मंगलवार, 5 जुलाई 2011

दुखवा मैं कासे कहूं मोरी सखी!!!

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प्रिय सखी
सच कहती हूँ... मेरी तकदीर में सुख कम दुःख ज्यादा लिखे हैं.अक्सर सफ़र पर ही रहती हूँ.कभी शहर के भीतर तो कभी लम्बे सफ़र पर....छोटे शहर से बड़े शहर तक.कई बार मेरी यात्रा एकदम तन्हाइयों में होती है . हाँ शहर के भीतर जरूर बच्चे से लेकर बूढ़े तक मेरे साथ होते हैं.दूर के सफ़र में मेरे इर्द-गिर्द बस... पेड़ -पौधे ... आसमान से मेरा चेहरा तकते चाँद-सूरज और मेरे जिस्म से होकर गुजरते इक्का-दुक्का इंसान या फिर भीड़ का रेला जो कभी रुकता ही नहीं.
सखी रे..मेरे बगैर कोई भी नहीं रह सकता.सब मुझे इस्तेमाल कर भूल जाते है.यूज किया और हाथ झाड़कर चल दिए.कभी कोई गौर करता है मेरी हालत पर?कैसी दिख रही हूँ मैं.. मेरी तबीयत ठीक है या नहीं... शरीर पर जख्म हैं तो नहीं! कई लोग तो बेवकूफों की तरह देखते रहते हैं ... मेरा जिस्म छलनी हुआ जाता है पर मुझसे बदसलूकी करने वालों को रोकते ही नहीं.... सजा क्या ख़ाक देंगे?माना कि मेरे साथ मील के पत्थर हैं पर वे भी तो गूंगे हैं!
सखी रे! तुम सब मेरी सहेलियां हो जो छोटी-छोटी जगह से आकर मुझसे अक्सर मिलती हो .न जाने कितने कोनों से.. नुक्कड़ों से घूम-फिरकर कितनी तकलीफें बर्दाश्त कर मेरे पास आती हो.तुम भी तो कह रही थीं आस-पास के लोग इतने बदतमीज हैं जरा भी ध्यान नहीं रखते.सच कहूं...अगर हमारे बाजू वाले घर के लोग इंसानों की तरह रहना सीख जाएँ तो हम सब क्या खुश नहीं रहेंगी?नल की पाइप लाइन और केबल बिछाने वालों ने तो हमारा जीना हराम कर रखा है.सखी रे.. लोग कितने बेशर्म हैं.. अपना घर तो रखेंगे टिप-टाप लेकिन कचरा हमपर फेक देंगे.न जाने अपनी जिम्मेदारी समझने की अक्ल उन्हें कब आयेगी ?
जब से अन्दर ग्राउंड ड्रेनेज का काम शुरू हुआ है सिम्प्लेक्स वालों ने हमारा सब कुछ लूट लिया.. कहीं मुंह दिखने लायक नहीं छोड़ा. अरे नामाकूल साहबों!हमारी हालत सुधरने की सही प्लानिंग नहीं कर सकते तो कम से कम हमारी अस्मत तो मत...गैरों के करम... अपनों के सितम!एक बात बताऊँ.."बड़े साहब" लोगों के घर के सामने से जब मैं गुजरती हूँ तब प्रशासन भी मेरा खूब ख्याल रखता है.लगता है मैं पार्लर से आ रही हूँ.लेकिन बाहरी और शहर के भीतरी इलाकों में मेरी हालत बद से बदत्तर है. आल अफसरों के कुकर्मों की सजा मुझे ... गालिया मेरे नसीब में क्यों !
