शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

परिवर्तन है नए वर्ष का सन्देश

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तारीख -३१ दिसंबर
वक्त  दोपहर   ( शाम के बाद समय नहीं मिलेगा इसलिए)
ह़र किसी का अपना अलहदा अंदाज होता है बीते बरस को अलविदा कहने का.वर्ष २०१० की विदाई और २०११ का  स्वागत करने प्लानिंग अमूमन पहले से ही हो जाया करती है.कईयों ने सोचा की आउटिंग कर ऐश करे और रात दारू-शारू के साथ मजे लें. नव- धनाढ्यों  का कुनबा बड़ी होटलों में साल की विदाई पार्टी के साथ "रात रंगीन " करने शराब -शबाब के पॅकेज डील कर चुका होता है.बीते बरस भी ३१ की रात को सुरूर में पहले तो तेज रफ़्तार सडको पर कुछ नौजवान घूमे फिर उनमें से कुछ अस्पताल में भी नजर आए.
                        वर्ष २००९ की रात को भी बारह बजे शहर जवान हो कर मस्ती में बल्ले-बल्ले कर रहा था. अपनी- अपनी सोच और नसीब के चक्कर में बीते साल की विदाई का अंदाज भी मजदूरों, मिडिल क्लास और रईसों की तकदीर- तदबीर के पारदर्शी अक्स दिखा जाता है.कहीं खुशी .. कहीं गम ...कहीं जोश-ऍ- जूनून तो कहीं झुंझलाहट नजर आती है.रात में टीवी के सामने " हात एंड मसाला कार्यक्रमों को देखने वालों का तबका भी होता है.युवा होस्टलों में जश्न का अलग अंदाज तो जिनकी एग्जाम चल रही है वे थोडा  सा एन्जॉय कर ज्यादा टाइम खोटी नहीं करना चाहते.
                               आज रात भी यही सब होगा . पिछले बरस अपने दद्दू ने टिप्पणी कीथी ,"दोस्त! बाजार और नई हवा के इशारे पर ही सही लोग अब अवसरों को बिंदास तरीके से जीने की जीवनशैली अपना चुके हैं.यह बात अलग है ki जिंदगी में मिली सौगातें अपने-अपने पुरुषार्थ और नसीब का मिला-जुला फलादेश है.कुछ लोग नए वर्ष पर जश्न के साथ कोई रिसोलुशन भी लेते हैं . हाँ! कौन निभाता है कौन नहीं यह अपनी जिद की बात है.
                           " संकल्प के लिए नए बरस की शुरुआत की मोह्ताज्गी क्यों ? क्या हम साल भर उत्सव की तरह नए  संकल्पों के साथ नहीं मना सकते? "क्यूँ नहीं!नए वर्ष का सन्देश है परिवर्तन.हमसे जुडी  व्यवस्थाओं के प्रति जाग्रति,सच्चे ज्ञान ,प्रेम और खुशियाँ बाटने का संकल्प  कर हम साल भर उसपर अमल कर सकते हैं.रात गई, बात गई कहकर एक दिनी हुल्लड़ और अय्याशी से कुछ नहीं होने का.फिर भी टेंशन भरी जिंदगी में हम लोग फुल -टू मनोरंजन का कोई भी मौका नहीं चूकते..चूकना भी नहीं चाहिए.
       बीते बरस की विदाई और नए वर्ष के स्वागत को एक दिनी जश्न मानने वालों के अलावा बच्चे से बूढ़े तक के लिए नए वर्ष का समूचा अजेंडा  गुरुदेव रवीन्द्र नाथ  टेगोर की " गीतांजलि" में इन पंक्तियों से प्रतिध्वनित होता है-
                                जहाँ पर मस्तिष्क हो निर्भय,
                                  और भाल सदा गर्वोन्मत्त
                                  जहां  हो ज्ञान का मुक्त भंडार,
                                 जहाँ न हो विश्व विभाजित
                                  संकीर्ण सरहदी दीवारों से
                                    जहाँ सदा जन्म लें अक्षर
                                  ध्रुव सत्य की कोख से
                                 जहाँ अनथक  परिश्रम आतुर हो
                                  उत्कर्ष का आलिंगन करने
                                    जहाँ निरंतर प्रयोजन के स्रोत
                                   स्वार्थ मरू में न हो गए हो लुप्त
                                     जहाँ मेधा इन सत्य पुष्पों से
                                    सदैव हो परिचालित,विचारवान
                                     मेरे पिता!जागने दो मेरे देश  को!
चलिए छोड़िए.... बीते बरस की विदाई में जुट जाएँ  अपने- अपने तरीके से.कल सुबह कोई मंदिर जाएगा  भगवान से आशीर्वाद लेने ... आराध्य  से नया वर्ष सुखद होने की कामना करेंगे.कोई देर सुबह तक उनींदा सा होगा. आप सभी मेरे अपने है. सो .अपनी प्रिय मित्र संज्ञा टंडन का मेरे मोबाइल पर आया यह सन्देश आपतक पहुंचाकर नया वर्ष खूब प्यार और खुशहाली भरा होने की कामना इन शब्दों में करता हूँ
                             क़ल जब किस्मत बटेगी तब ४ इक्के आप के हाथ लगेंगे ----1111  आगत वर्ष की तारीख़ - 1-1-1-1
                                     खुश रहिए ... खुश रखिए...और अपना ख्याल रखिएगा...
                                                                             किशोर दिवसे
                                                                               मोबाईल -09827471743                              
                                      
                                    

                              
                          

                                                            

रविवार, 19 दिसंबर 2010

दुम मरोड़ने का शुक्रिया

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राहुल भाई ,वर्तनी में भद्दी चूक ब्लॉग के ट्रांसलेटर से  रोमन स्क्रिप्ट के जरिए कम्पोज करते वक्त हड़बड़ी में हो जाती हैं. आइन्दा ख्याल  रखूंगा.  ब्रज किशोर सर जी, आपने ठीक कहा,कुछ जगहों पर कुछ चीजें बची हैं अभी. सवाल यह है कि उन्हें सहेजने पर कब कौन कैसे सोचता है. वैसे सर जी,ऐसी परम्पराओं का आवेग कर्नाटक में ही नहीं दीगर कई राज्यों में भी नजर आ  रहा है. छत्तीसगढ़ में भी व्याप्त कुछ कुप्रथाओ पर प्रिंट मीडिया ने बाखबर करने का काम किया है.चैनल वाले यहाँ अभी कुछ लो प्रोफाइल  पर है.हाँ...कब कौन से टीवी चैनल वाले किस मोमेंट को सनसनी के नाम पर अपना हिडन एजेंडा बना लें क्या भरोसा?

