शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

कांच के आदमी

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कांच के आदमी      दरअसल इस शीर्षक की कविता का जन्म एक छोटे से किस्से से हुआ . मेरे एक मित्र स्व. प्रो. रघुनाथ प्रधान चौकसे इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाते थे. अपने आठ साल के बेटे को वे नवभारत प्रेस ,बिलासपुर ला रहे थे. उसने पूछा , " पापा मुझे कहाँ  ले जा रहे हो?" " चल तुझे कांच के आदमी दिखाकर लाता हूँ."  प्रेस में सब लोग कांच लगे हाल में बैठते है.  बच्चे ने प्रेस से लौटते हुए पापा से कहा, पापा ये लोग कांच के आदमी कहाँ  है , मेरे जैसे तो है?" किसी तरह बच्चे की जिज्ञासा  प्रधान सर ने शांत कर दी. पर मुझे जब किस्सा उनहोंने  बताया , मेरे मन के भीतर कुछ कुलबुलाने लगा था. परिणति आप सबके सामने है 
    कांच के  आदमी
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  चलो बेटा मैं तुम्हे दिखाऊँगा
कांच के आदमी 
जिद्दी मासूम को भरमाया
उसके पिता ने कुछ सोचकर
और चल पड़ा वह अबोध
नन्हे हाथों से अंगुलियाँ थामकर
*******
आप झूठ बोलते हो पापा
कहाँ हैं ये कांच के आदमी?
देखो! सब हमारे जैसे हैं
दो हाथ-दो पैर और
एक सर, सो आँखों वाले
साधारण से आदमी!
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खीझकर घर लौटा बालक
उलझन में डूबे पिता के साथ
बिचकाकर अपना नन्हा सा मुंह
सवाल अब भी था अबूझ
धरती पर क्या सचमुच होते हैं
कांच के आदमी!
********
सामने एक-दूसरे के अब थीं
दो जोड़ी सवालिया आँखे
नन्ही आँखों में थी उत्कंठा
कहाँ मिलेंगे  कांच के  आदमी!
********
सोच रही थी वयस्क आँखें
कैसे समझाऊँ इस नादाँ को
जो इस युग में सोच बैठा है
" हो सकते हैं कांच के आदमी!
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सोचने लगा था हैरान पिता
क्या जाने वह मासूम
आदमी ,जब सचमुच था आदमी
तब,कांच की मानिंद थे पारदर्शी
आपके और हमारे मन-मस्तिष्क
जो होता था मन के भीतर
वही उतरता था जुबान पर
क्या वही थे कांच के आदमी?
*********
और आज!!!!!
पेट में रखता है छिपाकर अपने -दांत
कलियुग का सयाना आदमी
शुगर कोटेड  और मिठलबरा
कई सांप-गिरगिट मरते हैंजब
जनमता है आज का आदमी तब
यह उसकी मजबूरी है या प्रारब्ध
" मुख में राम बगल में छुरी!!!!
*****
अरे वह कांच की दुनिया!
बच्चे ,बूढ़े और जवान
कांच के जिस्म थे सब के सब
खूब मुस्कुराया, खिलखिलाया
कितनी सुन्दर है यह कांच की दुनिया!
प्यार और सहजपण जहाँ पाया
अरे वाह!कांच के आदमी!
कांच की दुनिया... अरे वाह!!
*****
टप-टप आंसू पड़े टपक
उस एक जोड़ी वयस्क आँखों से
वे कहने लगी थी मन ही मन
स्वप्न लोक में ही अब दिखेगा
कांच का आदमी!
जीवन संग्राम की धमन भट्टी में
पिघल गया है कांच का आदमी
और चिपट गई मजबूती से
स्वार्थ,लिप्सा और आज के यथार्थ की
अपारदर्शिता हमारे रोम-रोम में
********
छूकर देखा खुद के शरीर को
उस एक जोड़ी वयस्क आँखों ने
ओह! क्या बन गया हूँ मैं
और शायद आज की दुनिया भी!
कांच से बना अर्ध-मानव
क्या लौटेगा फिर वही युग?
सोचने लगा था वह पिता
सवालों के झंझावातों में कही गुम
********
तभी नींद में बुदबुदाया वह मासूम
कांच की दुनिया में डूबता-उतराता
सम्मोहित सा वह नादान
पापा...पापा...पापा...पापा...
देखो... देखो... आपका आधा शरीर
कांच का क्यों है... कांच का क्यों है?
******
इस बार ओंठ मुस्कुराये
फिर टपके आंसू टप -टप
काश आज का इंसान भी बन सकता
कांच का आदमी,कांच का आदमी!!! 


    

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन -2

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न हारा है इश्क ,न दुनिया थकी है 
दीया जल रहा है ,हवा चल रही है 
चरागों के बदले मकां जल रहे हैं
नया है जमाना ,तो नई रौशनी है 

