गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

ठिठुरती रात की बात | Kishore Diwase

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ठिठुरती रात की बात | Kishore Diwase

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ड्रामा रेपर्टरी और आर्ट गैलरी बिलासपुर में खोली जानी चाहिए | Kishore Diwase

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ड्रामा रेपर्टरी और आर्ट गैलरी बिलासपुर में खोली जानी चाहिए | Kishore Diwasehttp://kishordiwase.blogspot.in/2013/12/blog-post_4205.html

बुरी नजर वाले तेरा मुह काला

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बुरी नजर वाले तेरा मुह काला -किसी ट्रक  के पिछवाड़े पर यह इबारत लिखी थी। ये नजर लगने का गणित अब तक मेरी समझ में नहीं आया। किसे ,कब, क्यों, कहाँ , कैसे ,नजर लगती है?नजर क्या सिर्फ -  खूबसूरत लोगो को लगती है या फिर हमारे जैसे काले -कलूटों को भी? किसी के घर जाओ -वापस लौटने पर कहा जाता  है- अरे  तुझे उस बुढ़िया की नजर लग गयी होगी!क्या उस बुढ़िया को भी किसी की  नजर लगती होगी?उस घर में रहने वालों को उसकी नजर क्यों नहीं लगती?क्या किसी भी उम्र वाले को हर उम्र वाले की  नजर लग जाती है?क्या पत्नी  गोरी  हो और पति काला - तो उसे साथ-साथ  रहने पर नजर नहीं लगती? परंपरा और विज्ञानं के तर्क के बीच अक्खे दिमाग का दही बन गया है!मेरी बीबी ने अगर गलती से यह पोस्ट पढ़ ली तो जरूर कहेगी- अरे! तुम्हे किसी की नजर लग गयी है , ऊल-जलूल  बकवास कर रहे हो!( वैसे अपुन को आदत है)
अब आप ही बताओ,( सीरियसली ) ये नजर लगने का मामला क्या है? अगर नहीं बताओगे तो - जा!तुझको हमारी नजर लग जाये!

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

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आप सब जागते रहें। अलख निरंजन !



मगर मच्छों का झुण्ड .. जबड़े पूरी तरह फाड़े हुए। नीयत , फ़ौरन   निगल जाने की । उनके बीच फंसा हुआ है एक हिरन। अपने कुछ नवजात शावकों के साथ। मार दिया जाय  या छोड़ दिया जाय!अमूमन यही सीन नजर आ रहा है दिल्ली की आप पार्टी सरकार के सन्दर्भ में।
               सारी  दुनिया की  निगाहें आप पार्टी की  अगुवाई में बन रही दिल्ली की  सरकार   पर टिकी है। सबसे पहली वजह यही कि दिल्ली की नवजात  सरकार  वैकल्पिक मीडिया के जबर्दस्त उत्प्रेरक प्रभाव  और राष्ट्रिय दलों के विरोध से प्रसूत बुनियादी मसलों की  रण - दुंदुभि से गूंजती नव गठित सरकार  है। जितनी अधिक अपेक्षाएं हैं उससे भी ज्यादा दुष्कर इस सरकार  का टिके रहना समझा जा रहा है,यकीनन है भी। सरकार  चलाने का तरीका समझने में इन्हें निश्चित रूप से वक्त लगेगा। दहकता सवाल कानून और साथ दे रही पार्टी कांग्रेस की  नीयत का भी है। संवैधानिक अड़चने भी मुह बाये खड़ी दिखाई देंगी।
                    जनता के सन्दर्भ में कहा जाये तो अगर दिल्ली के लोगो को आप पार्टी के 18 सूत्री घोषणा पत्र  में उल्लिखित वायदों के अमल का तोहफा मिल गया तब यह एक व्यवहारिक- चमत्कार ही होगा। और सिर्फ चमत्कार ही नहीं बल्कि पुख्ता नजीर भी  बन जायेगी कि सरकारी सुविधाओं और व्यवस्थापन पर सदियों से हो रहे बेतहाशा खर्च में इस तरह से कटौती कर दीगर सरकारें भी क्यों चलायी नहीं जा सकती अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि जिनके ( पार्टी और नेता) मुंह में खून लगा हो वे  नेक नीयत कैसे हो सकते हैं ?क्या दीगर राष्ट्रीय दल भी इस प्रयोग(जो  जन हितकारीदिखाई दे रहा है )को किसी भी तरीके से सफल होने देंगे? यह उनके बदनीयत इरादों के अस्तित्व की  रक्षा का प्रश्न होगा।  दिल्ली की सरकार  का यह प्रयोग अगर सफल होता है तब निश्चित रूप से चुनाव में सुधार( सरकारी व्यवस्थापना  व्यय में कटौती  व् अन्य बेहतर विकल्प  लाने की  जिम्मेदारी भारत कि जनता पर नहीं होगी ?इस मसले  पर जन जिहाद और आप पार्टी की  सरकार  की सफलता के मध्यकाल का अंतराल के बीच-- आप सब जागते रहें। अलख निरंजन !