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

उनके नाम पर छी... उनके नाम पर थू.!!!!!!!!!!

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     १३ दिसंबर के हिन्दुस्तान टाइम्स में एक रिपोर्ट पढ़ी थी.शनिवार को कोई चैनल भी इसे जोर-शोर से दिखा रहा था. इस रिपोर्ट के मजमून ने रोंगटे खड़े कर दिए.हालाकी हमारे यहाँ कुछ परम्पराएं अच्छी है पर कुछ इतनी हद दर्जे की वाहियात है की उन्हें समूल ख़त्म करने पर समाज जब सोचने की भी जहमत मोल नहीं लेता तब जबरदस्त कोफ़्त  होती है.
                    दक्षिण कर्णाटक के कुक्के सुब्रमनियम मंदिर का नजारा दिखाया जा रहा था चैनल पर.४०० बरस से यह परंपरा जारी है.केले की पत्तियों पर ब्राह्मणों की जूठन पर दलित समाज के गरीब लोट रहे थे.आम मान्यता यह है कि ऐसा करने से उनके शरीर से चर्म रोग दूर हो जाएँगे..हालाकी कुछ संगठनों ने इसका विरोध किया लेकिन बात नहीं बनी.कहना है क़ि इस कुकर्म में सभी समाज के लोग शामिल होते है.मायावती इस कुप्रथा पर प्रतिबन्ध चाहती है लेकिन मंदिर प्रबंधन का दावा है कि वे दबाव नहीं डाल सकते.यह मंदिर यूं पी सरकार के मुजराई विभाग के अंतर्गत है.विभाग के मंत्री वी एस आचार्य के मुताबिक यह आस्था का मामला है, हम कुछ नहीं कर सकते.सुब्रमनियम मंदिर बंगलूरू से सिर्फ ३० की मी दूर है , जो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हब है.
                       कुपराम्पारा से जुदा एक कथानक- सुब्रमनियम ने सर्प देव वासुकी को शरण दी जो कुक्के की गुफामें गरुड़ के आतंक से बचने जा छिपे थे.रोचक तथ्य यह है की सर्प दोष दूर करने यह पर सर्प संस्कार किया जाता है.अनेक ही प्रोफाइल लोग यह आ हुके है जिनमें अमिताभ बच्चन और शिल्पा शेट्टी भी शामिल हैं.शुक्रवार को जब रस्म अद्द्य्गी हो रही थी तब विरोध के स्वर बुलंद भी हुए थे. अब आस्था को हौवा बनाकर आखिर कब तक यह शर्मनाक तमाशा चलता रहेगा और समाज कब तब इसे बर्दाश्त करेगा - परंपराओ के नाम पर , यह सोचने का दारोमदार भी समाज के धार्मिक मठाधीशों और शिक्षित  युवा फ़ोर्स पर है, ऐसा मुझे लगता है. इस बारे में आप क्या सोचते है, बताइयेगा. आज बस इतना ही.
                                                         अपना ख्याल रखिए...
                                                                                   किशोर दिवसे.

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

मैं नाना बन गया...

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    .मेरे प्यारे दोस्तों ,
काफी वक्त बाद आपसे रू-ब-रू हो रहा हूँ.दरअसल मैं नाना बन गया हूँ.बेटी सपना ने बेटे को जन्म दिया हैपिछ्ली  ३ तारीख़ को. व्यस्त था सो आपसे बात नहीं कर पाया. नन्ही जिंदगी के साथ वक्त बिताना अपने और अपने बच्चे के भी बचपन की तमाम यादों के दरीचे को पलटना सा लगता है. नाना बनने का रोमांच अपने साथ न जाने कितनी जिम्मेदारियों का एहसास करा जाता है. याद आ जाती है अपने नाना -नानी के दौर की बाते जो हमने जी थीं . आज जब खुद नाना बन गया हूँ तब लगता है जिंदगी न जाने कितनी करवटें ले चुकी है. खैर , यह तो नियति है ... जन्म चक्र इसी तरह चला करता है.कुल मिलाकर एक ट्रांस महसूस कर रहा हूँ इन दिनों. फिर भी जल्द ही बातचीत शुरू करूंगा.
                                                                      आपका
                                                                                किशोर दिवसे

सोमवार, 29 नवंबर 2010

दिल में मेरे है दर्दे डिस्को... दर्दे डिस्को...दर्दे डिस्को.

