रविवार, 14 सितंबर 2014

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विश्व हिंदी दिवस पर सभी भारतीयों और विदेशी हिंदी प्रेमियों को भी अनेकानेक शुभकामनायें। वस्तुतः आज का दिन यह सोचने का भी है कि बिना दीगर भाषाओँ की आलोचना किये ,भाषायी कौमार्य के मसले पर बावेला मचाये ,राजनैतिक मकड़जाल में बिना ,उलझाये कैसे इसे लोकप्रिय बनाया जा सकता है। चरम शुद्धतावादी ,अन्य भाषाओँ से जुबान पर आसानी से चढ़ जाने वाले शब्द हिंदी में आत्मसात किये जाने के मुद्दे पर लिबरल हों। अंग्रेजी या चीनी ,दीगर भाषा से शब्दों को शामिल करने पर लोकप्रिय हुई। अगर इस बिंदु पर गौर न भी करे तो अपने भारत में ही हर तरफ हिंदी लोकप्रिय कैसे बनायें इस पर भी सोचा जा सकता है?सबसे अहम मुद्दा मुझे युवाओं या अमूमन सभी वर्गों में हिंदी को सरल बनाने का लगता है। हिंदी का हिंदी अनुवाद करने की नौबत ही क्यों आनी चाहिए?भाषायी कौमार्य के परचमबरदार इसपर गौर करें। आम जीवन में भाषा विशेष का महत्व सम्प्रेषणीयता ,वैश्वीकरण,उदारीकरण और व्यक्तित्व बनने के संदर्भ में कितना है,इसपर भी ध्यान देना आवश्यक है।हर दिन "बहुभाषी दिवस " क्यों नहीं?जिस मातृभाषा का व्यक्ति मिले उससे उसकी ही भाषा में बात करने की हैसियत क्यों नहीं बन सकती? अंत में जय जय हिंदी !

