शुक्रवार, 24 जून 2011

गुरुदेव ने बनाया "उन तीनों को" अपना गुरु

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एक बार किसी गुरु की मृत्यु हो रही थी .उनके शिष्य ने पूछा,"गुरुजी, यह तो बताइये आपके गुरु कौन थे?"उन्होंने कहा,"बेटा! मेरे एक हजार गुरु थे.अगर मैं नाम गिनाना चाहूं तब कई महीने लग जायेंगेऔर काफी देर हो जाएगी."शिष्य के चेहरे पर सवालिया निशान देखकर गुरु समझ गए.उन्होंने स्वत  ही जिज्ञासा शांत करते हुए कहा,"बेटा! मैं अपने तीन गुरुओं के नाम जरूर बताना चाहूँगा.
          " मेरा पहला गुरु था एक चोर"


शिष्य के भौचक हो जाने पर गुरु ने कहना जारी रखा,"एक बार रेगिस्तान में मैं कहीं पर खो गया था.भटकते-भटकते जब एक गाँव में पहुंचा तब काफी देर हो चुकी थी.सारा शहर खामोश हो चुका था.एक ही आदमी मिला जो किसी घर की दीवार में सेंध लगाकर छेद कर रहा रहा.मैंने उससे पूछा,"भैया .. मेरे रुकने के लिए कोई जगह हो सकती हैं क्या?उसने जवाब दिया,"रात को इस वक्त तलाश करना मुश्किल है.चाहो तो तुम मेरे साथ रुक सकते हो.वह  इंसान बड़ा नेक था.मैं वहां पर एक महीने तक रुक गया.हर रोज रात को वह चोर मुझसे कहता ,' अब मैं अपने काम पर जा रहा हूँ तुम  आराम कर प्रार्थना करो." जब वह वापस लौटता ,मै कहता,"क्या कुछ हासिल हुआ?"वह कहता आज रात कुछ भी नहीं,कल मैं फिर कोशिश करूंगा... आगे भगवान की मर्जी!"
                   आश्चर्य की बात यह थी की  वह चोर कभी निराश नहीं था.वह हमेशा आशान्वित और खुश रहा.फिर  मैं बरसों तक ध्यान करता रहा कुछ हासिल नहीं हुआ.कई बार ऐसे पल आये जब मैं पूरी तरह निराश था.मैंने यह बेवकूफी समाप्त करने की सोची.अचानक मुझे याद आई उस चोर की जो हर रात कहता था ," ईश्वर अच्छा करेगा.कल अवश्य बेहतर होगा."
                 " आपके दुसरे गुरु कौन थे गुरुदेव?" शिष्य की उत्सुकता बढ़ने लगी   ." मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था"    



  गुरुदेव ने रहस्योद्घाटन किया, एक  रोज मैं नदी पर जा रहा था .मैं बेहद प्यासा था .अचानक एक कुत्ता वहां आया प्यास से जिसकी जीभ  बाहर लटक रही थी.कुत्ते ने नदी में देखा ," उसे पानी के भीतर एक कुत्ता नजर आया.अपनी खुद की परछाई देखकर वह डर गया.भौंककर वह भाग ही जाने वाला था लेकिन तेज प्यास उसे वापस लौटने पर मजबूर कर रही थी.आखिरकार उसने डर पर काबू पाया और वह पानी में कूद पड़ा.पलक झपकते वह छाया गायब हो गई." गुरुदेव ने कहा,"तब मुझे यह एहसास हुआ की भगवान् ने मुझे कोई सन्देश दिया है.वह सन्देश यही था,"चुनौती या डर चाहे जितने हों बावजूद इसके कूद पड़ो...."
                 गुरुदेव! अब आपका तीसरा गुरु!"-शिष्य ने अधीर होकर पूछा ." मेरा तीसरा गुरु है एक बच्चा ." 

             


गुरुदेव ने शिष्य को समझाइश देते हुए स्पष्ट किया," मैं जब शहर में दाखिल हुआ तब देखा की एक बच्चा जलती हुई मोमबत्ती मस्जिद में रखने के लिए ले जा रहा था.मैंने बच्चे से पूछा ,"क्या तुमने मोमबत्ती खुद जलाई है?: उसने जवाब दिया  ," हाँ" मैंने बच्चे से फिर पूछा ," पहले तो मोमबत्ती नहीं जल रही थी बाद में वह जलने लगी.तुम बता सकते हो वह स्रोत जहाँ से रौशनी आई है?"
                 वह बच्चा खिलखिलाकर हंसने लगा.फिर एकाएक उसने मोमबत्ती बुझा दी.अब बच्चे ने मुझसे सवाल किया," दादाजी!आपने देखा रौशनी चली गई"आप मुझे यह बताइये की रौशनी कहाँ गई!"  गुरूजी बोले ," बच्चे की बात सुनकर मेरा सारा अहंकार जाता रहा.और, उसी पल मुझे अपनी मूर्खता का एहसास हुआ.अपनी बुद्धिमत्ता पर मुझे तरस आने लगा.यह सच है की  मेरा कोई गुरु नहीं था .फिर भी इसका यह मतलब नहीं होता की मैं शिष्य नहीं था.!" 
              सारा किस्सा सुनकर प्रोफ़ेसर प्यारेलाल  के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं.उन्हें समझ में नहीं आया             की बगैर गुरु के गुरुदेव शिष्य कैसे हुए?उनहोंने दद्दू से पूछा ," आप ही बताइये दद्दू यह कैसे संभव है?"
                    दद्दू ने पहेली सुलझाते हुए कहा,"" ऐसा  है प्रोफ़ेसर !गुरुदेव ने सारी कायनात या सृष्टि को ही अपना गुरु माना,उन्होंने  भरोसा किया बादलों पर...हवा,पानी,आग... इंसानों पर .मेरा कोई गुरु नहीं था क्योंकि कुदरत के हर पहलू से मैंने कुछ न कुछ सीखा है.जिन्दगी में भी शिष्य बनना जरूरी  है लेकिन शिष्य बनने का मतलब होता है सीखने की चाह.
                प्रोफ़ेसर के दिमाग की ट्यूब लाईट जली." मतलब यह की TO BE AVAILABLE TO LEARN AND TO BE VULNERABLE TO EXISTANCE"   या दूसरे शब्दों में कहा जाये तो ," गुरु एक स्वीमिंग पूल होता है जहाँ तुम तैरना सीख सकते हो.एक बार सीख गए तब  सारे महासागर तुम्हारे हैं. मैं भी आपसे यह जानना चाहूँगा की आपने भी क्या कोई गुरु बनाया है या कुदरत और जिंदगी के अनुभव ही हैं आपका सच्चा गुरु!!!!                                                                अपना ख्याल रखिये..
                                                                                            किशोर दिवसे 


गुरुवार, 23 जून 2011

वो कागज की कश्ती ...वो बारिश का पानी!