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दर्दे दिल दर्दे जिगर दिल में जगाया आपने
पहले तो मैं शायर था आशिक बनाया आपने
कुछ इधर की कुछ उधर की.. पर चर्चा के दौरान विविध भारती में बज रहे इस रोमांटिक गीत पर एकाएक हम दोनों का ध्यान एक साथ गया.सुनहरा मौका ताड़कर दद्दू तपाक से बोले, " यार अखबार नवीस !ये मुहावरों की दुनिया भी कितनी निराली होती है?"
"हाँ...बात तो पते की है और मुहावरे भी जिंदगी के रंगों की ओर इशारा करते हैं .क्या तुम इस वक्त मुहावरों को किसी खास नजरिए से देखना छह रहे हो ?  "इशारा समझकर  भी मुद्दे की बात मैं दद्दू के मुहं से सुनना चाह रहा था." मैं सोच रहा था फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी गीतों की तरह दिल के कितने करीब हैं ये मुहावरे ?दद्दू ने बात कुछ और साफ की.
          दिल का मामला .. दिल से दूर...दिल में चोर...दिल हिला देना...पत्थर दिल...आदि-आदि.फेहरिस्त का पहला पन्ना मैंने दद्दू के सामने खोलकर कुछ इबारतें पढ़ीं." हाँ ssss   अख़बार नवीस किसी का दर्द महसूस कर दिल रो पड़ना ...दिल तोडना ...शेर दिल.. बुझ दिल...दिल भर कर रोना भी दिल से जुड़े बेहतरीन मुहावरें है." दद्दू ने दिल से जुड़े मुहावरों की फेहरिस्त से कुछ और इबारतें पढ़ीं.
                   " अंकल...दिल से जुडी फिल्मों के नाम बताऊँ ? पप्पू अचानक बीच में टपक पड़ा.जैसे ही उसने नाम गिनाना शुरू किया -दिल वाले दुल्हनिया ... दिल से ... दिल में मेरे है दर्दे डिस्को..मैंने उसको टोककर कहा ,"" ओये .. चुप कर यार !तुम लोग आपस में जब दोस्तों के साथ बैठोगे तब इस दिल के मामले पर बतिया लेना.हम लोगों की बातचीत सुन रही बबली भी कहाँ खामोश रहने वाली थी? बोली ," अंकल आज हम सब सहेलियां मिलकर एक ऐसी कम्पीटीशन करेंगे जिसमें सभी गाने "दिल" से शुरू होंगे..इतना कहकर वह फुर्र हो गई.इसी बीच एक नए गीत के बोल गूंजने लगे थे.
             दिल है के मानता नहीं...
दिल की बात जुबान पर ... लाने के बाद कोई किसी को दिल दे बैठता है.अगर दो दिल मिल रहे हैं ... तब तो ठीक है वर्ना दिल छोटा करना मजबूरी बनकर सामने आ जाता है.
 दिल की ये आरजू थी कोई दिलरूबा मिले.  ..         ...
भटको मत... लौट आओ दद्दू,हम लोग दिल से जुड़े मुहावरों की बात कर रहे हैं.दद्दू अपनी दुनिया में लौट आए और कहने लगे "अंग्रेजी में दिल यानी heart  से जुड़े मुहावरें कई हैं.Bleeding heart   ...Be at heart ... Bare your heart  और भी कई हैं लेकिन अपने दद्दू ह़र  किसी को यही सलाह देते हैं   Never break anybody's heart  .
                           दिल की बात सुने दिलवाला...
ओल्ड इज गोल्ड- पुराना फ़िल्मी गीत याद करते हुए नौजवान दोस्तों की चकल्लस का ख्याल हो आता है.बंटी अपने फ्रेंड से कह रहा था," Be a lion hearted yaar!!!!"   दो सहेलियां आपस में एक-दूसरे की प्रशंसा कर रही थी,"  You have a heart of gold dear!... You too....!
                मेरे कालेज की डायरी के पन्नों में दबा हुआ है एक सुर्ख गुलाब का फूल.नीचे एक इबारत लिखी है," दिल क्या चीज है आप मेरी जान लीजिए ..." दद्दू के हाथों में जब एक रोज डायरी लगी थी तब मुस्कुराकर बिना कुछ पूछे बहुत कुछ समझ गए थे ...
                           खैर ... दद्दू एक बार फिर समझाइश देने के मूड में आते है." अख़बार नवीस ! मुझे लगता है इंसान का साफ दिल और रहम दिल होना जरूरी है.वो शख्स इन्सान ही नहीं जो पत्थर दिल हो.बचपन में माँ का का दिल वाली कहानी सुनी थी, याद है?रूठे दिलों को कैसे भी कर मना लीजिए.आपके शब्द ऐसे हों जो किसी के भी दिल पर लगे जख्मों पर मरहम का काम करें.बेंजामिन फ्रेंकलिन ने कहा है," The heart of a fool is in his mouth but the mouth  of wise man is in his heart."
                        अब आप अपने दिल पर हाथ रखकर कही के कभी कोई काम अधूरे दिल से नहीं करेंगे.ह़र काम होगा पूरे दिल से....!सिर्फ सिल से जुड़े मुहव्रेपधने और समझने से कुछ नहीं होगा.एक बात चलते-चलते आपके यानी मेरे अपनों के लिए कह रहा हूँ -- छोडी ज़माने की बात... दिल की बात समझी वर्ना हम तो आपके लिए यही कहेंगे -
                                  तुम ज़माने की रह से आए
                                 वर्ना सीट था रास्ता दिल का
                                                                                                    किशोर   दिवसे                                                                   
                      
          
                          

 .

रविवार, 28 नवंबर 2010

मेरे घर आई एक नन्ही परी....