खुमार बाराबंक्वी के इस अलमस्त मौजूं शेर ने क्या समां बंधा है! वेलेंटाइन  दिवस पर अखबारों में दिलों को कभी गुदगुदाते तो क्स्भी गुस्सा दिलाते प्रेम-संदेशों की लाइनें पढ़कर भरोसा हो गया- नया है जमाना तो नई रौशनी है.नई रौशनी में आइये इतिहास के कुछ पन्ने पलटते हैं.
शुरुआत होती है रोमन सल्तनत से-जूनो के फेब्रुआता ,प्रेमोत्तेजना की देवी के सम्मान में रति या श्रृंगार उत्सव " ल्यूपर्केमिया " मनाया जाता था.कालांतर में इसका रूपान्तर हुआ और " सेक्स का स्थान सात्विक प्रेम ने ले लिया.चर्च ने अगुवा के रूप में एक ब्रह्मचारी संत वेलेंटाइन का चयन किया .वेलेंटाइन के बारे में पहली कथा-सम्राट क्लाडियस -२ का हुक्मनामा ,शादियाँ और विवाह बंधन समाप्त करने का , वेलेंटाइन ने ठुकरा दिया.नतीजतन वेलेंटाइन को मृत्युदंड  दिया गया.सजा-ऍ -मौत से पहले जेल में रहने के दौरान संत ने जेलर की बेटी की आँखें ठीक कर दी .फांसी से एक दिन पहले संत ने उस युवती को पत्र लिखा जो उनके प्रेम में ड़ूब गईं थी.यह सन्देश था,"फ्रॉम योर वेलेंटाइन".
                              वेलेंटाइन  डे का पहला लिखित सन्देश  ड्यूक ऑफ़ ओर्लिएंस ने सन 1415  में लिखा था.कैद के दौरान ये प्रेम सन्देश उसने अपनी पत्नी के लिए लिखे थे.18  वी सदी के बाद प्रिंटेड कार्ड बाजार में आए.आज वेलेंटाइन डे के न्यू मिलेनियम रूप में हम देख रहे है ... गुलाब की कलियाँ...ई-मेल...वीडियो टेप..रोमांटिक सन्देश भरे skrech कार्ड्स.रोमन मिथोलोजी में " क्यूपिड "  प्रेम की देवी वीनस का पुत्र है .ग्रीक मिथालोजी में ईरोस ,प्रेम का देवता ,भारतीय शास्त्रों में समकक्ष प्रतीक कामदेव.
                              हायतौबा मचा दी है वेलेंटाइन डे के नाम से.बुरी तरह छटपटा  रहे हैं  वे लोग जो " प्रेम को सेक्स के लिहाफ से बाहर निकालकर देखना ही नही चाहते.प्रेम आराधना है, पूजा है,इबादत है,फलसफा है,जीवन दर्शन का पवित्र दृष्टिकोण है .इसे नर-मादा के बीच देह भाषा तक सीमित रखना गलत होगा.गंदी नजर तो खुद को संस्कृति का मसीहा समझने वाले स्वयंभू मठाधीशों की है." POLITICS OF INTERPRETATIONS "  के चलते इसे जबरन हौवा बना दिया गया है.
                       दो विपरीत धाराएं समाज में बह रही है.ये शाश्वत सत्य है और रहेगा भी.वेलेंटाइन डे यानी प्रेम पर्व के पीछे मुझे दो मानसिकताएं साफ दिखाई देती हैं.पहली-ग्लोबलाइजेशन का असर.. परम्परावादी  सोच की ऊबाऊ मानसिकता से नई जनरेशन का विद्रोह.दूसरा- मार्केट फोर्सेस द्वारा  प्रेम की भावना का किया जा रहा आर्थिक दोहन... और आस्था और विश्वास की महंगे दामों में  बरास्ता बाज़ार खरीदी और बिक्री.नौजवान दोस्तों के लिए कुछ बरस पहले वेलेंटाइन डे पर " मैंने प्यार किया "जैसी फिल्म का रिलीज होना भी इसके एक बाजारवादी पहलू को इंगित करता है.रोजगार और व्यवसाय वैसे बुरा नहीं हो सकता.
      भर्तृहरि ने कहा है.,'प्रेम देवताओं का गुण है". गाँधी ने कहा है," प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू है.". कबीर का फलसफा है               प्रेम प्रेम सब कोई काहे ,प्रेम न चीन्हे कोय
                              आठ पहर भी न रहे प्रेम न हावे  सोय
" प्रेम स्वर्ग का रास्ता है " तोल्स्तोय ने कहा ,फिर उस स्वर्ग की सीधी को सायास कमजोर क्यों बनाया जाना चाहिए.तरस आता है उनकी काम अकली पर जो कहते हैं वेलेंटाइन डे मनाने से हमारी संस्कृति को खतरा है.फूहड़ता, अशिष्टता, अश्लीलता और भोंडेपन का विरोध जायज है पर प्रेम की भावना प्रकट करना जलालत कभी नहीं हो सकता.हमें नजरिया सुधारना चाहिए.वेलेंटाइन डे मनाने  से हम वेस्टर्न कल्चर में ढल जाएँगे यह सोचना मेरी नजर में बेवकूफी है.आप ही बताइये,एक ओर वेलेंटाइन डे का विरोध ... कहने को हमारी संस्कृति इसके खिलाफ है, स्वयंभू मठाधीश  ऐसा प्रलाप करते हैं  .सब जानते है कि  " काम सूत्र " सिर्फ भारतीय संस्कृति की देन है.खजुराहो और कोणार्क .. अजंता के मिथुन शिल्प से क्या हमारी संस्कृति तब या अब खतरे  में पड़ी?हाँ.. प्रेम प्रदर्शन के दौरान मर्यादाओं के पालन पर सोचा जा सकता है .
                             LOVE THY NEIGHBOURS " का फलसफा भी अगर उत्सव में तब्दील हो जाए तो बुरा क्या है?वैसे जिन्दगी के रंग में प्रेम का संग हो तथा आधुनिकता और प्राचीनता का मिश्रण हो जाए तो इसका गुलाबीपन कुछ और सुर्ख हो जाएगा.बाजारवाद के इस दौर में " प्रेम की निर्मलता को बचे रखने की जद्दो जहद के बीच वेलेंटाइन कार्ड लेने-देने वाले मेरे सभी नौजवान दोस्तों के लिए यह शेर पेश-ऍ नजर है-
                                 कुदरत के करिश्मों में अगर रात न होती 
                                ख्वाबों में भी मुलाकात न होती
                                 ये दिल हर ख़ुशी गम की वजह है यारों 
                                 दिल ही न हो तो  तो कोई बात न होती         
                                                                        प्यार के नाम एक पैगाम...
                                                                                         किशोर दिवसे
                                                     

                              

                