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लहरों में बहती गई वह कागज की छोटी सी नाव . मेरी नन्ही अँगुलियों ने ढेर सारी लहरें बनाकर उन्हें बहने दिया आगे और आगे....टप टप बारिश की बूँदें उस नाव को हिचकोले देती पर अलमस्त लहरों ने उसे मेरी आँखों से ओझल कर दिया.कागज़ की उस कश्ती से जुडी बचपन की यादे.मुझे ताजा हो आईं.ऐसा  क्यूं होता है की  जब-जब यादों के दरीचे परत-दर -परत खुलते हैं कई रिश्ते हमारे सामने तेजी से उभरने -मिटने लगते हैं.इसका सिलसिला बन जाता है.ऐसा  लगता है ना ... की  हम कभी रिश्तों पर क्यूं बात नहीं करते!
                     " वो कागज की कश्ती,वो बारिश का पानी " मुझे अक्सर याद आते हैं.बरास्ता उस कश्ती  के  मैं बचपन के रिश्ते को कई बार जी लेता हूँ.क्या आप भी?इस रिश्ते को क्या हम महसूस करते हैं जो कश्ती और बचपन में .. बचपन और जवानी.. जवानी और बुढ़ापे के बीच है?गोया रिश्ते ही तो हैं जो यादों  के अलावा मौजूं बनकर आपको जिंदगी के तमाम रंगों से प्यार करना सिखाते हैं.चलिए , आप और हम मिलकर आज यही सोचते हैं की रिश्ता क्या है!-
                     कलियों से भँवरे का,सूरज से किरणों का
                     झुकी पलकों से हया का ,कनखियों से शोखी का 
                     नवजात से लोरियों का,पतंग से आसमान का
                      धूप से छाव , आपसे परछाई का 
                    कोयल से बसंत का,आशिक से माशूक का
                     कोख से अजन्मे का,प्रकृति से इंसान का
                     हिचकी से यादों  का,जिस्म से साँसों का
                      ख़ुशी से गम का,हार से जीत का 
                    घंटियों से पूजाघर का ,ईश्वर से भक्त का
पलटिये अपनी यादों के दरीचे और खो जाइये उन रिश्तों में जो जिंदगी के कैनवास पर कभी रंगीन तो कभी बदरंग बनकर बनते-बिगड़ते रहते हैं.माँ-बाप,भाई-बहन,चाचा-चची ,फूफा-फूफी,,अंकल-आंटी,,मामा-मामी,साला-साली-जीजा ,बेटा-बेटी,पति-पत्नी  ,ये सब नामवर रिश्ते हैं जिनके  बीच आप और हम जिम्मेदारियों का ताना-बाना अक्सर सुलझाते व उलझाते रहते हैं.इससे भी परे एक दुनिया है अनाम रिश्तों की जिनका कोई नाम नहीं होता.फिर भी उनकी अहमियत उतनी ही समझी जाती है जितनी दुनियावी रिश्तों की.
                 खून के रिश्तों की अक्सर बात किया करते हैं हम लोग.सुना होगा "खून के रिश्ते ही काम अआते हैं".पर इन रिश्तों को भी बेमानी होते देखा है .तब उन दरकते हुए रिश्तों को बचाने की छटपटाह्त महसूस करे हम लोग.क्या कभी सोचा है आपने की  जिस जरूरतमंद को आपने बचने के लिए खून दिया है उससे अनायास कैसा अनाम रिश्ता जुड़ गया है?हालाकि यह भी सच है की कुछ लोग इसे महज चंद पैसों की जरूरत के लिए भी करते रहे हैं.वहीँ दूसरी और खून के प्यासे होने का रिश्ता ही जो खुद्कशीं  और क़त्ल में तब्दील होता दिखाई देता है.अनाम रिश्तों के कैनवास पर कभी यह देखने की भी फुर्सत निकालिए की क्या रिश्ता है-
                       चाँद से चकोर का,कसमों से वायदों का
                        मुहब्बत से वफ़ा का,आदम से हव्वा का 
                      नींद से ख्वाब का,राख से अंगारों का
                       आँख से आंसू का,रुखसार से तिल का
                       सांप से चन्दन का,जुर्म से अपराधी का 
                      दर्द  से दवा का,रेल से मुसाफिर का
                          मिठास से कडवाहट,दोस्ती से दुश्मनी  का  
रेशम की डोर और  फौलाद की जंजीर हैं सभी रिश्ते.  सारी दुनिया रिश्तों का गुलिस्तान है जिसमें तरह -तरह के  फूल खिले हैं.पर क्या आप सफल बागबान हैं?टटोलिये नामदार, अनाम या " प्लेटोनिक रिश्तों की जड़ें और चूने दीजिये उस बेल को आसमान की ऊंचाइयां.बार-बार उलटिए यादों के दरीचे और समझिये की कितने रिश्ते जिन्दा हैं ... कितने मुर्दा और कितने अधमरे!सवाल यह भी है की सोशल नेट्वर्किंग साईट पर बने संबंधों को क्या रिश्तों के आशियाने के दरवाजे पर दस्तक समझा जाय!
                       उस पल और लम्हे की गहराई को क्या हमने समझा है जब सब कुछ होने के बीच हम कुछ भी नहीं होते और रिश्ते की कोई न कोई शक्ल कल्पना या हकीकत के धरातल पर हमें मोहताज कर देती है की  हम अतीत और वर्तमान दोनों की आँखों में बसे सपनों को देखकर अहसास करें की आखिर क्या रिश्ता है-
                            फूलों से खुशबू का,अमीरी से गरीबी का 
                              पहली नजर से पहले-पहले प्यार का
                             अपनों से बेगानों का,कागज से कलम का 
                                   प्रेमिका की ना ...ना... से  हाँ ..हाँ.. का 
                             मंजिल से जूनून का, शमा से परवाने का 
                              हक़ से कर्तव्य का,वतन से फर्ज का
                              फन से फनकार का ,शबनम से कोंपल का  
काश हम अपने अंतर्मन को छूकर देखें की हमारे नाम-अनाम रिश्ते दरकते तो नहीं जारहे हैं .सहलाइए... संवारिये और सायास तरोताजा रखिये उन सभी रिश्तों को जो आपके हमसफ़र बनकर चल रहे हैं साथ-साथ.चाहे दूर हों या पास रिश्तों की ऊष्मा अपने मन में बनाये रखिये .समय चुराकर रिश्तों को समझना और जीना सीखना होगा तभी हम समझ पाएंगे की क्या रिश्ता है-
                             मांझी से नैया का,सागर से साहिल का
                             जिन्दगी से रंग और रंग से जिन्दगी का
                             अँधेरे  कोने से टिमटिमाते जुगनुओं का
                               बुलबुल की तडप से सैयाद के पिघलने का 
                               जमीं से आसमान , इंसान से इंसान का
                               सफ़ेद धागे से मोम के बदन का /और 
                              बोलते पत्थरों से सात सुरों का!!!!  
ख़ूब प्यार कीजिए नाम-अनाम रिश्तों को पर मत भूलिए " वो कागज़ की कश्ती... वो बारिश का पानी ".कागजों से अक्षरों का रिश्ता तो अटूट है अब कम्प्यूटर स्क्रीन से हमारी आँखों का रिश्ता इतना गहरा गया है की पूछिए मत!इसलिए क्या आप इस रिश्ते को भूल सकते हैं जो बरास्ता मेरे इन अल्फाजों की बारिश से आपके दिल को भिगोता जा रहा है... आहिस्ता आहिस्ता !!!!
                                                                                                                                                                           मेरे और आपके बीच जो है ,उसकी तलाश  आप भी                                                                                              कीजिए पर अपना ख्याल रखिये...
                                                                                          किशोर दिवसे 
                             
                             
                            



                         




                        

शुक्रवार, 17 जून 2011

देखा तुझे तो तेरे तलबगार हो गए!!!!

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हसरत.. आरजू...तमन्ना...और ख्वाहिश .कहें तो चार अलहदा शब्द लेकिन अर्थ अमूमन एक ही निकलता है.हरेक इंसान के लिए सन्दर्भ भले ही अलग-अलग हों लेकिन मायने कहीं न कहीं पर लक्ष्य से सीधा रिश्ता बना ही लेते हैं.कोई शब्द रेशमी अहसास लिए होता है तो कोई जिन्दगी की तल्ख सच्चाई.रूहानी मतलब भी कोई शब्द अपने भीतर समेट लेता है.
          बात अगर किसी आशिक की हो तो आरजू का अंदाज बड़ा रूमानी हो जाता है.देखते ही अपनी माशूका को वह कैसे तलबगार हो तो जाता है इसकी बानगी देखिये-
                तुझसे मिले न थे तो कोई आरजू न थी 
                देखा तुझे तो तेरे तलबगार हो गए
ये तो हुई किसी की तलब के लिए छटपटाहट.किसी टूटे दिल की आरजू होती है कि उसकी माशूका या आशिक  खुद साहिल पे होते और कश्ती भी वहीँ पर डूबती .यह भी एक तमन्ना है कि आरजू भी खामोश हो गई.लिखने से पहले ही ख़त का कागज भीग गया जिसे कलम गुमसुम होकर देखने लगी.
          भला ख्वाहिश के बगैर दिल भी बना करते हैं?नेता का दिल हो तो कुर्सी की ख्वाहिश करेगा...कलाकार  किसी फिल्म की...खिलाडी किसी जीत की...किसी का दिल अगर दागदार हो जाये तो वह धड़ककर हसरतों से बहादुर शाह जफ़र की जुबान में यूं कहने लगता है-
                इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें
               इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में
दिल के साथ दिमाग को भी दागदार बना दिया है भ्रष्टाचार ने.सवाल ये है कि जनता कब ख्वाहिश रखेगी ऐसों को जमींदोज करने की ?खैर... हसरतों और तमन्नाओं  से भी कभी शिकायतें होने लगती हैं.ये शिकायतें उस समय और भी दहकने लगती हैं जब चाहने वाला वही मांगता है जो उसके मुकद्दर में नहीं होता.मुकद्दर की बात पर गौर करने से पहले एक बार जरूर गाँठ बाँध लीजिये तमन्ना या हसरत रखेंगे तो आग का दरिया फलांगना होगा.अच्छी नौकरी या करियर की ख्वाहिश है तब अंगारों पर चलना होगा.राह कठिन संघर्ष की होगी तब ये मत कहने कि पाँव जलते हैं ... आरजू लेकर घरसे निकलते ही क्यों हो?और हाँ!ख्वाहिश एक नहीं होती बल्कि एक के बाद एक कर सिलसिला बन जाती हैं.
                हजारों ख्वाहिशें आकर घेर लेती हैं.खास तौर पर मिडिल क्लास के साथ तो ऐसा  ही होता है.आरजुओं के समंदर में उठता सैलाब कभी रुकता भी है?इन्ही आरजुओं ने सैकड़ों हंगामों के बावजूद जिंदगी को तनहा बना रखा है .शायर इकबाल सफीपुरी ने कहा  है-
            आरजू भी हसरत भी दर्द भी मसर्रत भी
           सैकड़ों हैं हंगामे ,जिन्दगी मगर तनहा 