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कुलच्छनी  ... फिर उसने एक बेटी जन दी.....मर क्यूँ नहीं गई ... अच्छा होता कि बाँझ ही रह जाती....बूढी सास हम उम्र महिला के पास अपनी भड़ास निकल रही थी.
अरे...तेरी लुगाई ने तो नाक कटा दी खानदान की...करमजली ने फिर बेटी पैदा की.तेरा खानदान चलाने  मैं तो तेरा दूसरा ब्याह कराने की सोच रही हूँ...!
कालचक्र को पूरी रफ़्तार से घूमना था ,सो घूमता रहा और आज ... पहली बेटी ,दूध रोटी... बधाई हो.... घर में लक्ष्मी आई है-बेटी जन्मते ही दाई ने अहाते में टहलते शुक्ल जी को बधाई दी और अपनी आँखों के भीगे कोरों पर पल भर के लिए अपना तहबन्द रूमाल रखकर वे जरूरी कामकाज में लग गए थे.
                       मुस्कुराती कली से आहिस्ता -आहिस्ता बनता फूल...खेतों में लहराती बालियाँ ...कुलांचे भरती हिरनी...तपती धूप में मंदानिल...मंदिर या गिरिजा की घंटियों के स्वर और मस्जिद की अजान या गुरूद्वारे के शब्द कीर्तन की शुचिता इन सभी भावनाओं को अगर किसी शरीर में बंद कर आपके सामने रख दिया जाए तो यकीन मानिए एक बेटी ही होगी आपके सामने.यादों के दरीचे खुलकर आपके कानों में आवाज गूंजेगी ...पापा ...पापा....लोरी सुनाओ ना...लल्ला.. लल्ला  ..लोरी ...दूध की कटोरी...दूध में बताशा...!!!
                                             मेरे घर आई एक नन्ही परी ....रेशमी बालों के नीचे काला टीका छुपाकर माथे पर थप्पी देकर सुलाते हुए मां के उन शब्दों में दिन को कतरा-कतरा पिघलते देखा है.दूज के चाँद और पूर्णमासी की चमकती-दमकती थाली तक पल-पल बढती चंद्रकलाओं में कभी अपनी बेटी का चेहरा देखना .... अद्भुत सम्मोहन है इसमें.
                                  "क्यों जी... !सासूजी कह रही थीं घर में सिर्फ बेटियां हैं .बेटे  के बगैर अपना खानदान कैसे चलेगा?
"देखो!आज के ज़माने में बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं है.अख़बारों में पढती नहीं तुम,बेटियां शोहरत की बुलंदी पर है..जानती नहीं तुम...अब तो बेटियां भी बाप की अर्थी को अपना कन्धा देकर मुखाग्नि तक देने लगी हैं..बंद कमरे का यह संवाद अब खुला सच है.    "पर ...कभी आपके मन में ऐसा तो नहीं लगता की काश अपना कोई बेटा होता!
"पगली !...बेवकूफ हैं जो इस बात पर कुढ़ते रहते हैं .आखिर छोटे भाई  क्या बेटे जैसे  नहीं होते?दुबे जी की बेटी नहीं है.वह पड़ोसन पण्डे भाभी  की बेटी को देखकर खुश हो जाती है.दूबाइन के बेटे कहाँ घर के कामकाज में हाथ बताने वाले,लेकिन पण्डे भाभी की बेटी को घर का सारा कामकाज संभलकर पढाई और खेलकूद में अव्वल देखते हुए मन भर जाता है.
                                बेटी के न होने का दुःख उनसे पूछिए जिनकी बेटी को क्रूर काल ने छीन लिया हो.ऐसे माता-पिता की आँखों में झांककर देखिए .उनकी सूनी पुतलियों में अब भी उस खो गई बेटी का आंसुओं से भरा चेहरा दिखाई देगा.अंगुलियाँ पलकों तक पहुंचे बगैर नहीं रह सकेंगी.
                                     "चलो नर्सिंग होम में चलकर जांच करवा लेते हैं,यदि लड़का है तो ठीक वर्ना ...!सोनोग्राफी क्लिनिक में परीक्षण करवाने पहुंचे युवा दम्पत्तियों की देह भाषा को ताड़ने में जरा भी वक्त नहीं लगता.यही वजह हैं की स्त्री-पुरुष अनुपात बिगड़ गया है..इसका खामियाजा सामाजिक समस्या के रूप में हम सबके सामने है.आपरेशन थिएटर में रक्त रंजित मांस का लोथड़ा देखकर अजन्मे नारी भ्रूण का करुण क्रंदन मेरे मन को छलनी कर देता है.मानो चीखकर वह कह रहा हो,"नहीं मत मरो मुझे..मैं निर्दोष हूँ... अपने पापों की सजा मुझ बेगुनाह को क्यूँ दे रहे हो??
          कन्यादान का सुख बूढ़े मां -बाप के लिए अनिर्वचनीय है.अपने ज़माने का एक पुराना गीत दिमाग के किसी कोने में उभरता है..बाबुल की दुआएं लेती जा ,जा तुझको सुखी संसार मिले.."बेटी पराया धन है... हम तो बेटी के घर का पानी तक नहीं पीते ... पुरानी मान्यताएं बदल चुकी हैं अब.विदाई की मार्मिक बेला में आंसुओं की बरसात का सच शाश्वत है.खूँटी पर टंगे उस कुरते पर अनायास ही नजर पड़ती है और आंसुओं के उस सैलाब को तलाश करने लगता हूँ जब दद्दू अपनी बेटी को बिदा करने के बाद मेरे सीने से लगकर फफक-फफक कर रोए थे.
                             बेटी को संस्कारित करना एक पूरे परिवार को संस्कारवान बनाना है.क्योंकि बेटी ही एक पृथक परिवार की बुनियाद है. MEENENDAR    ने कहा है,"बेटी पिता के लिए आकुल्कारी एवं जटिल वैभव है."यूरिपीदिस  भी दुहिता के वात्सल्य से अभिभूत है."बूढ़े होते माता पिता के लिए बेटी से प्रिय कुछ भी नहीं." बेटे जोश का ज्वालामुखी होते हैं परन्तु मिठास भरे प्रीतिकर अनुराग का दूसरा नाम है बेटी."
                        अंग्रेजी की पुस्तक पढ़ते पढ़ते अनायास ही दर्पण में अपने ही चेहरे पर दृष्टि पड़ती है.यह क्या..मेरे चेहरे पर यीट्स का मुखौटा!अँगुलियों के स्पर्श भी बेंमानी हो जाते हैं जब विलियम बटलर यीट्स की कविता के सम्मोहन में कोई भी पिता खुद को यीट्स समझ बैठता है.२६ फरवरी १९१९   को अपनी बेटी के जन्म पा पिता यीट्स की कविता " A PRAYER FOR MY DAUGHTER"     के भाव कुछ इस प्रकार हैं -
                                     " पालने में सोई है बेटी और बाहर चल रही है तूफानी हवाएं .बाहरी तूफ़ान मेरे  मन के भीतर है.कैसे बचाऊँगा   तूफानी हवाओं से उसे....जीवन के तूफानों का किस तरह करेगी वह सामना?मेरी बेटी इतनी खूबसूरत न हो की शिष्टाचार भूल जाए.वह हरा -भरा फलों से लदा पेड़ हो.ऐसा वृक्ष हो जिसकी जड़ें भी गहरी हों और वह जमीनी सचाइयों को पहचाने.वह अति सौन्दर्य वती हेलेन  आफ ट्राय की तरह नहीं हो जिसकी वजह से युद्ध हुआ और जिसने एक लंगड़े से शादी  की.वह सही-गलत की पहचान कर सके और बुद्धि जीवियों की नफरत उसके मन में न समाये.अमीरी की अकड और मिथ्या
 वैभव से मेरी बेटी दूर रहे.वह उस लेनेट पक्षी (चटक )की तरह बने जो तूफानों में भी गीत गाता है.और...जब उसका ब्याह हो उसे ऐसा जीवन साथी मिले जो उसे मकान  नहीं ऐसा आशियाना डे जहाँ पर संस्कार और परम्पराओं का खजाना हो.
                                         अचानक ही तेज हवा का एक झोंका आता है और मेरे गले से दो बाहें आकर लिपट जाती हैं.-"पापा मैं कालेज जा रही हूँ...बाय  ..ठीक है ...टेक केयर ... कहकर मैं खामोश हो जाता हूँ.पड़ोस में क्लास फिफ्थ में पढने वाली बिटिया आकर कहती  है ," अंकल जी... अंकल जी...देखिए न ..अच्छी बेटी दूध रोटी पर मैंने एक कविता  लिखी है." पप्पू  टीवी का स्विच आन करता है और गूंजने लगता है सोनू निगम का गया एक मीठा -मीठा गीत-
                     चंदा सी डोली में ... परियों की झोली में शहजादी आई मेरी.....
                                             शुभ रात्रि ...शब्बा खैर ...  अपना ख्याल रखिए...
                                                                          किशोर दिवसे
                                                                           MOB.०९८२७४७१७४३

                                                                        
                                  

बुधवार, 24 नवंबर 2010

इश्क कीजै फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है ....