सखी रे...नेताओं के आगमन पर स्वागत के लिए गेट बनाने वाले ,शादी के मंडप गाड़ने वाले इतने नालायक हैं ... मेरी हालत बिगड़कर रख देते हैं.न जाने कितनी बार कह चुकी हूँ की मेरी देह की दूरियां सम्हालकर आहिस्ता-आहिस्ता बड़े प्यार से....तय किया करो. कितनी जल्दबाजी... अरे बच्चा ..युवक ,युवती ही या बूढा... कोई भी इंसान हो उसके खून से मेरा जिस्म ही भीगता है न! भगवान न करे आपको कुछ हो गया तो!!! जख्मी होंगे आप पर दिल तो मेरा जार -जार रोयेगा न! धीरे नहीं चला सकते गाड़ियाँ?सखी रे!देख न! लोग कितने गैर-जिम्मेदार हैं !उस पढ़े-लिखे नौजवान ने गुटका खाया और पाउच फेक दिया मुझपर. लड़कियों ने कार के भीतर से पालीथिन और प्लास्टिक की बोतले बाहर फेक दीं.खाओगे पान और थूकोगे मुझपर! अपने घर के कमरे में थूको. जरा भी नहीं सोचते ... स्टूपिड कहीं के.. नगर निगम और लोक निर्माण विभाग मेरा बाबुल है तो आप सब भी मेरा ही परिवार हो.
आपके शहर में अक्सर बीमार रहती हूँ. आपके घर आने वाले मेहमान भी मुझे देखकर मुह बिचकाते हैं.विदेशों में तो मेरे साथ बदतमीजी करने पर तुरंत जुरमाना होता है . दोराहे तिराहे और चौराहे पर जब भी सखियों से मुलाकात होती है हाल-चाल जानने को मन उतावला रहता है.देख न.. न जाने कितने लोग हमसे होकर चले गए लेकिन किसी ने हमारे बारे में सोचा! रायपुर , नागपुर और कई शहरों की मेरी सहेलियां कितनी खूबसूरत और टनाटन ...गार्जियस लग रही है.एक बात तय है. अप मेरा जितना ख्याल रखोगे मै आपका उतना ख्याल रखूंगी.
अच्छा अब आप मेरा नाम पूछेंगे.पर बिलकुल नहीं बताऊंगी.पहचान कौन???चलो ठीक है.आप सब मेरे अपने है.पहले वायदा कीजिए कि आप लोग मेरा ख्याल रखेंगे ... वर्ना कभी फिसलकर गिरेंगे तो खूब ठहाका मारकर हसूंगी आपपर हाँ!!! फिर मत कहना.क्या कहा/ मिलना है मुझसे? ठीक है.. तो घर से बाहर आ जाओ न..चौराहे तक साथ चलो मेरे साथ. लेकिन मुझसे मिलने जरा अपनी निगाहें तो झुका लीजिये जनाब!!!!! अपना और मेरा ख्याल रखिये....
किशोर दिवसे.