जिंदगी अगर तनहा है तो खूबसूरत बनाने की ख्वाहिश क्यों नहीं रखते?लेकिन इसके लिए खुद को कई मायनों में वफादार बनाना होगा.वफादारी अगर अपने मादरे वतन के लिए है तब देशप्रेमी सिपाही मौत के आखिरी पल में भी यही आरजू मन में बसाए रखता है ,"रख दे कोई जरा सी ख़ाक-ए -कफन में "
                 चुनाव  के वक्त नेताओं को वोटों की आरजू तो सुविधाओं के अभाव में जनता को तकलीफें दूर होने की ख्वाहिश .अस्पताल में भर्ती मरीज को जिन्दा घर लौटने की हसरत ( यदि सरकारी अस्पताल हो तो और भी ज्यादा).मेहंदी रचे हाथों को उसके प्रियतम के दीदार की ख्वाहिश.कुछ ख्वाहिशें ऐसी भी होती  हैं कि हर  ख्वाहिश का दम निकल देती हैं.मिर्जा ग़ालिब का शेर है-
                        हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वहिश पे दम निकले 
                       बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
अरमानों का शिखर ही कहीं महत्वाकांक्षा या उच्चाकांक्षा तो नहीं!अगर ऐसा  है तो इस आकांक्षा का लक्ष्य फतह करने टुकड़ों -टुकड़ों में हासिल होती मंजिल के सामने भी कभी थककर  मत बैठिये.हसरतों और मंजिलों के मुसाफिर अगर अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करना  चाहते हैं तब लगातार  चलते रहिये.बच्चे... नौजवान...बूढ़े... उम्र के हर मोड़ पर हसरतों और आरजुओं से लिपटे कई सपने होते हैं .और इन सपनों को साकार करने या ख्वाहिशों को हकीकत के आईने में  उतारने चाहे कितनी भी मुसीबतों में गिरफ्तार हों तमन्ना और आरजू से भरे सपने देखिये और पूरा करने की कोशिश कीजिए.राह की कठिनाइयाँ खौफजदा करेंगी ... असफलता भूतिया चेहरों से डराएंगी,लेकिन अरमानो की आंच जलाये रखिये.कांटो पर  चलकर ही पूरे होते   हैं बहारों के सपने .हसरत.. आरजू..तमन्ना...और ख्वाहिश के सुनहरे सपने ,जो हम जागती आँखों से देखा करते हैं.
                                                        अपना ख्याल रखिये...प्यार सहित
                                                                     किशोर दिवसे 


               

                

गुरुवार, 16 जून 2011

किस्सों में छिपे हैं जिंदगी के कहे-अनकहे सच!

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किस्सों में छिपे हैं जिंदगी के कहे-अनकहे सच!




मैनेजमेंट के किस्से और उनकी फेहरिस्त बड़ी लम्बी है.उसे हर कर्मचारी  या बॉस अपने-अपने अजेंडा  के मुताबिक समय-समय पर फिट क़र देता है.बड़ा ही रोचक है यह मायाजाल.अब ये तमाम फंडे ऐसे अनारदाने हैं जिनसे छूटी आतिशबाजियां किस्सों की शक्ल में सारे संस्थानों के जरिये समाज में नजीरें बन चुकी हैं.ऐसे अनेक किस्से आपकी हमारी जुबान प़र रच-बस गए हैं जो हम लोग सुनते -सुनाते रहते है.
                    एक  सेल्समेन उस दफ्तर की महिला क्लर्क तथा मैनेजर दोपहर का भोजन करने एक साथ जा रहे थे.रास्ते में उन्हें एक चिराग पड़ा  मिला.उनमें से सबसे पहले लपककर महिला क्लर्क ने उठा लिया.कौतूहल वश उसे जैसे ही घिसा उसमें से एक अप्सरा निकली." तुम तीनों की एक-एक इच्छा मैं पूरी करूंगी." उसने खिलखिलाते हुए कहा." पहले मैं... पहले मैं..." क्लर्क युवती ने अप्सरा से कहा,"मैं  दार्जीलिंग जाऊंगी... मोटर बोट में झील का आनंद और पहाड़ी वादियों में रोमांस" ऐसा ही होगा.... अप्सरा ने कहा और वह युवती लुप्त हो चुकी थी.
                           " अब पहले मैं.. पहले मैं..."इस बार मैनेजर से पहले ही सेल्समेन ने अपनी इच्छा जताई.," मैं गोवा जाना चाहता हूँ.मसाज गर्ल्स .. शराब और समुद्र तट की धूप" अप्सरा ने वेद किया और वह सेल्समेन वहां से गायब हो चुका था.
                 " मैनेजर साहब ! अब आपकी बारी है ,अपनी इच्छा बताएं "अप्सरा ने मैनेजर से पूछा.फ़ौरन ही मैनेजर ने अप्सरा से कहा,"मैं  चाहता हूँ कि वे दोनों लंच करें और अपने अपने दफ्तर का कामकाज सम्हालने से मुझे ऊटी में हालीडे मनाने रिलीव करें."दद्दू ने यह किस्सा  सुनकर समझाइश दी ," हमेशा अपने बॉस को पहले अपनी बात कहने दें.अगर आपने पहले अपनी राय रखी तब कुछ भी हो सकता है."
 अबकी बारी थी प्रोफ़ेसर प्यारेलाल की.वे बता रहे थे एक बाज के बारे में .वह बाज किसी वृक्ष की ऊंची शाख पर बिना कुछ काम किये आराम से बैठा था.एक छोटे से खरगोश ने उसे देखकर पूछा,"क्या में ही आपकी तरह बिना मेहनत किये बैठा रह सकता हूँ? बाज ने जवाब दिया,"बिलकुल... क्यों नहीं!" वह खरगोश मैदान  पर नीचे बैठकर सुस्ताने लगा.अचानक एक लोमड़ी आई और झपट्टा  मरकर उसे खा गई..प्रोफ़ेसर ने समझाया,"मुझे लगता है अगर बिना खास मेहनत किये आराम से बैठना है तब आपको ऊँचाई या शिखर पर ही बैठना होगा वर्ना आपकी भी हालत उस खरगोश की तरह हो जाएगी."
                       मुर्गे और बैल का किस्सा सुनाया होशियार चंद ने.कहानी कुछ इस तरह की थी-एक मुर्गा  और बैल आपस में बातचीत कर रहे थे." मुझे इस वृक्ष की फुनगी पर पहुंचकर बड़ी ख़ुशी होगी." मायूस मुर्गे ने ठंडी सांस भरकर कहा," क्या करूं मित्र बैल!मेरे शरीर में उतनी ताकत ही नहीं है."" ऐसी बात है!तब तुम एक काम करो.... मेरे गोबर से कुछ दाने चबा लो. उससे तुम्हारे शरीर में ताकत आ जाएगी ."मुर्गे ने ऐसा  ही किया तथा उसके शरीर में इतनी ताकत आ चुकी थी की वह वृक्ष की निचली शाख तक पहुँच गया.चार रात तक लगातार मुर्गे ने यही किया और वृक्ष की फुनगी पर पहुँचकर बड़ी अकड़ से इधर-उधर देखने लगा.
            एकाएक किसी शिकारी ने उसे देख लिया.फौरन ही अपनी एयर गन से निशाना साधा और चन्द मिनटों में वह मुर्गा जमीन पर  गिरकर दम तोड़ चुका था.होशियारचंद ने मतलब समझाया,"चालाकी या मक्कारी अथवा बेवकूफ बनाकर आप शिखर पर पहुँच सकते हैं लेकिन टिक नहीं सकते.उसके लिए मेहनत ही एकमात्र रास्ता है."
                      अब की बारी मेरी बारी थी .  मुझे मालूम था पर चाय का  प्याला  मेज पर रख्का दद्दू बोले," हाँ अखबारनवीस,अब तुम्हारी बारी है."एक छोटा  सा परिंदा  सर्दियों  के मौसम की तलाश में कहीं उड़कर जा रहा था." मैंने किस्सा बयानी शुरू की.दरअसल मौसम में इतनी ठंडक बढ़ गई की ठिठुरकर वह खेत में नीचे जा गिरा.इससे पहले की वह उठकर उड़ जाता एक गाय ने आकर उसपर गोबर कर दिया.गर्म गोबर के नीचे ठिठुरकर  गिरे परिंदे को ऊब महसूस होने लगी.
                      शीघ्र ही वह मूर्ख परिंदा  ख़ुशी  से गाना गाने लगा.नजदीक से ही गुजरती बिल्ली ने परिंदे की आवाज सुनी और गोबर के इर्द-गिर्द घूमकर तफ्तीश करने लगी.जैसे ही परिंदे का सर उसे बाहर दिखाई दिया अपने पैने पंजों से उसने परिंदे को निकाला और हजम कर गई. 
                  पता  नहीं आप इस कहानी में छिपे" मारल आफ द स्टोरी " को समझे या नहीं हमारे दद्दू ,प्रोफ़ेसर प्यारेलाल और होशियार चन्द तत्काल समझ चुके थे.मेरे पूछने से पहले ही उन तीनों ने अपने निष्कर्ष सुना दिए.   !.यह जरूरी नहीं कि आपकी बुराई या आलोचना करने वाला आपका दुश्मन ही हो.२.यह भी जरूरी नहीं की आपको गन्दगी ( आलोचना )से बाहर निकालने वाला आपका शुभचिंतक ही हो.३.जब भी आप गन्दगी आलोचना या बुरे वक्त में फंस गए हों बेहतर यही है की खामोश रहें!!!!!
                                                         अपना ख्याल रखिये... आपका अपना 
                                                                     किशोर दिवसे.