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न जाने क्यों अपने देश में सहज प्यार पर सेक्स की दहशत सवार होती है!सौन्दर्य की उपासना या आसान से दोस्ताना रिश्ते या तो सहमे हुए होते हैं या फिर उस प्रेम के भीतर "आदिम भूख "चोरी छिपे सेंध लगाने लगती है.दरअसल शुरुआत ही गलत होती है.प्यार और सेक्स को अलग रखकर सोचा  ही नहीं जा रहा है.इसलिए घरेलू रिश्ते तो घबराहट की सीमा में नहीं आ पाते लेकिन बतौर प्रशंसा दर्शाया गया प्यार भी रिश्ते की तलाश करने की हड़बड़ी पैदा कर देता है.आसन सा जुमला है इन दिनों कहने के लिए ,"बड़ा ख़राब समय है "लेकिन कुछ हद तक भरोसे के संकट के इस दौर में स्त्री-पुरुष का हर आयु वर्ग असुरक्षितता की भावना के जबरदस्त चक्रवात में उलझा हुआ है.
            चलते-चलते यूँ ही किसी कार्ड गैलरी में रखे वेलेंटाइन डे के रंगीन कासिदों पर  अपने दद्दू की नजर पड़ते ही उनका दिमाग हरकत में आने लगता है,"यार अखबार नवीस !क्यूँ इतना हौवा बनाकर रखा है ...इतना असह्जपन क्यूँ है?"
                          हम लबों से कह न पाए हाल-ऍ-दिल कभी 
                           और वो समझे नहीं ख़ामोशी क्या चीज है 
जगजीत सिंह के बोल का सम्मोहन तोड़कर मैं बाहर आता हूँ,"दरअसल प्यार के प्रदर्शन को समझने की शुरुआत ही गलत तरीके से करते हैं..... सो स्वीट आफ यु ... आई लव यु...या आई लव यु आल ... चुम्बन या फ़्लाइंग किस भी अपनापन दर्शाने का नव-आधुनिक अंदाज है.यह मात्र किसी की अच्छाई,खासियत के प्रति सराहना का रिश्ते की गहराई के आधार पर व्यक्त किया जाने वाला छुआ या अनछुआ प्रदर्शन है.किसी भी लिहाज से इसे शारीरिक अंतरंगता की हद तक जाकर सोचना मूर्खता होगी."
                           प्यार एक इबादत है..पूजा... एहसास...समर्पण...जूनून... सेन्स आफ अप्रीसिएशन तथा तहे दिल प्रशंसा की अभिव्यक्ति है.यह नामदार रिश्तों से शुरू होकर अनाम रिश्तों को छूती है....ईश्वर की आराधना  कर प्रकृति के अंग -प्रत्यंग को सहलाकर सूफी समर्पण के साथ -साथ समूची मानवता को बाहुपाश में लेता है यही प्यार.तब प्यार का चरम ,सेक्स की दिशा में जाने की बात समझना या ले जाना दिमागी दिवालियापन है.प्यार का सेक्स संबंधों में रूपांतरण विवाह के जायज रिश्ते की जरूरत बन सकता है लेकिन बुनियाद कभी नहीं.
                          बे इश्क जरा आदमी की शान ही नहीं 
                          जिसको न होवे इश्क वो इंसान ही नहीं
यक़ीनन वो इन्सान ही नहीं जिसने इश्क के रंगों को ... उसके अलहदा चेहरों को पहचाना ही नहीं  और न ही एहसास किया."हे री मैं तो प्रेम दीवानी" कहने वाली मीरा का कृष्ण के प्रति समर्पण इश्क का सूफियाना अंदाज है.बुल्लेशाह,ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ,बाबा फरीद,निजामुद्दीन औलिया और कई सूफी संत हैं जिन्होंने कहा,"ईश्वर के प्रति इश्क समर्पण की परकाष्ठा है और कुछ भी नहीं पीड़ित मानवता के दुःख-दर्द का निवारक है यह इश्क.!"
                             इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया 
                               वर्ना हम भी आदमी थे काम के 
गलत है....प्रेम पहले अँधा होता था ,अब नहीं."डोंट फाल इन लव "  बात यूँ होनी चाहिए कि प्रेम कि भावना आपको बेहतर इंसान बनाए,"राइजिंग इन लव".हाँ,वेलेंटाइन डे को अपने दद्दू बिलकुल बुरा नहीं मानते.उनका सिर्फ इतना ही कहना है नौजवान दोस्तों से के "यारों!किसी का दिल मत दुखाना....प्यार का इजहार दिलों को जीतने के लिए होना चाहिए ,दिलों को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं.यह तो किसी के प्रति प्यार दिखाने का महज प्रतीक है इसे शालीनता और अक्सेपटेंस चाहिए ... फूहड़ता या वाहियातपन  या जबरदस्ती नहीं.जरा सोचें कि मिठास भरी यादें मिली या कसैलेपन का अहसास!वेलेंटाइन डे को सिर्फ रूमानी इश्क समझने वालों को यह ख्याल रहे कि,"  It's beautiful necessity of our nature is to love something ".   सच्चा प्यार उन भूतों क़ी तरह होता है जिसके बारे में बातें तो ह़र कोई करता है पर बहुत कम लोग उसे देख ,महसूस और समझ पाते है.
                     मैं भी अपने मन में कभी-कभी यही सोचने लगता हूँ ,"नहीं है मुझे संपत्ति क़ी हवस ... न मैं भूखा हूँ सम्मान का....न खुशियों  में ही हमेशा डूबता रहूँ....मैं तो बस इतनी ही ख्वाहिश रखता हूँ... यही गुजारिश है कि मेरे दिल में इतना प्यार हो कि मैं लोगों को और लोग मुझे हमेशा प्यार करते रहें ... हमेशा... हमेशा...हमेशा...
                             शुभ रात्रि... शब्बा खैर... प्यार सहित...
                                                                                          किशोर दिवसे 
                                                                                         Mob;09827471743    
                                       