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन -1

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मै किस्से को हकीकत  में बदल बैठा तो हंगामा.... !
जींस -टॉप..कार्गो टी शर्ट...फंकी-शंकी लुक वाले  नौजवान छोकरों और बोल्ड ,ब्यूटीफुल और बिंदास लड़कियों से घिरा था मैं.भाई, कुछ भी बोलो मुझे तो आज की नई जनरेशन बेहद पसंद है ... बिलकुल मीठे-नमकीन बिस्कुट फिफ्टी-फिफ्टी या फिर खट्टी-मीठी इमली की तरह.आज के ज़माने में जब हाफ सेंचुरी के करीब या उसके प़र लोग जब नए रंग में रंगने लगे हैं तब जवानी को दिशाहीन ,उच्श्रीन्खल या  दीवानी कहने की फितरत एकदम बकवास है .यकीनी तौर पर समाज के आज या आज के समाज को महसूस करने के बाद बूढों का यह फिकरा ," धूप में हमने बाल सफ़ेद नहीं किए हैं"उन युवाओं की कड़ी चुनौती से जूझता हुआ लथपथ सा लगता है जो " जोश भरे होश "के साथ जिन्दगी जीता है .इसमें गंभीरता के साथ पूरी मस्ती -शस्ती भी होती है ... दिल से !
                           यूं ही सीरियस मुद्दों पर लिखते रहोगे या कभी हमारे साथ मस्ती भी... ! अपने डोले दिखाते हुए " माचो मैन" और एक जोड़ी शैतान शरीर कनखियों की शरारत ने मुझे यह एहसास दिला दिया कि मुहब्बत और करियर के साझा जज्बे को पुचकारती पीढ़ी का मीठा रिश्ता इस पल मुझसे क्या मांग रहा है.
                                  सच कहूं!दद्दू और प्रोफ़ेसर प्यारेलाल जब साथ हो जाते हैं तब किसी भी महफ़िल की रौनक क्या खूब जमती है.हुआ भी यूं...एहसासों का आकाश था... चर्चा के बहाने ही सही अल्फाजों  के परिंदे मुहब्बत की रेशमी डोर  लेकर उड़ने लगे ऊंचे ... और ऊंचे...
                              की कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है 
                               मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है 
यहाँ प्यासी धरती की बेचैनी और बरसने को आतुर बादल की बेकरारी किसकी है यह हर कोई समझ सकता है .लेकिन दद्दू के मन में एक और बात आती है , "मनोविज्ञान में मैंने पढ़ा है की दूरियां प्यार को और बढा देती हैं" " फिर भी दूरियों की मियाद भी तो तय होनी चाहिए ना!" मैंने टोका.उदास खोई सी आँखों वाला युवक गुनगुनाने लगा
                                 मैं तुझसे दूर कैसा हूँ,तू मुझसे दूर कैसी है
                                  ये तेरा दिल  समझता है या मेरा दिल समझता है
दो जोड़ी आँखें जब एक-दूसरे से बिना कुछ काहे सब कुछ कह रही थी तभी प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने कहा ,"प्यार में दिल और दिमाग का सही संतुलन जरूरी है मुहब्बत में  FALL IN LOVE" के बजाए   " RISE IN LOVE" होना चाहिए.खास तौर पर नई पीढ़ी इसे समझ गई ( मुझे लगता है अब अच्छी तरह समझ चुकी है) तब प्यार अँधा नहीं बल्कि तेज आँखों वाला और जिम्मेदार हो जाएगा."
                                  कि मुहब्बत एक एहसासों  की पावन कहानी है 
                                  कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है
कबीर और मीरा से कम, हीर-राँझा,शीरी. -फरहाद,रोमियो- जूलियट से अधिक वाकिफ एक शोख " हॉट एंड स्वीट " कहने लगी ," सर जी! उनके प्यार को समाज नहीं समझ पाया.मेरी आँखों के आंसुओं को कौन समझेगा कि ये मोती हैं या पानी!"
                                यहाँ सब लोग कहते है कि मेरी आँखों में आंसू हैं 
                                जो तू समझे तो मोती है जो ना समझे तो पानी है      
दद्दू अपनी जवानी का किस्सा बताते हैं," हुआ यूं कि मुहब्बत क़ी राह पर निकल पड़ी थी दो जोड़ी आँखें. तकदीर का फसाना
कहिए कि साथ छूटा और लड़की की शादी हो गई कहीं और.दो बरस बाद अपने बच्चे का परिचय उस युवती ने " देखो मामा आए " कहकर कराया .वापस लौटने के बाद(टूटे दिल वाले नौजवान ने ( उस युवती के पति के लिए) अपनी भड़ास कुछ इस अंदाज में निकाली -
समंदर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता 
ये आंसू प्यार  का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को तू अपना बना लेना मगर 
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता 
" अब समझदार हो चुकी है युवा पीढ़ी" नौज्वाहों से रिएक्शन लेने जब दद्दू ने उनसे कहा, प्रेम हिंदुस्तान में ऐसा विषय है जिसमें केवल थ्योरी क़ी क्लासेस चलती हैं" इसपर दबी जुबान से खिलखिलाहटें और इशारेबाजियाँ जब हुईं मामला साफ़ था कि वे क्या कहना चाहते हैं.
" सर जी!आज के नौजवान युवक-युवतियां सोच समझकर अपने जीवन साथी का चुनाव करते हैं"- पहला युवक
  "हाँ सर! पेरेंट्स को भी चाहिए कि हम पर भरोसा कर कम से कम हमारी बात तो सुने"-पहली युवती
  " करियर मेकिंग और फियान्सी को अच्छी तरह समझना  हम  कोर्टशिप के दौरान ही कर लेते हैं सर जी!"-दूसरा युवक
" सर जी! इसलिए तो प्रेम विवाह भी अच्छे माता- पिता परखने के बाद अरेंज्ड में बदल देते हैं. कसौटी पर कसना तो हर मामले में पड़ता है "- दूसरी युवती
खोई -खोई सी आँखों वाले उस युवक को देखकर ही लगा था कि वह शायराना तबीयत का नौजवान है.दद्दू, प्रोफ़ेसर और मै, हम तीनों कि अनुभवी आँखें यह जानती थी कि खोया- खोया सा रहना भी प्यार में होने कि निशानी है ( बशर्ते कोई दीगर  मसला न हो.इसी बीच उसने एक पल आसमान की ओर देखा ,फिर अपने साथियों की ओर मुखातिब होकर कहने लगा- "सखी ! प्यार तो मीठा एहसास है ... जूनून और पैशन भी क्योंकि
                    भ्रमर कोई कुमुदिनी पर मचल बैठा तो हंगामा 
                    हमारे  दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा 
                    अभी तक ड़ूब कर सुनते थे तब किस्सा मुहब्बत का
                    मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा 
वाह-वाह .... और सीटियों के स्वर यदि नौजवानों के बीच से नहीं आते तब आश्चर्य होता .प्यार भरी मस्ती में नौजवान टोली हमसे विदा लेती है .लेकिन हमारी नजर में इश्क जिस्मानी नहीं रूहानी रिश्ता है ... इबादत... खुदाई...आतिश-ऍ-ग़ालिब.. राधा ,मीरा और जूलियट का समर्पण है जो रब के लिए सूफीज्म भी बन जाता है.मुसाफिर के साथ रहने वाले क़दमों का निशान है प्यार . पर टीनेजर प्लस की उम्र में तो जिस्म में मचलते है कई तूफ़ान ...और उसपर पहरेदारी  का अंकुश! डैम  इट यार ... चल हम दोनों कही लॉन्ग रन पर चलते है... लवर्स पाइंट ... गार्डन...मल्टीप्लेक्स...किसी रेस्तरां में....  बाइकिंग  करते हुए...मेसेजिंग.... फेसबुक... ओरकट... और भी कई नए शगल ढूंढ लिए हैं   इस जूनून ने!!इस प्यार को सेक्स की आदिम अवधारणा से अलहदा करने पर ही उसकी पवित्र सुगंध का एहसास होता है उसी प्यार का जो जात,उम्र,मजहब,जन्म के बंधन से परे गहराइयों तक समां जाता है सिर्फ दिल क़ी धड़कन में.लेकिन क्या करें कंट्रोल नहीं होता ... कैसे करें!!!!!!!!!!!!!!
                      हालाँकि सीरियस लफ्जों क़ी बजाए अपनी जींस-टॉप ... कार्गो टी-शर्ट ... फंकी-शंकी लुक वाले " तुझमें रब  दिखता है  यारां...: गुनगुनाने वाले मेरे प्यारे नौजवान दोस्तों को यह बात जल्द समझ में आती है क़ी प्यार तो बस हर हाल में निभाना है क्योंकि-
                     इश्क वाले आँखों क़ी बात समझ लेते हैं
                     सपनों में मुलाकात समझ लेते हैं
                   रोता तो आसमान ही है प्यार के लिए
                      पर नादाँ लोग उसे भी बरसात समझ लेते हैं
                                                                                                 एहसास  कीजिए प्यार का....
                                                                                                            किशोर दिवसे
                                                                                         
                   

                         

                                  
                                   


                               

 

सोमवार, 24 जनवरी 2011

गणतंत्र दिवस मनई ले पर क्या जिगर में लगी आग है.