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

भूख हूँ मैं... | Kishore Diwase

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भूख हूँ मैं...

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राबर्ट बिनयन की एक(अनूदित ) कविता 




भूख हूँ मैं...
=========
भीड़ से छिटककर आता हूँ मैं
किसी परछाई की तरह /और
बैठ जाता हूँ हर इंसान की बाजू में
कोई भी नहीं देखता मुझे/पर
सभी देखते हैं एक-दूसरे का चेहरा
वे जानते हैं की मैं वहां पर हूँ
मेरा मौन है किसी लहर की ख़ामोशी
जो लील लेता है बच्चों का खेल मैदान
धीमी रात्रि में गहराते कुहासे की तरह 
आक्रान्ता सेनाएं रौंदती,मचाती हैं तबाही
धरती और आसमान में गरजती बंदूकों से
लेकिन मैं उन फौजों से भी दुर्दांत
गोले बरसाती तोपों से भी प्राणान्तक
राजा और शासनाध्यक्ष देते हैं आदेश
पर मैं किसी को नहीं देता हुक्म 
सुनाता हूँ मैं राजाओं से अधिक
और भावपूर्ण वक्ताओं से भी 
निः  शपथ करता हूँ शब्दों  को
सारे उसूल हो जाते हैं असरहीन
नग्न सत्य अवगत हैं मुझसे
जीवितों को महसूस होने वाला
प्रथम और अंतिम शाश्वत हूँ मैं
भूख हूँ मैं... भूख हूँ मैं!




   

शनिवार, 26 मई 2012

सबसे खूबसूरत दिल वही जो बाँटता है प्यार...