शनिवार, 13 सितंबर 2014

देवी की दासी

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सुला जब वठार  पहुँचीं सुबह के नौ बजे थे। आज उसे पहुँचने में देर हो गयी थी। अब दोपहर बारह-एक बजे तक गाव के सभी घरों मेमांगने उसे जाना था।  हर मंगलवार को देवी क दिन होता है। इस दिन वह जोगना मांगने वठार आतीं है। न जाने कितने बरसों से उसके घर मे यह  प्रथा कायम  है। उसके पहले माँ  और नानी भीं वठार आकर जोगवा मांगती थीं। उनके  बाद सुला ने भी यह प्रथा जारी रखी है। उम्र के अाठवें वर्ष में ही उसका ब्याह देवी के साथ हो चुका  था। उसके बाद वह जोगवा मांगने ,गीत गाने और  जगराता करने लगी। पूर्णिमा के रोज वह जोगवा माँगने बाहर निकलती। वैसे आम तौर पर यह घर में ही रहती थीं।  सुबह शाम वह देवी की पूजा करती  . मधुर स्वर में देवी गीत गाया करती थी। 
            बीस बरस की  सुला गजब क़ी  खूबसूरत थीं। उसकी आँखें काली और मृगनयनी थीँ। देह यष्टि किसी साँचे मे ढली हुई और केश लम्बे तथा घने थे। दीगर देव दासियों की तरह उसकी जटाएं नहीं  थी डूबते सूरज की तरह उसका रंग ताम्बई था  ज़ब वह मुस्कुरातीं उसके गालो पर पड़ने वाला डिम्पल भी हंसने लगता। कुल मिलकर उसकी सुंदरता किसी भी पुरुष  के दिल की घंटियां बजाने के लिये पर्याप्त थीं 
                       अपने साथ झुलवा लगाने की  फिराक  मे गांव के मुस्टण्डे  गिद्ध दृष्टि लगाये बैठे थे। वे लोग हरसंभव जुगाड़ लगने मे जुटे रहते की  कैसे वह कमसिन कली आपने हाथ लग जाएं! सुला थी जो किसी को भी घांस नहीं डालती। सुबह- शाम उसकी देहरी मे ताँक -झाँक करने वाले शोहदों की भीड़ बढती जा रही थी। लम्बे और फैशनेबल हेयर स्टाइल वाले नौजवान  सिगरेट बीड़ी  के खीचने टशन वाले युवक " कैसी हो सुला!क्या हाल-चाल है कहकर लार टपका कर नज़रों से ही जिस्म का एक्स-रे करने वाले रोमियो उसके दरवाजे पर मंडराते रहतें  .सुला ने किसी को भी भाव नहीँ दिया। बल्कि कभी-कभार खरी-खोटी सुना  देती ," देवी की दासी को देखकर खखारने मे शर्म नहीं आती तुझे? छेड़ने के लिये तेरे घर मे माँ -बहन है या नहीं?  दो टका सवाल पूछकर वह शोहदों की  बारात बैरंग लौटा देती। मस्ती  मरने वाले युवकों  को भला इन झिड़कियों से क्या फर्क पड़ना था !वे सुला की  ओर देखकर काक्रोच कि तरह मंडराते और दीवानों की  मानिंद करते। 
                             ऐसा भी होता कि सुला जब घरों मे जोगवा मांगने जातीं ये छैला बाबू ही बाहर निकलकर जोगवा देने की फ़िराक़ में रह्ते। "अपनी माँ को भेजना  कहकर सुला उन्हें उलटे मुंह  लौटा   देती।  माँ के आने पर ही जोगवा स्वीकार करती।  सूपे में भंडारा डालकर जी भरकर दुआएं देती। उन्हें वापस भेजती लेकिन  उससे पहले यह जरूर  कहती ,"मौसी !जरा लड़कों को समझा देना। बेवजह परेशान करते हैं। दरवाजे पर आकर कैसी गंदी-  गंदी बातें करते हैं अरे! देवी की दासी से छेड़छाड़ का  मतलब अंगारों से खेलना है  नहीं क्या? अब ये लड़के अपनी गली के हैं गांव के हैं  इसलिये  शाप नहीं  देतीं। देवी का शाप बड़ा भयानक होता  है उन्हें समझाना   नहीं तो उनकी शादी  कर देना। !"जोगवा देने वाली औरतों को उसकी  बात जचती थीं। वे अपने लड़कों की बखिया उधेड़ने लगतीं। 
                                        सुला जब वठार  पहुँचीं उस गांव के अनेक पुरुष सदस्य खेतों पर  जा चुके थे। घर की औरतें ही धीरे-धीरे कामकाज निपटाते हुए अपने बच्चोँ-कच्चों में उलझी हुई थी  सुला हमेशा  कीं  तरह घर के सामने जोगवा मांगने लगी " अकुनदे   जोगवा " कहते ही भीतर से कोई  आता। पूरे भक्ति भाव से जोगवा देकर वापस लौटता। उससे पहले चुटकी भर भंडारा देते वक्त सुला उनकी खुशहाली  के बारे मे पूछताछ करती। फिर दूसरे   घर के दर वाजे पर दस्तक देती। सुला के कंधे से एक झोला लटक रहा था।  हाथ  में एक डलिया  थी  जिसमें यल्लम्मा की  मूर्ति रखीं हुई  थी। शायद वह पीतल की रही होगी। मूर्ती के सामने भंडारे से भरी थैली थी। समूची डलिया  भंडारे से सनी   हुई थी। मूर्ति के पास ही हरी चूड़ियाँ और कुछ रेजगारी।  अनाज झोली   मेँ रखकर चिल्हर डलिया में डाल  लेतीं। उसका मस्तक भी भंडारा  यानि प्रसाद से सना हुआ था।  सफ़ेद मनकों  की माला गले  लटक  रही थी। कानों में बुंदके और नथुने मे चमकीली  नथ। पैरों में पाजेब तथा कमर मे कमरबंद कसकर  बंधा  था। वह चाँदी का था। सुला ने साडी भी पीले रँग की पहनीं थी। चोली भी उसी रंग की थी जो गीली हल्दी की  तरह झक्क पीली नजर आई। सूरज की किरणें जब उसके चेहरे पर पड़तीं तब वह साड़ी और भी खुलकर दिखती।  
                  एक के बाद दूसरा घर वह जोगवा माँग रही  थीं। सुला को यह गाव जल्दी हीं  निपटाकर शाम तक आपने गांव मेँ जोगवा मांगना था। जल्द-जल्द डग  भरकर वह चलती  और जोगवा लेती। फिर दूसरे  घर के दरवाजे पर दस्तक देती। धूप  तेज होने लगी। देखते ही देखते सूरज सर   पर आग बरसाने लगा। पसीने की धाराएं उस पर पीली हल्दी और सूर्य की प्रखर  किरणें ,स्वेद बिंदु मोतियों से चमकने  लगें। 
               बढ़ती धूप के साथ ही सुला के कदम भी  बोझिल होने लगें। "अकुंदे  जोगवा "कहते वक्त हलक सूखने  लगा। उसके  मन में विचार आया कि गांवके पाटिल क एक घऱ निपटाकर वापस लौटा जाये। पाटिल के घर जोगवा लेने के लिये वह गई। दरवाजे पर खड़े रहकर उसने कहा  "अकुंदे  जोगवा " ज़ैसे ही घर के भीतर उसने नजर डाली खुद पाटील सामने खडा नजर आया। उसकी निगाहें सुला पर ही टिकी हुई थीं सुला को पाटील कि  आँखोँ से बरसता वासना का जहर पहचानने मैं जरा  भी देर नहीँ  लगी। पाटिल सोफे पर बैठकर पल भर सुला को घूरता रहा। अधिक देर तक पाटिल से नजरेँ मिलाना  असहनीय होने पर  सुला ने अपनी  गर्दन झुका  ली। डलिया में रखी  हल्दी और भन्डारे  की  थैली टटोलते हुए उसने कहा ," माँ घर पर नहीं है शायद है शायद !"" घर पर नहीं होने के लिये क्या हुआ ?। है ना घर पर"
"उनसे कहिये जोगवा  लेकर आएँ " कहकर सुला ने चुंटकी भर हलदी घर की देहरी पर रखी।  भंडारा रखने के लिए जैसे वह नीचे झुकी उसके काँधे का आँचल नीचे गिर गया। फ़ौरन ही सतर्क होकर उसने आंचल फ़िर कंधे पर  डाला। इतनी देर में पाटिल पागल हो चुका था। 
"लगता  है इस बार फसल जोरदार लहलहा रही है "
" मैं समझी नहीं " सुला ने आँचल ठीक करते हुए कहा। 
" समझोगी कैसे?यह बात तो लहलहाती फसल देखने वाले किसान ही समझ सकते हैं "
सुला खामोश खडी थी। 
पाटिल ने पूछा ," किसे चुना है झुलवा करने के लिये ?"