शनिवार, 20 नवंबर 2010

मेरी अनूदित तीन पुस्तकें

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१.महान विप्लव-१८५७:    १८५७ के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का घटना क्षेत्र और फलक अत्यंत व्यापक था.आज भी इतिहास का वह दौर पूरी तरह सामने नहीं आ सका है.साम्राज्यवाद के खिलाफ यह दुनिया भर में पहला बड़ा संघर्ष था.--भले इसमें शामिल लोग इसे इस रूप में नहीं समझते  थे.भारतीय इतिहास के उन उथल-पुथल भरे दिनों को ब्रिटिश इतिहास लेखक क्रिस्टोफर हिबर्ट की यह पुस्तक प्रमाणिक व् रोचक  ढंग से सामने लती है.दुर्लभ साक्ष्यों और दस्तावेजों के कारण यह पुस्तक न सिर्फ विशिष्ट है बल्कि १८५७ को जानने के लिए विश्वसनीय स्रोत भी.विराट  घटनाक्रम की रोचक ,पठनीय और महाकाव्यात्मक प्रस्तुति.लेखक:क्रिस्टोफर हिबर्ट .अनुवाद किशोर दिवसे (पृष्ठ -472 ) ISBN :978-81-89868-38-3.मूल्य हार्ड बाउंड -550  /-पेपर बैक -250/-
२.विज्ञानं का इतिहास  ISBN :978-81-89868-37-6.मूल्य हार्ड बाउंड -450  /-पेपर बैक -250/ : मनुष्य  की सोच सकने की क्षमता उसे चिंतन तक ले गई.उसने अपने परिवेश को जानना शुरू किया.प्रकृति और ब्रह्माण्ड के बारे में पारी कल्पनाएँ किन.उसका श्रम उसके भौतिक परिवेश को बदल रहा था.बदला हुआ भौतिक परिवेश उसके चिंतन को अमूर्त परिकल्पनाओं से मूर्त विचारों ,परी वेक्षण ,आकलन और सृष्टि व प्रकृति सम्बन्धी ज्ञान में रूपांतरित कर रहा था.यहीं से शुरू हुई विज्ञानं की कहानी.यह यात्रा समय के अनेक पड़ावों से गुजरती जहाँ पहुंची है --वह उपलब्धियों का एक आश्चर्य लोंक है.विज्ञानं का यह सफ़र सिर्फ कुछ प्रतिभाओं के सिद्धांत और अविष्कार भर नहीं हैं .इसमें सभ्यताओं के द्वंद्व ,संस्कृतियों की विरासत और पीढ़ियों की द्वंद्व और मूल्यों -मान्यताओं का तुमुल है.धर्म-संस्थानों और सत्ता के सियाह गलियारे और बलिदान हैं.यह कहानी उतनी ही रोचक है ,जितनी कोई कहानी हो सकती है..लेखक;पी.एन.जोशी .अनुवाद किशोर दिवसे.(.पृष्ठ 368)   ISBN :978-81-89868-37-6.मूल्य हार्ड बाउंड -450  /-पेपर बैक -250/-

 3..देवदासी -देवताओं की  दासी यानी देवदासी.मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठित देवी-देवताओं की आजीवन  सेवा करना ही उसका कर्तव्य है.देवदासी प्रथा के विषय में अनेकानेक बातें कही जाती हैं लेकिन मूलतः इस कुप्रथा की जड़ें धर्म तथा अंध श्रद्धा में धंसी हुई है.मंदिर और देवदासी के बीच में अटूट रिश्ता है इसलिए प्राचीन काल में देवालयों के देवी-देवताओं की सेवा करने महिलाऐं  आम तौर पर रहती थीं.प्रत्येक देवदासी को देवालय में नाचना -गाना पड़ता था.मंदिरों में बाहर से आने वाले खास मेहमानों के साथ शयन करना पड़ता था.इसके एवज में उसे अनाज या धनराशी,प्राप्त होती थी.इस अमानवीय प्रथा के इतिहास और समाज शस्त्र से मुठभेड़ करती यह पुस्तक इस समस्या के निवारण के लिए कई कारगर पहलुओं को सामने रखती है.लेखक :उत्तम काम्बले.अनुवाद किशोर दिवसे. (पृष्ठ -९६)   .ISBN :978-81-89868-32-1.मूल्य हार्ड बाउंड -150  /
 प्रकाशक :संवाद प्रकाशन ,आई-499,शास्त्री नगर ,मेरठ -250004

