समझा था मैंने.... फिर   क्यूँ आपने मुझे नहीं बताया कि मैं गोद ली हुई बेटी हूँ! क्या आपकी बेटी इतनी कमजोर थी कि वह इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी या आपके ही मन में कहीं यह डर था मुझे खो देने का? पापा... आपने तो मुझे अपने आंसुओं से सींचा है.इतने सालों बाद भी मेरे मन में कभी यह सवाल नहीं उठा क़ि, मेरे असली पापा कौन होंगे... भले ही मुझे मेरी सहेलियों से पता चल चुका था."
                       स्नेह की डायरी के पन्नों पर लिखी इबारत त्रिलोचन बाबू के आंसुओं से धुंधली हो गई.कांपते हांथों से वह डायरी वहीँ पर गिरी जहाँ दुल्हन के सिंगार में बिदा होती स्नेह की आँखों से आंसुओं के फूल जमीन पर गिरे थे.त्रिलोचन ने आंसुओं से भीगी माटी को पोरों से उठाकर उसी डायरी के पन्नो में सहेज लिया.गोद ली बेटी बिदा हो गई ससुराल पर इस सवाल ने त्रिलोचन के मन में हूक उठा दी थी, " मैंने शादी होते तक स्नेह को यह बताया ही नहीं कि वह मेरी गोद ली हुई बेटी है.मेरा फैसला सही था या गलत..... सचमुच अपनी बेटी को मै अगर खो देता तब!अपनी बेटी को मैंने इतना कमजोर क्यों समझा!क्या वह मेरे स्नेह बंधन में छिपे पश्मीने भाव को नहीं समझ पाती?
                       " त्रिलोचन ,तुमने स्नेह को न बताकर ठीक नहीं किया."   "नहीं...नहीं...मैं बिलकुल गलत नहीं हूँ..." मेज पर रखे आईने में त्रिलोचन को अपनी ही दो शक्लें दिखाई दीं.एक दूसरे से जिरह करती हुईं .और उनसे जवाब मांगता वह सवाल विचारों के खंजर लिए हुए लहूलुहान करता ही रहा त्रिलोचन को.
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तीन से सोलह बरस का सफर ... ट्रेन पूरी रफ़्तार से दौड़ रही है अपने  गंतव्य की ओर.फेयरी क़ी जिंदगी किशोर वय में ही इतनी " अनफेयर " क्यों हो गई थी?गोद लिए होने का मतलब यह तो नहीं क़ी वर्जनाओं के परबत लाद दिए जाएँ!मम्मी... पापा... भैया....सब मिलकर मुझपर कितनी सख्ती बरतते  हैं!मुझे... मेरे मन को भीतर से समझने क़ी कोशिश कोई क्यों नहीं करता? टीनएजर मन कच्चा लोहा होता है.किसी के भी प्यार का चुम्बक उसे आकर्षित कर लेता है ." खुद को न समझे जाने और अति वर्जनाओं से उपजी अपोजिट रिएक्शन ने फेयरी को गलत रास्ते पर डाल दिया.? साईंकियाट्रिस्ट के कहने पर जब गलती का एहसास हुआ काफी देर हो चुकी थी.
                                   अँधेरी सुरंग से दूर करने फेयरी को " बड़े शहर " भेजा जा रहा है .... बहाना पढने का.काश ! मुझे समझने क़ी कोशिश क़ी गई होती.  माँ... माँ ...फेयरी क़ी आँखों से आंसू उसकी नावेल पर गिरे.मेक्सिम गोर्की  के उस उपन्यास का शीर्षक था " मदर ".ट्रेन क़ी रफ़्तार के साथ ही फेयरी क़ी माँ भी दौड़ रही  थी पूरे आवेग से .... धक् धक् धक् धक् !
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" निपूती बाँझ कहीं क़ी... अब तो अपने बेटे क़ी शादी किसी दूसरी लड़की से कर दूँगी..."इस तरह के कलेजा छलनी कर देने वाले फिकरे बदलते समय और शिक्षा के प्रभाव से शहरों में तो काम पर गाँव में अब भी सुनने को मिल जाते हैं. समय पर बच्चा गोद लिए जाने क़ी आवश्यकता ,लाभ और सहूलियतों क़ी समाज के भीतर गहराई तक समझाइश दिया जाना आज भी जरूरी है.हकीकत यह है क़ी शहर -गाँव दोनों जगह खुली मानसिकता देखने नहीं मिल रही. लिहाजा इस दिशा में जन जिहाद अमल में लाना होगा.भ्रम और अंतर्द्वंद का घटाटोप बच्चा गोद देने वाली संस्थाओं के रहने पर भी छटता  नहीं है.
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अखबार नवीस!कई विदेशी  ,भारत आकर यहाँ के बच्चों को गोद ले रहे हैं,क्या तकदीर है उनकी! दद्दू के इस हैरत भरे सवाल क़ी तृष्णा को मैंने शांत किया ," विदेशी परिवारों में बच्चे काम रहते हैं.अतृप्त मातृत्व क़ी प्यास वे महिलाऐं बच्चे गोद लेकर और कुत्ते पालकर भी पूरी करती   है.अपने देश में साक्षरता के अभाव में एक तो बच्चे पैदा करना ही  कई जगह " मनोरंजन उद्योग समझने की मजबूरी है .दूसरा जिन नेताओं के ही ८-१० बच्चे हों वे क्या खाक शिक्षा देंगे अवाम को?तीसरा इंसानों के बच्चे कुत्तों क़ी तरह लावारिस और बेसहारा घूमते दिख जाते हैं लेकिन इलीट क्लास के लोग उन बच्चों का भविष्य बनाना सोचने के बजाय कुत्तों को राजकुमार क़ी तरह पालते हैं.सबसे बड़ी विडंबना यह है क़ि निःसंतान दंपत्ति मनोवैज्ञानिक रूप से इतने कमजोर हैं क़ि वे ख़ुदकुशी कर लेते है मगर बच्चा गोद नहीं लेते.. क्यों!!!!
                                  दद्दू कुछ विचार मग्न प्रतीत हो रहे थे क़ि मैंने उन्हें याद दिलाया के मिस  यूनिवर्स  सुष्मिता सेन, अंजेलिना जोली और अनेक अभिनेत्रियों ने खुद कुंवारी रहकर भी बच्चे गोद लिए हैं.उनके बदन उघाड़ूपन  के आलोचक इस जज्बे की प्रशंसा क्यों नहीं करते? नव धनाढ्य वर्ग इनदिनों जगराता  और बाबावाद के जरिये अध्यात्म क़ी  जीतोड़ मार्केटिंग कर सकता है. धार्मिक कार्यक्रमों से आपत्ति नहीं पर सामाजिक सरोकार के प्रति वे शतुरमुर्ग बनकर  आँखे क्यों मूँद लेते हैं? लायंस , रोटरी तथा जेसीज जैसी संस्थाएं भी लावारिस बच्चों तथा दीगर बच्चों को गोद लेने जनजागरण कर सकती हैं.
                                  मेरे एक पत्रकार मित्र एक परिवार में सिर्फ यह देखने गए थे क़ि गोद ली हुई बच्ची वयस्क होने के बाद परिवार में कितना मानसिक तौर पर एडजस्टमेंट   कर पाती है .वात्सल्य की  पराकाष्ठा  देखिए महिला की  आँखों  से आंसू झरने लगे थे .उसने यह भी कहा " भगवान के लिए....कोई स्टोरी  नहीं देनी है अख़बार में... उसे पता भी नहीं चलना चाहिए क़ि वह गोद ली हुई है.
                              दद्दू बता रहे थे ," अखबार नवीस ! मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो जिसने  बच्चा गोद लिया पर जिम्मेदारी नहीं समझी." मैंने जब बीच में टोका तब उतावले होकर दद्दू बोले,"पूरी बात तो सुनो ,उसने गैर जिम्मेदारी की  हद कर दी.दारू पीना नहीं छोड़ा और असमय ही खर्च हो गया.?
                              गोद ली हुई एक बच्ची माया आज मेडिकल कालिज में पढ़ रही है.सभी के चेहरे पर हर्षातिरेक... पर यह तभी संभव हुआ जब माता-पिता ने पूरी जिम्मेदारी से माया क़ि परवरिश की.डाक्टर पटेल के गोद लिए बच्चे ने जब सान फ्रांसिस्को से अपने बूढ़े माता- पिता को ख़त लिखा और वाहन आने के लिए हवाई टिकट भेजे उनकी आँखे भर आई.मैं उनसे इतना भर कह पाया," यह तो ऋणानुबंध है डाक्टर साहब!क्या फर्क पड़ा अमित गोद लिया बेटा है!आज जब बच्चे अपने बूढ़े माँ बाप को सहारा देने में कतराते हैं तब गोद लिए बच्चे अनमोल वरदान नहीं तो और क्या हैं?
                                  " लेकिन अखबार नवीस!लोग गोद लिए बच्चों की परवरिश के मामले में भी साईंकियाट्रिस्ट से सलाह लेने में झिझकते क्यों हैं?दद्दू के इस सवाल का जवाब आप भी सोचकर दीजिएगा.और हाँ...बेशक लोग भले ही यह मानने लगे हैं कि गोद लेना अच्छी बात है लेकिन सामाजिक संस्थाएं इस महायग्य के प्रति उदासीन क्यों हैं?गोद लिए बच्चों के परिवार हों या समाज इन यक्ष प्रश्नों का जवाब उनके पास भी नहीं क़ि-गोद लिए बच्चों को क्या बताया जाए क़ि वे "अडाप्ट" किए हुए हैं!बताया जाए तो कब?नहीं बताया जाए तो क्यों नहीं?                        सोचिए  और बताइए...                             
                                                                        किशोर दिवसे 
                                             e-mail             kishorediwase0@gmail.com

कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं..

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कौन  याद करता है हिचकियाँ समझती हैं... 
बेटा ...कोई शायद याद कर रहा है इसलिए इतनी हिचकियाँ ले रहा है तू ... चल जा पानी पीकर आ"...बचपन में माँ के कहे हुए शब्द आज भी याद हैं.और पानी पीने से पहले जाने-अनजाने कितनों को याद कर लिया था उन दिनों में.  नौजवानी ने कदम बढ़ाए और जवानी के दौरान भी छेड़खानी  के अंदाज़  में ही सही इन हिचकियों के साथ ही अपनों को याद करने का इतना प्यार भरा तरीका मुझे नहीं लगता हमारे देश के अलावा किसी और जगह सोचा भी जा सकता है.
                 हिचकियाँ... पानी का गिलास और बहाना ही सही अपनों को याद कर लेना ..जरा सोचिये तो सही किसके मन में सबसे पहले यह विचार आया होगा कि हिचकी आई  है चलो अपनी नजरों से दूर चहेतों को याद तो कर लें नई  पीढ़ी के मेरे नौजवान दोस्त पता नहीं हिचकियों से जुड़ा यह  रेशमी रिश्ता छू पाते हैं या नहीं जो अक्सर मन को गुदगुदा जाता है .भूले -बिसरे लोगों को  इसी बहाने याद करके देखिए तो सही कितना मजा आता है!
              इसका मतलब यह हुआ की मुझे हिचकियाँ नहीं आती यानि मुझे कोई याद ही नहीं करता."गंजी चाँद पर हाथ फेरते हुए दद्दू ने कहा," लगता है सब  लोग मुझे भूलते जा रहे हैं इसलिए हिचकियाँ आनी बंद हो गई हैं" इसी बीच दद्दू को हिचकी आई और दो घूँट पानी से हलक तर करते ही उनका कंठ खुल गया -
              हिचकियाँ इसलिए अब मुझको नहीं आती हैं 
              रफ्ता-रफ्ता वो मुझे भूल गया है शायद 
हिचकियों और यादों से जुडी बातों के रस्ते दद्दू और मैं कुछ दूर निकल पड़ते हैं तफरीह के लिए.सिमटते मैदान के कोने में खड़े आम के पेड़ की डाल पर बुलबुल और एक फुनगी पर सैयाद के होने का एहसास मिठास भरी कूक से होता है." पत्रकार भाई!कहीं इस बुलबुल के स्वर  में सैयाद के बिछोह की व्याकुलता तो नहीं छिपी है?" दद्दू ने मुझसे सवाल किया ." न तो मुझे पक्षियों की बोली का ज्ञान है और न ही मैं ऑरनिथोलाजी का विशेषग्य." लेकिन कहानियां और उपन्यास मैंने जी भरकर पढ़े हैं और बुलबुल और सैयाद के जरिये प्रेमी जोड़ों की कल्पना की गई है." मैंने कहा.
                       "तब कहीं यह कूक सैयाद की याद में बुलबुल की हिचकी तो नहीं!" दद्दू ने मुझे फिर टोका.अपने सर के बाल नोंच लेने का जी चाहा था दद्दू के इस " सेन्स आफ एस्थेटिक्स " पर.फिर भी आज के युवा दोस्तों के इर्द-गिर्द मौजूदा माहौल के मद्देनजर  मुझे एहसान दानिश का यह शेर याद आता है-
                दो  जवां  दिलों  का गम  दूरियां  समझती  हैं 
                कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं 
                  