                         
                   

हम क्यों बने रहते हैं कछुए!!!!

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हम क्यों बने रहते  हैं कछुए!!!!



एक बार एक कछुआ परिवार पिकनिक मनाने गया.अब कछुओं के बारे में नौ दिन चले अढाई कोस वाली कहावत तो आपने  सुनी होगी.तैयारी  करने में ही उन्हें सात बरस का समय लग गया.आखिरकार वह कछुआ परिवार कोई अच्छी जगह तलाशने घर से निकल पड़ा.अपने सफ़र के दूसरे साल उन्हें एक अच्छा ठिकाना मिल गया.अमूमन छमाही तक कछुआ परिवार जगह की साफ़-सफाई करता रहा.उन्होंने अपनी पिकनिक वाली टोकरी खोली और तैयारी करने लगे.
                      एकाएक उन्हें याद आया," अरे हम लोग नमक लाना तो भूल गए.नमक के बगैर खाने के स्वाद का कोई मतलब ही नहीं." सब लोग इस बात पर सहमत हो गए.लम्बी बहस के बाद सबसे छोटे कछुए को घर जाकर नमक लाने के लिए चुना गया.हालाकि छोटा कछुआ धीमे चलने वाले सभी छोटे कछुओं में सबसे तेज था फिर भी वह ना-नुकुर कर रोते हुए अपनी खोल में बैठकर जी चुराने लगा.वह किसी पेड़ के पीछे बैठ कर यही देखता रहा कि परिवार के बाकी सदस्य  क्या करते हैं.
         एक शर्त पर छोटा कछुआ नमक लाने घर जाने को तैयार हुआ.उसने शर्त रखी,"देखिये,, मैं  घर जाकर नमक लाने को तैयार हूँ.लेकिन मेरे घर से लौटने तक कोई खाना नहीं खायेगा."पूरा परिवार इस बात पर राजी हो गया और कुछ ही  देर में छोटा कछुआ घर के रास्ते पर  था....एस परिवार के सभी सदस्य सोचने लगे.
                     एक-एक कर तीन बरस बीत गए पर छोटा कछुआ नहीं लौटा .फिर पांच और छः बरस भी.सातवें बरस जब वह नहीं पहुंचा तब बूढा कछुआ अपनी भूख बर्दाश्त करने में खुद को असमर्थ महसूस करने लगा.उसने यह ऐलान किया,"अब वह भूख सहन  नहीं कर पा रहा है इसलिए वह खाना शुरू करेगा." इतना कहकर बूढ़े कछुए ने खाने का डिब्बा खोल लिया.अचानक छोटा कछुआ किसी वृक्ष के पीछे से निकला और छिपकर  कहने लगा," देखा ! ...देखा!मैं जानता था कि आप मेरे लौटने का इन्तजार नहीं करोगे.अब मैं नमक लाने घर जाऊंगा ही नहीं.
                      "क्यों दद्दू!कछुए के किस्से  का कोई मतलब समझे" मैंने उनसे चुहलबाजी करनी चाही." दरअसल अखबार नवीस!" दद्दू ने अपना बोल-बचन शुरू किया,"हममें से भी कई लोग कछुए की तरह हैं.कुछ लोग अपना समय यही जानने और समझने में बिता देते हैं कि अमुक क्या कर रहा है ...या फलाना ने ऐसा क्यूं  किया!( अमूमन सभी दफ्तरों  में यही हाल हुआ करता है.)
               हम अपनी अपेक्षाओं के मुताबिक लोगों से रहने की उम्मीद में वक्त जाया करने लगते हैं.लोग क्या कर रहे हैं .. या कौन क्या कर रहा है यह जानने की पंचाईत में इतना डूब जाते हैं की हमें क्या करना है ...हमें क्या करना चाहिए...इसका तक होश नहीं रहता . और हम खुद कुछ भी नहीं करते.!
                                                                     किशोर दिवसे.
         

मंगलवार, 14 जून 2011

फर्न की हरी चटाई और आसमान छूते बांस

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फर्न की हरी  चटाई और  आसमान छूते बांस 