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सबसे खूबसूरत दिल  वही जो बाँटता है प्यार...
" कुछ लोग तो ऊपर से बड़ी चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं लेकिन उनके मन में जहर भरा होता है.ऐसे मिठलबरा इंसानों के पेट में दांत होते हैं"
" ठीक कह रहे हो .. कुछ तो नारियल की तरह होते हैं ...ऊपर से सख्त लेकिन भीतर से उतने ही नर्म और कोमल"
"" सच कहा,हरेक इंसान की सूरत और सीरत  होती है. सूरत भले ही अच्छी न रहे पर सीरत अच्छी होनी चाहिए "
"बस ,वैसे ही जैसे भोला-भाला चेहरा और दिल बेईमान है.यानी तन के उजले , मन के काले!बातचीत के दरम्यान अक्सर यह कहते हुए  सुना जाता है कि अमुक इंसान बड़े ही प्यारे दिल  का  है.वह हर दिल अजीज बन जाता है.वहीँ जिसके दिल में खोट है वह लाख छिपाने पर भी छिप नहीं सकता."
        यूं ही समय काटने के लिए दद्दू और मैं गपिया रहे थे.मसला अच्छे और बुरे दिल का था.दद्दू बोले,"अखबारनवीस!ये दिल कैसी बला है मैं तो समझ ही नहीं पाता." मैंने कहा," दद्दू! ये दिल की रियासत भी बड़ा अबूझ तिलस्म है.बस इतना ही समझ लो-
                         दुनिया की बलाओं को जब जमा किया मैंने
                          धुंधली सी मुझे दिल की तस्वीर नजर आई
" पर अखबारनवीस!अगर किसी के दिल की तस्वीर धुंधली सी नजर आए तो समझना क्या मुश्किल नहीं होगा की अमुक इंसान का दिल अच्छा  है या बुरा!" -दद्दू ने फिर सवाल किया.
"देखो दद्दू!किसी का दिल अच्छा  है या बुरा यह पता  लगाने उसे गहराइयों तक समझना होता है.हालाकि  यह अनुभव की बात है पर एक किस्सा सुनो... सारी बात आईने की तरह साफ़ हो जाएगी.
                       " इस शहर  में मेरा दिल  सबसे खूबसूरत है" एक नौजवान शहर के बीच चौराहे पर खड़े होकर चुनौती भरा दावा कर रहा था.थोड़ी देर में वहां पर जबरदस्त भीड़ इकठ्ठा हो गई.सभी ने महसूस किया की उसका दिल एकदम चंगा है.उसके दिल पर कहीं जख्म नहीं था.न कहीं रिश्ता हुआ लहू,न कोई निशान." सचमुच यह सबसे खूबसूरत दिल है " पहले ने कहा." मैंने तो इससे प्यारा दिल कहीं नहीं देखा"दूसरे ने हामी भरी.धीरे-धीरे सभी लोग एक- दूसरे से सहमत होने लगे." फिर क्या हुआ अखबार नवीस!दद्दू ने अधीर होकर पूछा."अरे सुनो तो यार!वह नौजवान बड़े घमंड से " खपती की तरह अपने खूबसूरत दिल पर इतराने लगा.
                             अचानक  भीड़ को चीरता हुआ एक बूढा बीचोबीच आकर खड़ा हो गया.उसने नौजवान को चुनौती दी,"ओ नौजवान!आखिर तुम्हारा दिल मेरे  दिल की तरह खूबसूरत क्यों नहीं है?"चौंक गया वह नौजवान. उसने  बूढ़े के दिल में झांककर देखा.उसका दिल मजबूती से धड़क रहा था.लेकिन ओह!उसके दिल पर जख्मों के कई निशान थे.उस दिल में कई जगहों से मांस के टुकड़े गायब थे.अनेक जख्मों पर गोश्त के टुकड़े कहीं से बड़े ही बेतरतीब ढंग से चिपका दिया गए थे.उस नौजवान ने हैरत भरी आँखों से देखा.बूढ़े के दिल में कुछ स्थानों पर गड्ढे दिखाई दे रहे थे.वहां सिर्फ सूराख ही नजर आ रहा था.