 कभी घर में यूं ही बतरस  के दौरान अपनों से बातचीत कर पूछिए इस बारे में कि हर उम्र के लोग हिचकियों के बारे में क्या सोचते हैं?नै जनरेशन को हिचकियों का तिलस्म मालूम भी है या नहीं!मुझे तो लगता है कि इंसान चाहे आयु के किसी भी दौर से गुजर रहा हो जब भी मौत सामने आये रिश्तों की मिठास इतनी गहरी होनी चाहिए की उसमें डूबकर अलविदाई के समय भी हर कोई अपने अजीज से कहे-
                            आखिरी हिचकी तेरे जानू पे आये
                             मौत भी मैं शायराना चाहता हूं
लीजिये बातों ही बातों में दद्दू और मैं तफरीह पूरी कर घर लौट आये.घर के सामने ही उसी बिजली के खम्भे के पास लडखडाता हुआ एक आदमी हिचकियाँ ले रहा होता है .बदबू का तेज झोंका नथुनों से जैसे ही टकराया ,दद्दू ने आलाप लिया," अखबारनवीस !यह हिचकी दारू ज्यादा होने की है या " कोटा " कम पड़ जाने का सिग्नल?"
" मुझे इसकी जानकारी सचमुच नहीं है  दद्दू "  यह कहकर जैसे ही मैं अपने घर में दाखिल होने को था मैंने देखा दद्दू  हिचकियाँ ले रहे थे.फौरन मैंने कहा ," घर जाओ दद्दू लगता है भाभीजी याद कर रही हैं "
                               सुबह सोकर उठता हूँ चाय की प्याली के साथ अखबार के पन्ने पलटने लगता हूँ.अरे!!!! यह क्या !!!मुझे हिचकियाँ आ रही हैं  ." ऐसी भी क्या बात है!!! सच बताइए... कहीं आप मुझे याद तो नहीं कर रहे हैं!!!!!                                                       
                                                                           हिचकियों सहित 
                                                                                                    किशोर दिवसे      
                        

ख़ौफ़ज़दा रहा जब तक जिंदगी से मुहब्बत ना हुई .

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ख़ौफ़ज़दा  रहा जब तक जिंदगी से मुहब्बत ना हुई ...

किसी भी इंसान का मन सागर की तरह होता है .कभी शांत -अबूझ तो कभी भावनाओं का ज्वार - भाटा  उद्दाम लहरों के रूप में जिंदगी की चुनौतियाँ बनकर जूझने पर मजबूर कर देता है.चक्रवात, तूफ़ान,बवंडर .भूडोल और भावनाओं के अनगिनत सुनामी और कटरीना के साथ ही खुशियों की ता- ता-  थैया के अवसर हम सबका मानसिक धरातल सुनिश्चित करते हैं.यही होता है हमारा मेंटल मेक- अप जिसके किसी कोने में छिपे रहते हैं अपने -अपने डर .उहापोह से उपजी झिझक डर बनकर हमारी सोच पर अक्सर हावी होती है.परिवर्तन की चुनौतियों से डरकर खुद को यथा स्थिति में बनाए रखना ही दद्दू और उनके मित्र बुद्धिजीवी के बीच हुई बातचीत का सार है.प्रस्तुत है रिकार्ड की गई उनकी बातों का सारांश .-
 दद्दू:                हर समय भीड़ के बावजूद मेरे मन में अकेलेपन का डर तब तक बना रहा जब तक मैंने स्वयं को पहचानना                          नहीं सीख लिया 
 .
बुद्धिजीवी:          मुझे भी हमेशा किसी काम में असफल होने का डर रहता था.लेकिन यह डर उस समय दूर हो गया जब यह एहसास हुआ की मै विफल तभी होता हूँ जब सही कोशिश नहीं करता.
दद्दू:                  लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे इस बात का डर मेरे मन में बना रहता था .यह सोच उस वक्त समाप्त हो गई जब मैंने स्वयं तय किया कि लोग तो अपना-अपना नजरिया रखेंगे ही ,मुझे भी तो आगे बढ़ना ही है.फिर क्या था, लोगों के सोचने का डर ख़त्म!
बुद्धिजीवी:            पहले मुझे इस बात का डर था कि कहीं मैं ठुकरा न दिया जाऊं .जब मेरे मन में आत्मविश्वास  बढ़ा अपने " रिजेक्शन  का डर काफूर हो गया.
ददू:                   कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है.इस लोकोक्ति पर मुझे तब भरोसा हो गया जब मैंने सबसे पहले अपने आप पर ही भरोसा करना  सीखा .आत्मविश्वास से उपजा डर तब मिट गया जब यह सोच बनी " विकास करने के लिए किसी न किसी स्तर पर दर्द या तकलीफें बर्दाश्त करनी पड़ती हैं.
बुद्धिजीवी:              आज के ज़माने की अनेक सच्चाइयों से मैं पहले तो डरता रहा झूठ के मुखौटे  के भीतर छिपी  बदसूरती का जब अनुभव हुआ मेरे मन में दो-टूक सच कहने का डर जाता रहा.
दद्दू:                       जानते हो बुद्धिजीवी! जिंदगी के रंग अनगिनत हैं.कभी समाप्त नहीं होंगे.चुनौतियों से डरकर में जिंदगी से ही घबराने लगा था.मैंने की कि अपने आसपास ही ढेर सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने कड़ी मेहनत से चैलेन्ज  स्वीकारे और उनकी जिंदगी में सुख- सम्पन्नता की खूबसूरती छा गई है.बस! उसी पल जिंदगी से घबराना छोड़ दिया.
बुद्धिजीवी:                दद्दू ! यूँ ही एक बार मेरे मन में मौत की अन्जान दहशत समां गई थी.कहीं मैं मर गया तब? लेकिन कुछ पुस्तकें पढने और कुछ अनुभवों से सीखकर यह जान गया कि मौत,जीवन की समाप्ति नहीं यह तो नई जिंदगी की शुरुवात है.अब मेरे मन में यह विचार नहीं आता " मैं अचानक मर गया तब"?   
दद्दू :                         मरने की बात कायर लोग करते हैं.पुराने ज़माने में बुजुर्ग कहा करते थे " पता नहीं मेरे भाग्य में क्या  लिखा है? कम्युनिकेशन स्किल और व्यक्तित्व विकास के जरिए मैंने कुछ बातें समझीं हैं.अब नई जनरेशन से यही कह सकता हूँ          " अपने भाग्य का विधाता इंसान खुद होता है." मैंने तो भाग्य से डरना  कब से छोड़ दिया है.अपनी जिंदगी बदलने की क्षमता इन्सान में बुनियादी रूप से होती है.आवश्यकता मात्र उसे पहचानने की  है.
बुद्धिजीवी:                   दद्दू!   मैं जवान था तब " प्यार" शब्द से  पहले - पहले घबराता था." उसके  प्यार ने " मेरे दिल में वो रेशमी एहसास जगाया की मेरे भीतर का अँधेरा दूर हो गया और जिंदगी प्यार से तर- ब-तर हो गई.
दद्दू;                         जब मैं छोटा था मुझे लोगों के उपहास का डर था- सोचता था, " कहीं लोग मुझ पर हसेंगे तो नहीं? " यह डर ख़त्म हो गया जब मैंने अपने आप पर हँसना सीख लिया.
बुद्धिजीवी;                अपने अतीत से डरता था में जब भरोसा हो गया के मेरे वर्तमान को वह नुकसान नहीं पहुँचाएगा ,वह आखिरी डर भी समाप्त हो गया.झिलमिलाते सितारों की रौशनी का सौन्दर्य ,चाँद की मौजूदगी में निहारने के बाद ही अब मुझे अँधेरे से जरा भी डर नहीं लगता.अब आप ही बताइए कि अपने बारे में क्या ख्याल है आपका?
                                          अपना ख्याल रखिए           
                                                                                  किशोर दिवसे  
                                                                                  मोबाईल; 9827471743             
                                                     
