मेरे अजीज "कलूटा -कुनबे" ( मन के उजले ,तन के काले)सभी साथियों को मेरी प्यार भरी झप्पी । कालेज के पहले साल में पढ़ने के दौरान मुझे अपने काले होने पर इनफीरियारिटी काम्प्लेक्स था। एक जूनियर सखी ने वह दूर किया। अब ज़माना काफी बदल चुका है। फिरभी अपने कलूटा -समुदाय ( मैं भी शामिल हूँ) की हौसला अफजाई करना नैतिक दायित्व तो बनताइच है। सो,अपनों की बात,अपनों के साथ। कम- स- कम हमरंगी साथी तो साथ देंगे ही। बाकी भी अगर मुस्कुराएंगे तो मेरा प्रॉमिस-उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा.-पक्का। -लीजिये,तोहफा क़ुबूल कीजिए
वो तिल बना रहा था , सियाही फिसल गई
उस रोज रेडियो पर किसी कार्यक्रम में बहस चल रही थी काले और गोरे रंग को फिल्म वालों ने किस तरह तरजीह दी है....हिरोइन या हीरो काले क्यों नहीं होते? गोरा रंग ही क्यों अपील करता है...( हालाकि आज के दौर में इस बाबत भी प्रयोग होने लगे है.) फ़िल्मी गीतों में काले -गोरे का इस्तेमाल कैसा किया गया है वगैरह-वगैरह.लोग अपनी राय दे रहे थे और बीच-बीच में गीतों के बोल भी सुनाई दे रहे थे- गोरे रंग पे न इतना गुमान कर ... हम काले है तो क्या हुआ दिलवाले हैं ... राधा क्यों गोरी ,मैं क्यों काला... ये काली कालीऑंखें .. ये गोरे गोरे गाल.... गोरे रंग की नजाकत पर शायरों और लेखकों ने अरसे से लिखीं हैं अनगिनत इबारतें लेकिन बेचारा काला रंग ! उसपर चर्चा करना भी लोग गवारा नहीं समझते.जबकि जिन्दगी के रंगों में इसकी अहमियत जितनी है उतनी किसी अन्य रंग की नहीं..काले रंग के बारे में मन कुछ सोचने लगा था की अचानक दद्दू आ टपके." बात क्या है दद्दू!. काली शर्ट और पैंट भी काली... कोई खास बात !"इससे पहले की वे कुछ जवाब देते मुझे याद आया अखबारवाले ही तो छापते हैं अमुक दिन अमुक रंग के कपडे पहनना शुभ होता है .फिर दद्दू भी अगर इस लहर में बह जाएँ तब कैसा आश्चर्य! "भाई .. शनिवार है नहीं मालूम क्या?नहा धोकर पूजा -पाठ किया और काले तिल, काली उड़द और काले कपडे का दान कर इसी और निकल पड़ा. शनिवार को काले रंग का महत्व है और शनिदेव की प्रतिमा भी तो काली है " दद्दू की बातों से मुझे काले रंग पर चिन्तन के लिए रास्ता खुलता हुआ महसूस हुआ.यों तो दद्दू और मैं दोनों ही " कलूटा समुदाय" के हैं पर खुद को बचाने कई बार सांवला कहकर गौरवान्वित हो जाते हैं .इससे भी अगर मन नहीं भरता तब भगवान के दिए पक्के रंग (रंग न उड़ने की सेंट परसेन्ट गारंटी )को इस शेर के जरिये याद कर अपने समुदाय के बाकि मेम्बरों की हौसला अफजाई भी कर लेते हैं- चेहरा अगर सियाह है तो उनका क्या कसूर वो तिल बना रहा था सियाही फिसल गई गुनगुनाकर ठहाका लगाया ही था कि यकायक दद्दू न जाने क्या सोचकर गंभीर हो गए.मैंने राज जानना चाहा और वे बोले,'कलमकार... डेढ़ बरस पहले मैंने एक घटना पढ़ी थी.किसी टीन एजर बच्ची को काली है कहने पर इतनी कोफ़्त हुई कि उसने आवेग में आकर ख़ुदकुशी कर ली." इससे बड़ी बेवकूफी क्या हो सकती है " मैंने कहा ," काला या गोरा कोई मायने नहीं रखता .सूरत से भी अधिक महत्वपूर्ण है सीरत. गुणों के सामने चेहरे का रंग बेमायने है.कोयल की मीठी कूक हो या स्वर -कोकिला लता मंगेशकर ... काला रंग मिठास या शोहरत की बुलंदी में कहाँ आड़े आया? दद्दू ने हामी में सर हिलाया.बातचीत कुछ और आगे बढ़ी..काला जादू ..काली रातों के डरावने किस्से ...कालिया नाग ... कृष्ण पक्ष..अमावस की काली रात !" अख़बार नवीस!नेत्रहीनों की दुनिया कितनी अँधेरी होती होगी!" दद्दू के मन में कुछ जानने की चाह थी." नहीं दद्दू .. वे चमत्कारिक लोग होते है .