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लो आ गया एक और गणतंत्र दिवस!मालूम है ,क्या तोप मार लोगे आज के दिन!टीवी या मैदान पर सन्देश और राज्यों के विकास का " अर्ध सत्य "  बताने वाली झांकियां देखोगे?कर्मचारी इस जुगाड़ में होंगे कि कैसे  लगातार और छुट्टियों का जुगाड़ हो जाए.वैसे शुक्र, शनि या सोम ,मंगल को गणतंत्र दिवस आए तो यह जुगाड़ करने की तबीयत और मचल उठती है ताकि दो- तीन दिन की छुट्टी मिल जाए.इलाकेदार नेता चुनिन्दा कार्यक्रमों में अलापेंगे अपनी- अपनी ढपली,अपना -अपना राग.बाकी लोगों के लिए..कुछ नहीं तो आउटिंग,मिलना-जुलना या घर बैठकर आराम...यही होना है.रही युवा साथियों की बात-घूमेंगे -फिरेंगे ,नाचेंगे -गाएँगे ... ऐश करेंगे और क्या!!!
                                       गणतंत्र दिवस ... भारत के संविधान की बुनियाद का दिन. आज के  हालात- कहाँ का गण  और कहाँ का तंत्र! उम्र के हिसाब से सठिया चुके ( माफ़ कीजिए साठ वर्ष से अधिक हो गए इसलिए) गणतंत्र की हालत  आज क्या है ... क्या कभी इस बात पर सोचा गया है?खिसियाकर दद्दू पूछते हैं ," भैये!यह तो बताओ.. गणतंत्र के मायने क्या हैं?मैंने उन्हें टेंथ क्लास के  छात्र की तरह समझाया" गण " यानी BODY OF FOLLOWERS  और " तंत्र"    के मायने हैं RULE OR ADMINISTRATION.गणतंत्र दिवस  या REPUBLIC DAY में रिपब्लिक का अर्थ होता है गणराज्य ,लोकतंत्र या प्रजातंत्र.
                                     " प्रजातंत्र में प्रजा शब्द से क्या सामंती बू नहीं आती ? " दद्दू ने छेड़ने के लिहाज से पूछा." ठीक कह रहे हो ,इसलिए तो अब लोकतंत्र को व्यापक अर्थों में स्वीकार गया है.लोंक अर्थात नागरिक." मैंने जवाब दिया." लेकिन अखबार नवीस... 1950  में ढेर सारे संविधानों की चुनिन्दा खासियतों से बनाये गए हमारे देश के संविधान की समय सापेक्षता को लेकर क्या कुछ ज्वलंत मुद्दों पर बहस नहीं छेडी जानी चाहिए? 1950 और आज2010 के राजनैतिक और समाजार्थिक माहौल में जमीन -आसमान का फर्क नहीं है?
                                           " बात तो ठीक कह रहे हो दद्दू!लेकिन कहाँ कोई इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचता है? जनमानस ही जब कुछेक लचर कानूनों की समीक्षा और नागरिकों के दायित्व के मसले पर नहीं खदबदाता ,नीति निर्धारकों के कानो पर भला क्यूं कर जूं रेंगेगी?" अब आप ही बताओ दद्दू सच्चे लोकतंत्र के लिए जैसे " लोंक " चाहिए जैसा " तंत्र" चाहिए जैसे " नेता चाहिए  क्या आज हैं?बीते पांच वर्षों में जितने घोटाले हुए ,मीडिया ने जितने भ्रष्टाचारियों के नाम उछाले क्या किसी पर भी जवाबदेही तय की गई. चाहे व्यक्ति पर हो या सरकार पर जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी  यह देश भाड़ बनता रहेगा.    
                                                                                      गांधी,नेहरू,सुभाष,पटेल शास्त्री , जैसे जमीने स्तर के नेता 
 और दीगर  क्रांतिकारियों के फलसफे पर अमल होने की क्या कोई उम्मीद की जा सकती है?वह पीढ़ी अब पुस्तकों  तक सिमट गई है.पार्टियों की बेशर्म नूरां कुश्ती का तमाशा जगजाहिर है.शहीदों की याद दिलाने वाले गाने हड़ताली पंडालों में ही सुनाई दे जाते है.आधुनिक भारत की बुनियाद के दौर में बीसवी सदी के कुछ नेताओं ने अवश्य ही देश को विकास की रौशनी दी पर आज देश की हालत डा. हनुमंत नायडू के शब्दों में
                                     सपने बिछाके  दो-चार ओढ़कर ,सोता है देश देखिए सरकार ओढकर 
                                     भाषण छपा है देश में खुशियाँ बरस रहीं ,लेटे है खाली पेट हम अखबार ओढकर 
गणतंत्र दिवस पर यह सोचा जाना चाहिए की विकास की रौशनी से सुदूर गाँव ला गरीब कब तर-बतर होगा!जहाँ तक नेताओं का सवाल है जमीरी (जमीर वाले ) और जमीनी दोनों ही स्तर के नेता अब दुर्लभ हो चुके हैं.यह सोच का बिंदु  है क्योंकि _ "आज की राजनीति की रम्भा ,दिल कहीं,दलबदल रही है कहीं".
                                       खून  करते हैं वे नकाबें और दास्तानें पहन 
                                        जुर्म को अपने छिपाने में कुशल अत्यंत हैं.
वाकई जुर्म को छिपाने में उनकी कुशलता काबिल -ऍ-तारीफ़ है.इसलिए तो पहले के नेता जमीन दान ( भूदान) करते थे और आज के नेता भू-माफिया के साथ मिलकर या स्वयम बनकर भूमि डकार जाते हैं...या अनाप-शनाप रेट हासिल कर लेते हैं.डा. अर्बनात ने कहा  है, ALL POLITICAL PARTIES DIE AT LAST OF SWALLOWING THEIR OWN  LIES "जो कुछ तो सच है पर यह भी सच है कि देश का काफी पैसा नौकरशाह और सरकारी अफसरों के भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है.
                                    दद्दू  ! गणतंत्र दिवस मनाते हैं हम सब लेकिन आज तक क्या जिम्मेदार नागरिक बन सके हैं?दूसरी ओर नागरिक सरकार पर निर्भरता अपना अधिकार  समझते हैं लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह गैर-जिम्मेदार हैं.क्या शहर की साफ़-सफाई,बेतरतीब यातायात ,प्रदूष्ण ,कार्यालयीन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता  की कोई जवाबदेही नहीं?महंगाई, व् राजनैतिक घोटालों पर जानता की आवाज बुलंद नहीं होनी चाहिए?लोग अपने -आपमें इतने आत्म केन्द्रित हो गए हैं के गंभीर मसले पर सोचने पर मजबूर नहीं होते कि-        
      क्या हो रहा ही सड़कों पे रात-दिन ,लोगों निकल के देखो आरामगाह से 
जिम्मेदार नागरिक बनना जरूरी है.देश के कुछ सड़े हुए सिस्टम  में तबदीली लाने करप्शन फ्री बनाने प्रत्येक नागरिक को नैतिक मूल्य जीवित रखने होंगे बैड गवर्नेंस को गुड गवर्नेंस ( अखबारी रिपोर्ट नहीं, हकीकत में बदलने ईमानदार जन-भागीदारी आज की अनिवार्यता है.
                           बहरहाल, आज तो गणतंत्र दिवस मनई  ले...पर याद रहे बदहाली का खुशहाली में कायाकल्प करने हरेक के जिगर  में देश के प्रति स्वाभिमान की आग जलनी चाहिए.भरोसा ही कि वो सुबह कभी तो आएगी पर जरूरत है अलख जगाने वाले, मशालों से लैस अनगिनत हाथों की .
                                                             गणतंत्र दिवस क़ी शुभ कामनाएँ
                                                                             किशोर दिवसे 
                                                                             
                                       

मिले सुर मेरा तुम्हारा ,तो सुर बने हमारा...