दारू-शारू.... मुर्गा-शुर्गा...हा ..हा.. ही.. ही.. और ढेर सारी मस्ती.अमूमन जंगल जाने का मकसद भी यही हुआ करता है.और कुछ नहीं तो बकर ... का अनवरत दौर जो जहाँ चार यार मिल जाएँ  वहां ... हुआ तो अल्सुब्बह तक चलता रहता है.लेकिन मुझे याद है एक बार मैं जब जंगल गया था वह भी पचमढ़ी की खूबसूरत वादियों में जमीन पर बिछी हरी घांस की चादर पर लेटा हुआ ऊपर आसमान की नीली छतरी को निहारते हुए ,कब आँख लगी पता ही न चला.और मेरे बाकी दोस्त ... वे सब वही कर रहे थे जिसका जिक्र मैं इस लेख की पहली लाइन में कर चुका हूँ.
          बेहद निराश था में उस रोज.तय  कर लिया था कि छुटकारा पा लूँगा.नौकरी छोड़ दूंगा... रिश्ते- नाते भगवान्-श्ग्वान ...यहाँ तक की ज़िन्दगी से भी ऊब हो चुकी थी.ठंडी हवा बह रही थी और मन सोच रहा था कि काश!धरती पर सच्ची-मुच्ची में अगर भगवान्- शगवान है तब उससे एक बात तो बातचीत हो जाती!इतने में वीणा की मधुर तान गूंजी-
               नारायण...नारायण...नारायण...नारायण...
देखा तो देवर्षि नारद मेरे सामने खड़े हैं.आपने भी कहानी-किस्सों में सुना होगा कि उनकी महिमा अपरम्पार है.मन के भीतर की बातों को बिना बोले ही ताड़ जाते हैं." प्रणाम देवर्षि!" एकाएक उन्हें  सामने पाकर भौचक स्थिति  मैं मेरा  मुंह खुला का खुला रह गया था.
                   "टनाटन रहो मेरे दोस्त !"देवर्षि की न्यू जनरेशन बोली ने मुझे कुछ और हैरत मैं ड़ाल दिया.सोच परिवर्तन सृष्टि का नियम है : हम सब लोग जब परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं तब देवर्षि इससे बच जाये यह कैसे मुमकिन है?खैर चलते-चलते मैंने  भी अपने मन के भीतर का भड़ास डाट काम खोलकर देवर्षि के सामने उसी तरह अपना जी हल्का  कर लिया जैसे खांटी रोनहा टाईप लोग अपने बॉस के आने पर किया करते हैं.
                                       वैसे भी देवर्षि नारद सभी तरह की विश्वसनीय सलाह देने का एकमात्र स्थान हैं.मैंने अपना दुखड़ा रोते हुए उनसे कहा था," देवर्षि! इतना सब सुनने के बाद आप क्या एक भी कारण बता सकते हैं कि मैं  सब कुछ छोड़-छाड़ कर कहीं चल न जाऊं!"इस पर देवर्षी नारद ने मुझे जो गुरुमंत्र दिया वह(अपने कान मेरे पास लाइए) आपके कानों मैं भी फूंक देता हूँ-
                    " अखबार नवीस ! आसपास जरा गौर से देखो"-देवर्षि ने मुझसे कहा." यहाँ तो चारों ओर पर्णांग( फर्न)और बांस का जंगल हैं." मैंने चारों और नजरें दौड़ते हुए कहा ." तुम जानते हो जब पर्णांग और बांस के बीज लगाये गए थे धरती पर ,प्रकृति या ईश्वर ने उनकी पूरी तरह देखभाल की.सूरज( प्रतीक  ईश्वर )ने उन्हें रोशनी दी.. पानी दिया.और फर्न के बीज  तत्काल धरती का सीना चीरकर अंकुरित हो गए.वो देखो! फर्न की चमकीली हरी चटाई कैसे  पसरी हुई है !लेकिन बांस के बीज से कुछ नहीं निकला .बांस के बीज से आशा नहीं छोड़ी थी प्रकृति ने.!"
               दूसरे बरस फर्न काफी घना और जीवंत हो चुका था फिर भी बांस का बीज निरुत्तर था.ईश्वर या प्रकृति ने बांस के बीज से अब भी आशा नहीं छोड़ी थी.देवर्षि ने अपना कथन जारी रखा,"तीसरे बरस भी बांस का बीज पूरी तरह खामोश रहा.लेकिन आशा मन में कायम थी.चौथे बरस भी यही हाल रहा.अब भी बरकरार था आशा पर विशवास.
                      " पांचवे बरस धरती के भीतर से बांस के बीज ने अंकुर उभारा." देवर्षि का किस्सा रोचक मोड़ पर था. वे कहने  लगे,"पर्णांग या फर्न की तुलना में यह अंकुर एकदम नन्हा और प्रभावहीन था.लेकिन छः महीने के बाद बांस का बीज जमीन से सत्तर फीट ऊंचाई पर खड़ा था.पांच बरस तक उसकी जड़ें जमीन में गहराती जा रही थीं.उन जड़ों ने बांस को मजबूती और लम्बे समय तक जीने की अंदरूनी ताकत दी.
                       नारायण ..नारायण..नारायण..नारायण..
देवर्षि नारद ने मेरे चेहरे पर भकुआया भाव देखकर अपने बोल-बचन फिर शुरू किये.,"कुछ समझे अखबार नवीस!प्रकृति या ईश्वर अपनी रचनाओं को कभी ऐसी चुनौतियों से जूझने को विवश नहीं करती जो वे संभल न सकें." तुम जानते हो,जब तक तुम अपनी जिंदगी मैं संघर्ष कर रहे होते हो ,दरअसल तुम्हारी जड़ें जमीन में गहराई तक धंसती चली जाती हैं जिस तरह बांस के बीज से आशा अंतिम समय तक रही तुमसे भी   भरोसा  कैसे छोड़ा जा सकता है?बाकी लोगों से अपनी तुलना करना छोड़ दो."
                                  

                       " मेरे कहने का मतलब यह है कि  " देवर्षि ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा "पर्णांग या फर्न का प्रयोजन अलग है और बांस की महत्ता अलहदा .फिर भी दोनों ही मिलकर जंगल को खूबसूरत बनाते हैं.
" लेकिन देवर्षि! मेरी समस्याएँ जो अपनी जगह पर हैं उनका क्या?" मैंने सारी समझाइश को अपनी परेशानियों  के और करीब लाना चाहा." अखबार नवीस!बस यही तो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ" देवर्षि नारद बोल-बचन के अंतिम दौर में थे." तुम्हारा भी समय जरूर आएगा.... ईश्वर ( सुप्रीम पावर) ने मुझसे कहा है ... तुम्हारे भी दिन बदलेंगे और नई ऊंचाइयां हासिल  होंगी."
                      "देवर्षि ...किस ऊंचाई तक पहुँच सकूंगा में" मैंने पूछा." किस ऊंचाई तक पहुँचता है बांस!" देवर्षि ने प्रतिप्रश्न किया."जितनी मेहनत और लक्ष्य होगा."" हाँ! बिलकुल ठीक." ऊंचाई और सफलता हासिल कर तुम मुझे गर्व करने का अवसर देना" देवर्षि  ने इतना कहा और वे अंतर्धान हो गए.हवा में गूंजने लगी वीणा की तान और देवर्षि के ये शब्द.-
             नारायण...नारायण...नारायण...नारायण...
" अबे जल्दी उठ!!!साले... जल्दी घर लौटना है या नहीं?"मेरे बाकी दोस्त ढूंढते हुए पहुंचे और झकझोर कर जगाया.मुस्कुराते हुए में जंगल से घर की और लौटता हूँ अपने दोस्तों के साथ ..आज भी अक्सर मुझे दिखाई दे जाते हैं वही  आसमान छूते बांस और फर्न की पसरी हुई हरी चटाई!!!
           आज बस इतना ही.
                                                     अपना ख्याल रखिये
                                                                                       किशोर दिवसे 
                                           

                  
                    

सोमवार, 13 जून 2011

मैं हूँ खुश रंग हिना.. प्यारी खुश रंग हिना!

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मैं  हूँ खुश रंग हिना.. प्यारी खुश रंग हिना!