                   समूची भीड़ की आँखें एक ही सवाल कर रही थीं," यह बूढा किस तरह दावा कर रहा है की उसका दिल सबसे खूबसूरत है " वे किंकर्तव्यविमूढ़  थे .उस बूढ़े के दिल की ऐसी हालत देककर नौजवान ने उपेक्षा भरा ठहाका लगाया और कहा," " इस बुढ़ापे में आपको ऐसा भद्दा मजाक करना शोभा नहीं देता.कहाँ मेरा दिल चुस्त  दुरुस्त और कहाँ आपका-सैकड़ों जख्मों से भरा... और आंसुओं के सैलाब में डूबा हुआ."
                 अब उन बूढी आँखों ने नौजवान को गहराई से देखकर कहा,"अरे नौजवान!तुम्हारा दिल सिर्फ देखने में अच्छा है पर उसे कसौटी पर नहीं परखा गया है.तुम जानते हो!मेरे दिल पर पड़ा हर एक  एक निशान उस इंसान का प्रतीक है जिसे मैंने अपना  प्यार दिया है.यह बात है की कुछ लोग   बदले में अपने दिल का टुकड़ा दे देते हैं.कई बार मेरे दिल के जख्मों पर वे टुकड़े बेतरतीब लगते है.लेकिन मैं दिल पर मौजूद उन पैबन्दों से भी मैं खुश हूँ क्योंकि वे मुझे प्यार बांटने का अहसास दिलाते रहते है.और इस दिल में सूराख बने हैं न..वो इसलिए क्यूंकि कुछ बेगैरत इंसानों ने मेरे प्यार के बदले अपने दिल का टुकड़ा नहीं लौटाया.
           भीड़ में सन्नाटा छा गया.वह नौजवान सम्मोहित सा उस बूढ़े की और देखने  लगा," सुनो ओ नौजवान!देख रहे हो मेरे दिल के सूराखों को?किसी को अपना प्यार देना " शतरंज की बाजी खेलना"  है.ये खुले जख्म काफी दर्द भरे हैं फिर  भी ये हमेशा  मुझे यही याद दिलाते  हैं," मैंने इन्हें कभी अपना प्यार दिया था .मुझे उम्मीद है 
की लोग कभी किसी रोज मेरा प्यार लौटाकर इस दिल के खुले जख्मों को भर देंगे.
               " अब तुम्हीं बताओ नौजवान!कौन सा दिल प्यार के काबिल है?तुम्हारा जो कोरे कागज की तरह है या मेरा जिसने प्यार बांटकर जख्म हासिल किये हैं?- उस बूढ़े की दर्द भरी आँखों में सवाल था.उस नौजवान की आँखों से आंसुओं की धाराएँ बह निकली.वह उस बूढ़े के पास गया और अपने खूबसूरत दिल का टुकड़ा निकालकर कांपते हुए हाथों से उसे सौप दिया.
                तत्काल ही बूढ़े ने अपने जख्मी दिल का टुकड़ा निकालकर नौजवान के दिल में लगा दिया.नौजवान ने देखा की अब उसका दिल देखने में सही नहीं था लेकिन पहले से कहीं बेहद खूबसूरत बन गया था... भले ही बूढ़े के दिल का टुकड़ा बेतरतीब ढंग से लगा था. दरअसल बूढ़े के दिल से प्यार का सैलाब उस नौजवान के दिल में समा  गया था.कुछ देर बाद वह भीड़ भीगी हुई आँखों से देख रही थी - उस बूढ़े और नौजवान ने एक-दूसरे को गले लगा लिया. अब वे साथ-साथ चलने लगे थे.
                       साथ -साथ चलते हुए दद्दू ने पूछा," अखबार नवीस!खुले दिल के...साफदिल और अच्छे दिल के लोग सब को पसंद आते हैं.यह तो बताओ कि  आपके दिल में कौन है?यार छोडो भी!!!उस वक्त तो दद्दू को मैंने टाल दिया था पर यही सवाल चूंकि आपने भी पूछा है ... तब तो बताना ही पड़ेगा न..
                            पूछते क्या हो की दिल में कौन है
                             लो... यह आईना उठाकर देख लो!!!