बाहर से उनकी दुनिया स्याह होती है पर उनकी अंतर्दृष्टि की जगमगाती रौशनी अँधेरी राह को उजाले से भर देती है." मैंने अपनी बात को वजनदार बनाने फिल्म ब्लैक देखकर उसे महसूस करने की हिमायत भी की. " कारी घटा छाय मोरा जिया घबराय .. काली घटाओं ने गोरी का घूँघट उड़ा दिया ... काली घटाओं से गोरी का जिया घबराने और घूँघट उड़ने का एहसास हम दोनों ने उन गीतों के मुखड़ों से कर लिया था जो हमारी बातचीत के दरम्यान विविध भारती पर बज रहे थे.काले बालों और गोरे गालों का शोख अंदाज इस कव्वाली में बेहतर ढंग से किया गया है- हमें तो लूट लिया मिल के हुस्नवालों ने काले काले बालों ने गोरे गोरे गालों ने गोरे गालों से निगाहें हटकर जब एक पुस्तक पर बनी बापू की फोटो पर पड़ी तब ख्याल आया काले रंग का चर्चा हो और महात्मा गाँधी का जिक्र न आये यह कैसे हो सकता है?काले- गोरे के रंगभेद ... कालो पर अत्याचार मिटाने गाँधी के भागीरथ प्रयास आज कालजयी है.कालों की वैश्विक दुनिया गाँधी के सामने नत मस्तक है. नतमस्तक उन महापुरुषों के सामने भी होने को मन करता है जो हमेशा यह सीख देते हैं की अपने मन के कल्मष (अन्धकार) को दूर करने की चेष्टा करें.काश काले मन को गोरा बनाने के लिए सद्विचारों के फेयर एंड लवली का भी इस्तेमाल करना लोग सीखें .काला अक्षर भैस बराबर मुहावरा सुना है लेकिन इन्हीं काले अक्षरों को पढकर हर इंसान अपनी दुनिया में तरक्की का उजाला भरने में कामयाब होता है .फैशन के दीवाने ब्लैक कास्ट्यूम अब भी बेहद पसंद करते हैं. " क्यों अखबार नवीस ! विदेशों की डिप्लोमेटिक बैठकों में काला सूट पहनकर पहनकर हाई प्रोफाइल शख्सियतें रहती हैं." हाँ इसे ही तो ड्रेस कोड कहते हैं" मैंने कहा.दद्दू यकायक बोले ." दूल्हा कितना भी काला-बिलवा-डामर हो अखबार में विज्ञापन छपवाएगा की दुल्हन गोरी ही चाहिए.वैसे विवाह योग्य उम्मीदवारों को काले रंग नहीं आर्थिक क्षमता और चरित्र पर ध्यान देना चाहिए. बचपन से ही काला धागा .. काला टीका ... काजल की कोठरी काली बिल्ली का खौफ देखते -सुनते आये है .किसी हसीं के गोरे चेहरे पे काला तिल भी तो यूं लगता है जैसे - दौलते हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है! पीने के शौक़ीन अपने लिए बहाना ढूंढ ही लेते है. और अगर काली काली घटायें छा गयी हो तो- पीने का इरादा तो नहीं था मगर ऐ जोश काली घटा को देखकर नीयत बदल गयी बहरहाल काले रंग पर बातचीत के इतने दौर चले तब मंटो की मर्मस्पर्शी कहानी "काली सलवार" को कैसे भूल जा सकता है. कोई पत्थर दिल भी इसे पढकर आँखें पोंछने पर मजबूर हो जायेगा.जितनी जुगुप्सा है काले रंग में उतना ही तिलस्मी है इससे जुडा संसार. हाँ यह भी सच है की काले इंसानों की दुनिया से हीं भावना मिट चुकी है.फिर भी काले रंग से जुडी रोचक बाते अगर आपको मालूम हों तो जरूर बताइयेगा.
मैं खिड़की हूँ …… दोनों और निहारती हूँ कोई बंद कर लेता है जब सोचती हूँ उनके बारे में जो होते हैं कमरे के भीतर पर ठीक उसी वक्त फीडबैक मिलता है मुझे दुनिया के विहंगम,विकल -अविकल विकास और विनाश का भी ! मैं खिड़की हूँ। … समझो तो एक सेतुबंध भीतरी/बाहरी दुनिया के बीच यह तो आपपर है निर्भर जानना और आत्मसात करना - खुली खिड़की का ध्रुव सत्य अगर मन-मेधा की अपने रखोगे खिड़की खुली हो जाओगे पूर्णतः अपडेट समय - सापेक्ष सरोकारों से वर्ना-मैं रहूंगी चिर मौन ! और आप?-ठहरा हुआ पानी! अतः सोचो अपने बारे में मैं खिड़की हूँ। ....