" जी! अभी तय नहीं किया। " सुला। 
" जल्दी ही तय कर ले ना ! वरना लहलहाती फसल बेकार जायेगी। हमारे बारे में भी सोच ले!तुझे किसी तरह की कमी नहीं  होने देंगे। झुलवा का अनुभव है मुझे "पाटिल  मूछों पर ताव देते हुए कहा। 
सुला मारे  शर्म के पानी -पानी हो गई  थी। ठीक उसी वक्त पाटलिन बाई अपने हाथ मे सूपा लेकर बाहर आई। पाटिल पर खिसियाते हुए उसने कहा ,"क्यों, जोगवी का मजाक उड़ा रहे हो? 
"हाँ!नहीं तो और करू? झुलवा के लिये उसे अपने बारे मे विचार  करने को कह रहा  था। "
" बोलने से पहले इन्सान को अच्छी तरह सोच लेना चाहिये। दो- तीन बार होगया  है झुलवा। अब हमारे बच्चे शादी के लायक हो गए  हैं। यह सब अच्छा  नहीं लगेगा। " पाटलिन बाई गुस्से में तमतमा रही  थी पाटिल  ने बेशर्मी से हँसते उए कहा ," बाल-बच्चे शादी के लायक हो गए हैं तो क्या हुआ?उम्र होने पर सभी शादी के लायक हो जाते हैं. "इस बार फसल लहलहा रही है सिर्फ़ इतना ही तो कहा था मैने!?
 " अजी! देवी की दासी का ऐसा  मखौल नही उड़ाया करते। "
पाटिल ठहाका मारकर हंसा ,"अरे! देवी की दासी से मजाक नहीँ करुँ तो क्या गढ्ढेः से करुँ? तुझे समझ मेन नाहीं आऐंगी ये बाते। "
" रहने दीजिये   रहने दीजिये कहकर पाटलिन बाई डिहरी पर पहुंचीं उस्ने सला कि झोली मे  सूपा खाली किया। दहलीज पर रखा भंडारा अपने माथे    पर लगाया। सुला बगैर कुछ बोले अपनी राह चली गई। 
  धूप कुछ और तेज हो गई थी।  सारा जिस्म झुलसने लगा था। सुला जल्दबाज  क़दमों से गांव की ओर जाने लगी। आज उसे पर्याप्त जोगवा भी नाहीं मिला था। गाँव चार किलोमीटर की दूरी पर था। वहां पहुँचते तक तीन-चार बज जाते बज जाते। वैसे मंगलवार उसके उपवास का  दिन होता है। सुबह से उसके पेट में अनाज का  एक दाना भी नहीं गया था। लगातार चलकर उसके पैरों के तलुए दर्द से जवाब देने लग गये थे। तीखी धूप  की वजह से हलक  सूख़ चुका था। उसके मन में  विचार आया कि बाड़ी रुककर कूएं पर पानी पीकर निकला  जाएं।बाड़ी दीखते ही उसे खुशी हुई। अमूमन पचास कदम जाने पर वह बाड़ी मे पहुँच चुकी थी। कुँए में लगा पम्प पानी उगल रहा  था। साफ़ पानी की नाली लबालब भरी हुई थी जहान से पूरी बॉडी  मे सिचांई होती थी। 
                     सुला ने गले से झोला निका लकर रखा और उसपार डलियाँ रख दी। ."आई येल्लूबाई "उच्चारकर जैसे ही पानी में हाथ डुबोये वैसे ही पानी उलीचने वाली जगह से आवाज आई," क्या हाल-चाल है कबूतरी!"
माने पाटिल की  आवाज सुनकर सुला चौक गई। उसने नजर उठाकर देखा पाटिल किसी  जंगली सूअर  की तरह  दस कदम दूर खडा था। काला डामर जैसा रंग और उंची-पूरी कद-काठी के पाटिल को देखकर ऐसा लगा मानो  उसकी छाती के भीतर  दिल के धड़कने की बजाये हथौड़ा पीटने की  रही हो।  उसे देखे बगैर  सुला ने अपनी हथेलियों की अंजुरी फ़िर पानी मे डुबोई। उसी वक्त  माने पाटिल ने मुंह खोला 
     "क्या बोलती तू कबूतरी!लगता है थक  गई है !"
     सुला अब भी खामोश थी। 
     लगा ," माँ कसम!लगातार गुटुर गूँ करने की उम्र मे इस कबूतरी कि चोच बन्द क्योँ है ?"
   सुला अब सहम गई थी। माने अगले पल क्या कर बैठेंगा कोइ भरोसा नहीं  था। सुला ने अपनी मधुर आवाज मेन की," क्या मालिक!में देवी की दासी क्यों इस गरीब का मजाक उड़ा रहे हैं ?"माने दांत निपोरकर कहने  लगा। ," अरे वाह! यह कबूतरी तो बोलती भी है!" अरे! देवी की दासी है इसलिए तो आया हूँ तेरे  पीछे -पीछे ! अब शिकार जब खुद ही चलकर शिकारी के पास आ गया है तब उसे यूं ही छोड़ देना  भी ठीक नहीँ है ना!तू चल ना मड़ैया के भीतर। थोड़ी देर वहां आराम कर ले। वैसे भी बाड़ी के भीतर कितनी  ठंडक है ना!"
     माने एक-एक कदम गंभीरता से आगे बढ़ रहा था। सुला ने बाड़ी पर सभी  ओर नजर घुमाई।दूर -दूर तक उसे कोइ इन्सान नही  दिखाईं दिया।  छाती के भीतर हथौड़ों के प्रहार कि गति तेज हो चुकी थी। मन ही मन वह देवी की प्रार्थना करने लगी वासना    के चरम पर माने क़ब शरीर को दबोच ले!बाह पल कभी भी आ सकता  था। उसने पानी के भीतर से अपनी अंजुरी  बाहर निकाली। झोले पर रखी डलिया उठाई फ़िर बगैर पल भर गवाए बिजली की रफ़्तार से दौड़ने लगी ।माने पर वासंना का उन्माद  सवार था। वह भी सुला के पीछे  भागने लगा। सुला भयभीत हिरणी की तरह भाग रहीं थी। अपने शरीर सारी ताकत इकठ्ठा कर बदहवास दौङ रही थी। दौड़ते-दौड़ते उसने पीछे मुड़कर देखा। माने किसी वहशी भेड़िये की तरह पीछा कर रहा था। सुला अब दुगुनी रफ़्तार से भागने लगी। हलक सूख गया था। उसे ऐसा लगा मानो  गश खाकर गिर पड़ेगी। रास्ते के किनारे आम के पेड़ के नीचे उसने धौकनी की तरह चलतीं  साँसों को संयत करने की चेष्टा की। एक बार फिर उसने पीछे मुड़कर देखा ,माने उसे कहीँ भी नजर नहीँ आ रहा था ।उसने ठंडी साँसें लीं एक नजर खुद   को जी   भरकर देखा अपने उफनते यौवन को ही हजार गालियाँ दी.बिखरे हुए केश ठीक किये। अपना आँचल कंधे पर डाला आये हाथ मे रखीं डलियाँ पर  उसकी नजर पड़ी। वह पूरी तरह खाली हो चुकी थी। भागने के उन्माद में डलिया  से देवी की  मूर्र्ति   कब गिरी इसका भान भी नही  रहा। मूर्र्ति  के सामने रखी भंडारे की थैली भी ग़ायब थी। पानी उलीचने वाले कनस्तर मे फंसकर गले मे लटकती माला के मोती भी बिखर चुके थे। माथे पर लगा भंडारा ( हल्दी )पसीने से गया  था। झोली भी  जगत पर ही रह  गयी थी। 
                  सुला किं कर्तव्य विमूढ़ थी।  संज्ञा शून्य स्थिति मे उसे पता  ही नहीं चलाकि वह क्या मह्सूस कर रही है!बगैर देवी की  डलिया  का क्या फायदा! यह सोचकर उसने डलिया पूरी ताकत से फेंक दी। न जाने क्यों दूसरे  ही क्षण उसे ऐसा लगा मानो उसने सही नहीं  किया।  आखिर कुछ भी हो  की डलिया थी उसे   घर लेकर ही आना चाहिए था। डलिया वापस लेने उसने एक कदम आगे बढ़ाया लेकिन इससे पहले कि  दूसरा कदम बढ़ातीं वह ठिठक गई। हाथों देवी  रहने के बावजूद   सारी जिन्दगी देवी को अर्पित करने पर भी  मर्द मेरी इज्जत तार-तार कर देने  भेडियो की तरहमेरे  पीछे क्योँ  प ड़े ?आखिर देवी की दासी की तकदीर मे ही ऐसा छलावा क्योँ? सवालों के तीर सुला के ह्रदय  को छलनी किये  जा रहें थे। उसने दूर जमीन पर पड़ी डलिया पर नजर डाली। दुबारा डलिया उठाने  की इच्छा मन  में  नहीं हुई। सुला अपने खाली हाथों से ही  घर रवाना हो गई। उसने ठान लिया था वह डलियाअब कभी भी जीवन मे नहीं उठाएगी। 
                                                                     अनुवाद-किशोर दिवसे 