              

शुक्रवार, 25 मई 2012

.खबरदार .. पंखदार अफवाहें गिराती हैं बिजलियाँ....

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खबरदार .. पंखदार अफवाहें गिराती हैं बिजलियाँ....

किटी  पार्टी में श्रीमती बडबोले ने एक अफवाह मिसेज मंथरा  के कानों में कही.कुछ ही दिनों के बाद वह अफवाह समूची कालोनी में फ़ैल गयी.जिसके बारे में वह अफवाह थी वह बड़ी दुखी हुई.बाद में श्रीमती बडबोले को पता चला की अफवाह बेसिर -पैर थी....सफ़ेद झूठ. तब माथे पर हथेली मारकर बोली-" हाय राम! मैंने ये क्या कर डाला!"
              श्रीमती बडबोले को बहुत बुरा लगा( हालाकि  इस आदत की महिलाओं को नहीं लगता.)वह स्वामी मुक्तानंद के पास गई।
.और उनसे पूछा,"स्वामीजी! मेरी फैलाई हुई अफवाह से किसी के दिल पर चोट पहुंची है बताइये  मैं इसका प्रायश्चित्त कैसे करू?मैं सचमुच दुखी हूँ .
" ऐसा  करो... तुम बाजार जाओ.  एक मुर्गा खरीदना और उसे मार  डालने के लिए कहना .फिर मरे हुए मुर्गे को हाथ  में लेकर वापस अपने घर लौटना .लेकिन खबरदार!पूरे रास्ते भर एक-एक पंख नोंचकर सड़क पर डालती जाना.श्रीमती बडबोले इस सलाह से भौचक थी पर उसने वही  किया जो उससे कहा गया था.दुसरे दिन वह स्वामी मुक्तानंद के पास पहुंची. प्रणाम और आशीर्वचन की औपचारिकताओं  के बाद स्वामीजी ने मुस्कुराते हुए कहा,"भद्र महिला.. अब तुम जाओ और वे सारे पंख चुनकर वापस ले आओ जो तुमने कल  फेंके थे.वे सारे पंख मुझे लाकर देना .
                      काफी दूर चलने के बाद भी श्रीमती बडबोले को कोई पंख नहीं मिला." उफ़! न जाने वे सारे पंख कहाँ चले गए." ... वह खीझकर कहने लगी.कई घंटों की तलाश के बाद उसे सिर्फ तीन पंख हाथ लगे." तुमने देखा! उन पंखों को नोंचकर बिखेरना कितना आसान  था ?लेकिन उसे वापस लेना  कितना कठिन!" अपनी ओढ़नी  के सिरे से पसीना पोंछती श्रीमती बडबोले से स्वामी जी बोले.कहानी का क्लाइमेक्स अभी आने को ही था की अपने दद्दू ने तपाक  से बीच में चोंच मारी.,"भाई अखबारनवीस!ये तो बताओ फिर क्या हुआ?
                       "होना क्या था दद्दू!स्वामी जी ने श्रीमती बडबोले को समझाइश दी की किसी अफवाह को फ़ैलाने में अधिक समय नहीं लगता.एक बार आपने अफवाह फैलाई की बन्दूक की  तरह..... जंगल में आग की तरह फैलती है अफवाह.इससे होने वाले नुकसान का पूरो तरह प्रायश्चित्त नहीं कर सकते." लेकिन अखबारनवीस!क्या अफवाहबाज सिर्फ महिलाएं होती हैं?इन पर तो हमेशा आरोप लगता आया है कि  उनके पेट में कभी कोई बात नहीं पचती.आजकल मर्द तो इस मामले में महिलाओं से काफी आगे निकल चुके हैं.देखते नहीं!.. आफिस-आफिस, संस्थानों में काफी हाउस या गपोड़ियों के अड्डों पर किस तरह अफवाहों की मिसाइलें उडा  करती है?"दद्दू ने नया पासा फेंका.( बाद में पप्पू  से पता चला कि  श्रीमती जी को अफवाहबाज कहने पर उन्हें बेल्नास्त्र का प्रहार सहन करना पड़ा था।)
                        दद्दू के सर पर उमड़े गूमड़ को देखकर अखबारनवीस ने मुस्कुराते हुए कहा,"भाई दद्दू! अफवाहें सचमुच परेशानियों में डालती ही हैं.कानाफूसी से पैदा हुई अफवाहें मन और चरित्र पर भी असर डालती हैं.संस्थानों में भी कुछ अघोषित(?) पट्टे दार  इस काम के लिए शाबासी  हासिल करते हैं .वास्तव में देखा जाये तो अफवाहबाजी किसी के लिए शौकिया तो किसी के लिए चरित्र की खासियत बन जाती है.यकीन मानो , जो इंसान अफवाहों पर तत्काल भरोसा कर लेता है वह उसे फ़ैलाने का पहला दोषी है.सच कहूं  तो यह देखना  और महसूस करना कितने हैरत की बात  है की किस  तरह कुछ लोग अफवाहबाजी के चलते चरित्र और खुशियों को बर्बाद करते हैं।"
                            ठीक कह रहे हो अखबारनवीस! बच्चों को कई बार यह कहकर भरमाया जाता है," वो देखो! कौवा कान ले गया.आसमान गिर रहा है....सारे जानवर भागने लगते हैं  .पर कभी आसमान गिरता है क्या? खैर! चाय की चुस्कियों के साथ किस्सेबाजी का दौर ख़त्म हुआ ही था कि  महरी अपना एक हाथ कमर पर और दूसरा नचा-नचाकर र्रिम्तीजी से कह रही थीं," मैडम जी।.. मैडम जी! मंथरा  मैडम जी से किसी ने कहा  मालूम....शुक्रवार की रात को नौ बजे उत्तर दिशा में नीली रौशनी वाला एक तारा चमककर दक्षिण की और जायेगा  .उसे देखकर सवा किलो मिठाई जो ब्रह्मण को दान करेगा उसे एक सप्ताह के भीतर खूब धनराशी प्राप्त होगी . 
                   