मुहब्बत है उसे हर किसी से.उम्र ,जाती या मजहब की दीवारों से दूर वह सबको अपने प्यार में रंग देती है.हरी ओढनी में इतराकर ,इठलाकर  जुल्फें हों या हथेलियाँ अपने जिस्म के हरे लहू में तर-बतर करना ही उसकी फितरत ,आदत और अदा भी है.गजब का सुकून दिलाती है उसकी सोहबत.पिस कर खुद जर्रा-जर्रा  बन जाएगी .मगर क्या मजाल कि उसके चूमते ही हर एक की हथेली से यह ख्वाहिश  न निकले-
              मोहे रंग दे... मोहे रंग दे..मोहे रंग दे रंग दे रंग दे...
हिना हर किसी की अपनी है.उसके साथ स्कूल जाती हुई बच्ची , पत्नी,प्रेमिका,भाभी,बहू, ननंद,माँ ,सास और सहेली भी .औरत और मर्द से जुड़े हर रिश्ते में वाबस्ता है हिना.खास तौर पर उम्र के उस दौर में जब बालों में चाँदी की रंगत घुलने लग जाती है तब हिना की याद  आती है.पहले तो उम्र दराज  होने पर ही हिना का साथ नसीब होता था अब तो उम्र की मोह्ताज्गी कहाँ रही ?खैर सर  के बालों का मसला अलग है .यही हिना किसी की हथेलियों के आईने का हरा सिन्दूर बनकर दिल में छिपी मुहब्बत का रंग उभार देती है.शरमाकर गुलाबी से सुर्ख होती हिना से रंगी नाजुक हथेलियों को देखकर उनका महबूब दिल्लगी करते हुए कुछ इस अंदाज में छेड़ने लगता है-
                   जी  में आता  है की चूम लू मेहंदी से रचे हाथ
                    बहुत दिनों  में आज पकडे गए हो रंगे हाथ
उस रोज जब दद्दू  ने हिना के दो पैकेट एक साथ लिए तब मैंने पुछा था ," यार ! एक साथ दो पैकेट!" दद्दू ने सफाई दी थी,"एक तुम्हारी भाभी के लिए और दूसरा अपने आधे खल्वाट के बचे-खुचे बालों के लिए." मैंने पूछा, "बाजार में  इतने हेयर कलर आते हैं फिर  हिना ही क्यों ? दद्दू ने अध् गंजी  चाँद खुजाते हुए कहा ,"बाकी रंगों में केमिकल होता है .हिना या मेहंदी में प्राकृतिक रंग है.बालों को नुकसान नहीं करती और सर की गर्मी शांत करती है सो अलग.वैसे अब स्टाइल का जमाना है सिंथेटिक कलर्स भी आम तौर पर ज्यादा इस्तेमाल हो रहे हैं.इतने में जींस -टाप पहनी एक युवती उसी पार्लर में आई.वह गुनगुना रही थी-
                   मैं हूँ खुश रंग हिना... प्यारी खुश रंग हिना...
अपनी  जवानी के दिन याद आते ही दद्दू को एक वाक्य याद आया.उनकी शादी तय हो चुकी थी.दद्दू ने अपनी प्रेमिका( वर्तमान भाभीजी)से वायदा  किया था घर आऊँगा... फिर कहीं चलेंगे.लेट लतीफ दद्दू जब  घर पहुंचे भाभीजी पावों में मेहंदी लगा चुकी थी .दद्दू को गुस्सा आ गया.... यार तुम्हे मालूम था बाहर जाना है फिर भी!!!मान-मनुहार  करने के बाद भाभीजी  ने एक शेर सुनायाजिसे  सुनकर दद्दू भी मुस्कुराये बगैर न रह सके-
                    याद आया यार के आने का वायदा उन्हें तो कब
                   जब रात को पाँव में मेहंदी लगा चुके
हिना अब महज शगुन या संस्कार नहीं आर्ट से भी बढ़कर आय का जरिया बन चुकी है.लड़कियां बड़े शौक से मेहंदी लगाना सीखती हैं.प्रशिक्षित होकर तीज-त्यौहारों के वक्त अपने या दूसरों के हाथों पर मेहंदी लगाने की कला को पार्ट टाइम व्यवसाय भी बनाया जा सकता है.दुल्हन की हथेलियों पर मेहंदी लगाने की रस्म अब फैशन में शुमार हो चुकी है.लड़कियां तो क्या लड़के भी अब मेहंदी की डिजाइनें बनवा रहे हैं.
  दुकान से हम लोग लौटकर घर पहुँच चुके थे.काफी की चुस्कियों का दौर चल ही रहा था कि पप्पू  नमस्ते अंकल  कहकर कहीं जाने को निकला.अपनी शाहरूख स्टाइल के बालों को खास अंदाज में झटककर बाहर निकलने से पहले वह गुनगुना रहा था -
                      मेहंदी लगा के रखना ,डोली  सजा के रखना...
एक बार जब हम फिर मेहंदी पर बात कर रहे थे ,मुझे अपने कालेज के दिनों की  याद ताजा हो आई. मैं "उससे" अक्सर मिला करता था.मैंने दद्दू को बताया ," हम लोग यूं ही घूमने निकल गए थे.उसने जिस अंदाज से दोनों हथेलियाँ मेरे सामने खुली रखीं मुझे लगा " मेहंदी का बोझ नहीं उठा सकती ये नाजुक कलाइयाँ". मैंने मेहंदी रची उन कलाइयों को चूमकर कहा-


                        वल्लाह ये नाजुकी तेरी सलामे बयाँ में 
                        आधा ही हाथ उठ सका मेहंदी के बोझ से
सभी ने खूब सुनी है फिल्मों में हिना की खिल खिलाहट -पुराने गीतों में जो खुशबू है आज की नौजवान पीढ़ी शायद वाकिफ न हो.मेहंदी लगी मेरे हाथ रे...मेहंदी लगे थे मेरे हाथ,जो तुम आये थे...मेहंदी रंग तो लाई है लेकिन किस्मत ये खेल खेली....हमारी साँसों में आज तक वो हिना की खुशबू.. आदि आदि.
                       दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका में मेहंदी अत्यधिक लोकप्रिय है . मनोचिकित्सक डा. श्रीवास्तव ने कहा,"हाथ-पाँव में मेहंदी लगाने का वैज्ञानिक कारण है .यहाँ पर किरेटिन का स्तर सर्वाधिक होता है .राजस्थान में मेहंदी प्राचीन लोककला है.केरल में इसे मिलांची कहते हैं.अरब और पर्शिया में मेहंदी गर्भावस्था के सातवें महीने ,प्रसूति,शादी,सगाई व् पारिवारिक समारोहों में लगाईं जाती है.
                            " अंकल! जिसकी स्किन जितनी गर्म होती है हिना उतने दिन टिकती है जितना धुलती है उतनी रचती है" बबली की सहेली  कमसिन ने मेहंदी पर अपनी भागीदारी निभाने का मौका नहीं छोड़ा.दादी भी बोलीं,"दद्दू बेटा!मेहंदी लगाने से पति की आयु बढ़ती है." इसी बीच रंगीली भी मेहंदी की ट्रेनिंग क्लास से लौट चुकी थी.चहक चहककर  कहने लगी ," देखो न ... मेरे हाथों  पर अरेबियन स्टाइल की मेहंदी लगी है .मेरी बाकी सहेलियों ने भी स्पार्कल जर्दोरी ,जिग-जैग,बूटी और ब्लैक एंड रेड स्टाइल से मेहंदी  लगाईं है!!!
                                                                                   रंग -बिरंगी भावनाओं के साथ 
                                                                                           किशोर दिवसे 
                      


रविवार, 12 जून 2011

तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...

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तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...