(अपर्णा अनेकवर्णा की भेजी एक पोस्ट के बाद मैंने सोचा-)
चकाचौंध भरे “ कौन बनेगा करोडपति के फ्लोर पर एकबारगी सुखकर्ता – दुःख हर्ता भगवन श्रीगणेश को देखकर कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता महानायक अमिताभ बच्चन खुद भौचक थे .बुद्धि के देवता को अपने आगे पाकर उन्हें अंतर्मन से प्रणाम किया और पल भर में फैसला लेकर दर्शको की ओर मुखातिब हो गए .आम तौर पर स्पर्धा में शामिल लोगो को पसीना छूटता था पर इस बार बात कुछ अलग थी . “ आइये आप और हम मिलकर खेलते है कौन बनेगा करोडपति …..” रौबदार खनकती आवाज़ गूंजी बिग बी की और हॉट सीट पर विराजमान हो गए भगवान .महानायक से जब रहा ना गया तब अपनी चुम्बकीय आँखों की गहराई से झांककर पूछ ही लिया “ सिद्धि विनायक ! आप तो माया मोह से परे है , इस धन राशि का क्या करेंगे ?” लम्बोदर बोले ,”मुझे आवश्यकता पैसो की सारे दुखी जनों की चैरिटी के लिए होगी .” “तो भगवन … बीस हज़ार की राशि के लिए पहला सवाल ये रहा आपके सामने … और शुरू हो गया सवालो का सिलसिला .आखिर हॉट सीट पर भगवन थे .. यानी वी आई पी उम्मीदवार , सो सवालो की शुरुआत बीस हज़ार के पहले प्रश्न से होनी तय थी आडियेंस की तालिया … भाव विभोर दर्शको के उतावलेपन के बीच ही बिग बी बताते रहे की “ कुली “ की शूटिंग के दौरान जब वे ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहे थे तब उन्होंने कितना याद किया था भगवन को ! खैर … सवाल होते रहे - बेरोजगारी , नैतिक मूल्यों के पतन , आबादी विस्फोट ,इंसानी दुनिया के दुखो का हल , आस्तिक - नास्तिक , पाखंड और बाबावाद , छद्म धर्म - निरपेक्षता , और भी कई सवाल . बुद्धि के देवता ने सारे सवालो के जवाब तपाक - तपाक से दिए. ( अन्तर्यामी जो ठहरे )! चेक जमा होते गए और फिर गूंजी बिग बी की सम्मोहक आवाज़ ” आखिरी सवाल … भगवन , जो आपको दिलाएगा सप्त कोटि (सात करोड़) की राशि … हम चाहते है . यह राशि पीड़ित मानवता की सेवा में काम आए .दर्शक हर्षातिरेक से गदगद होकर श्री गणेशाय नमः और कुछ तो आरती करने के मूड में आ गए थे .एक नौजवान जोरो से जयघोष कर उठा ,” गणपति बाप्पा मोरया !” कंप्यूटर स्क्रीन पर भगवन ! सवाल ये रहा आपके सामने - “ दुखी इंसानों का उद्धार करने सबसे सही रास्ता इन चारो में से कौन सा है - ए .नेताओ को ईमानदार बनाए बी . स्वर्ग से देवताओ को बुलाया जाए सी . इंसानों के लिए मोरल सैंस का कम्पलसरी कोर्स और डी. पार्लियामेंट के जरिये मानव समुदाय को सबक सिखाये .आपका समय शुरू होता है अब ….! घडी की सुइयों की टिक टिक के साथ ही बिग बी सोच रहे थे “ सुनामी ,कटरीना ,भूकंप , बाढ़ ज्वालामुखी … ये सब क्या मिनी प्रलय नहीं है ?! और भी प्रलय की जरूरत है क्या ?भगवान् गणेश को सूंड खुजाते विचारमग्न देखकर बिग बी में छिपा एंकर शातिराना अंदाज़ में बोल उठा ,”आप चाहे तो लाइफ लाइन इस्तेमाल कर सकते है … फिफ्टी फिफ्टी , आडियेंस पोल . फ्लिप ऑर फोन ए फ्रेंड . “अमिताभ मै सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से बात करना चाहूँगा ”भगवान् श्रीगणेश ने फोन इ फ्रेंड का आप्शन इस्तेमाल करना चाहा .” ब्रह्मा जी ,कौन बनेगा करोडपति प्रोग्राम से मै अमिताभ बच्चन बोल रहा हू .ब्रह्मा जी ने तत्काल आशीर्वाद दिया “ आयुष्यमान भव”” सृष्टिकर्ता !आज हॉट सीट पर स्वयं मंगलमूर्ति विराजमान है .वे एक सवाल का जवाब जानना चाहते है आपसे .