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इश्क कीजै फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है ..

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इश्क कीजै फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है ...


न जाने क्यों अपने देश में सहज प्यार पर सेक्स की दहशत सवार होती है!सौन्दर्य की उपासना या आसान से दोस्ताना रिश्ते या तो सहमे हुए होते हैं या फिर उस प्रेम के भीतर "आदिम भूख "चोरी छिपे सेंध लगाने लगती है.दरअसल शुरुआत ही गलत होती है.प्यार और सेक्स को अलग रखकर सोचा  ही नहीं जा रहा है.इसलिए घरेलू रिश्ते तो घबराहट की सीमा में नहीं आ पाते लेकिन बतौर प्रशंसा दर्शाया गया प्यार भी रिश्ते की तलाश करने की हड़बड़ी पैदा कर देता है.आसान  सा जुमला है इन दिनों कहने के लिए ,"बड़ा ख़राब समय है "लेकिन कुछ हद तक भरोसे के संकट के इस दौर में स्त्री-पुरुष का हर आयु वर्ग असुरक्षितता की भावना के जबरदस्त चक्रवात में उलझा हुआ है.
            चलते-चलते यूँ ही किसी कार्ड -गैलरी में रखे वेलेंटाइन डे के रंगीन कासिदों पर  अपने दद्दू की नजर पड़ते ही उनका दिमाग हरकत में आने लगता है,"यार अखबारनवीस !क्यूँ इतना हौवा बनाकर रखा है ...इतना असह्जपन क्यूँ है?"
                          हम लबों से कह न पाए हाल-ऍ-दिल कभी 
                           और वो समझे नहीं ख़ामोशी क्या चीज है 
जगजीत सिंह के बोल का सम्मोहन तोड़कर मैं बाहर आता हूँ,"दरअसल प्यार के प्रदर्शन को समझने की शुरुआत ही गलत तरीके से करते हैं..... सो स्वीट आफ यू ... आई लव यू ..या आई लव यू आल ... चुम्बन या फ़्लाइंग किस भी अपनापन दर्शाने का नव-आधुनिक अंदाज है.यह मात्र किसी की अच्छाई,खासियत के प्रति सराहना का रिश्ते की गहराई के आधार पर व्यक्त किया जाने वाला छुआ या अनछुआ प्रदर्शन है.किसी भी लिहाज से इसे शारीरिक अंतरंगता की हद तक जाकर सोचना मूर्खता होगी."
                           प्यार एक इबादत है..पूजा... एहसास...समर्पण...जूनून... सेन्स आफ अप्रीसिएशन तथा तहे दिल प्रशंसा की अभिव्यक्ति है.यह नामदार रिश्तों से शुरू होकर अनाम रिश्तों को छूती है....ईश्वर की आराधना  कर प्रकृति के अंग -प्रत्यंग को सहलाकर सूफी समर्पण के साथ -साथ समूची मानवता को बाहुपाश में लेता है यही प्यार.तब प्यार का चरम ,सेक्स की दिशा में जाने की बात समझना या ले जाना दिमागी दिवालियापन है.प्यार का सेक्स संबंधों में रूपांतरण विवाह के जायज रिश्ते की जरूरत बन सकता है लेकिन बुनियाद कभी नहीं.
                          बे इश्क जरा आदमी की शान ही नहीं 
                          जिसको न होवे इश्क वो इंसान ही नहीं
यक़ीनन वो इन्सान ही नहीं जिसने इश्क के रंगों को ... उसके अलहदा चेहरों को पहचाना ही नहीं  और न ही एहसास किया."हे री मैं तो प्रेम दीवानी" कहने वाली मीरा का कृष्ण के प्रति समर्पण इश्क का सूफियाना अंदाज है.बुल्लेशाह,ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ,बाबा फरीद,निजामुद्दीन औलिया और कई सूफी संत हैं जिन्होंने कहा,"ईश्वर के प्रति इश्क समर्पण की पराकाष्ठा  है और कुछ भी नहीं पीड़ित मानवता के दुःख-दर्द का निवारक है यह इश्क.!"
                             इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया 
                               वर्ना हम भी आदमी थे काम के 
गलत है....प्रेम पहले अँधा होता था ,अब नहीं."डोंट फाल इन लव "  बात यूँ होनी चाहिए कि प्रेम की  भावना आपको बेहतर इंसान बनाए,"राइजिंग इन लव".हाँ,वेलेंटाइन डे को अपने दद्दू बिलकुल बुरा नहीं मानते.उनका सिर्फ इतना ही कहना है नौजवान दोस्तों से के "यारों!किसी का दिल मत दुखाना....प्यार का इजहार दिलों को जीतने के लिए होना चाहिए ,दिलों को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं.यह तो किसी के प्रति प्यार दिखाने का महज प्रतीक है इसे शालीनता और रज़ामंदी  चाहिए ... फूहड़ता या वाहियातपन  या जबरदस्ती नहीं.जरा सोचें कि मिठास भरी यादें मिली या कसैलेपन का अहसास!वेलेंटाइन डे को सिर्फ रूमानी इश्क समझने वालों को यह ख्याल रहे कि,"  It's beautiful necessity of our nature is to love something ".   सच्चा प्यार उन भूतों क़ी तरह होता है जिसके बारे में बातें तो ह़र कोई करता है पर बहुत कम लोग उसे देख ,महसूस और समझ पाते है.
                     मैं भी अपने मन में कभी-कभी यही सोचने लगता हूँ ,"नहीं है मुझे संपत्ति क़ी हवस ... न मैं भूखा हूँ सम्मान का....न खुशियों  में ही हमेशा डूबता रहूँ....मैं तो बस इतनी ही ख्वाहिश रखता हूँ... यही गुजारिश है कि मेरे दिल में इतना प्यार हो कि मैं लोगों को और लोग मुझे हमेशा प्यार करते रहें ... हमेशा... हमेशा...हमेशा...
                             शुभ रात्रि... शब्बा खैर... प्यार सहित...
                                                                                          किशोर दिवसे 
                                                                                         Mob;09827471743    
                                       