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आज  एकाएक टीवी चैनल पर जब पंडित भीम सेन जोशी के निधन की खबर सुनी .आंखों के सामने उनकी  गीत -संगीत यात्रा चल-चित्र की तरह घूमने लगी.अपनी रूचि के अबूझ पहलुओं को जानने -समझने की उनकी ललक कभी कम नहीं हुई बल्कि सदा बढती ही रही.पंडित जोशी को प्यार से "संगीत का हाई कमिश्नर " कहा जाता था.जीवन और संगीत में उनकी खोजी प्रवृत्ति अनथक जारी रही.होनहार बीरवान के होत चीकने पात- जब तीन बरस के थे पहली बार घर से भागे और मस्जिद के सामने बैठ गए.मुइज्जन की अजान- अल्लाह हो अकबर के अल्फाजो में छिपा संगीत तलाश रहे थे. फिर मंदिरों में गाने वाली भजन मंडलियों और बारातों में गीतों की धुनें भी गहराई से सुनते रहे.उनके भाग  जाने की आदत से परेशां होकर उनके पिता गुरुराज जोशी ने कई बार पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई  . हर बार कोई बन्दा नन्हे भीम को घर लाकर छोड़ देता था.
    ग्यारह बरस की उम्र में भीमसेन फिर घर छोड़  कर भाग गए- वजह थी मां उसे घी-चावल परोसने की हैसियत नहीं रखती थी.भीमसेन की जिन्दगी का यह जबरदस्त मोड़ था.नजदीक की चाय दूकान पर किराना घराने के उस्ताद  अब्दुल करीम खान साहिब का राग झिंझोटी में आबद्ध कोई ग्रामोफोन रिकार्ड सुना और ट्रेन पर बेटिकट ही सवार हो गए.मुसाफिरों से भीख मांगते किसी तरह तीन महीने में अपने गाव कर्नाटक के गदग जिले के रान से पुणे, मुंबई होते हुए ग्वालियर पहुंचे. आख़िरकार उस्ताद करीम (1936 ) से मुलाकात हो ही गई.गुरु-शिष्य परंपरा में पक्का भरोसा रखने वाले पंडित जोशी  कहते थे,"पहले किसी गुरु से सीखना और फिर उसमें अपना हुनर समाहित करना जरूरी है तभी कोई मजबूती से अपनी बात कह सकता है.अपनी संगीत यात्रा के दौरान  किराना   घराने  के परम्परावादी होकर  भी दीगर घरानों के लिए अपनी सोच को उन्होंने पूरी तरह खुला रखा.
       पंडित  भीमसेन जोशी अक्सर कहा करते थे की खुद को दूसरे दर्जे का नकलची बनाने की बजाए अपने गुरु का पहले दर्जे का सुधारक बनना चाहिए. जयपुर के संगीतग्य मल्लिकार्जुन मंसूर और केसर बाई केरकर के प्रति गहरी आस्था उनमें थी.केसर बाई ने एक बार टिप्पणी भी की थी ,: मै जानती हूँ के तुमने मुझसे काफी -कुछ चुरा लिया है.उनके संगीत ने अनेक पहलुओं को उकेरा जिनमें चिन्तन ,मनोरम,अंतर ज्ञान मूलक और अतार्किकता  थी.असफलता के तीव्र अंदेशे को  उन्होंने  कभी अपनी  ललक पर हावी नहीं होने दिया. इसलिए वे किराना घराने के एकमात्र गायक हैं जिन्होंने राग रामकली पर अपनी जिद दिखाई.पंडित भीमसेन ने अपने संगीत में उस्ताद करीम खान,सवाई गन्धर्व ,रोशन आरा बेगम सहित अनेक विभूतियों को जिन्दा रखा.
 1936  में पंडित भीमसेन सवाई गन्धर्व( पंडित राम भाऊ  कुन्दगोलकर ) के शिष्य बन गए थे.गंगू बाई हंगल भी सह-शिष्य थी. वे घर का काम करते और संगीत भी सीखते. 1943 ,में  वे मुंबई पहुच गए और 19 साल की उम्र   में रेडियो  आर्टिस्ट बनकर कन्नड़ और हिंदी गीत गाए .ख्याल,मराठी भजन, अभंग गायन में उन्हें महारत थी.उनको मिले अवार्डों में -पद्मश्री (1972),संगीत नाटक अकादमी अवार्ड(1976),नेशनल फिल्म अवार्ड(1985),पद्मभूषण(1985),पद्मविभूषण(1999),आदित्य विक्रम बिरला अवार्ड(2000),कला   शिखर पुरस्कार(),महाराष्ट्र भूषन(2002,कर्नाटक रत्न(2005),भारत रत्न(2008), लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिल्ली(2009),नारायण स्वामी अवार्ड बेंगलूरू (2010)प्रमुख रहे.
पंडित भीमसेन जोशी के बारे में सारी जानकारियाँ किसी एक लेख में समाहित करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. उनकी संगीत यात्रा " हरी अनंत, हरी कथा  अनंता" है . फिर भी उनका गायन सुनकर तन- मन झूमने लगता है .उनके प्रसिद्द हुए रागों में-सुधा कल्याण,मियां की तोड़ी,पुरिया धनश्री ,मुल्तानी,भीम पलासी,और दरबारी है.उन्होंने बसंत बहार ,बीरबल माई ब्रदर,नोदी  स्वामी नावु इरोधू हीगे,तानसेन तथा अनकही फिल्मो में गीत गाए.हालिया समय में लोगो को उनका गाया " मिले सुर मेरा तुम्हारा  .. तो सुर बने हमारा ...(1985  वीडियो ) बरबस याद आ गया होगा. पंडित भीमसेन जोशी को इस लेख के माध्यम से संगीत साधकों की ओर से श्रद्धा सुमन. उनकी संगीत  साधना के सुर हमारे बीच अमर रहेंगे.
                                                                  किशोर दिवसे
                          

रविवार, 23 जनवरी 2011

कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नहीं देखा

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मान लो के दुनिया अगर समंदर है तब आप और हम कश्तियाँ ही तो हुए !हमारा जमीर पतवार की भूमिका अदा करता  है .खुदा  और नाखुदा (नाविक )की अपनी-अपनी अहमियत होती है.किसी की भी हो ,जिन्दगी है तब समंदर की तरह उसमें तूफ़ान आयेंगे ही.और यही वक्त होता है जब हम सब ईश्वर या खुदा तथा नाखुदा को जिन्दगी के आईने में कुछ इस तरह देखने लगते हैं-
                     खुदा और नाखुदा मिलकर डुबो से ये तो मुमकिन है 
                     फकत तूफ़ान मेरी वजहें तबाही नहीं हो सकता 
यकीनन जब भी किसी कि जिन्दगी में तूफ़ान आते हैं देर -सबेर कश्तियाँ साहिल पर पहुँचती ही हैं.हौसला अफजाई करने हम एक-दूसरे से कहते भी है ,"नाखुदा जिनका ना हो उनका खुदा होता है "यह बात अलग है कि जिन्दगी के सफ़र में खुद से कोई लुट जाता है तो किसी को नाखुदा  ही लूट लेता है.दरअसल आपने भी कभी महसूस किया होगा हमारे जीवन में कुछ तूफ़ान ऐसे भी आते हैं जो खुद-ब खुद हमें किनारा सौंप देते हैं.
                      " पर अखबार नवीस ... जिन्दगी में कुछ लोग खुशामद करना नही जानते.उनकी खुद्दारी उन्हें व्यावहारिक नहीं बनने देती है.-दद्दू भावावेश में बहने लगे थे." लेकिन ऐसे लोग प्रैक्टिकल न होने कि वजह से कभी-कभी सफल नहीं हो पाते.
पारदर्शी प्रशंसा और फूहड़ चाटुकारिता में जमीन-आसमान का फर्क हैऔर यही पर कोई खुद्दार अपनी औकात पर कुछ इस तरह उतरता है -
                         नाखुदा मुझसे न होगी खुशामद तेरी 
                         मै वो खुद्दार हूँ ,कश्ती से उतर जाऊंगा 
जिद होनी चाहिए कि कश्ती  है तब सफ़र करना ही है चाहे कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न हो भला कश्ती का ऐसा कोई मुसाफिर होगा जिसने समंदर नहीं देखा होगा? भाई!जिन्दगी को पूरी संवेदना ,गहराई और चौकस नजरिये से देखना और समझना होगा वर्ना कश्ती के ड़ूब जाने का ख़तरा  नहीं मंडराएगा  क्या?
                        प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने संजीदा होकर कहा,"' अखबार नवीस! कभी कोई कश्ती ड़ूब जाती है तब आसानी से तूफ़ान की खबर हो जानी चाहिए लेकिन चाहे इसे खुदा की गफलत कहें या जिंदगी के सफ़र में हमारी अपनी असावधानियाँ ,साहिलों से टकराकर कई नौकाएं टूट जाती हैं.इसलिए जिन्दगी को पूरी गंभीरता से हर अंदाज समझकर जीना चाहिए."
                     " जिंदगी के दौरान जीवन  क़ी धूप,तल्खियों या जिम्मेदारियों से  कुछ लोग भागना चाहते है.आंधियां आने पर अपनी कमजोरियां एक-दूसरे पर टालने क़ी कोशिश भी करते हैं .एक खूबसूरत साकी ने जिसकी कश्ती साहिल पर ही टूट गई थी अपनी आँखों में कशिश लिए हुए मुझसे कहा था-
                            खुदा क़ी गफलत भी क्या से क्या दिखाती है
                            साहिलों से टकराकर नाव भी टूट जाती है 
यकीन मानिये ,जीवन में हर पल नाखुदा (नाविक )को बाखबर रहना होता है.नदी क़ी शांत लहरों  पर तैरते हुए दीये से भी सवाल किए जाते होंगे ,ऐ  मौजों (लहरों ) वो कौन लोग है जो कश्तियाँ डुबोते हैं?" आचार्य विनोबा ने कहा है , ' संघर्ष और उथल-पुथल के बिना जीवन बिलकुल नीरस बनकर रह जाता है.इसलिए जीवन में आने वाली विषमताओं को सह कर उससे सीखना ही समझदारी है.
                                कल रात को जब मैं सोया था,सपने में जिन्दगी को देखा
"I slept and dreamt that life was beauty.I woke and found that life was duty."
आप तो मेरे अपने हैं .जिन्दगी के समंदर में जब आप और हम कश्तियाँ हैं खुदा ...नाखुदा ... साहिल और समंदर क़ी चढ़ती -उतरती लहरों में भीगी-भीगी एक बात मुझे अक्सर याद आया करती है
                                 उसकी कश्ती को हवादिस ने दिया है साहिल
                                बढ़ के जो वक्त के तूफ़ान से टकराया है
                                                                                           अभी इतना ही... अपना ख्याल रखिए
                                                                                                     किशोर  दिवसे