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सोमवार, 21 मई 2012

ख़ुशी का पैगाम कहीं कहीं दर्दे जाम लाया!!.

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ख़ुशी  का पैगाम कहीं कहीं दर्दे जाम लाया!!.


शायद इस बूढ़े बाप को मनी आर्डर  भेजा हो बेटे ने....मेरा इंटरव्यू काल लेटर होना चाहिए....पप्पू ने सोच ... बलम परदेसिया को दुखियारी बिरहन की यादे हो..... उस भाभी का मन कह रहा था जिसके साजन नौकरी धंधे की जुगत में दूर शहर में रहते हैं...... और नजरें चुराकर चांदनी भी देखती है कहीं उसके चकोर ने गुलाबी ख़त भेजा हो.... इधर निपट देहातन की सूनी नजरें  भी तक रही हैं उसी को जो आकर चिट्ठी भी बांच देगा.कोई और नहीं..एक ही है वह शख्स जिसे हम कहते हैं पोस्ट मेन या डाकिया.
                          याद है पहले कितनी चिट्ठियां लिखा करते थे आप और हम!ख़ुशी और गम के कडवे -मीठे घूँट चिट्ठियां बांचते ही पीने पड़ते थे.मुस्कान और आंसू देने वाली ये इबारतें कभी लिफाफे के भीतर तो कभी अंतर देशीय या पोस्ट कार्ड पर।ज़माने की रफ़्तार ने ढेर सारे नए जरिये पैदा कर दिए है ... डाकिये भी हैं और उनका विकल्प भी आज के हाई -टेक युग में आना ही था ..फिर भी आज भी कानों में गूंजती है एक आवाज जो बढ़ा देती है हर किसी के दिल की धडकनें -
                            डाकिया डाक लाया डाकिया डाक लाया 
                           ख़ुशी का पैगाम कहीं कहीं दर्दे जाम लाया 
क्या आपको याद है पिछली बार आपने चिट्ठी कब लिखी थी?वही  डाकिया  जो अक्सर दरवाजे की सांकल या कालबेल बजाकर आवाज लगता था -पोस्ट मेन  अब कितनी बार घर आता है?चिट्ठियां लिखना कम हो गया तो पाओगे कहाँ से? सारे  परिवार का हाल-चाल , सुच-दुःख की बातें.. मान-मनुहार यानी  भावनाओं की भानुमती का पिटारा हुआ  करती थी चिट्ठियां  .  
                        आप में से बहुतों को मालूम है चिट्ठियां लाने - ले जाने वाले कासिद हुआ करता है.राजा  महाराजाओं के जमाने में कबूतर भी कासिद  हुआ करते थे जो प्यार के पैगाम ले जाते.ऐसे ही आशिक राजकुमार के दीदार को ,तरसती माशूका ने एक ख़त लिखा और तड़पकर कासिद से कहा -
                     नामाबर ख़त में मेरी आँख भी रखकर ले जा 
                    क्या गया जो देखने वाली भी न गयी 
खतों में गीत-गजल, शायरियां लिखने का रिवाज भी खूब चला था.दिल को छू लेने वाली चिट्ठियां लिखना भी एक कला है.पंडित नेहरू,महात्मा गाँधी,अब्राहम लिंकन ,अमृता प्रीतम,के लिखे खत  ऐतिहासिक  दस्तावेज है.विश्व विख्यात चित्रकार विन्सेंट वान  गो और उनके भाई थियो के पत्रों पर आधारित उपन्यास " LUST FOR  LIFE अद्भुत रचना है.पत्रों का अनोखा संसार है क्योंकि चिट्ठियां ऐसी पंखदार कासिद हैं जो पूरब से पश्चिम तक प्यार की राजदूत बनकर जा सकती हैं.ऐसी ही एक चिट्ठी मोर्चे डटे जवान को मिलती है और खंदक में ही वह अपने दोस्तों के साथ एक गीत गाता है ( फिल्म बार्डर)-