" जाति -बंधन से लहू लुहान होते दिलों के रिश्ते..

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" जाति -बंधन से लहू लुहान होते दिलों के रिश्ते...

आंसुओं  के मोती झर-झर  के वहीँ पर गिरे जहाँ पर अखबार के कालम में ढेर सारे क्लासिफाइड छपे थे.- बंगाली वर चाहिए,सजातीय श्रीवास्तव.. जैन.. ब्राह्मण .. पंजाबी ...मराठी.. आदि-आदि... वर चाहिए... जातिबंधन के नासूर ने रूही का दिल छलनी कर दिया था.वह  सोचने लगी,"," शादी तो दो दिलों का चिरंजीवी रिश्ता है .जाती की दीवारों से क्यों लोग इसे तंग कोठी  बना देते  हैं .क्या बुराई है रोहन में .सिर्फ सजातीय नहीं है बस!पर एमबीए है..अच्छी खासी सर्विस है तब पापा ने क्यों उसे खरी-खोटी सुनाई?शादी के बाद म्युचुअल अंडर स्टैंडिंग  जरूरी है या जाती के कैक्टस की लहू लुहान कर देने वाली बाड़!
                        दद्दू ने स्नेह से रूही के सर पर हाथ रखा और बोले,"बेटी तुम चिंता मत करो.रोहन से बेझिझक शादी  कर सकती हो.शादी के लिए सबसे जरूरी है आपसी सामंजस्य  और एक-दूसरे  को उसकी अच्छाइयों और कमजोरियों के साथ स्वीकार करना.रहा सवाल तुम्हारे पिता की नाराजगी का ,उन्हें मैं समझा लूँगा." रूही आश्वस्त होकर घर लौटी और थोड़ी देर में दद्दू तफरीह के लिए निकल पड़े.काफी हाउस के सामने एकाएक मुझपर निगाह पड़ी तब हम दोनों  कॉफी  की टेबल पर थे.
                                  फ्रॉक पहन कर इठलाने नाचने से आज छाती पर ओढ़नी  रखने की उम्र तक का वक्त मानो फुर्र से उड़ गया था.कल के पल-पल की यादों के साथ रूही का आज दद्दू के सामने था . रूही का वही दर्द दद्दू की आँखों में छिपाए न छिप सका.  " आखिर जाति बंधन की दीवार से कब तक लहू लुहान होते रहेंगे दिलों के रिश्ते?बात सिर्फ रूही की नहीं.. नितिन... कंचन..दीपक.अभिषेक.. संजय या रश्मि..जाति बंधन की वजह से किसी का भी सपना क्यों टूटना चाहिए?
युवा और रूढ़िवादी बुर्जुआ -इन दो पीढ़ियों के बीच शादी के मामले में जातिबंधन शिथिल करने के सवाल पर समाज का कैनवास दृश्यों का कोलाज दिखा रहा है.सपनों के टूटने से खुद्कुशीं करते युवा,थोपा हुआ फैसला मानने पर मजबूर नौजवान,ऐसे शेरदिल जिन्होंने सजातीय या विजातीय प्रेम विवाह सहमती या असहमति से किये.कोलाज के दृश्यों में कुछ अड़ियल बुजुर्ग हैं जिन्होंने नौजवान दिलों के रिश्ते अपनी जिद की सूली पर लटका दिए.आज की  आधुनिक जनरेशन से दोस्ताना सम्बन्ध चलने वाले माता -पिता भी हैं जो अपने-बेटे-बेटी की पसंद को कसौटी पर परख कर " स्वप्न नीड़ बनाने की हरी झंडी देते हैं सही मायने में जनरेशन गैप का भूत ऐसे परिवारों पर काला साया ओढाने का दुस्साहस कभी नहीं करता.
                               सांस लेने का नाम अगर जीना है साहिर
                               तो सांस लेने के अंदाज भी बदलते रहिये.
अंतरजातीय विवाह जरूरी नहीं लेकिन आज की पीढ़ी यदि प्रेमविवाह या जाति बंधन मुक्त विवाह की पक्षधर है तब सारे पूर्वाग्रह या दुराग्रह छोड़कर पीठ थपथपाने में देर क्यों होनी चाहिए?अब तो शेक्स्पीरियां मैरिज भी होने लगी है.जो सफल भी हैं.छत्तीस में से बत्तीस गुण मिलाने वाला युगल सारी  जिंदगी लड़ते- भिड़ते गुज़ार  देता है. बिना कुंडली देखे विवाह करने वाले कई दंपत्ति समझदारी से बेहतर जिंदगी भी बिताते है. 
                        पुराने पड़ गए अब फेंक दो तुम
                          ये कचरा अब फेंक दो तुम
दो महीने यूं ही गुजर गए.एक रोज भरी दुपहरी में दद्दू ने आकर बताया." खाना खाकर यूं ही सुस्ता रहा था.कॉल  बेल बजने पर दरवाजा खोला तो सामने रूही ... साथ में युवक को देखकर समझने में देर नहीं लगी की वह  रोहन ही है.रोम  रोम में बसी खुशियाँ अल्फ़ाज़  बनकर फूट पड़ीं.उसने बताया मम्मी -पापा आखिर राजी हो गए.वे आने वाले थे लेकिन... उसकी आँखों की भीगी कोरों से मैंने पूरी इबारत पढ़ ली थी.
                       शादी का कार्ड देकर रूही ने दद्दू के पाँव छुए." जादू की झप्पी के बाद रोहन-रूही जब विदा हुए दद्दू उन्हें ओझल होने तक देखते रहे.अलमारी में रखी अखबार की वह कतरन देखी  जो कभी रूही के आंसुओं  से भीग  गई  थी.भीगी आँखों से मुस्कुराकर  दद्दू ने दीवार पर टंगे केलेंडर पर सात नवम्बर की तारीख को लाल घेरे में समेट लिया. 
                                                      अपना ख्याल रखिये
                                                                               किशोर दिवसे 