 कभी कभी तेरे ओठों की मुस्कुराहट से 
मुझे बहार  की आहट सुनाई देती है

यूं क़ि कितना  करीबी रिश्ता है मुस्कुराहट और बहार की आहट का.अगर ये कहें की किसे पसंद है मनहूस और सूजे हुए चेहरे?यकीनन कोई भी पसंद नहीं करेगा .चलिए ,खड़े हो जाइए आईने के सामने और मुंह लटका लीजिये.फिर मुस्कुराइए... और..थोडा और ...अब तो समझ गए न ! वाकई जैसे ही कोई हमसे मिलता है या हम किसी से मिलते है अपने ओठों पर  मुस्कान उस इबारत पर मुहर होती है जिसमें बिना कुछ लिखे यह लिखा होता है ," आपसे मिलना हमें सचमुच अच्छा लगा."
                       चाहे कोई भी हो किसी भी उम्र का हो कितना अच्छा लगता है जब कोई मुस्कुराता है .खास तौर पर किसी मासूम बच्चे की मुस्कान.पालने में सोया छौना जब नींद में मुस्कुराता है तब उसे देखकर भी लगता है मानों तपती लू में शीतल हवा का झोंका .कितनी मनुहार करते हैं रोते बच्चे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने  के लिए ?रोते हुए बच्चे के चेहरे पर तबस्सुम लाने की जिद भी किसी इबादत से कम नहीं.इसीलिए सच कहा गया है -
                     मंदिर और मस्जिद यहाँ से है बहुत दूर
                      चलो किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
जब कोई मुस्कान दिल को छू लेती है तब उसे मिलियन डालर स्माइल कहते हैं.लखटकिया मुस्कान के लिए अब तो बकायदा प्रशिक्षण भी मिलने लगा है.वैसे तो टूथ पेस्ट वालों ने मुस्कुराहट को बिनाका और कोलगेट स्माइल बना दिया है .फिर भी मुस्कान सहज होनी चाहिए,उसे नकली कतई न बनने दें.चुनाव नजदीक आने पर किसी नेता की मुस्कान का अंदाज  भी आपने लगाया होगा.छीछा लेदर करती पब्लिक के सामने नेताओं की मुस्कराहट के छिपे हुए मायने भला आपसे कहाँ छिपे हैं?लेकिन ऐसे भी लोग  हैं जिनके ओठों के तबस्सुम का बोझ आँखें नहीं उठा पातीं और वे आंसू छलकाने लगती हैं.
                          माना की जिंदगी इन दिनों काफी तल्ख़ हो चुकी है.कुछ लोग शिकायती अंदाज में " इस सदी में हंसने वाले को पत्थर का कलेजा"कहकर अपना रोना भी रो लिया करते हैं फिर भी टाप-जींस पहनने वाले बंटी और बबली के हम उम्र दोस्तों का अंदाज -ए- बयां भी यही होता है-
                        तबस्सुम और फिर उनके लबों पर
                        चमन की हर कली शरमा रही है
कलियों के शर्माने या मुस्कुराने का अंदाज वही होता है जो फूल बनने से पहले कली के चटखने का.दिल-ए- आशना की निगाहों में सुबह-सुबह के वक्त चेहरे का तबस्सुम यह कहने पर मजबूर कर देता है ," सुबह के तारों ने भी अपनी जान तक कर दी निसार.( न्यौछावर)".फानी ने अपने खूबसूरत अंदाज में किसी ओठों की मुस्कुराहट को हजरत मूसा के सामने तूर नामक पहाड़ी पर लहराई हुई बिजली की मानिंद बताया है.मुस्कराहट की वजह से खुलने वाले ओठों को धडकते दिलों ने गुलिस्तान ( बगीचा ) कहा है.कुछ लोगों को यह भी कहते सुना है ," हमसे तबस्सुम की ख़ुशी क्या पूछते हो ,हमको तो मुस्कुराये हुए जमाना गुजर गया."
                        दद्दू गए थे अपने बीमार रिश्तेदार को देखने .उसके चेहरे पर मुस्कुराहट देखकर मन ही मन सोचने लगे," मिजाज पूछने वाले की आबरू रख ली."उसे देखकर लौट रहे थे दद्दू .हलके अंधियारे में लैम्प  पोस्ट के नीचे अपनी फटेहाली ओढ़कर एक दिलजला  लुढका हुआ था.सीने के भीतर शीशा-ए-दिल के टुकड़े और फर्श पर शराब की बोतल का चूर चूर शीशा.किताब में रखे हुए सुर्ख गुलाब को हाथों में लिए हुए गुनगुनाने लगा.-
               हमने एक हसरत-ए तबस्सुम को 
               कितने आंसूं पिला के पाला है 

बहरहाल,खुद भी मुस्कुराइए और मुस्कुराते रहने का सन्देश भी दीजिये.मय कशीं में जब   कुछ लोगों के होश फना हो जाते है तब हाथों में शराब का प्याला लिए अपनी रूह के जगमगाने का दावा करते हैं पर हकीकत में होता यह है की उनकी अक्ल सर्द हो चुकी होती है.बागबान को कहते सुना है कि फूलों के खिलने या मुस्कुराने की सजा है मुरझाना .पर यह सच नहीं.मुस्कुराना हँसी की पहली पायदान है जो बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी निहायत जरूरी है.हाँ -एक बात और ...." उनसे " जब कभी तकरार हो जाए तो रूठकर नाराज होने वाले को फ़ौरन कह दीजिये -
                           कितने शीरीं हैं लब तेरे कि
                              गालियाँ खा के भी बेमजा न हुआ.
                                                                                    अपना ख्याल रखिये... मुस्कुराते रहिये...
                                                                                                       किशोर दिवसे 
                            



शनिवार, 11 जून 2011

बोझ को बना लें डैनों का आत्मविश्वास

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बोझ को बना लें डैनों का आत्मविश्वास 


" बहुत पुरानी बात है जब भगवान ने बहुत सारे बोझ बनाये " दद्दू ने एक किंवदंती सुनाते हुए कहा," वे चाहते थे की  इस तमाम बोझ को धरती पर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाये.लिहाजा भगवन ने सभी जानवरों से इस काम मैं मदद करने को कहा.सभी जानवर भगवान् की इस बात पर ना-नुकुर करने लगे.
                   हाथी अपने-आपको बेहद प्रतिष्ठापूर्ण मानता था अ.और सिंह तो जंगल का राजा होने की वजह से वैसे भी गर्वोन्मत्त था.ऐसा ही रूख अमूमन सभी जानवरों ने प्रदर्शित किया.आखिरकार सभी परिंदे एक साथ मिलकर भगवान् के पास पहुंचे उनहोंने समवेत स्वर में कहा ," भगवान् जी!अगर आप सभी बोझ छोटे-छोटे गट्ठरों में बंधकर रख देंगे तब हम सब उन्हें आप जहाँ चाहते हैं वहां पर पहुंचा सकते हैं.हम लोग दिखने में छोटे जरूर हैं लेकिन आपका काम करने में हमें अत्यंत प्रसन्नता होगी.
                   भगवान् ने परिंदों की बातें बड़े ध्यान से सुनीं और हर परिंदे की पीठ पर छोटे -छोटे बोझ बांध दिए.सारे परिंदे अपने गंतव्य पर रवाना हो गए. रास्ते भर ख़ुशी से वे गाते जा रहे थे . इसलिए  बोझ की  वजह से उनहोंने ज़रा सी भी थकान महसूस नहीं की.दिन-ब- दिन पीठ पर लदा बोझ इन परिंदों को हल्का और हल्का लगने लगा.धीरे-धीरे बोझ लेकर वे आराम से चलने लगे.पहले उन्हें वही बोझ कुछ भारी लग रहा था.जब वे परिंदे निर्दिष्ट गंतव्य स्थल पर पहुंचे  बोझ पीठ से हटाने के बाद उनहोंने देखा की उनके छोटे-छोटे पंख विशाल डैनों में बदल चुके हैं.वे डैने  इतने बड़े थे की परिंदे अब आकाश में बहुत ऊंचाई तक उड़ सकते थे.पेड़ की गगन चुम्बी फुनगियों पर भी बैठने में अब सक्षम थे.
                   परिंदों ने महसूस किया की बोझ अब बिलकुल नहीं रहा छोटे -छोटे बोझ ही डैने बन गए थे.उन डैनों से उड़कर वे भगवान् तक पहुँच सकते थे.प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने जब दद्दू के मुंह से यह किंवदंती सुनी ,बात उनकी समझ में आ गई.उनहोंने कहा," बोझ को अगर हम चाहे तो आत्मविश्वास के डैनों में तब्दील कर सकते है."
                   चाहे कोई काम हो या जिम्मेदारी अगर हम रुचि या रुझान दिखाकर पूरा कर रहे हों तब तहे दिल से किया गया काम हमेशा सफलता की और अग्रसर करता है..बोझ ,डैनों का आत्मविश्वास बनकर इतनी खुशियाँ प्रदान करता है जिसकी पहले हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती है.
                                                आज इतना ही... अपना ख्याल रखे.
                                                                              किशोर दिवसे 
                                                                                      मोबाइल   09827471743

बुधवार, 8 जून 2011

आईला हाट सीट पर गणपति बाप्पा !