आपका सही जवाब उन्हें दिलाएगा सात करोड़ रुपये जो दुखी जनों का उद्धार करने वे चैरिटी में प्रदान करेंगे .जवाब के लिए आपको मिलेंगे सिर्फ तीस सेकण्ड .अगली आवाज होगी भगवन श्री गणेश की और आपका समय शुरू होता है अब … भगवन से पूरा सवाल सुनकर ब्रह्मा जी ने दूरभाष पर ही विघ्नहर्ता के कान फूके “पार्वती सुत ! आप भी कहा फस गए इन इंसानो के मायाजाल में ? अच्छे भले भगवन के ग्रेड में हो ,सुहाता नहीं क्या ? भूल गए … देवताओ को जब श्राप दिया जाता है तब उन्हें मानव योनी में रहने का दंड पृथ्वी लोक पर भुगतना पड़ता है ?तत्काल ही बुद्धिदाता का माथा ठनका ,” बाप रे !!!! घोर कलियुग में इंसान की जिंदगी जीने का प्रारब्ध ! देखते नहीं मनोकामनाओ की तेज आंच से देवता भी कैसे भागे भागे फिर रहे है ? लोगो ने यही समझ रखा है कि पाप करो , फिर दान पुण्य के बहाने चढ़ावा डालकर धर्मात्मा होने का सर्टिफिकेट ले लो . अमिताभ की कंप्यूटर स्क्रीन पर भगवन श्री गणेश का जवाब उभर चुका था जिसे देखकर वे सात करोड़ का चेक साइन करने लगे थे. .ब्रह्मा जी का गुरुमंत्र पाते ही एकाएक भगवन श्रीगणेश अंतर्धान हो गए .सर उठाकर बिग बी ने जब देखा हॉट सीट खाली थी .इसी बीच फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट स्पर्धा के प्रतिभागियों का फैसला भी हो चुका था .सवाल का जवाब सबसे पहले बजर बजाकर देने वाला जब उठकर आया तब बिग बी ने देखा वीणा की झंकार के साथ ही आवाज गूंजने लगती है .. नारायण … नारायण …!. आडियेंस में बैठे बैठे अखबारनवीस ने साफ़ महसूस किया मुंबई की बाढ़ से महँगी मूर्तिया देखकर भगवन श्रीगणेश का मुख कमल आम आदमी की तरह मुरझा गया है .यहाँ तक कि उनका वाहन मूषक राज भी बेशर्मी से ड़ोंनेशन की मांग करते फलते फूलते कोचिंग सेन्टर और विद्यार्थियों पर चूहे की तरह प्रयोग किये जाने से दुखी था .बिग बी केबीसी के एपिसोड की अंतिम औपचारिकताये पूरी कर रहे थे और अखबारनवीस सोच रहा था “ अगर बुध्हिदाता से कहा जाता की सारी दुनिया का चक्कर लगा आओ जैसी की पुराण कथाओ में हम सबने पढ़ा है , क्या भगवन श्रीगणेश कम्पूटर का गोल चक्कर नहीं लगा लेते ? खैर …सात करोड़ का चेक बिग बी ने कंपनी वालो से बात कर मंदिर ट्रस्ट को सौप दिया . दो दिन बाद ही सुर्खिया अखबारों में बनी की मंदिर के एक ट्रस्टी ने ले लिया सात करोड़ के चेक का फर्जी भुगतान .दरअसल उस मंदिर में कुछ बरस पहले आभूषणों की भी चोरी हो गयी थी और चोरो का पता भी आखिर तक नहीं लग पाया था .फर्जी भुगतान लेकर उस ट्रस्टी ने कुछ लोगो के साथ मिलकर आभूषणों का गुप्तदान मंदिर में कर दिया था . और हाँ … भगवन श्रीगणेश जी ने जो सात करोड़ की राशी के लिए पूछे गए बिग बी के सवाल का जो जवाब दिया वह एंकर के कम्पूटर में इस तरह लाक हो गया की स्क्रीन पर लाना मुश्किल है .इसी स्थिति में अगर जवाब आपके दिमाग की कम्पूटर स्क्रीन पर कभी उभरे तो बताइयेगा जरूर …