गुनगुनाती कुदरत - अध्येता यायावर (SCHOLAR GYPSY-By-MATHEW ARNOLD)

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अध्येता यायावर (SCHOLAR GYPSY- By-MATHEW ARNOLD)


जाओ गडरिये...वे पहाड़ी से तुम्हें बुला रहे हैं...
खोल दो वे जंगले जो टहनियों से बने हैं
लालायित भेड़ों के झुण्ड को भूखा  मत रहने दो 
और मत चीखने दो प्यास से साथी  कुत्तों को
कुतरी घांस के ठूंठों  का मत लगने दो मेला
जब खेत हों खामोश और हो गोधूलि की बेला
........
मजदूर और कुत्ते सब थककर हो गए हों चूर
सिर्फ सफ़ेद भेड़ें नजर आ जाएँ कहीं दूर
चाँद की दूधिया रोशनी में नहाये खेतों के पास
आओ गडरिये...ताजा कर ले किसी के मिलने की आस
.........
कटैया बहता है अपना पसीना  देर तक यहाँ 
छायादार इन खेतों के झुरमुटों में वहां
जहाँ रखा था उसने अपना गमछा,पोटली और सुराही
उगते सूरज के संग बाँधता है फसलों के ढेर
तब थकान से चूर भरता है अपना पेट दोपहर
यहाँ बैठ करूंगा मैं उसकी प्रतीक्षा उस पहर
दूर मैदान से गूंजेगी मेरे कानों में
मिमियाहट.... भेड़ के नन्हे छौने की 
भुट्टों के खेतों में काम करते कटैयों की 
और बेजान सी सरसराहट दुपहरी की 
..........
ऊंचे अधकटे   खेतों का यह छायादार कोना
ओ गडरिये!मैं रहूँगा यहाँ तब  तक 
जब तक आसमान में पसरेगा ,सूर्यास्त का सोना
सर उठाते हैं अहिपुष्प भुट्टे के घने खेतों में 
गोल गहरी जड़ें और सुनहरे मक्के की बालें 
मैं निर्निमेष निहारता हूँ अपलक किस तन्मयता में!
..................
किसलय उभरते हैं हरिणपदी की गुलाबी गोद से
महकती है मंदानिल नीम्बुओं  की गंध से
पुष्पित हैं पारिजात पावसी सम्मोहन से
और रक्षित हैं मन मयूर आदित्य  तप्त ताप से 
दृष्टि यात्रा पसरती है आक्सफोर्ड की अट्टालिकाओं पर
विस्मृत होता है चंचल मन देहभान त्यागकर
.......
देखो!तृणशैया पर रखा है "ग्लानविल का रचना संसार"
पन्नों के पार्श्व पर अंकित अध्येता यायावर का कथा सार
प्रखर मस्तिष्क.. पर गरीबी से थक हारकर'
टूट गया मानव तन विपदा से जूझकर
...
अब सुनो कहानी एक अध्येता यायावर की
गर्मियों की एक सुबह उसने छोड़ी सोहबत दोस्तों की
चला गया यायावरों से सीखने बातें अबूझ तिलस्म की
 चप्पा-चप्पा भटकता रहा दुनिया यायावरों की
जैसे बूझता हो पहेलियाँ,कंजर ... उत्पति गिरोह्जन की 
पर कभी सुध न ली अपने दोस्तों और आक्सफोर्ड की
..........
कई बरसों बाद बन गया एक  संयोग था
अचानक मिले दो साथी जिसे वह जानता था 
दोस्त! कैसे बीत रही है जिंदगी पूछा  उन्होंने
सबको हैरत में दाल दिया अध्येता यायावर की बातों ने
यायावर टोली जानती है तंत्र- मन्त्र -सम्मोहन!
वशीकरण से वश में कर लेना दूसरों का मन
विवश कर देता है इनकी मोहिनी का मोहपाश
जादुई विद्या के जोर पर करते है सर्वनाश...
और मैं.. बोलता रहा वह अध्येता यायावर 
भौचक थे किस्सों से .. अवाक सारे श्रोता थे 
उनकी कला का तिलस्म सीखकर आऊँगा मैं
कैसा है यह जादू दिखलाऊँगा मैं
पर पारंगत होने इस गूढ़ विद्या में 
ईश्वरीय वरदान की चाह  में प्रतीक्षारत हूँ मैं
......
बस इतना कहकर चल पड़ा  वह अध्येता यायावर
पर बात फैली सब और लपटों की तरह सर -सर 
गावों में अरसे से गुम अध्येता यायावर दिखा था आज
कुछ देर बोला पर चिंतित सा .. क्या था इसका राज!
यायावर की तरह  ही बन गया था अध्येता यायावर
वेश था उनके जैसा वैसा ही था उसका परिवेश
चोगा और अजूब टोपी,बस यही रह गया था शेष 
घूमता रहा था अध्येता यायावर कई गाँव कई देश
.