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

गाजर अंडा या काफी..आप किस तासीर के हैं

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"मांssssss   जिंदगी में मुझे हर काम इतना कठिन क्यों लगता है ? जो चाहती हूँ उसे हासिल नहीं कर पाती",परेशां होकर संज्ञा ने अपना दुःख मां के सामने रखते  हुए कहा,"माँ  ssss जिंदगी से संघर्ष करते-करते थक चुकी हूँ.ऐसा लगता है के समस्याएँ मेरे लिए ही बनी है इसलिए  ही एक मसला हल होता है दूसरा तैयार हो जाता है."
                  संज्ञा अपनी जिंदगी के झंझावातों से हार मानने  की स्थिति में थी..लेकिन उसे पूरा भरोसा था उसकी मां कोई न कोई राह जरूर दिखाएगी.और हुआ भी यही.... माँ ,संज्ञा को किचन में ले गई.उसने तीन प्यालियाँ लेकर उन्हें पानी से भर दिया.फिर उन तीनों प्यालियों को तेज आंच पर रख दिया .जल्द ही तीनों प्यालियों का पानी खौलने लगा.संज्ञा ने पहली प्याली  में गाजर ,दूसरी में अंडे और तीसरी में काफी के पिसे हुए बीज रखे.जब तक उन प्यालियों का पानी उबल रहा था संज्ञा की मां ने कोई बात नहीं की.
 अमूमन बीस मिनट तक उबलने के बाद स्टोव बंद कर दिया गया.पहली प्याली से गाजर  बाहर निकाले और एक  बाऊल में रख दिए.दूसरी प्याली से अंडे निकालकर उन्हें भी अलग प्याली में रखा .काफी तीसरी प्याली से निकालकर उसे भी अलग रकाबी में रख दी .अब संज्ञा की ओर मुड़कर मां ने पूछा ,"संज्ञा बेटी ! अब तुम ही  बताओ   कि तुम्हे क्या दिखाई दे रहा है"
                 " गाजर , अंडे और काफी" तपाक से संज्ञा ने जवाब दिया.संज्ञा की  मां ने उससे कहा ,"बेटी!जरा नजदीक आकर इन गाजरों को छू कर देखो.उसने ऐसा ही किया.उसे महसूस हुआ कि गाजर अत्यंत नर्म हो चुके थे.फिर माँ ने कहा ,संज्ञा बेटी! यह  अंडा लेकर उसे तोड़कर देखो."अंडे का छिलका निकालने के बाद संज्ञा ने देखा के वह उबलने के बाद सख्त हो चुका था.अंत में मां ने संज्ञा से कहा,"संज्ञा बेटी! , जरा एक घूँट काफी पीकर देखो."मां!कितनी खुशबू और स्वाद है इस काफी में "संज्ञा ने फ़ौरन अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की.
                      " मां    sssss  इन सब का मतलब समझ में नहीं आया  "  संज्ञा ने मंतव्य न समझकर उसे समझने मां के गले में अपनी बाहें डाल दी..  .जिंदगी के अनुभवों की धूप ने संज्ञा की  माँ के सर के केशों में चांदी की रंगत घोल दी थी.मां ने अपने अनुभव की बात कहनी शुरू की, "संज्ञा .... तुम जानती हो तीनों प्यालियों ने एक जैसी विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष किया.यह चुनौती थी खौलने की.फिर भी प्रत्येक ने अपनी रिएक्शन अलहदा तरीके से व्यक्त की.गाजर मजबूत ,सख्त और लिजलिजेपन से मुक्त था.लेकिन गरम पानी में उबलकर वह नर्म और कमजोर हो गया.उबलने से पहले अंडा कभी भी टूटने की स्थिति में था.बाद में इसके बाहरी खोल ने भीतर में मौजूद सब कुछ सुरक्षित बचा लिया.लेकिन उबलते पानी ने इसे अन्दर से एकदम सख्त बना दिया था.वैसे काफी के पिसे हुए बीज चौंकाने वाले रहे.उबलते पानी में रहने के बाद उन्होंने पानी का रंग ही बदल डाला.
                           "तुम कौन हो" मां ने संज्ञा से जब एकाएक पूछा तब वह भौचक थी.संज्ञा को अवाक् देखकर मनन ने उससे पूछा ,संज्ञा!जब विप्रीप परिस्थितियां या जिंदगी की चुनौतियों ने तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दी तब तुमने किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की?गाजर, अंडे या  काफी... किस चीज की तरह तुम्हारी तासीर दिखाई दी?
                             संज्ञा तुम्हें ही नहीं हम सब को इस बारे में सोचना  चाहिए कि इनमें से मैं क्या हूँ!क्या मैं गाजर की तरह हूँ जो बाहर से मजबूत दिखाई देते है लेकिन संघर्ष और विपरीत  परिस्थितियों (गरम पानी )के सामने क्या में लिजलिजा और नर्म होकर अपनी ताकत और मजबूती खो बैठता हूँ?
                             क्या मैं अंडे की तरह हूँ जो सामान्य स्थिति मैं जरा से भी धक्के  से टूट सकता है लेकिन गरम पानी में खौलकर जिंदगी के संघर्ष से जूझकर  सख्त हो जाता हूँ.? क्या मेरी आत्मा द्रव रूप में थी लेकिन किसी की मौत ,दिल पर कोई जख्म लगने पर या आर्थिक परेशानियों अथवा दीगे चुनौतियों का सामना कर अधिक दमदार और मजबूत इच्छा शक्ति का प्रतीक हो गई?
                            इसी बीच मां-बेटी की बातों को गौर से सुनते पर अब तक खामोश बैठे दद्दू बोले,'अरे संज्ञा!आपकी मां ठीक कह रही हैं .हम सबको यह महसूस करना होगा की क्या मेरा बाहरी सोच कुछ और है लेकिन भीतर से मैं कडवा और सख्त हूँ?क्या मेरे विचार कठोर और मन के समय के अनुरूप परिवर्तनशील नहीं हैं? या क्या मैं काफी के उन पिसे हुए बीजों की तरह हूँ ?दरअसल काफी का पाउडर गरम पानी का रंग ही बदल देता है.यानी दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए तब जिंदगी में दर्द ,परेशानियाँ और चुनौतियाँ पैदा करने वाली परिस्थितियां .जब पानी खुलता है मेरा आत्मा ,जमीर या सोच से वह महक ,सचाई ,ईमानदारी और मेहनत की खुशबुएँ उडती हैं .
                           " संज्ञा बेटी!,दद्दू ने उसे समझाया ," अगर तुम काफी की तरह हो तब जिंदगी की कठिन चुनौतियों और विषम परिस्थितियों के बावजूद तुम भीतर से श्रेष्ठतम हो जाते हो और अपने इर्द-गिर्द मौजूद सारी परिस्थितियां अपनी क्षमता से बदलने में कामयाब रहते हो."
                           "हाँ बेटी "... सच कह रहे है तुम्हारे दद्दू चाचा,,"जब कभी समस्याओं या चुनौतियों का घुप्प अँधेरा छाया हो और चुनौतियाँ शिखर छूने लगे क्या तुममें यह क्षमता है की अपने श्रेष्ठतम स्तर पर तुम स्वतः को स्थापित कर सकते हो?
आखिर जिंदगी के संघर्ष को किस तरह की रणनीति बनाकर काबू में कर लोगे?बस....एक ही शब्द में अब आप सभी लोग अपने परिवार केछोटे -बड़े सभी सदस्यों से  पूछिए कि ," आप  की शख्सियत कैसी है-    गाजर, अंडा या काफी........  ??????????


                                                             किशोर  दिवसे 

जिंदगी थी कोई अनारकली.......वक्त बेरहम मुगले आजम था...