                       

बुधवार, 19 जनवरी 2011

हे प्रभु.. तू इन्हें माफ़ कर ....

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अन्थोनी गोंजाल्विस... हाँ... ट्रेन में सफ़र के दौरान उसने अपना यैच्च नाम बताया था.पता नहीं था मुसाफिराना अंदाज में हुई यह मुलाकात दोस्ती में बदल जाएगी.आज वही अपुन का दिलदार दोस्त अन्थोनी गोंजाल्विस घर आएला था.अक्खा साल भर बाद अपुन का यार अन्थोनी आएला है और खाली-पीली भंकस करने के साथ-साथ दिल खोलकर रख दिया था हम दोनों ने.मेरी सुनने के बाद जब अन्थोनी की बारी आई तब उसने अपने एक रिश्तेदार जान डीकोस्ता का किस्सा सुनाया.
                       बोले तो जान रईस खानदान का औलाद.जान ग्रेजुएट होने जा रहा था.रास्ते पर एक शो रूम में उसे एक स्पोर्ट्स कर बेहद पसंद आई थी.वह जानता  था कि उसका डैडी उसे यह कार खरीद कर दे सकता है.उसने अपने दिल की बात डैड को बताया.ग्रेजुएशन के रिजल्ट वाले दिन जान को पक्का भरोसा था कि डैड वह कार तोहफे में देंगा.उस रोज डैड ने उसे बुलाया था और कहा," माई सन !! तुम्हारे जैसे बेटे को पाकर हम कितना प्राउड फील करता है यह मेरा दिल ही जानता है.डैड उससे बेहद प्यार करता है.इतना कहकर जान को उसके डैड ने रंगीन चमकीली जिल्द लगा गिफ्ट बाक्स दिया.जान हैरान और दुखी था.उसने जब वह बक्सा खोला ,उसमें चमड़े का कव्हर लगी  एक बाइबल  थी जिसपर सुनहरी इबारत में लिखा था ," तू जान विथ लव." न जाने कैसे जान का गुस्सा फट पड़ा.," डैड!गिफ्ट में क्या यही बाइबल दे रहे हो?कोई अच्छा तोहफा नहीं दे सकते थे?आग बबूला होकर वह अपने घर से जो निकला फिर लौटकर नहीं आया.
                 एक-एक कर कई साल बीतते गए.जान गोवा में बिजनेस करने लगा था.गाड की दुआ से सक्सेस भी हुआ.... घर बनाया...शादी भी बनाया.एक दिन यूं ही उसकी वाइफ शर्ली ने कहा," जान! कभी डैड को देखने का मन नहीं करता?" " हाँ शर्ली कई साल हो गया,सन्डे को जाकर देख आऊँगा." फ्राइडे का दिन था वह.
                           अचानक सैटरडे को एक टेलीग्राम पहुंचा.खोलकर देखा तो लिखा था," योर डैडी एक्सपायर्ड ,कम  सून."फ़ौरन ही वे लोग मुंबई से गोवा पहुंचे.सब कुछ ख़त्म हो गया था.फ्यूनरल होने के बाद जब घर पर यूं ही कुछ कागजात पलट रहा था तब जान को पता चला कि डैड ने  सारी वसीयत उसके नाम कर दी थी.किताबों के शेल्फ में अचानक उसकी नजर पड़ी-अरे! यह तो वही बाइबल है चमड़े के कवर से ढकी हुई.उसने भारी मन से कुछ पन्ने पालते.डैडी ने बाइबल कि कुछ लाइनों को अन्डर लाइन किया था.उसमें  लिखा था  -
                       Matt: 7;11     And if ye being evil know how to give good gifts to your children,how much more shall your hevenly father which is in heavengive to those who ask for it?"
                         जैसे ही जान ने ये शब्द पढ़े एक चाबी बाइबल से नीचे खिसक कर गिरी.उसमें उसी डीलर के नाम का कार्ड लगा हुआ था.जिसके शो रूम में उसने स्पोर्ट्स कर  देखी थी.उसी कार्ड पर जान के ग्रेजुएशन का दिन और तारीख के अलावा यह भी लिखा था  PAID IN FULL यानी पेमेंट हो चुका है.जान की आँखों से बहते आसुओं को बाइबल ने अपने सीने में यूँ छिपा लिया था जैसे दुखियों का दर्द जीसस अपने सीने में .शर्ली ने जैसे ही जान के कंधे पर हथेली रखी फफककर रो पड़ा था जान.शर्ली ने उसे ढाढस दिलाया.
                                आखिर हम कितनी बार प्रभु के आशीष को दरकिनार कर जाते हैं?सिर्फ इसलिए की वे उस रूप में हमारे सामने नहीं आते जैसा की हम चाहते हैया हमें उम्मीद होती है.हमें यह सोचना चाहिए की जो सुख हमारे पास है उसे क्या सिर्फ यूं ही तबाह होने दे क्यूंकि हमने कुछ  और  ज्याद इच्छाएँ पालरखी थी .? जो आपके पास है उसे महसूस करें.हो सकता है की आपने जो चाहा वह आने वाले समय में और बेहतर पॅकेज में मिले!
                                दद्दू बोले," यूं आर राईट अन्थोनी.हम छोटे -छोटे सुखों को अपनी बड़ी आकांक्षाओं के नीचे कुचल देते हैं.छोटे-छोटे सपनों और सुखों को जीना सीखें... उनकी सराहना करें.अगर जान में सब्र होता तब ऐसा  दुःख क्यूं होता?छोटे सुखों के रास्ते हम बड़े सुखों से जुड़ने लगते हैं.ये हमें स्नेह और लगाव के लम्बे रास्ते पर ले जाते हैं.दरअसल जान के मन में सब्र या पेशंस नहीं था.किसी ने सच कहा है," सहनशक्ति या धीरज अक्सर किसी वजह से मिली असफलता को सफलता में बदलने में मददगार होती  है लेकिन सहनशक्ति नहीं रही तब अछे से अच्छा शक्तिमान भी अपनी ताकत को बेसब्री से तबाह कर देता है "
                                                           अपना ख्याल  रखिए
                                                                                  किशोर दिवसे 

                       