          

हम क्यों बने रहते हैं कछुए!!!

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हम क्यों बने रहते  हैं कछुए!!!!



एक बार एक कछुआ परिवार पिकनिक मनाने गया.अब कछुओं के बारे में नौ दिन चले अढाई कोस वाली कहावत तो आपने  सुनी होगी.तैयारी  करने में ही उन्हें सात बरस का समय लग गया.आखिरकार वह कछुआ परिवार कोई अच्छी जगह तलाशने घर से निकल पड़ा.अपने सफ़र के दूसरे साल उन्हें एक अच्छा ठिकाना मिल गया.अमूमन छमाही तक कछुआ परिवार जगह की साफ़-सफाई करता रहा.उन्होंने अपनी पिकनिक वाली टोकरी खोली और तैयारी करने लगे.
                      एकाएक उन्हें याद आया," अरे हम लोग नमक लाना तो भूल गए.नमक के बगैर खाने के स्वाद का कोई मतलब ही नहीं." सब लोग इस बात पर सहमत हो गए.लम्बी बहस के बाद सबसे छोटे कछुए को घर जाकर नमक लाने के लिए चुना गया.हालाकि छोटा कछुआ धीमे चलने वाले सभी छोटे कछुओं में सबसे तेज था फिर भी वह ना-नुकुर कर रोते हुए अपनी खोल में बैठकर जी चुराने लगा.वह किसी पेड़ के पीछे बैठ कर यही देखता रहा कि परिवार के बाकी सदस्य  क्या करते हैं.
         एक शर्त पर छोटा कछुआ नमक लाने घर जाने को तैयार हुआ.उसने शर्त रखी,"देखिये,, मैं  घर जाकर नमक लाने को तैयार हूँ.लेकिन मेरे घर से लौटने तक कोई खाना नहीं खायेगा."पूरा परिवार इस बात पर राजी हो गया और कुछ ही  देर में छोटा कछुआ घर के रास्ते पर  था....एस परिवार के सभी सदस्य सोचने लगे.
                     एक-एक कर तीन बरस बीत गए पर छोटा कछुआ नहीं लौटा .फिर पांच और छः बरस भी.सातवें बरस जब वह नहीं पहुंचा तब बूढा कछुआ अपनी भूख बर्दाश्त करने में खुद को असमर्थ महसूस करने लगा.उसने यह ऐलान किया,"अब वह भूख सहन  नहीं कर पा रहा है इसलिए वह खाना शुरू करेगा." इतना कहकर बूढ़े कछुए ने खाने का डिब्बा खोल लिया.अचानक छोटा कछुआ किसी वृक्ष के पीछे से निकला और छिपकर  कहने लगा," देखा ! ...देखा!मैं जानता था कि आप मेरे लौटने का इन्तजार नहीं करोगे.अब मैं नमक लाने घर जाऊंगा ही नहीं.
                      "क्यों दद्दू!कछुए के किस्से  का कोई मतलब समझे" मैंने उनसे चुहलबाजी करनी चाही." दरअसल अखबार नवीस!" दद्दू ने अपना बोल-बचन शुरू किया,"हममें से भी कई लोग कछुए की तरह हैं.कुछ लोग अपना समय यही जानने और समझने में बिता देते हैं कि अमुक क्या कर रहा है ...या फलाना ने ऐसा क्यूं  किया!( अमूमन सभी दफ्तरों  में यही हाल हुआ करता है.)
               हम अपनी अपेक्षाओं के मुताबिक लोगों से रहने की उम्मीद में वक्त जाया करने लगते हैं.लोग क्या कर रहे हैं .. या कौन क्या कर रहा है यह जानने की पंचाईत में इतना डूब जाते हैं की हमें क्या करना है ...हमें क्या करना चाहिए...इसका तक होश नहीं रहता . और हम खुद कुछ भी नहीं करते.!
                                                                     