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..अब बूढी हो गई हूँ बेटा...क्या पता कब ऊपर से बुलावा आ जाए !बस... एक ही इच्छा रह गई है मन में .बहू की गोद भर जाए और नन्हा मुन्ना आँगन में खेलने लग जाए.ख़ुशी-ख़ुशी आँखे मूँद लूंगी अपनी.ब्याह के बाद बेटे और बहू के सामने अक्सर चुकती उम्र की माताएं कहा करती है.किलकारियों की ख्वाहिश होती हैं हर बुजुर्ग माँ की.
                 शब्द अलग होते हैं पर बातचीत का एक अहम् बिंदु पति-पत्नी के बीच "दो से तीन "होने का ही रहता है.
"देखो जी!अभी-अभी शादी हुई है एकाध दो बरस घूम-फिर लेते हैं.बच्चे की जिम्मेदारी बढ़ने के बाद फिर कहाँ?मान-मनुहार,ना
नुकुर और आपसी मशविरे के बाद "बच्चे का मुद्दा नितांत निजी फैसला बनकर रह जाता है.लेकिन किसी भी वजह से पति-पत्नी के दो से तीन होने की गुंजाईश न रहे तब!
                 "बाँझ कहीं की... करमजली ... निपूती...मेरे बेटे की किस्मत फूटी थी जो तुझ जैसी अभागन गले पड़ी."सास सारा जहर उगलती है अपनी बहू पर .और एक बार नहीं बार -बार .तिल-तिल कर मरने लगते हैं ... नोंच-खसोटकर मर्म को लहू-लूहान कर देते हैं कुनैन में डूबे व्यंग्य बाण. निष्पाप, निरपराध  बहू को न जीने देते हैं न मरने.एक बात है -बंजर जमीन या बाँझ कोख.करुण क्रंदन एक सा है.बीज को गर्भ में रखकर अंकुर न दे सकने वाली भूमि और किसी अभागन की सूनी कोख का..
       बर्ट्रेंड रसल ने कहा है , Marriage is not for the pro-creation of a child but it is to prevent the sin of fornications ."
 कई तरह की व्याख्याएँ हो सकती हैं इसकी गहराई में जाना बेकार है.क्यों न यथार्थ पर सोचें!
        सूनी कोख वाली अधूरी औरत का पति पूर्ण-पुरुष का दंभ भरता है .ऐसे    Male Chauvinist pigs    घोर पर-पीडक भूमिका में आकर छलावा करने लगते है.पहले से ही ऐसी  मानसिकता में जीती औरत के साथ  कई शिखंडियों को मैंने देखा है छद्म-मर्दानगी की जोर आजमाइश करते हुए.औरत के आंसू तो अपने भीतर छिपे सवालों से ही गरम  होकर उबलते हैं.घुटती तमन्नाओं के बारे में पूछने-बताने का गिला-शिकवा भी जिंदगी का एक सच्चा रंग है.गोया--
                      जो तमन्ना थी दिल ही दिल में घुटकर रह गई
                      उसने पूछा भी नहीं ,हमने बताया भी नहीं
नहीं पर यह तो बुरी बात है.पति-पत्नी के पूछने -बताने का सिलसिला चलेगा तभी तो किलकारियां सुनने की उनके क्षणों की आस पूरी होगी!तेजी से बदलता वक्त, विज्ञानं के पंखों पर नए समाधानों के विकल्प लेकर आता है.नहीं, आया भी है.-निःसंतान लोग बच्चे गोद नहीं ले सकते हैं!सवाल सोच और नीयत का है.
                  मैंने देखा है एक ऐसा इंसान....दिन रात शराब के नशे में चूर .निःसंतान होने के दुःख से उबरने का यह कौन सा सोल्यूशन है ? हद दर्जे की काम-अकली है यह.ऐसे लोग बच्चे गोद क्यों नहीं लेते?जिम्मेदारी सम्हालने तथा वाहियात परम्पराओं का  दुर्गन्ध भरा लबादा चीरने की औकात बनाने में पति-पत्नी तालमेल क्यों नहीं बना पाते?औरतों की अधूरी कोख भी उन्हें झिंझोडती नहीं क्या ?अरे!बच्चा तो बच्चा होता है.अपना कोख जना हो या गोद लिया.हाड़-मांस का वह भी और यह भी.मेडिकल साइंस कहता है ... सच भी है " जींस "से माता -पिता और बच्चे में कई शारीरिक या मानसिक गुन  मिल जाते हैं .पर आज की जिंदगी का यह भी एक सच है कि  गोद लिए बच्चे पर भी पालक मां-बाप के अक्स उभरकर अमिट हो जाते हैं.
                        एक लैटिन मुहावरा  है  Nesessitas non habet legen    यानी आवश्यकता के लिए कोई नियम नहीं.स्त्री-पुरुष को पूर्णता का एहसास दिलाने के साथ जिम्मेदारियों के बंधन में बांधता है बच्चा .ऐसी स्थितियों में संतान प्राप्ति का अंतिम विकल्प गोद लेना क्यों नहीं होना चाहिए?विशेषग्य चिकिसकों से भी विमर्श के लिए प्रेरक लोग या संगठनों की  या शिक्षित करने की आवश्यकता है.
                           अजीब और घटिया किस्म के विरोधाभासों से अटा-पटा है  हमारा देश.किसी घर में बच्चों की कतारें.भगवान का आशीर्वाद है बच्चे.. यही कहते है लोग.हलाकि इस सोच में कुछ सुधर आया है फिर भी हद  हो गई बेशर्मी की.करतूत इंसान की और ठीकरा भगवान के सर पर काहे फोडोगे?सड़कों पर भीख मांगते ... जूठन पर पलते ... वासना कांड  और नशे की लत का शिकार होते बच्चे....पर समाज का दिल पत्थर और र्दिमाग फौलाद है.तभी तो कुत्तों के पिल्लै ऐशो-आराम से अमीरों के घर पलते हैं और मासूम अभिशप्त बच्चे कुत्तों से बदतर जिंदगी घिसट -घिसट कर जीते है....गन्दी नाली के कीड़ों की तरह बिलबिलाते . समाज में पाखंड की स्थिति करेले पर नीम चढ़े जैसी है तभी तो संपन्न  धन-पिशाच   धर्म स्थलियाँ बनाने के नाम पर पैसा पानी की तरह बहते है लेकिन समाज के इस नासूर को समाप्त करने के नाम पर बेशर्मी से अपना पिछवाडा दिखाने लग जाते है..समाज की छाती फट क्यों नहीं जाती?क्या समाज के ही "आंखों वाले अंधे "बन  गए लोग अपने लिए भी एब बच्चे को गोद नहीं ले सकते?
                                       काश इन बच्चों को गोद मिलती.सूनी कोख क्या इनके स्नेह से हरी-भरी नहीं हो जाती?एक मासूम की जिंदगी के स्याह रंग घुलकर उसपर हमेशा के लिए सुरक्षा के इन्द्र धनुषी रंगों की मेहराब नही बन जाती?आखिर क्या कर रहे हैं हमारे सामाजिक संगठन?इन बच्चों को गोद लेने के लिए जनचेतना की अलख जगाने वाले कार्यक्रम क्यों नहीं करते?दांत निपोरकर फोटो खिंचवाने और अख़बारों में वाहवाही लूटने वाले "कास्मेटिक संगठनों के लिए किटी पार्टी और फैशन शो अधिक जरूरी है.भाड़ में जाएँ बेसहारा बच्चे.. उन्हें गोद मिले न मिले क्या फर्क पड़ता है!
                           दद्दू इस मसले पर काफी सोचते है.उनका कहना है,"कानून हैं पर इतने जटिल कि लोग परेशां हो जाते हैं प्रक्रिया पूरी करने में.इसे सरल बनाया जाना चाहिए."गोद लिए बच्चो की परवरिश भी अहम् मसला है.किसी बच्चे के मुंह से ये शब्द,"मुझे गोद लिया है न ... मेरी किस्मत में कहाँ  इतना प्यार मिलेगा ... पालक माता  -पिता के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता.फिर भी यह कोई ऐसा मसला नहीं जो हल न किया जा सके.गोद लेने के मामले में समाज  में व्याप्त भ्रांतियां  भी मिटनी चाहिए.अपने ही समाज में आपने और हमने देखा है रक्त सम्बन्ध से पैदा हुए बेटे को पितृ या मातृ  हन्ता बनते.और यह भी देखा है कि  कोई मासूम श्रवण कुमार बनकर माता-पिता के बुढ़ापे को अपने विश्वास की कांवड़ से पार करा रहा है.
                          वैसे तो पति -पत्नी  की जिंदगी अनारकली की मानिंद होती है.लेकिन अगर प्रारब्ध ने आँचल सूना रखकर कोख को रुलाया है तब उस आँचल को थमने वाले पुरुष का यह कर्तव्य हो जाता है की वह संतान गोद ले.जब बच्चा गोद लेकर जिन्दगी को संवारने का विकल्प मौजूद है तब यह शिकायत और कोसते रहना पूरी तरह बेमानी हो जाता है कि -
        जिंदगी थी कोई अनारकली और वक्त बेरहम मुगल-ऍ- आजम था ....
                                                                             मुस्कुराते रहिए... अपना ख्याल रखिए...
                                                                            किशोर दिवसे
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