सोमवार, 17 जनवरी 2011

आदमी वो है जो खेला करे तूफानों से

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" सभी कार्यों में सफलता पूर्व तैयारी पर निर्भर करती है.पूर्व तैयारी के बगैर निश्चित रूप से असफलता हाथ लगती है."- कन्फ्यूशियस 
यह कथन मुझे सौ फीसदी खरा उस समय लगा जब मैंने पीएस सी की परीक्षा पास करने वाले होनहार युवक-युवतियों के इंटरव्यू अखबारों में पढ़े थे.रोक्तिमा राय ,फरिहा मतीन,दीपक अग्रवाल,अरविन्द पतले ,सोनल खंडूजा,सुनील चौधरी ,आदित्य शर्मा और सुनील सिंह के अलावा अनेक नौजवान ,मेहनतकश पढ़ाकुओं ने सिविल सेवाओं के लिए परीक्षा यों ही नहीं पास कर ली होगी.बेशक इनकी सफलता के पीछे लक्ष्य,बेहतर कोचिंग , गहरा मार्गदर्शन ,सही विषय चयन और नए ट्रेंड की जानकारी के साथ ही ज़माने की नब्ज को भी पहचानने की बात रही होगी.
                         इन सबके साथ ही गायत्री सिंह,निवेदिता पाल,नेहा पाण्डे, रेणुका श्रीवास्तव ,मीनाक्षी शुक्ल,और सोनिया नायक जैसी करियर कांशस युवतियों की फेहरिस्त भी है जिनके बुलंद हौसलों और सही अकादमिक रणनीति ने उन्हें सफलता बक्शी.उन्हें मैंने उसी वक्त बधाइयों के गुलदस्ते भेजे थे.मन में यह बात उठती है की क्या उनसे बाकी हम-उम्र युवा कोई सीख नहीं ले सकते! निश्चित तौर पर उन सभी के रास्तों में भी कठिनाइयाँ आई होंगी पर समस्याओं के तूफानों से लड़ने की जिद ही तो सफलता के कदम चूमने का मौका देती है.शैलेन्द्र ने क्या खूब गया था-
         बात इतनी सी है कह दो कोई दीवानों से 
        आदमी वो है जो खेला करे तूफानों से 
तमाम प्रोफेशनल कालेजों और नौकरियों के लिए  चयन स्पर्धाओं में सफल होने वाले मुकद्दर के सिमंदारों और शिकस्त खाने वाले , दोनों के लिए ही नए सफर का आगाज शुरू होना चाहिए .सफलता की ख़ुशी तब सार्थक होती है  जब सफल प्रतियोगी अपनी रणनीति का खुलासा साथियों के बीच करते हैं.वैसे यह जिम्मेदारी कोचिंग सेंटरों की है जहाँ पर वे पढ़ते रहे.जो असफल रहते है उन्हें अपनी रणनीति का पुनरावलोकन करना चाहिए.इमर्सन ने कहा है ," सफलता का पहला रहस्य है आत्म विश्वास."
यानी  हम विफल हुए तो अपनी कमजोरियों को दूर कर दोबारा मेहनत करें.
                           सफल परीक्षार्थियों  ने यकीनी तौर पर खुशियाँ मनाई होंगी पर मै असफल शहसवारों की हौसलाफजाई इन शब्दों में करना चाहूँगा.-          वो देख चिरागों के शोले मंजिलों से इशारा करते हैं 
                                          तू हिम्मत हार के बैठ गया, हिम्मत कहीं हारा करते हैं ?
अपनी असफलताओं से मत घबराइए.सफल होने के लिए तुरंत फैसला करने की शक्ति आवश्यक है.सफल इंसान उस गुलदस्ते की तरह होता है जिसे जिन्दगी का घूमता चाक अच्छे कुम्हार(मार्गदर्शक )की मदद से गढ़ता है.वैसे देखा जाए तो हालिया नौजवानों की पीशी ने सचमुच यह साबित कर दिया है के करियर बनाने में " अकादमिक विरासत " की कहीं कोई मोह्ताज्गी नहीं है.
                       पर हमारे ज़माने में करियर बनाने के मौके भी कम थे, माता-पिता और बच्चों के बीच दूरियां भी इतनी थी की जनरेशन गैप की वजह से हमें उतना मार्ग दर्शन नहीं मिला जितना आज की पीढ़ी को मिल रहा है." दद्दू ने अतीत की याद कर अपनी बात कही.बात तो ठीक कह रहे हो दद्दू,मैंने कहा ," आज अवसरों का खजाना सामने है ,बच्चे माता-पिता के दोस्त बन गए है.दूरियों की दहशत समाप्त हो गई हैऔर पालकों ने भी अच्छी तरह सीख लिया है " जनरेशन-मैनेजमेंट" .बेहतर  और अपडेटेड मार्गदर्शन करने और जुटाने में भी आज पालक सक्षम हैं.
तफरीह करते हुए मै और दद्दू जब पान ठेले के सामने से गुजरते है .... चार  युवा खड़े हैं जिनकी  बाते हमारे कानों से टकराती हैं.-सिगरेट फूंकता पहला युवा शिक्षा पद्धति को कोसता है.गुटका मुहं में ठूंसकर दूसरे ने कहा," यार !पैसे देकर भी मामला नही जमा.तीसरा बोला, मैंने तो हरे नोट देकर मामला सलटा लिया है.चौथा बिगड़ा  नवाब है ."अबे झंडू बाम! बाप किसके लिए कमा रहा है!" पान ठेले के थोड़ी ही दूर टिमटिमाते दिए की रोशनी में झोपड़ी के भीतर एक मजदूर का बेटा सुरेश मन लगाकर पढ़ रहा है.दसवी की  बोर्ड परीक्षा में उसने टॉप किया था.सुरेश जैसे ही जोशीले हिम्मत वालों के लिए कहा गया है-
                        सफर मैं मुश्किलें  आए तो जुरअत और बढ़ती है 
                         कोई जब रास्ता  रोके तो  हिम्मत और बढती है 
नौजवान पीढ़ी को हिम्मत और लग्न से लक्ष्य तक की सीढियां चढ़नी होंगी..मुसीबतें सहनी होंगी क्योंकि  "  शिकायतें गर न हों तो जिन्दगी मोहकम  नहीं होती"  इसलिए जोश और होश वाले नौजवान दोस्तों , जब भी हम लक्ष्य के सफर पर चलना शुरू करें एक बात हमेशा अपने-आपसे दुहराते रहना जो बशीर बद्र साहब ने आपके और  सभी के लिए कही है-
            जिस दिन से चला हूँ मंजिल पे मेरी नजर है 
             आँखों  ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा 
                                                                          अपना ख्याल रखिए .. खुश रहिए...
                                                                                 किशोर दिवसे


                          

अगर कभी हसबैंड स्टोर खुल गया तो???