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चकाचौंध भरे " कौन बनेगा करोडपति "के फ्लोर पर एक बारगी सुखकर्ता-दुखहर्ता भगवान् श्रीगणेश को देखकर कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता महानायक अमिताभ बच्चन  खुद भौचक थे.बुद्धि के देवता को उनहोंने अंतर्मन से प्रणाम किया और पल भर में फैसला लेकर दर्शकों की ओर मुखातिब हो गए.आम तौर पर स्पर्धा में शामिल लोगों को पसीना छूटता था लेकिन इस बात बात कुछ और थी.
                            " आइये आप और हम मिलकर  खेलते हैं कौन बनेगा करोडपति द्वितीय..." रौबदार खनकती आवाज गूंजी बिग बी की और  हाट सीट पर विराजमान हो गए भगवन.महानायक से जब रहा न गया तब अपनी चुम्बकीय  आँखों की गहराई से झांककर पूछ ही लिया ," सिद्धि  विनायक!आप तो माया -मोह से परे है ,इस धन -राशी का क्या करेंगे?लम्बोदर बोले,"मुझे क्या आवश्यकता  पैसों की ,सारी राशी दुखी जनों की चैरिटी के लिए होगी. 
                         " तो भगवन! बीस हजार की राशी के लिए पहला सवाल ये रहा आपके सामने.... और शुरू हो गया सवालों का सिलसिला.आखिर हाट सीट पर भगवन थे यानी वीआइपी उम्मीदवार सो सवालों की शुरुआत बीस हजार के पहले प्रश्न से ही होनी थी.आडियंस की तालियाँ  भाव विभोर दर्शकों  के उतावलेपन के बीच ही बिग बी बताते रहे kii " कुली" फिल्म की शूटिंग के दौरान जब वे जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे उनहोंने कितना याद किया था भगवन को!खैर ...सवाल होते रहे-बेरोजगारी,नैतिक मूल्यों के पतन ,आबादी विस्फोट,इंसानी दुनिया के दुखों का हल,आस्तिक -नास्तिक,पाखण्ड और बाबा वाद,छद्म धर्म निरपेक्षता और भी कई सवाल.बुद्धि के देवता ने सारे सवालों के तपाक-तपाक जवाब दिए.( अन्तर्यामी जो ठहरे)!
                        चेक जमा होते गए और फिर गूंजी बिग बी की सम्मोहक आवाज," आखिरी सवाल... भगवन, जो आपको दिलाएगा एक  करोड़ की राशी... हम चाहते हैं की यह राशी पीड़ित मानवता की सेवा में काम आये.देशक हर्षातिरेक से गदगद होकर श्री गणेशाय नमः और कुछ तो आरती करने के मूड में आ गए थे. एक नौजवान जोर से जय घोष कर उठा," गणपति बाप्पा मोरया"
                        कम्प्यूटर स्क्रीन पर भगवन! सवाल ये रहा आपके सामने -
दुखी इंसानों का उद्धार करने सबसे सही रास्ता इन चारों में से कौन सा है ए.नेताओं को ईमानदार बनायें.बी.स्वर्ग से देवताओं को बुलाया जाये.सी.इंसानों के लिए मारल  साइंस का कम्पलसरी कोर्स. डी.प्रलय के जरिये मानव समुदाय को सबक सिखाये.आपका समय शुरू होता है अब.
                           घडी की सूइयों की टिक-टिक  के साथ ही बिग बी सोच रहे थे ," सुनामी, कैटरीना भूकंप ,बाढ़ , ज्वालामुखी .. ये सब क्या मिनी  प्रलय नहीं हैं? और  और भी प्रलय की जरूरत है क्या?भगवन श्रीगणेश को सूंड खुजाते देखकर विचारमग्न बिग बी में छिपा एंकर अंदाज में बोल उठा ,आप चाहें तो लाइफ लाइन का इस्तेमाल कर सकते हैं.फिफ्टी फिफ्टी...आडियेंस पोल...फ्लिप और फोन ए फ्रेंड.
                     " अमिताभ मैं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से बात करना चाहूँगा "भगवन श्रीगणेश ने फोन ए फ्रेंड का आप्शन इस्तेमाल करना चाहा ." ब्रह्मा जी!!!कौन बनेगा करोडपति से मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ. ब्रह्मा जी ने आशीर्वाद दिया," आयुष्यमान भाव ."
                          " सृष्टिकर्ता !आज हाट सीट पर स्वतः मंगल मूर्ती विराजमान हैं .वे एक सवाल का जवाब जानना चाहते हैं आपसे .आपका सही जवाब उन्हें दिलाएगा दो करोड़ रूपये जो  दुखी जनों का उद्धार करने वे चैरिटी में प्रदान करेंगे.जवाब के लिए आपको मिलेंगे सिर्फ तीस सेकण्ड.अगली आवाज होगी भगवन श्रीगणेश की और आपका समय शुरू होता है अब-
      भगवन से पूरा सवाल सुनकर ब्रह्माजी ने दूरभाष पर ही विघ्न हरता के कान फूंके ," पार्वती सुत! आप भी कहाँ फस गए  इन इंसानों के मायाजाल में !अच्छे-भले भगवन के ग्रेड  में हो ,सुहाता नहीं क्या?भूल गए!देवताओं को जब श्राप दिया जाता है तब उन्हें मानव योनी में रहने का दंड पृथ्वी लोक पर भुगतना पड़ता है.तत्क्षण ही बुद्धि दाता का माथा ठनका-" बाप रे!!!घोर  कलियुग में   इंसान की जिंदगी जीने का प्रारब्ध!देखते नहीं मनोकामना की तेज आंच से देवता कैसे भागे-भागे फिर रहे हैं!लोगों ने यही समझ रखा है की पाप करो फिर दान-पुन्य के जरिये चढ़ावा डालकर धर्मात्मा होने का सर्टिफिकेट ले लो."
                            अमिताभ की कम्प्यूटर स्क्रीन पर भगवन श्रीगणेश का जवाब उभर चुका था.इसे देखकर वे दो करोड़ का चेक साइन करने लगे थे.ब्रह्मा जी का गुरुमंत्र पाते ही यकायक भगवान् श्रीगणेश अंतर्धान  हो गए.सर उठाकर बिग बी ने जब देखा हाट सीट खाली थी.इसी बीच फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट के प्रतिस्पर्धियों का भी फैसला हो चुका था.सवाल का जवाब सबसे जल्द बजर दबाकर देने वाला जब उठकर आया तब बिग बी ने देखा वीणा की झंकार के साथ ही आवाज गूंजने लगी है नारायण... नारायण....इससे पहले की दो लाख का ईनाम जीतने वाले हाट सीट के अगले प्रतिस्पर्धी  का परिचय वे कराते बजर दब गया यानी शो का समय ख़त्म.और नारायण... नारायण...की आवाज वाले प्रतिभागी दो लाख की राशी लेकर अनजान गंतव्य की और कूच कर गए.
                                      आडियंस में बैठे अखबारनवीस ने ने साफ़ महसूस किया की अपनी महंगी मूर्तियाँ देखकर भगवन श्रीगणेश का मुख कमल आम आदमी की तरह मुरझाया है.यहाँ तक की उनका वाहन मूषकराज भी बेशर्मी से डोनेशन की मांग करते फलते-फूलते कोचिंग सेंटर और  विद्यार्थियों पर चूहे की तरह प्रयोग किये जाने से दुखी था .बिग बी " केबीसी "के एपिसोड की अंतिम औपचारिकतायें पूरी कर रहे थे और अखबार नवीस सोच रहा था ," अगर बुद्धिदाता से कहा जाता अकी सारी दुनिया का चक्कर लगा आओ ,जैस की पौराणिक कथा में हम सबने सुना है ,क्या भगवन श्रीगणेश कम्प्यूटर का एक गोल चक्कर नहीं लगा लेते?
           खैर... दो करोड़ का चेक बिग बी ने कंपनी वालों से बार कर मंदिर त्रस्त को सौप दिया.दो दिन बाद ही सुर्खियाँ अखबारों में छपी.मंदिर के एक ट्रस्टी ने  लिया दो करोड़ के चेक का फर्जी भुगतान.दरअसल उस मंदिर में कुछ बरस  पहले आभूषणों की चोरी हो गयी थी .आखिर तक चोरो का पता नहीं लग पाया था.फर्जी भुगतान लेकर उस ट्रस्टी ने कुछ लोगों के साथ मिलकर आभूषणों का गुप्तदान मंदिर में कर दिया था.
                              और हाँ!भगवन श्रीगणेश ने जो दो करोड़ की राशी के लिए पूछे गए बिग बी के सवाल का जो जवाब दिया वह एंकर के कम्प्यूटर में इस तरह लाक हो गया है  की स्क्रीन पर लाना मुश्किल है.ऐसी स्थिति में अगर जवाब आपके दिमाग की कम्प्यूटर स्क्रीन पर कभी उभरे तो बताइयेगा जरूर.... शुभ रात्रि... शब्बा खैर... एंड प्लीज प्लीज प्लीज डू व्हेरी गुड केयर आफ योर सेल्फ.
                                                     अपना ख्याल रखियेगा.
                                                                    किशोर दिवसे
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