अपनी ही साँसों का कैदी, रेशम का यह शायर

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शहतूत की शाख पे बैठा कोई                                                             
बुनता है रेशम के तागे 
लम्हा-लम्हा खोल रहा है, पत्ता-पत्ता बीन रहा है 
एक-एक सांस बजाकर सुनता है सौदाई
एक-एक सांस को खोल के ,अपने तन पे लिपटाता जाता है
अपनी ही साँसों का कैदी  रेशम का यह शायर एक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जायेगा
                      शहतूत  की पत्तियों पर बैठे हरे रंग के कीड़े को रेशमी शायरी ओढाने की अद्भुत  कल्पना सिर्फ गुलजार के बस की ही बात  हो सकती है शायद किसी और की  नहीं.रेशम का एक हसीन शायर कहकर शाह्तूती कीड़े को जो इज्जत बख़्शी  है गुलजार ने उसका अंदाज रेशम विभाग के किसी अफसर ने सपने में भी  सोचा होगा ऐसा नहीं लगता.बिलकुल आसान  नहीं था रेशम बुनने वाले इस अदने से जीव की शब्दों के पवित्र फूलों से सारी जिन्दगी संवार देना.
                           यों तो जिन्दगी का फलसफा जड़-चेतन वस्तुएं ,भूख-प्यास ,प्रेम,ईर्ष्या,मौसम,नजर ,समंदर,रोजा,आग,इंसान,कासिद,तन्हाई,कलाम,हिचकी,जुर्म,अखबार   युद्ध,नेता,सियासत और ऐसे ही अनगिनत विषयों पर कवियों और शायरों ने खूब लिखा है .. लिखते ही रहते है.फिर भी कीड़े -मकोड़ों ,जानवरों या प्राणी जगत पर रचनाएं अपेक्षाकृत  कम ही देखने -पढने को मिलती हैं.हिंदी के कवियों ने जीव-जंतुओं पर काफी कलम चलाई है लेकिन अंग्रेजी के साहित्यकारों ने प्राणी जगत को पंखिल शब्दों  के जादू से जो करिश्माई और गगनचुम्बी ऊंचाई दी है वह सचमुच कमाल की है.
                  किसी भी जंतु अथवा प्राणी की आकृति और चरित्र को यथार्थ और फंतासी के दोहरे नजरिये से महसूस कर कवितायेँ रचना कमाल का हुनर  है.अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद इस करिश्मे का साक्ष्य हैं.
                " मैंने नहीं देखी होती वह पगडण्डी                     
               सफ़ेद पतली और चमकीली
              कभी न कर पाता कल्पना मैं
               धीमी पर निश्चित प्रगति के लिए
                 घोंघे के उस मंथर उन्माद की
                हरी चादर पर रेंगता है एक घोंघा
    घोंघे पर थॉमस  गन की यह कविता जीवंत चित्रण करने में सक्षम है.एडवर्ड थॉमस  ने उल्लू पर  लिखा है -
                  

                      निस्तब्ध निशा का वह सन्नाटा 
                     जिसे चीरती  थी कर्कश चीख 
                      उलूक ध्वनि  थी कितनी अवसाद भरी 
                     लम्बी चीख पहाड़ी पर गूंजती 
वाय.बी कीट्स ने शिशिर में वनों के राजहंस की कल्पना में प्रकृति का चित्रण करते समय लिखा है -
                 धवल पंखों की थिरकन/वह प्रणय नर्तन
                 हंस युगलों की जलक्रीडा 
               और उनका नया बसेरा
 टेड हग ने अपनी कविता हॉक  रूस्टिंग  में बाज के खौफ का जिस अंदाज़  में वर्णन किया है वह निम्न काव्यांश में स्पष्ट है-
                 " और उन्ही पंजों से जकड़  लिया है/
                   सृष्टि को मैंने
                  बांधे हैं मैंने मृत्यु दंड के आदेश
                  वृहत वर्तुलों के अपने यम् पाशों  से 
                  जब जिस पर चाहूँ देता हूँ फेंक
 रहस्यवाद  के आवरण में पीटर पोर्टर ने  बिल्ली पर कल्पना की है कि  वे पतनोंमुखी समाज में पूजित रहीं.वे बैठकर मूत्र विसर्जन करती है और जुगुप्सा भरी है उनकी प्रणय-आराधना.डी .एन. लारेंस ने भी पहाड़ी सिंह पर  लिखी कविता में मानव समाज की ओर  से प्राणी जगत में होने वाले अतिक्रमण की पराकाष्ठा का चित्रण किया 
है.
                    इंसान अधिकारी है खुलेपन का
                     और हम सिमटे हैं  घाटी के धुंधलके में!
घाटी के धुंधलके से लौटते हैं हम अपने घरों में जहाँ हम परेशां हैं मच्छरों से.डेविड हर्बर्ट लारेंस की कविता  में पारभासी पिशाच के   रक्त शोषी चरित्र  से आप  दंशित  हो चुके हैं.विस्तृत कविता  में उल्लिखित बिम्ब और प्रतिमान अद्भुत हैं.अल्फ्रेस लार्ड टेनिन्सन ने उकाब ( ईगल) का वर्णन करते हुए लिखा है-
                 तीक्ष्ण दृष्टि है उसकी शिकार के पीछे
                 झपटता है वह बिजली बनकर नीचे
अपने प्रेमगीतों के लिए मशहूर पर्सी बायसी शैली की लिखी कविता " टू द विडो बर्ड " के काव्यांश  देखिये-
                 बिछड़ी माशूका के गम में मायूस था 
                विरह से व्यथित एक विरही परिंदा
               बैठा था कांपती डाल के कोने पर 
                  गुमसुम यादों के हसीं हिंडोले पर 
हिंडोले से नीचे उतरकर कल्पना कीजिए विलियम कॉपर के उस खरगोश की जो चिर निद्रा में लीन है.कापर ने अपने शब्दों में दर्द इस तरह से उंडेला है-
                अब अखरोट की छाया तले है 
                 उसका बसेरा ,चिरनिद्रा में लीन
                 मानो  खामोश करता है प्रतीक्षा 
               मेरे पुचकारने की!!!!
पुचकारते हुए शब्दों को विटर  बायनर ने सरपट दौड़ते हुए अश्व की अनावृत्त पीठ कहा है." हॉर्सेज  "नामक कविता में शब्दों के लिए अश्व का अद्भुत प्रतीकात्मक उपयोग किया गया है.
               काव्यधारा में वनचरों की आकृति ,चारित्रिक एवं व्यवहारगत विशेषताएं रचनाधर्मियों  के लिए प्रेरक हैं.वनचरों को दर्शन से जोड़ने की महारत एक तरह से नए रचनाकारों को उत्तेजित और उकसाती हुई लगनी चाहिए..हिंदी-अंग्रेजी कविताओं के अलावा शायरियों में भी कीट-पतंगे को परवाने की शक्ल में अक्सर याद किया गया है गौर कीजिए-
                    इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
                   जलती है शम्मा मगर नाम है परवाने का
परवाने की बात छोडिये सांप को प्रतीक बनाकर चंदन और दोस्त के साथ अनेकों बार वाहवाही लूटी गई है.कबूतर और जुगनू भी फिल्मी गीतकारों के अज़ीज़ रहे है .फिल्मी गीत कबूतर जा  जा  जा और राहत इन्दौरी की यह बात कभी-कभी आपके मन को भी जगमगाती होगी-
                 लाख सूरज से दोस्ताना  रखो 
                चंद जुगनू भी पाल रखा करो 
जुगनुओं की झिलमिल के बीच एक बार  फिर मुझे काव्यधारा में प्रकृति चित्रण के अद्भुत रचयिता विलियम वर्डस्वर्थ की एक कविता " टू द  कक्कू "की याद आ रही है .उनके कूकते हुए शब्दों ने अपनी भावनाएं  कुछ इस तरह से व्यक्त की हैं-
                   ओ ऋतुराज वसंत की प्रियतमा 
                   ओ वसंत दूत ,ओ ऋतू अंकशायिनी
                       अब भी मैं सुनता हूँ वह कूक
                         मदनिका कोयल का रति उन्माद
                    स्मृतियों की इन आम्र मंजरियों से 
                 झंकृत होते है हृदय वीणा के तार 