...................
वसंत की एक भोर ... मिला वह दरख्तों के नीचे
जलते अलावों के पास था वह यायावरों के पीछे 
असभ्य किन्तु अनुरागी,अनाडी लोगों के पास 
जैसे ही वे चीखते चिल्लाते और मचाते शोर
अध्येता यायावर यक्ष- प्रश्न लेकर निकलता किसी और
जीवंत  अंदाज उसका ऐसा खूब समझता था मैं
क्योकि लगता था की अगर वहां पर होता मैं
तो सरपट भाग निकलता कहाँ-कहाँ पर मैं
.........
पूछता था सभी से अपना चेहरा दिखाकर
बोलो देखा है ऐसे चेहरे वाले को तुमने कहीं पर!
पूछता था मैं खेतों पर बैठे रखवालों को
बोलो!वीराने रास्तों से गुजरते देखा है किसी को?
...
क्या अब मैं लेट जाऊं अपनी इस नौका में 
समुद्र तट पर तैरती जो अटकी है लंगर में !
सूरज की रोशनी से चमकते चारागाह के निकट 
और तकता रहूँ हरी चादर ओढ़े पहाड़ियों को विकट
इस उधेड़बुन में खोया हाकी वह अध्येता यायावर
क्या आया होगा इस अप्रतिम,अबूझ ठिकाने पर!
.....
वे हरफनमौला यायावर अक्सर यहीं डालते हैं डेरा
इसी जगह को कभी जंगलों और जानवरों ने था घेरा
यहीं उस अध्येता यायावर को मिली थी शांति की राह
आततायी विद्रूपता से विमुख होने विरक्ति की चाह 
आक्सफोर्ड के छात्र यहीं करते थे नौकायन
ग्रीष्म यामिनी में घर लौटकर करने से पहले शयन
अपनी अँगुलियों से नदी की शीतल जलधारा को सहलाते
जैसे ही लंगर से छूटकर घूमती थी उनकी नौका
पीछे झुककर झूलने लगते थे स्वप्न का झोंका
उस्न्की गोद में रहते थे ढेर सारे फूल झर झरकर 
छायादार शीतल ठौर,खेतों में लदी फसलों की सरसर 
तकते रहते चन्द्रप्रभा से आल्हादित झरनों की कलकल 
........
पर हाय!आक्सफोर्ड के छात्रो ने पार कर ली थी नदी
चप्पा-चप्पा ढूँढा,अध्येता यायावर नहीं मिला कहीं
बालाएं जो आकर करती थीं नृत्य जहाँ-जहाँ
सांझ ढले हिरनी बनी गाँव की गोरियां वहां-वहां
अठखेलियों के साथ उन्होंने भी पार कर ली थी वह बाड
शायद! देखा होगा उन्होंने कहीं उस अध्येता यायावर को
जो भर देता था उनके आंचल में ढेर सारे  फूलों को
पर कभी नहीं लाता था जुबान पर अपने मन की बातों को
..........
पुष्प-पवन पुष्प और नील घंटिका के
भोर के तुषार बिन्दुओं में भीगे-भीगे से
नीलवर्णी आर्किड,लुभावनी पत्तियों के 
कोई न जान सका ठिकाने अध्येता यायावर के
......
घूमने लगा काल चक्र और बीतता गया हर प्रहार
लू की लपटों से सहमता रहा रपटा दोपहर
सूखी घांस के गट्ठर लहराते थे लहर-लहर
और चमकने लगे रोशनी के टुकड़े दरान्तियों पर
सरसराते खेतों से जाया करते थे खेतिहर
वहीँ पर उतरते थे अबाबीलों  के स्याह पर
थककर चूर,अठखेलियाँ -कल्लोल करते थे जहाँ पर
हाय! उसी डोह में कोई नहीं आता था वहां पर
...............
अचानक ही उनका मलिन मुख मुस्काया
सोचा!कितनी  प्रतीक्षा के बाद अध्येता यायावर को पाया
उफनती नदी के तट पर बैठा था वह स्थिति प्रग्य
अजूबा सा परिधान पहने जारी था उसका भाव-यग्य 
गहरी खोई सी आँखों में थी सपनों  की छाया
दूर...से देखकर उसे, सबका मन हर्षाया
पर हाय! नियति को उनका सुख न भाया
जाकर वहां देखा तो उसे कहीं न पाया
गुम हो चुका था "अध्येता यायावर  का साया
सोच उन सबने होगी यह ईश्वर की माया
.................
नहीं! वह दिखाई दे जाता था कहीं न कहीं पर
क्यूमर पहाड़ी की वीरानी में बसे किसी फ़ार्म हाउस पर
अपनी झलक दिखा देता था वह अध्येता यायावर
किसी प्रतीक्षारत गृहिणी को खुले दरवाजे पर
कोठारो पर जो गंधाते थे काई से
निहारत था वह थ्रेशर को अपलक नेत्रों से
मिलता था उन छौनों से जो विचरते थे ढलानों  पर 
और चनसुर की तलाश में भटकते थे सोतों पर
........
सचमुच...उन्होंने ही देखा था उस अध्येता यायावर को
अपलक निहारते दूब की चादर  ओढ़े  खेतों को 
खिलाता था वह चारा अक्सर भूखी गायों को 
और प्रफुल्लित हो मुस्कान से खिला लेता ओठों को
गर्मियों में वह निकल पड़ता था वीरान जंगलों की ओर
पगडंडियों के किनारे बसे थे वहीँ यायावर तम्बू दोनों ओर
........
हां .. आता था यायावर उन अबूझ बस्तियों में
 चीथड़े और पैबंद थे जहाँ पर हर झाडी में  
मीलों पसरी भूमि के ऊपर सारे जंगल में 
कस्तूरक पक्षी      दबाकर दाना अपनी चोंच में 
विहार करते थे निडर, यायावरों की उपस्थिति में 
निर्भय थे  सभी ,ममतामयी प्रकृति की गोद में 
.....
 अक्सर सैलानी बन घूमता था वह अध्येता यायावर
सूखी टहनी घुमाते अपने हाथों पर 
उस अलौकिक क्षण के लिए प्रतीक्षा रत था चेहरा 
सर पर जब उसके सजेगा ...सफलता का सेहरा 

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चैन से जब सो जाओगी तुम 
जागेगी रात ,, तुम्हें आहिस्ता भींचकर 
हँसेगी जिन्दगी तुम्हारी बाहों में 
गुम होने लगेंगे सारे पैबंद
और तंज सूइयों का दर्द भी!!!

बुधवार, 5 मार्च 2014

मेरी पुस्तकें खरीदने ISBN नंबर एवं प्रकाशक का संपर्क पता

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मेरी पुस्तकें खरीदने ISBN नंबर
एवं  प्रकाशक का संपर्क पता



मेरी अनूदित पुस्तकें खरीदने के लिए मित्रों से निरंतर फोन पर संपर्क हो रहा था. चूंकि पुस्तकें सीधे प्रकाशक से ही खरीदी जानी है लिहाजा मैं पुस्तकों का  नंबर एवं विस्तृत पता दे रहा हूँ.  1. माँ ( दलित विमर्श )-उत्तम कांबले -ISBN .NO-978-81-89868-68-2.PRICE-100/.. 2  हिन्दू संस्कृति और स्त्री ( स्त्री विमर्श )  -आ. ह. सालुंखे -ISBN .NO-978-81-89868-73-0.PRICE-300/... 3 साझा विरासत ( इतिहास) डा. अजीत  जावेद -ISBN .NO-978-81-89868-54-5.PRICE-300/     4 विज्ञानं का इतिहास -प्र. न.  जोशी -ISBN .NO-978-81-89868-37-6.PRICE-250/    5 . महान विप्लव (इतिहास)-ISBN .NO-978-81-89868-38-3.PRICE-250/    6. देवदासी (स्त्री विमर्श )-ISBN .NO-978-81-89868-32-1.PRICE-75/  .
                      प्रकाशक- आलोक श्रीवास्तव
                      संवाद प्रकाशन , आई -499 शास्त्रीनगर मेरठ  -250004 ( उत्तर प्रदेश )
                      मोबाइल न। -09610 584000   /  099700 16684
प्रकाशक से उनके मेल-आई डी aloks.shrivastav @gmail.com पर सीधे संपर्क किया जा सकता है।
                 किशोर दिवसे ,बिलासपुर छत्तीसगढ़ ,kishorediwase0@gmail.com    मोबाइल- 09827471743
                                 












शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

MY BOOKS RECENTLY PUBLISHED

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किशोर  दिवसे अनूदित पुस्तकों की डबल हैट्रिक
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बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। वरिष्ठ पत्रकार एवं अनुवादक किशोर दिवसे अनूदित तीन पुस्तकें फरवरी माह में प्रकाशित हुई हैं। वर्ष 2008 के फरवरी माह में भी श्री दिवसे द्वारा अनूदित तीन पुस्तकों की हैट्रिक प्रकाशित हुई थी जिसका विमोचन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने किया था। वर्ष 2014 में छपी  पुस्तकों का प्रथम पुष्प है "माँ   "  . दलित विमर्श के तहत महाराष्ट्र के प्रख्यात पत्रकार एवं साहित्यकार उत्तम कांबले की  मूल मराठी पुस्तक  " आई" का यह अनुवाद है। मराठी में इसके 28 संस्करण  छप  चुके हैं। कन्नड़, उर्दू व अंग्रेजी अनुवाद के अलावा इस पर नेत्रहीनों के लिए " टाकिंग बुक ' भी ब्रेल लिपि में बन चुकी  है। 
                             दूसरी पुस्तक के लेखक हैं आ.ह.सालुंखे। स्त्री विमर्श पर मूल मराठी में लिखी गई पुस्तक "हिन्दू संस्कृति आणि स्त्री" का यह अविकल अनुवाद " हिन्दू संस्कृति और स्त्री " के नाम से प्रकाशित हुआ है। मराठी संस्करण को वर्ष 1990 में महाराष्ट्र सरकार  का  डॉ। बाबा साहेब आम्बेडकर पुरस्कार मिला था। 
                          तीसरा अनुवाद है दिल्ली विश्व विद्यालय के सत्यवती  कालेज में राजनीति शास्त्र की रीडर डॉ अजीत जावेद रचित मूल अंग्रेजी पुस्तक " " हेरिटेज आफ हार्मोनी " का। मध्य युगीन भारत में हिन्दू- मुस्लिम धर्मानुयायियों के जीवन अंतर सम्बन्धों पर यह गहन अंतर दृष्टि डालता है। वर्ष 2008 में किशोर दिवसे के प्रकाशित तीन अनुवाद  थे -1. विज्ञान उदय और  विकास-मूल लेखक- प्र. ना.जोशी ( मराठी), देवदासी- मूल लेखक-उत्तम  कांबले ( मराठी)तथा 3. महान विप्लव- मूल अंग्रेजी लेखक -क्रिस्टोफर हिबर्ट  की  पुस्तक द ग्रेट म्युटिनी इण्डिया ; 1857 का हिंदी शीर्षक- महान विप्लव ;1857 के नाम  से हिंदी अनुवाद। सभी छह पुस्तकों के प्रकाशक हैं आलोक श्रीवास्तव संवाद प्रकाशन,आई-499 मेरठ -पिन-250004 ,उत्तरप्रदेश।  प्रकाशक से मोबाइल  न.09610584000  या मेल आई-डी aloks.shrivastav@gmail .com  पर संपर्क किया जा सकता है। 
                                                                                                                   
                                                                                                                                                     किशोर दिवसे 
संपर्क - किशोर दिवसे 
फ़्लैट न.  308 ,ऑम गार्डेंस ,पारिजात कालोनी 
बिलासपुर -495001 ,छत्तीसगढ 
                                                                                                                                                    -09827471743 
                                                                                                                                                   मेल  आई डी -kishorediwase0@gmail.com
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                                                                         बायो डाटा -




                                                   
                                                                                               
                                                                                                                     किशोर दिवसे            बिलासपुर, छत्तीसगढ़    
                                                                                                                     मोबाइल- 09827471743  
                             
अनुभव तथा ज्ञान की अपडेटिंग जीवन के किसी भी क्षेत्र में परिपक्वता के लिए अनिवार्य है.वर्ष 1979 से आज तक यानी तीन दशक से अधिक अरसा हुए मैंने पत्रकारिता व लेखन   के क्षेत्र में अनथक यात्रा जारी रखी ... प्रतिपल सीखता रहा.लिहाजा मेरे कार्य क्षेत्र से जुड़ा  तब और अब का पारदर्शी प्रतिबिम्ब  कम्प्यूटर युग के सन्दर्भ में स्पष्ट झलकता है.
            छत्तीसगढ़ व् महाराष्ट्र से मेरी शिक्षा हुई.रायपुर से बी. जर्नलिज्म  तथा पूर्व में नागपुर महाराष्ट्र से बी.एससी किया. अंग्रेजी, हिंदी, मराठी का  धाराप्रवाह  ज्ञान मेरे लेखन की धुरी है.अत; अनुवाद, स्तम्भ लेखन.कथा-कहानी रचना,मेरे प्रिय विषय रहे है.
               पत्रकारिता का सफ़र
              ================
  1.  युगधर्म रायपुर,छत्तीसगढ़(1979 -1982)  २.नवभारत,रायपुर(1982-1984 ) .३. नवभारत बिलासपुर  (1984 -  आज तक ) सम्प्रति -नवभारत बिलासपुर में संस्थापक सह संपादक.तथा पृथक रूप से परियोजना निर्माण. 
          जहाँ से मिला अनुभव 
        ==================
1. विभिन्न मुद्दों पर रिपोर्ताज, रेडियो वार्ताए.2. एक्शन एड फेलोशिप के तहत स्वास्थ्य  अधोसंरचना पर 5 लेख प्रकाशित (एक अंग्रेजी).3.छत्तीसगढ़ में IFAD परियोजना कार्यक्रम के दस्तावेजों के मूल प्रारूप का अनुवाद .4.ग्रामीण रिपोर्ताज,कथा-लेखन,विभिन्न विषयों पर पुस्तकों का  प्रोफेशनल ट्रांसलेशन 5. गुरू  घासीदास विवि के पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग लेक्चरार रहा.
              पुस्तकें प्रकाशित
              =============
1. विज्ञान का इतिहास- पी.एन.जोशी विज्ञानं उद्भव आणि विकास  ( मराठी- हिंदी).2.महान विप्लव-क्रिस्टोफर हिब्बर्ट- इन्डियन म्यूटिनी-1857 ( अंग्रेजी-हिंदी).3.देवदासी- उत्तम काम्बले -मराठी-हिंदी)
4. माँ -उत्तम कांबले ( मराठी-हिंदी),5 हिन्दू संस्कृति और स्त्री-आ. ह.  सालुंखे   हिन्दू संस्कृति आणि स्त्री ,( मराठी- हिंदी).6 .साझा  विरासत--डॉ. अजीत जावेद ( मूल अंग्रेजी- हेरिटेज आफ हार्मोनी) सभी अनुवाद- प्रकाशक- आलोक श्रीवास्तव, संवाद प्रकाशन  I-499 शास्त्री नगर , मेरठ.( MOBILE- 09610584000)
                       शीघ्र प्रकाश्य
                    ===========
1 .चीन की लोक कथाएं -(अंग्रेजी से हिंदी)  ,साहित्य अकादेमी दिल्ली .  2.  कौवे और इन्सान -उत्तम कांबले  ,( मराठी- हिंदी ). कावळे  आणि माणस , आधार प्रकाशन हरियाणा ,3 . कथा लोक-छत्तीसगढ़ -यश प्रकाशन दिल्ली )
          संपर्क
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ई-मेल-  
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निवास 
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किशोर दिवसे ,फ़्लैट- न.-308  ऑम गार्डन्स,पारिजात कालोनी ,कस्तूरबा नगर  बिलासपुर-495001,छत्तीसगढ़ 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