विश्व हिंदी दिवस पर सभी भारतीयों और विदेशी हिंदी प्रेमियों को भी अनेकानेक शुभकामनायें। वस्तुतः आज का दिन यह सोचने का भी है कि बिना दीगर भाषाओँ की आलोचना किये ,भाषायी कौमार्य के मसले पर बावेला मचाये ,राजनैतिक मकड़जाल में बिना ,उलझाये कैसे इसे लोकप्रिय बनाया जा सकता है। चरम शुद्धतावादी ,अन्य भाषाओँ से जुबान पर आसानी से चढ़ जाने वाले शब्द हिंदी में आत्मसात किये जाने के मुद्दे पर लिबरल हों। अंग्रेजी या चीनी ,दीगर भाषा से शब्दों को शामिल करने पर लोकप्रिय हुई। अगर इस बिंदु पर गौर न भी करे तो अपने भारत में ही हर तरफ हिंदी लोकप्रिय कैसे बनायें इस पर भी सोचा जा सकता है?सबसे अहम मुद्दा मुझे युवाओं या अमूमन सभी वर्गों में हिंदी को सरल बनाने का लगता है। हिंदी का हिंदी अनुवाद करने की नौबत ही क्यों आनी चाहिए?भाषायी कौमार्य के परचमबरदार इसपर गौर करें। आम जीवन में भाषा विशेष का महत्व सम्प्रेषणीयता ,वैश्वीकरण,उदारीकरण और व्यक्तित्व बनने के संदर्भ में कितना है,इसपर भी ध्यान देना आवश्यक है।हर दिन "बहुभाषी दिवस " क्यों नहीं?जिस मातृभाषा का व्यक्ति मिले उससे उसकी ही भाषा में बात करने की हैसियत क्यों नहीं बन सकती? अंत में जय जय हिंदी !
सुला जब वठार पहुँचीं सुबह के नौ बजे थे। आज उसे पहुँचने में देर हो गयी थी। अब दोपहर बारह-एक बजे तक गाव के सभी घरों मेमांगने उसे जाना था। हर मंगलवार को देवी क दिन होता है। इस दिन वह जोगना मांगने वठार आतीं है। न जाने कितने बरसों से उसके घर मे यह प्रथा कायम है। उसके पहले माँ और नानी भीं वठार आकर जोगवा मांगती थीं। उनके बाद सुला ने भी यह प्रथा जारी रखी है। उम्र के अाठवें वर्ष में ही उसका ब्याह देवी के साथ हो चुका था। उसके बाद वह जोगवा मांगने ,गीत गाने और जगराता करने लगी। पूर्णिमा के रोज वह जोगवा माँगने बाहर निकलती। वैसे आम तौर पर यह घर में ही रहती थीं। सुबह शाम वह देवी की पूजा करती . मधुर स्वर में देवी गीत गाया करती थी।
बीस बरस की सुला गजब क़ी खूबसूरत थीं। उसकी आँखें काली और मृगनयनी थीँ। देह यष्टि किसी साँचे मे ढली हुई और केश लम्बे तथा घने थे। दीगर देव दासियों की तरह उसकी जटाएं नहीं थी डूबते सूरज की तरह उसका रंग ताम्बई था ज़ब वह मुस्कुरातीं उसके गालो पर पड़ने वाला डिम्पल भी हंसने लगता। कुल मिलकर उसकी सुंदरता किसी भी पुरुष के दिल की घंटियां बजाने के लिये पर्याप्त थीं
अपने साथ झुलवा लगाने की फिराक मे गांव के मुस्टण्डे गिद्ध दृष्टि लगाये बैठे थे। वे लोग हरसंभव जुगाड़ लगने मे जुटे रहते की कैसे वह कमसिन कली आपने हाथ लग जाएं! सुला थी जो किसी को भी घांस नहीं डालती। सुबह- शाम उसकी देहरी मे ताँक -झाँक करने वाले शोहदों की भीड़ बढती जा रही थी। लम्बे और फैशनेबल हेयर स्टाइल वाले नौजवान सिगरेट बीड़ी के खीचने टशन वाले युवक " कैसी हो सुला!क्या हाल-चाल है कहकर लार टपका कर नज़रों से ही जिस्म का एक्स-रे करने वाले रोमियो उसके दरवाजे पर मंडराते रहतें .सुला ने किसी को भी भाव नहीँ दिया। बल्कि कभी-कभार खरी-खोटी सुना देती ," देवी की दासी को देखकर खखारने मे शर्म नहीं आती तुझे? छेड़ने के लिये तेरे घर मे माँ -बहन है या नहीं? दो टका सवाल पूछकर वह शोहदों की बारात बैरंग लौटा देती। मस्ती मरने वाले युवकों को भला इन झिड़कियों से क्या फर्क पड़ना था !वे सुला की ओर देखकर काक्रोच कि तरह मंडराते और दीवानों की मानिंद करते।
ऐसा भी होता कि सुला जब घरों मे जोगवा मांगने जातीं ये छैला बाबू ही बाहर निकलकर जोगवा देने की फ़िराक़ में रह्ते। "अपनी माँ को भेजना कहकर सुला उन्हें उलटे मुंह लौटा देती। माँ के आने पर ही जोगवा स्वीकार करती। सूपे में भंडारा डालकर जी भरकर दुआएं देती। उन्हें वापस भेजती लेकिन उससे पहले यह जरूर कहती ,"मौसी !जरा लड़कों को समझा देना। बेवजह परेशान करते हैं। दरवाजे पर आकर कैसी गंदी- गंदी बातें करते हैं अरे! देवी की दासी से छेड़छाड़ का मतलब अंगारों से खेलना है नहीं क्या? अब ये लड़के अपनी गली के हैं गांव के हैं इसलिये शाप नहीं देतीं। देवी का शाप बड़ा भयानक होता है उन्हें समझाना नहीं तो उनकी शादी कर देना। !"जोगवा देने वाली औरतों को उसकी बात जचती थीं। वे अपने लड़कों की बखिया उधेड़ने लगतीं।