दुखवा मैं कसे कहूं मोरी सखी!!!

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प्रिय सखी
सच कहती हूँ... मेरी तकदीर में सुख कम दुःख ज्यादा लिखे हैं.अक्सर सफ़र पर ही रहती हूँ.कभी शहर के भीतर तो कभी लम्बे सफ़र पर....छोटे शहर से बड़े शहर तक.कई बार मेरी यात्रा एकदम तन्हाइयों में होती है . हाँ शहर के भीतर जरूर बच्चे से लेकर बूढ़े तक मेरे साथ होते हैं.दूर के सफ़र में मेरे इर्द-गिर्द बस... पेड़ -पौधे ... आसमान से मेरा चेहरा तकते चाँद-सूरज और मेरे जिस्म से होकर गुजरते इक्का-दुक्का इंसान या फिर भीड़ का रेला जो कभी रुकता ही नहीं.
सखी रे..मेरे बगैर कोई भी नहीं रह सकता.सब मुझे इस्तेमाल कर भूल जाते है.यूज किया और हाथ झाड़कर चल दिए.कभी कोई गौर करता है मेरी हालत पर?कैसी दिख रही हूँ मैं.. मेरी तबीयत ठीक है या नहीं... शरीर पर जख्म हैं तो नहीं! कई लोग तो बेवकूफों की तरह देखते रहते हैं ... मेरा जिस्म छलनी हुआ जाता है पर मुझसे बदसलूकी करने वालों को रोकते ही नहीं.... सजा क्या ख़ाक देंगे?माना कि मेरे साथ मील के पत्थर हैं पर वे भी तो गूंगे हैं!
सखी रे! तुम सब मेरी सहेलियां हो जो छोटी-छोटी जगह से आकर मुझसे अक्सर मिलती हो .न जाने कितने कोनों से.. नुक्कड़ों से घूम-फिरकर कितनी तकलीफें बर्दाश्त कर मेरे पास आती हो.तुम भी तो कह रही थीं आस-पास के लोग इतने बदतमीज हैं जरा भी ध्यान नहीं रखते.सच कहूं...अगर हमारे बाजू वाले घर के लोग इंसानों की तरह रहना सीख जाएँ तो हम सब क्या खुश नहीं रहेंगी?नल की पाइप लाइन और केबल बिछाने वालों ने तो हमारा जीना हराम कर रखा है.सखी रे.. लोग कितने बेशर्म हैं.. अपना घर तो रखेंगे टिप-टाप लेकिन कचरा हमपर फेक देंगे.न जाने अपनी जिम्मेदारी समझने की अक्ल उन्हें कब आयेगी ?
जब से अन्दर ग्राउंड ड्रेनेज का काम शुरू हुआ है सिम्प्लेक्स वालों ने हमारा सब कुछ लूट लिया.. कहीं मुंह दिखने लायक नहीं छोड़ा. अरे नामाकूल साहबों!हमारी हालत सुधरने की सही प्लानिंग नहीं कर सकते तो कम से कम हमारी अस्मत तो मत...गैरों के करम... अपनों के सितम!एक बात बताऊँ.."बड़े साहब" लोगों के घर के सामने से जब मैं गुजरती हूँ तब प्रशासन भी मेरा खूब ख्याल रखता है.लगता है मैं पार्लर से आ रही हूँ.लेकिन बाहरी और शहर के भीतरी इलाकों में मेरी हालत बद से बदत्तर है. आल अफसरों के कुकर्मों की सजा मुझे ... गालिया मेरे नसीब में क्यों !
सखी रे...नेताओं के आगमन पर स्वागत के लिए गेट बनाने वाले ,शादी के मंडप गाड़ने वाले इतने नालायक हैं ... मेरी हालत बिगड़कर रख देते हैं.न जाने कितनी बार कह चुकी हूँ की मेरी देह की दूरियां सम्हालकर आहिस्ता-आहिस्ता बड़े प्यार से....तय किया करो. कितनी जल्दबाजी... अरे बच्चा ..युवक ,युवती ही या बूढा... कोई भी इंसान हो उसके खून से मेरा जिस्म ही भीगता है न! भगवान न करे आपको कुछ हो गया तो!!! जख्मी होंगे आप पर दिल तो मेरा जार -जार रोयेगा न! धीरे नहीं चला सकते गाड़ियाँ?सखी रे!देख न! लोग कितने गैर-जिम्मेदार हैं !उस पढ़े-लिखे नौजवान ने गुटका खाया और पाउच फेक दिया मुझपर. लड़कियों ने कार के भीतर से पालीथिन और प्लास्टिक की बोतले बाहर फेक दीं.खाओगे पान और थूकोगे मुझपर! अपने घर के कमरे में थूको. जरा भी नहीं सोचते ... स्टूपिड कहीं के.. नगर निगम और लोक निर्माण विभाग मेरा बाबुल है तो आप सब भी मेरा ही परिवार हो.
आपके शहर में अक्सर बीमार रहती हूँ. आपके घर आने वाले मेहमान भी मुझे देखकर मुह बिचकाते हैं.विदेशों में तो मेरे साथ बदतमीजी करने पर तुरंत जुरमाना होता है . दोराहे तिराहे और चौराहे पर जब भी सखियों से मुलाकात होती है हाल-चाल जानने को मन उतावला रहता है.देख न.. न जाने कितने लोग हमसे होकर चले गए लेकिन किसी ने हमारे बारे में सोचा! रायपुर , नागपुर और कई शहरों की मेरी सहेलियां कितनी खूबसूरत और टनाटन ...गार्जियस लग रही है.एक बात तय है. अप मेरा जितना ख्याल रखोगे मै आपका उतना ख्याल रखूंगी.
अच्छा अब आप मेरा नाम पूछेंगे.पर बिलकुल नहीं बताऊंगी.पहचान कौन???चलो ठीक है.आप सब मेरे अपने है.पहले वायदा कीजिए कि आप लोग मेरा ख्याल रखेंगे ... वर्ना कभी फिसलकर गिरेंगे तो खूब ठहाका मारकर हसूंगी आपपर हाँ!!! फिर मत कहना.क्या कहा/ मिलना है मुझसे? ठीक है.. तो घर से बाहर आ जाओ न..चौराहे तक साथ चलो मेरे साथ. लेकिन मुझसे मिलने जरा अपनी निगाहें तो झुका लीजिये जनाब!!!!! अपना और मेरा ख्याल रखिये....
किशोर दिवसे.