किशोर दिवसे अनूदित पुस्तकों की डबल हैट्रिक

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मान्यवर,
सादर नमस्कार 
समाचार संलग्न है। इस समाचार का प्रकाशन कर रचना धर्मिता का सम्मान करें -किशोर दिवसे 



किशोर  दिवसे अनूदित पुस्तकों की डबल हैट्रिक
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बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। वरिष्ठ पत्रकार एवं अनुवादक किशोर दिवसे अनूदित तीन पुस्तकें फरवरी माह में प्रकाशित हुई हैं। वर्ष 2008 के फरवरी माह में भी श्री दिवसे द्वारा अनूदित तीन पुस्तकों की हैट्रिक प्रकाशित हुई थी जिसका विमोचन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने किया था। वर्ष 2014 में छपी  पुस्तकों का प्रथम पुष्प है "माँ   "  . दलित विमर्श के तहत महाराष्ट्र के प्रख्यात पत्रकार एवं साहित्यकार उत्तम कांबले की  मूल मराठी पुस्तक  " आई" का यह अनुवाद है। मराठी में इसके 28 संस्करण  छप  चुके हैं। कन्नड़, उर्दू व अंग्रेजी अनुवाद के अलावा इस पर नेत्रहीनों के लिए " टाकिंग बुक ' भी ब्रेल लिपि में बन चुकी  है। 
                             दूसरी पुस्तक के लेखक हैं आ.ह.सालुंखे। स्त्री विमर्श पर मूल मराठी में लिखी गई पुस्तक "हिन्दू संस्कृति आणि स्त्री" का यह अविकल अनुवाद " हिन्दू संस्कृति और स्त्री " के नाम से प्रकाशित हुआ है। मराठी संस्करण को वर्ष 1990 में महाराष्ट्र सरकार  का  डॉ। बाबा साहेब आम्बेडकर पुरस्कार मिला था। 
                          तीसरा अनुवाद है दिल्ली विश्व विद्यालय के सत्यवती  कालेज में राजनीति शास्त्र की रीडर डॉ अजीत जावेद रचित मूल अंग्रेजी पुस्तक " " हेरिटेज आफ हार्मोनी " का। मध्य युगीन भारत में हिन्दू- मुस्लिम धर्मानुयायियों के जीवन अंतर सम्बन्धों पर यह गहन अंतर दृष्टि डालता है। वर्ष 2008 में किशोर दिवसे के प्रकाशित तीन अनुवाद  थे -1. विज्ञान उदय और  विकास-मूल लेखक- प्र. ना.जोशी ( मराठी), देवदासी- मूल लेखक-उत्तम  कांबले ( मराठी)तथा 3. महान विप्लव- मूल अंग्रेजी लेखक -क्रिस्टोफर हिबर्ट  की  पुस्तक द ग्रेट म्युटिनी इण्डिया ; 1857 का हिंदी शीर्षक- महान विप्लव ;1857 के नाम  से हिंदी अनुवाद। सभी छह पुस्तकों के प्रकाशक हैं आलोक श्रीवास्तव संवाद प्रकाशन,आई-499 मेरठ -पिन-250004 ,उत्तरप्रदेश।  प्रकाशक से मोबाइल  न.09610584000  या मेल आई-डी aloks.shrivastav@gmail .com  पर संपर्क किया जा सकता है। 
                                                                                                                   


                                                                                                                                                     किशोर दिवसे 
संपर्क - किशोर दिवसे 
फ़्लैट न.  308 ,ऑम गार्डेंस ,पारिजात कालोनी 
बिलासपुर -495001 ,छत्तीसगढ 
                                                                                                                                                    -09827471743 
                                                                                                                                                   मेल  आई डी -kishorediwase0@gmail.com


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                                                                         बायो डाटा -




                                                   
                                                                                               

                                                                                                                     किशोर दिवसे            बिलासपुर, छत्तीसगढ़    
                                                                                                                     मोबाइल- 09827471743  

                             
अनुभव तथा ज्ञान की अपडेटिंग जीवन के किसी भी क्षेत्र में परिपक्वता के लिए अनिवार्य है.वर्ष 1979 से आज तक यानी तीन दशक से अधिक अरसा हुए मैंने पत्रकारिता व लेखन   के क्षेत्र में अनथक यात्रा जारी रखी ... प्रतिपल सीखता रहा.लिहाजा मेरे कार्य क्षेत्र से जुड़ा  तब और अब का पारदर्शी प्रतिबिम्ब  कम्प्यूटर युग के सन्दर्भ में स्पष्ट झलकता है.
            छत्तीसगढ़ व् महाराष्ट्र से मेरी शिक्षा हुई.रायपुर से बी. जर्नलिज्म  तथा पूर्व में नागपुर महाराष्ट्र से बी.एससी किया. अंग्रेजी, हिंदी, मराठी का  धाराप्रवाह  ज्ञान मेरे लेखन की धुरी है.अत; अनुवाद, स्तम्भ लेखन.कथा-कहानी रचना,मेरे प्रिय विषय रहे है.
               पत्रकारिता का सफ़र
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  1.  युगधर्म रायपुर,छत्तीसगढ़(1979 -1982)  २.नवभारत,रायपुर(1982-1984 ) .३. नवभारत बिलासपुर  (1984 -  आज तक ) सम्प्रति -नवभारत बिलासपुर में संस्थापक सह संपादक.तथा पृथक रूप से परियोजना निर्माण. 
          जहाँ से मिला अनुभव 
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1. विभिन्न मुद्दों पर रिपोर्ताज, रेडियो वार्ताए.2. एक्शन एड फेलोशिप के तहत स्वास्थ्य  अधोसंरचना पर 5 लेख प्रकाशित (एक अंग्रेजी).3.छत्तीसगढ़ में IFAD परियोजना कार्यक्रम के दस्तावेजों के मूल प्रारूप का अनुवाद .4.ग्रामीण रिपोर्ताज,कथा-लेखन,विभिन्न विषयों पर पुस्तकों का  प्रोफेशनल ट्रांसलेशन 5. गुरू  घासीदास विवि के पत्रकारिता विभाग में विजिटिंग लेक्चरार रहा.