सुला जब वठार पहुँचीं उस गांव के अनेक पुरुष सदस्य खेतों पर जा चुके थे। घर की औरतें ही धीरे-धीरे कामकाज निपटाते हुए अपने बच्चोँ-कच्चों में उलझी हुई थी सुला हमेशा कीं तरह घर के सामने जोगवा मांगने लगी " अकुनदे जोगवा " कहते ही भीतर से कोई आता। पूरे भक्ति भाव से जोगवा देकर वापस लौटता। उससे पहले चुटकी भर भंडारा देते वक्त सुला उनकी खुशहाली के बारे मे पूछताछ करती। फिर दूसरे घर के दर वाजे पर दस्तक देती। सुला के कंधे से एक झोला लटक रहा था। हाथ में एक डलिया थी जिसमें यल्लम्मा की मूर्ति रखीं हुई थी। शायद वह पीतल की रही होगी। मूर्ती के सामने भंडारे से भरी थैली थी। समूची डलिया भंडारे से सनी हुई थी। मूर्ति के पास ही हरी चूड़ियाँ और कुछ रेजगारी। अनाज झोली मेँ रखकर चिल्हर डलिया में डाल लेतीं। उसका मस्तक भी भंडारा यानि प्रसाद से सना हुआ था। सफ़ेद मनकों की माला गले लटक रही थी। कानों में बुंदके और नथुने मे चमकीली नथ। पैरों में पाजेब तथा कमर मे कमरबंद कसकर बंधा था। वह चाँदी का था। सुला ने साडी भी पीले रँग की पहनीं थी। चोली भी उसी रंग की थी जो गीली हल्दी की तरह झक्क पीली नजर आई। सूरज की किरणें जब उसके चेहरे पर पड़तीं तब वह साड़ी और भी खुलकर दिखती।
एक के बाद दूसरा घर वह जोगवा माँग रही थीं। सुला को यह गाव जल्दी हीं निपटाकर शाम तक आपने गांव मेँ जोगवा मांगना था। जल्द-जल्द डग भरकर वह चलती और जोगवा लेती। फिर दूसरे घर के दरवाजे पर दस्तक देती। धूप तेज होने लगी। देखते ही देखते सूरज सर पर आग बरसाने लगा। पसीने की धाराएं उस पर पीली हल्दी और सूर्य की प्रखर किरणें ,स्वेद बिंदु मोतियों से चमकने लगें।
बढ़ती धूप के साथ ही सुला के कदम भी बोझिल होने लगें। "अकुंदे जोगवा "कहते वक्त हलक सूखने लगा। उसके मन में विचार आया कि गांवके पाटिल क एक घऱ निपटाकर वापस लौटा जाये। पाटिल के घर जोगवा लेने के लिये वह गई। दरवाजे पर खड़े रहकर उसने कहा "अकुंदे जोगवा " ज़ैसे ही घर के भीतर उसने नजर डाली खुद पाटील सामने खडा नजर आया। उसकी निगाहें सुला पर ही टिकी हुई थीं सुला को पाटील कि आँखोँ से बरसता वासना का जहर पहचानने मैं जरा भी देर नहीँ लगी। पाटिल सोफे पर बैठकर पल भर सुला को घूरता रहा। अधिक देर तक पाटिल से नजरेँ मिलाना असहनीय होने पर सुला ने अपनी गर्दन झुका ली। डलिया में रखी हल्दी और भन्डारे की थैली टटोलते हुए उसने कहा ," माँ घर पर नहीं है शायद है शायद !"" घर पर नहीं होने के लिये क्या हुआ ?। है ना घर पर"
"उनसे कहिये जोगवा लेकर आएँ " कहकर सुला ने चुंटकी भर हलदी घर की देहरी पर रखी। भंडारा रखने के लिए जैसे वह नीचे झुकी उसके काँधे का आँचल नीचे गिर गया। फ़ौरन ही सतर्क होकर उसने आंचल फ़िर कंधे पर डाला। इतनी देर में पाटिल पागल हो चुका था।
"लगता है इस बार फसल जोरदार लहलहा रही है "
" मैं समझी नहीं " सुला ने आँचल ठीक करते हुए कहा।
" समझोगी कैसे?यह बात तो लहलहाती फसल देखने वाले किसान ही समझ सकते हैं "
सुला खामोश खडी थी।
पाटिल ने पूछा ," किसे चुना है झुलवा करने के लिये ?"