( अंग्रेजी से अनुदित कुछेक कविताओ के अंशों पर आधारित)
                     

                
                    
       
                
                            
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जुल्म सहना भी जुर्म है यारों !

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जुल्म सहना भी  जुर्म है यारों।

हर तरफ जुर्म ही जुर्म।.. प्रिंट मीडिया  हो या इलेक्ट्रानिक  मीडिया क्यूं बनती जा रही है सुर्खियाँ जुर्म की?क्या हो गया है इस समाज को?बच्चे भटककर जुर्म की राह पकड़ रहे हैं।बेरोजगार युवा अपराध की दुनिया में उतरने पर क्यूं मजबूर हैं?समाज में अपराधियों की बात तो दूर सफेदपोशों की जमात भी गुनाहों के दलदल में इतनी धंस गयी है कि सच का चेहरा सहमा हुआ है और झूठ का मुखौटा कर रहा है अट्टहास -
              सच पूछो तो  तो सब ही मुजरिम हैं 
               कौन यहाँ पर किसकी गवाही दे?
      पर जब अवसरवादी कूटनीति हावी होती है तब श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी याद आना स्वाभाविक है।... जिसकी दुम  उठाओ मादा  नजर आता है।लेकिन जुर्म के मक्कार चेहरों की धूर्तता देखिये-एक फ़िल्मी गीत में कहा गया है-.आप अन्दर से कुछ और बाहर से कुछ और नजर आते है!" क्या यह जुर्म नहीं ?गाँव ,शहर या महानगर -जुर्म  अलग अलग चेहरे बदलकर आता है और कभी हालत यूं भी बन जाती है-
                       मैं कहाँ से पेश करता  एक भी सच्चा गवाह 
                        जुर्म भी था आपका और आपकी सरकार थी 
क्या आज के दौर में वे लोग बेहतर हैं जो मुजरिम की तरह जीने का फन सीख लेते हैं।वर्ना शराफत का पुतला बने उल्लुओं को " सीधा-साधा" ब्रांडेड कर हाशिये की सूली पर लटका दिया जाता है।इसीलिए नयी ट्रेंड में पूरी तरह प्रोफेशनल  बन जाना निहायत जरूरी है जो बीत चुके दौर में जुर्म की तरह समझा जाता रहा।
                            सफेदपोशों के जुर्म की दुनिया के उसूलों का भी अंदाज नया है।दायें हाथ का काम बाएं हाथ को पता नहीं चलता।झूठ बोलना अगर जुर्म है (किसी ज़माने में सैद्धांतिक अपराध रहा)तब नयी ट्रेंड के गुनाहगार इतने आत्म विश्वास से झूठ बोलते हैं कि सैकड़ों " गोयबल्स" छटपटाकर  दम तोड़ दें!-
                            जहाँ क़ानून बेआवाज होगा 
                           वहीँ जुर्म का आगाज होगा 
                 यह सच  कानून और प्रशासन दोनों  के लिए समान रूप से लागू होता है।समाज में यह भी एक नीम सच है ," जो खुद ही मुजरिम है लोगों की नजर में वही देता है सजा भी"यह स्थिति भी बदलनी चाहिए।कुछ लोगों के करम का भी कोई हिसाब भी नहीं होता।ऐसे लोगों के गुनाह गिनकर अपने दिल को छोटा नहीं करना चाहिए।इसी तरह पहली बार जुर्म करने वाले को सजा  देकर गुनाहगार बनाना जरूरी नहीं।कुछ लोगों को जुर्म का एहसास भी सताता है और " अपराध बोध " उनकी देह्भाषा में उजागर हो जाता है।
                     क्यूं जुर्म समझ लेते हैं मुहब्बत को लोग?मीडिया में कई ख़बरें सुर्खियाँ बनी हैं जब अंतर जातीय विवाह करने वाले मुहब्बत भरे दो दिलों को समाज ने यातनाएं दी और जलील  भी किया।। ऑनर  किलिंग का लफ्ज भी हमने हालिया तौर पर अखबारों में अनेक दफे पढ़ा है जब समाज की खिलाफत करने वाले प्रेमी जोड़े को पंचायत  के फरमान से मार डाला जाता है।किसी को चाहते रहना कोई खता  तो नहीं!मुहब्बत पाकीजा इबादत है ... कोई जुर्म नहीं।.. बागबान से पूछे जाने की हिम्मत होनी चाहिए कि किस जुर्म में निकले गुलिस्तान से हम!ख़ास तौर पर नौजवान, मुहब्बत को जिम्मेदारी से निभाए और डंके की चोट पर कहे-
                     कुछ जुर्म नहीं इश्क जो दुनिया से छिपाएं 
                      हमने तुझे चाहा  है हजारों में कहेंगे 
जुर्म।. मुजरिम।. गुनाह और गुनाहगारों की दुनिया बड़ी तिलस्मी है. आजादी के पहले से आज तक किसम किसम के जुर्म होते आये और गुनाहों की दुनियाएं बनती रहीं।जिंदगी का काल चक्र गांधी की अहिंसा और  अंग्रेजों के जुल्म का  गवाह है।शारीरिक और मानसिक  जुर्म की अपनी उलझनें और समाधान  हैं।               फिलहाल आज के दौर में इस बात पर हर एक इंसान को सोचना चाहिए कि जुर्म को कैसे मिटायें-
                      चुप ही रहना भी जुर्म है यारों  
                       कुछ न कहना भी जुर्म है यारों                   
                      जुर्म करना तो जुर्म है ही मगर 
                      जुल्म सहना भी जुर्म है यारों