              पुस्तकें प्रकाशित
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1. विज्ञान का इतिहास- पी.एन.जोशी विज्ञानं उद्भव आणि विकास  ( मराठी- हिंदी).2.महान विप्लव-क्रिस्टोफर हिब्बर्ट- इन्डियन म्यूटिनी-1857 ( अंग्रेजी-हिंदी).3.देवदासी- उत्तम काम्बले -मराठी-हिंदी)
4. माँ -उत्तम कांबले ( मराठी-हिंदी),5 हिन्दू संस्कृति और स्त्री-आ. ह.  सालुंखे   हिन्दू संस्कृति आणि स्त्री ,( मराठी- हिंदी).6 .साझा  विरासत--डॉ. अजीत जावेद ( मूल अंग्रेजी- हेरिटेज आफ हार्मोनी) सभी अनुवाद- प्रकाशक- आलोक श्रीवास्तव, संवाद प्रकाशन  I-499 शास्त्री नगर , मेरठ.( MOBILE- 09610584000)

                       शीघ्र प्रकाश्य
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1 .चीन की लोक कथाएं -(अंग्रेजी से हिंदी)  ,साहित्य अकादेमी दिल्ली .  2.  कौवे और इन्सान -उत्तम कांबले  ,( मराठी- हिंदी ). कावळे  आणि माणस , आधार प्रकाशन हरियाणा ,3 . कथा लोक-छत्तीसगढ़ -यश प्रकाशन दिल्ली )

          संपर्क
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किशोर दिवसे ,फ़्लैट- न.-308  ऑम गार्डन्स,पारिजात कालोनी ,कस्तूरबा नगर  बिलासपुर-495001,छत्तीसगढ़ 


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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

परिवर्तन है नए वर्ष का सन्देश

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परिवर्तन है नए वर्ष का सन्देश
तारीख -३१ दिसंबर
वक्त  दोपहर   ( शाम के बाद समय नहीं मिलेगा इसलिए)
ह़र किसी का अपना अलहदा अंदाज होता है बीते बरस को अलविदा कहने का.वर्ष २०१३  की विदाई और २०१४  का  स्वागत करने प्लानिंग अमूमन पहले से ही हो जाया करती है.कईयों ने सोचा की आउटिंग कर ऐश करे और रात दारू-शारू के साथ मजे लें. नव- धनाढ्यों  का कुनबा बड़ी होटलों में साल की विदाई पार्टी के साथ "रात रंगीन " करने शराब -शबाब के पॅकेज डील कर चुका होता है.बीते बरस भी ३१ की रात को सुरूर में पहले तो तेज रफ़्तार सडको पर कुछ नौजवान घूमे फिर उनमें से कुछ अस्पताल में भी नजर आए.
                        वर्ष २०१ २
की रात को भी बारह बजे शहर जवान हो कर मस्ती में बल्ले-बल्ले कर रहा था. अपनी- अपनी सोच और नसीब के चक्कर में बीते साल की विदाई का अंदाज भी मजदूरों, मिडिल क्लास और रईसों की तकदीर- तदबीर के पारदर्शी अक्स दिखा जाता है.कहीं खुशी .. कहीं गम ...कहीं जोश-ऍ- जूनून तो कहीं झुंझलाहट नजर आती है.रात में टीवी के सामने " हॉट एंड मसाला कार्यक्रमों को देखने वालों का तबका भी होता है.युवा होस्टलों में जश्न का अलग अंदाज तो जिनकी एग्जाम चल रही है वे थोडा  सा एन्जॉय कर ज्यादा टाइम खोटी नहीं करना चाहते.
                               आज रात भी यही सब होगा . पिछले बरस अपने दद्दू ने टिप्पणी कीथी ,"दोस्त! बाजार और नई हवा के इशारे पर ही सही लोग अब अवसरों को बिंदास तरीके से जीने की जीवनशैली अपना चुके हैं.यह बात अलग है कि  जिंदगी में मिली सौगातें अपने-अपने पुरुषार्थ और नसीब का मिला-जुला फलादेश है.कुछ लोग नए वर्ष पर जश्न के साथ कोई रिसोलुशन भी लेते हैं . हाँ! कौन निभाता है कौन नहीं यह अपनी जिद की बात है.
                           " संकल्प के लिए नए बरस की शुरुआत की मोह्ताजगी  क्यों ? क्या हम साल भर उत्सव की तरह नए  संकल्पों के साथ नहीं मना सकते? "क्यूँ नहीं!नए वर्ष का सन्देश है परिवर्तन.हमसे जुडी  व्यवस्थाओं के प्रति जाग्रति,सच्चे ज्ञान ,प्रेम और खुशियाँ बाटने का संकल्प  कर हम साल भर उसपर अमल कर सकते हैं.रात गई, बात गई कहकर एक दिनी हुल्लड़ और अय्याशी से कुछ नहीं होने का.फिर भी टेंशन भरी जिंदगी में हम लोग फुल -टू मनोरंजन का कोई भी मौका नहीं चूकते..चूकना भी नहीं चाहिए.
       बीते बरस की विदाई और नए वर्ष के स्वागत को एक दिनी जश्न मानने वालों के अलावा बच्चे से बूढ़े तक के लिए नए वर्ष का समूचा अजेंडा  गुरुदेव रवीन्द्र नाथ  टेगोर की " गीतांजलि" में इन पंक्तियों से प्रतिध्वनित होता है-
                                जहाँ पर मस्तिष्क हो निर्भय,
                                  और भाल सदा गर्वोन्मत्त
                                  जहां  हो ज्ञान का मुक्त भंडार,
                                 जहाँ न हो विश्व विभाजित
                                  संकीर्ण सरहदी दीवारों से
                                    जहाँ सदा जन्म लें अक्षर
                                  ध्रुव सत्य की कोख से
                                 जहाँ अनथक  परिश्रम आतुर हो
                                  उत्कर्ष का आलिंगन करने
                                    जहाँ निरंतर प्रयोजन के स्रोत
                                   स्वार्थ मरू में न हो गए हो लुप्त
                                     जहाँ मेधा इन सत्य पुष्पों से
                                    सदैव हो परिचालित,विचारवान
                                     मेरे पिता!जागने दो मेरे देश  को!
चलिए छोड़िए.... बीते बरस की विदाई में जुट जाएँ  अपने- अपने तरीके से.कल सुबह कोई मंदिर जाएगा  भगवान से आशीर्वाद लेने ... आराध्य  से नया वर्ष सुखद होने की कामना करेंगे.कोई देर सुबह तक उनींदा सा होगा. आप सभी मेरे अपने है. सो नया वर्ष खूब प्यार और खुशहाली भरा होने की कामना इन शब्दों में करता हूँ
                         
                                     खुश रहिए ... खुश रखिए...और अपना ख्याल रखिएगा...बहुत बहुत प्यार
                                                                             किशोर दिवसे,बिलासपुर, छत्तीसगढ़, भारत
                                                                               मोबाईल -09827471743