" जी! अभी तय नहीं किया। " सुला।
" जल्दी ही तय कर ले ना ! वरना लहलहाती फसल बेकार जायेगी। हमारे बारे में भी सोच ले!तुझे किसी तरह की कमी नहीं होने देंगे। झुलवा का अनुभव है मुझे "पाटिल मूछों पर ताव देते हुए कहा।
सुला मारे शर्म के पानी -पानी हो गई थी। ठीक उसी वक्त पाटलिन बाई अपने हाथ मे सूपा लेकर बाहर आई। पाटिल पर खिसियाते हुए उसने कहा ,"क्यों, जोगवी का मजाक उड़ा रहे हो?
"हाँ!नहीं तो और करू? झुलवा के लिये उसे अपने बारे मे विचार करने को कह रहा था। "
" बोलने से पहले इन्सान को अच्छी तरह सोच लेना चाहिये। दो- तीन बार होगया है झुलवा। अब हमारे बच्चे शादी के लायक हो गए हैं। यह सब अच्छा नहीं लगेगा। " पाटलिन बाई गुस्से में तमतमा रही थी पाटिल ने बेशर्मी से हँसते उए कहा ," बाल-बच्चे शादी के लायक हो गए हैं तो क्या हुआ?उम्र होने पर सभी शादी के लायक हो जाते हैं. "इस बार फसल लहलहा रही है सिर्फ़ इतना ही तो कहा था मैने!?
" अजी! देवी की दासी का ऐसा मखौल नही उड़ाया करते। "
पाटिल ठहाका मारकर हंसा ,"अरे! देवी की दासी से मजाक नहीँ करुँ तो क्या गढ्ढेः से करुँ? तुझे समझ मेन नाहीं आऐंगी ये बाते। "
" रहने दीजिये रहने दीजिये कहकर पाटलिन बाई डिहरी पर पहुंचीं उस्ने सला कि झोली मे सूपा खाली किया। दहलीज पर रखा भंडारा अपने माथे पर लगाया। सुला बगैर कुछ बोले अपनी राह चली गई।
धूप कुछ और तेज हो गई थी। सारा जिस्म झुलसने लगा था। सुला जल्दबाज क़दमों से गांव की ओर जाने लगी। आज उसे पर्याप्त जोगवा भी नाहीं मिला था। गाँव चार किलोमीटर की दूरी पर था। वहां पहुँचते तक तीन-चार बज जाते बज जाते। वैसे मंगलवार उसके उपवास का दिन होता है। सुबह से उसके पेट में अनाज का एक दाना भी नहीं गया था। लगातार चलकर उसके पैरों के तलुए दर्द से जवाब देने लग गये थे। तीखी धूप की वजह से हलक सूख़ चुका था। उसके मन में विचार आया कि बाड़ी रुककर कूएं पर पानी पीकर निकला जाएं।बाड़ी दीखते ही उसे खुशी हुई। अमूमन पचास कदम जाने पर वह बाड़ी मे पहुँच चुकी थी। कुँए में लगा पम्प पानी उगल रहा था। साफ़ पानी की नाली लबालब भरी हुई थी जहान से पूरी बॉडी मे सिचांई होती थी।
सुला ने गले से झोला निका लकर रखा और उसपार डलियाँ रख दी। ."आई येल्लूबाई "उच्चारकर जैसे ही पानी में हाथ डुबोये वैसे ही पानी उलीचने वाली जगह से आवाज आई," क्या हाल-चाल है कबूतरी!"
माने पाटिल की आवाज सुनकर सुला चौक गई। उसने नजर उठाकर देखा पाटिल किसी जंगली सूअर की तरह दस कदम दूर खडा था। काला डामर जैसा रंग और उंची-पूरी कद-काठी के पाटिल को देखकर ऐसा लगा मानो उसकी छाती के भीतर दिल के धड़कने की बजाये हथौड़ा पीटने की रही हो। उसे देखे बगैर सुला ने अपनी हथेलियों की अंजुरी फ़िर पानी मे डुबोई। उसी वक्त माने पाटिल ने मुंह खोला
"क्या बोलती तू कबूतरी!लगता है थक गई है !"