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अगर कभी हसबैंड स्टोर खुल गया तो???
डोंट बी संतुष्ट... थोडा विश करो.. डिश करो...हालाकि यह पंच लाइन किसी ऐसे विज्ञापन की है जिसमें शाहरूख खान कुछ प्रमोट करना चाहते हैं लेकिन यूं लगता है कि इसकी थीम महिलाओं को मद्दे नजर रखकर सोची गई है".
" बात कुछ हज़म नहीं हुई ... जरा और खुलासा करो" मेरी छोटी सी बुद्धि के खांचे में बात फिट न होने पर मैंने दद्दू से पूछा."यार अखबार नवीस !क्या इस दुनिया में महिला को कोई पूरी तरह संतुष्ट कर सकता है" दद्दू ने सीधा सवाल दागा.सवाल थोडा डेंजरस टाइप लगा इसलिए मैंने दद्दू कि गुगली को "डक"  करना चाहा.. मैंने पूछा," क्या मतलब?"
नहीं  नहीं...इसका वो मतलब नहीं जो आप समझ रहे हो.क्या कोई पुरुष किसी महिला को पूरी तरह खुश रख सकता है?क्योंकि बेचारे पुरुष तो छोटी -छोटी खुशियों में ही बल्ले... बल्ले.. करने लगते हैं .लेकिन महिलाऐं कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती.
" दद्दू यह आपका अनुभव बोल रहा है क्या?इस बार मने जरा चालाकी से सवाल उनकी ही ओर रिबाउंड करते हुए कहा ,"  दद्दू.... वैसे संतुष्टि तो अपने मानने पर होती है लेकिन आप किस मुद्दे पर अपने दिमाग कि लेजर बीम का बटन ऑन कर रहे हो?
                            समझ गए थे दद्दू कि मैंने उनकी नीयत भांप ली है इसलिए मूड में आकर उन्होंने किस्सागोई शुरू की-
मुंबई में एक स्टोर खुला है जहाँ पर "पति " मिलते है.कोई भी विवाह इच्छुक महिला वहाँ पर पति का चुनाव कर सकती है .इस स्टोर के प्रवेश द्वार पर एक तख्ती लगी है जिस पर लिखा है कि आपको यहाँ पर सिर्फ एक बार ही दाखिला मिल सकता है.इस स्टोर में छः मंजिलें हैं.जैसे-जैसे खरीददारी के लिए ऊपर की मंजिल पर पहुँचते जाते हैं पुरुषों के भीतर मौजूद खासियतें बढ़ती जाती हैं.( पाठक युवती व् महिला के शाब्दिक झमेले में न पड़ें , मतलब विवाह योग्य से है.)
                           वैसे इस पति स्टोर की अनिवार्य शर्त यही है कि किसी मंजिल पर एक ही विवाह इच्छुक अपने पति का चुनाव कर सकती है.वहाँ से वापस किसी दूसरी मंजिल पर नहीं जा सकती .उसे सीधे बाहर ही निकलना होगा.
शादी करने की इच्च्छुक एक महिला उस स्टोर में गई.पहली मंजिल में लिखा था-" इन पुरुषों की नौकरी है और वे भगवान पर विश्वास रखते हैं.दूसरी मंजिल की तख्ती-इनके पास नौकरी है,भगवान पर विश्वास है और ये बच्चों से प्यार  करते हैं.तीसरी मंजिल की तख्ती पर लिखा था फ्लोर थ्री -यहाँ रखे गए पतियों की नौकरी है ,भगवान पर विश्वास करते हैं ,बच्चों से प्यार करते है और बेहद सुन्दर है.
                           अरे वाह!विवाह की आकांक्षा रखने वाली वह महिला सोचने लगी.फिर पल भर में उसके मन में विचार आया ," क्यूं न अगली मंजिल में जाकर देख लूं! वह अपने मन के लालच को रोक न सकी.चढ़कर वह सीधे चौथी मंजिल पर पहुंची.चौथे मंजिल की तख्ती में दर्ज था ,इन पुरुषों के पास नौकरी है ,भगवान पर विश्वास ,बच्चों से प्यार, बेहद सुन्दर हैं और घरेलू कामकाज में मदद भी करते हैं.
                  " ओ माई गाड..!कितनी ख़ुशी की बात है वह महिला सोचने लगी लेकिन दूसरे ही पल उसके मन में ख्याल आया ,"  क्यूं न अगली मंजिल में जाकर देख लूं !" मिनटों में वह पाचवी मंजिल पर थी . वहाँ भी थी एक तख्ती.वह पढने लगी ,-फ्लोर नंबर पांच के हाल में मौजूद पुरुषों के पास नौकरी है,भगवान में विश्वास ,बच्चों से प्यार,खूबसूरत है ,घरेलू कामकाज में मददगार है ,एक और खासियत यह की ये बेहद रोमांटिक तबीयत के हैं.."
                      उस महिला के मन में उसी फ्लोर पर रुकने का ख्याल  आया.पर ये दिल है  के मानता नहीं! थोड़ी ही देर में वह छठवी मंजिल पर पहुँच गई.तख्ती यहाँ भी लटक रही थी." फ्लोर सिक्स -आप इस फ्लोर पर आने वाली -899989 वी महिला है.इस मंजिल पर जो हाल है वहाँ पर एक भी पुरुष नहीं है.यह फ्लोर इस बात का सबूत है कि महिलाओं को खुश रखना असंभव है.आपको हसबेंड स्टोर में आने का शुक्रिया.बाहर  निकलते समय आप अपने कदम के बारे में सोचें .आपका दिन शुभ हो.
                      अब बताओ अखबार नवीस! क्या ख्याल है? दद्दू ने फिर चहककर पूछा. देखो दद्दू! संतुष्टि अपनी जगह पर है लेकिन महत्वाकांक्षा अपनी जगह पर.क्योंकि-  AMBITION IS NOT A WEAKNESS UNLESS IT IS DIS-PROPORTIONATE TO THE CAPACITY .TO HAVE MORE AMBITION THAN ABILITY IS TO BE AT ONCE WEAK AND UN-HAPPY.
                        ददू मेरी बात से सहमत थे.बोले-अखबार नवीस... मानता हूँ तुम्हारी बात को ... प़र भूल से भी अगर यह किस्सा लिखोगे तब एक बात जरूर वहा पर दर्ज कर देना---
संवैधानिक चेतावनी...महिलाओं के हसबेंड स्टोर वाले किससे के बारे में घर पर ( अपनी भाभीजी से  ) चुगली नई करने का क्या!!!!!!!
                            शुभ रात्रि.. शब्बा खैर... अपना ख्याल रखिए...
                                                                                      किशोर दिवसे
                        

महंगाई डायन खाए जात है!!!!!!

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 महंगाई डायन खाए जात है...
दोस्तों .. महंगाई डायन खाए जात है. ह़र बन्दा इस हकीकत  को भुगत रहा है.अपने -अपने घरों में बैठकर हम सब बेतहाशा कोस लेते हैं महंगाई को.जन-जिहाद का कहीं पर नाम-ओ- निशाँ तक नही है.आज सुबह से इण्डिया टीवी ने इस मुद्दे को खूब उभारा है. कागजी शेर बने सामाजिक संगठन मिलजुलकर महंगाई के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते क्या? मुझे  धार्मिक आस्था से कोई परहेज नहीं लेकिन  अपने भारत का यह दुर्भाग्य है कि  यहाँ पर मंदिरों में भगदड़ मचती है और सौ से अधिक लोग मर जाते है. ऐसा कई बार हुआ है. महंगाई जैसे भीषण मुद्दे पर समाज "जिन्दा लाशों का समूह बनकर कानों में अंगुलिया डाले बैठा रहता है.
     सरकारों का हाल ये है कि-      चाट  समझ फिर चाट  जाओ देश को
                                               ,आप खाओ और बच्चों को खिलाओ देश को
                                             दूर मंडराते रहे आकाश में फिर एकदम ,
                                                      इक झपट्टा मार पंजों में दबाओ देश को
                                              भाषणों की भस्म नारों की शहद में घोटकर
                                                       ,देश बीमार बतलाकर चटाओ देश को
मुझे लगता है कि सारे  गाँव ..शहर  के लोगों को इस मुद्दे पर शालीन तरीके से सड़कों पर आना चाहिए. समाज के सारे तबके के लोग महंगाई के खिलाफ निजी और सांगठनिक तौर पर अपने विरोध का खुला इजहार करे. इन्टरनेट के चिटठा जगत ... चौपालों पर भी इसपर अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज क़ी जाए . और तो और खुला हस्ताक्षर अभियान  भी चलाया जा सकता है. आप खुद भी सोचिये कि जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से आप महंगाई का विरोध कैसे कर सकते है?सोचिये   क्या ऐसे मुद्दों पर जनता का सामूहिक हस्तक्षेप जरूरी नही? उठिए... अब यह जागकर अपने जिम्मेदार होने का सुबूत देने का सही वक्त है...