                             संदेशे आते हैं, वो पूछे जाते हैंकि तुम कब आओगे
                             की घर कब आओगे ये घर तुम बिन सून सूना है...
फिल्म पलकों की छाव में -डाकिये की भूमिका में राजेश खन्ना ने परदे पर दिल छू लेने वाला गीत गया था -डाकिया डाक लाया.... फिर ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम...और ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू...और चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है...
                               और एक बात मेरे नौजवान दोस्तों के लिए - साहित्यकार जान जेकिन रूसो ने कहा है सबसे अच्छा प्रेम पत्र लिखने,   बगैर जाने यह लिखना शुरू कीजिए की आप क्या चाहते  हैं .यह जाने बिना भी ख़त्म कीजिए की  आपने क्या लिखा है.पर जरा गौर तो कीजिए इस नौजवान ने एक रूक्के पर हाले-दिल किस  तरह बयान किया है-
                                मेरे कासिद जब तू पहुंचे मेर दिलदार के आगे
                                अदब से सर झुकाना हुस्न की सरकार  के आगे
डाकिये की जिंदगी रील लाइफ में जितनी अलहदा है रियल लाइफ में उतनी ही कठिन और संघर्ष पूर्ण.उसकी सायकल के कैरियर और झोले में बिल.व्यावसायिक पत्र,अखबार, मैगजीन और  रजिस्टर्ड पार्सल होंगे पर  जज्बातों में डूबी चिट्ठियां अब नहीं होतीं.आज अगर किसी को चिट्ठियां लिखने को कहें तो वह कहेगा ,"क्या लिखूं कुछ भी समझ में नहीं आता."पर एक बात जरूर समझ में आ गयी की बदलते वक्त के साथ लोगों के मिजाज भी बदल गए हैं .दद्दू के घर टीवी चैनल पर एक फ़िल्मी गीत चल रहा है-
                            कबूतर जा जा जा ... कबूतर जा जा जा
                            पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ
 छोडो कल की बातें... अब तो क़ासिद का काम अपना मोबाइल ही सम्हाल रहा है.डाकिये और कूरियर सर्विस से आगे जरूरी मैसेज या " नन्ही इबारतों वाले खत " ये कासिद  ही लाते-ले जाते हैं.क्या नयी क्या पुरानी जनरेशन ... ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं.. पार एक बात का यकीन मानिए  अच्छी  .. प्यारी और खूबसूरत चिट्ठियां लिखने वाला इंसान ही संजीदा संवेदनशील और मुहब्बत भरे दिल का मालिक होता है.चिट्ठी लिखकर अपने भीतर खुद की तलाश कीजिए सिर्फ  चिट्ठियों के जरिये किया जाने वाला प्यार प्लेटानिक लव कहलाता है.
                                     एक बार फिर चिट्ठियों ..खतों.. कासिद और नामाबर की दुनिया के करीब से गुजर कर देखिये,खुद को तलाशने का एक आइना यह भी है.एक मिनट...रुकना जरा..देखूं तो मेरा कासिद "इलेक्ट्रानिक कासिद "यानी मेरा मोबाइल कौन सा पैगाम लेकर आया है-
                अगर जिंदगी में जुदाई न होती,तो कभी किसी की याद आई न होती
                साथ ही अगर गुजरते हर लम्हे तो शायद रिश्तों में ये गहराई न होती