सुला अब भी खामोश थी।
लगा ," माँ कसम!लगातार गुटुर गूँ करने की उम्र मे इस कबूतरी कि चोच बन्द क्योँ है ?"
सुला अब सहम गई थी। माने अगले पल क्या कर बैठेंगा कोइ भरोसा नहीं था। सुला ने अपनी मधुर आवाज मेन की," क्या मालिक!में देवी की दासी क्यों इस गरीब का मजाक उड़ा रहे हैं ?"माने दांत निपोरकर कहने लगा। ," अरे वाह! यह कबूतरी तो बोलती भी है!" अरे! देवी की दासी है इसलिए तो आया हूँ तेरे पीछे -पीछे ! अब शिकार जब खुद ही चलकर शिकारी के पास आ गया है तब उसे यूं ही छोड़ देना भी ठीक नहीँ है ना!तू चल ना मड़ैया के भीतर। थोड़ी देर वहां आराम कर ले। वैसे भी बाड़ी के भीतर कितनी ठंडक है ना!"
माने एक-एक कदम गंभीरता से आगे बढ़ रहा था। सुला ने बाड़ी पर सभी ओर नजर घुमाई।दूर -दूर तक उसे कोइ इन्सान नही दिखाईं दिया। छाती के भीतर हथौड़ों के प्रहार कि गति तेज हो चुकी थी। मन ही मन वह देवी की प्रार्थना करने लगी वासना के चरम पर माने क़ब शरीर को दबोच ले!बाह पल कभी भी आ सकता था। उसने पानी के भीतर से अपनी अंजुरी बाहर निकाली। झोले पर रखी डलिया उठाई फ़िर बगैर पल भर गवाए बिजली की रफ़्तार से दौड़ने लगी ।माने पर वासंना का उन्माद सवार था। वह भी सुला के पीछे भागने लगा। सुला भयभीत हिरणी की तरह भाग रहीं थी। अपने शरीर सारी ताकत इकठ्ठा कर बदहवास दौङ रही थी। दौड़ते-दौड़ते उसने पीछे मुड़कर देखा। माने किसी वहशी भेड़िये की तरह पीछा कर रहा था। सुला अब दुगुनी रफ़्तार से भागने लगी। हलक सूख गया था। उसे ऐसा लगा मानो गश खाकर गिर पड़ेगी। रास्ते के किनारे आम के पेड़ के नीचे उसने धौकनी की तरह चलतीं साँसों को संयत करने की चेष्टा की। एक बार फिर उसने पीछे मुड़कर देखा ,माने उसे कहीँ भी नजर नहीँ आ रहा था ।उसने ठंडी साँसें लीं एक नजर खुद को जी भरकर देखा अपने उफनते यौवन को ही हजार गालियाँ दी.बिखरे हुए केश ठीक किये। अपना आँचल कंधे पर डाला आये हाथ मे रखीं डलियाँ पर उसकी नजर पड़ी। वह पूरी तरह खाली हो चुकी थी। भागने के उन्माद में डलिया से देवी की मूर्र्ति कब गिरी इसका भान भी नही रहा। मूर्र्ति के सामने रखी भंडारे की थैली भी ग़ायब थी। पानी उलीचने वाले कनस्तर मे फंसकर गले मे लटकती माला के मोती भी बिखर चुके थे। माथे पर लगा भंडारा ( हल्दी )पसीने से गया था। झोली भी जगत पर ही रह गयी थी।
सुला किं कर्तव्य विमूढ़ थी। संज्ञा शून्य स्थिति मे उसे पता ही नहीं चलाकि वह क्या मह्सूस कर रही है!बगैर देवी की डलिया का क्या फायदा! यह सोचकर उसने डलिया पूरी ताकत से फेंक दी। न जाने क्यों दूसरे ही क्षण उसे ऐसा लगा मानो उसने सही नहीं किया। आखिर कुछ भी हो की डलिया थी उसे घर लेकर ही आना चाहिए था। डलिया वापस लेने उसने एक कदम आगे बढ़ाया लेकिन इससे पहले कि दूसरा कदम बढ़ातीं वह ठिठक गई। हाथों देवी रहने के बावजूद सारी जिन्दगी देवी को अर्पित करने पर भी मर्द मेरी इज्जत तार-तार कर देने भेडियो की तरहमेरे पीछे क्योँ प ड़े ?आखिर देवी की दासी की तकदीर मे ही ऐसा छलावा क्योँ? सवालों के तीर सुला के ह्रदय को छलनी किये जा रहें थे। उसने दूर जमीन पर पड़ी डलिया पर नजर डाली। दुबारा डलिया उठाने की इच्छा मन में नहीं हुई। सुला अपने खाली हाथों से ही घर रवाना हो गई। उसने ठान लिया था वह डलियाअब कभी भी जीवन मे नहीं उठाएगी।
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