शनिवार, 2 जुलाई 2011

सूखी अरपा ....

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सूखी अरपा ....

आज सचमुच देखा 
अपनी अरपा का सूखा तन 
कसक उठी,दुखी हुआ मन
सूखी अरपा ,खोया यौवन धन 
  
 आज सचमुच देखा
अरपा की पसरी रेत
दूर तक फैला पाट
बेजान  ,नीरव और सपाट

आज सचमुच देखा 
 चीखती अरपा पहियों के नीचे 
छलनी करती लौह मशीनें
उसे बेचकर चांदी कूतते
नराधमों का कुनबा

आज सचमुच देखा
अरपा के पाट का दर्द
हाँ! उसे ही दिखता है दर्द 
जो सुनता है नदी की कराह को 
और महसूसता है मरू के श्वास

आज सचमुच देखा
अरपा के पाट पर गूंजते 
स्वर संकेतों का  करुण क्रंदन 
पाट गर्भ से गूंजती चीखें
नवजात शिशुओं , अनचीन्हे शवों की
और रेत से निकलती गर्म साँसें 
कहाँ है सचमुच की नदी
उसकी खिल-खिल हंसी!!!

आज सचमुच देखा 
रेत को बदलते  हुए 
अनगिनत इंसानी शक्लों में
सुना आपने! सूखी रेत पूछती है 
कहाँ है पानी... कहाँ है पानी!!


अरे इंसान बंद कर  नादानी
कब तक रौंदेगा मेरी छातियों को?
सूखा है पाट, धधकता है मन
कब भीगेगा मेरा प्यासा तन?
मेरी गहराइयों का अतलांत!
मै गाऊंगी- कल -कल छल- छल 
स्वप्नाकांक्षा  कब होगी शांत!!!
                                                                   किशोर दिवसे 















शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

गूगल के संस्थापकों से आगे निकले फेसबुक के जुकरबर्ग

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गूगल के संस्थापकों से आगे निकले फेसबुक के जुकरबर्ग




 सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग अमीरी के मामले गूगल के संस्थापकों सर्गी ब्रिन और लैरी पेज से आगे निकल गए हैं। महज 27 साल के जुकरबर्ग 18 अरब डॉलर [करीब 81 हजार करोड़ रुपये] की संपत्ति के साथ अब प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की तीसरी सबसे अमीर शख्सियत बन गए हैं। माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स [56 अरब डॉलर] और ओरेकल के लैरी एलिसन [39.5 अरब डॉलर] ही अब उनसे आगे हैं।
टाइम मैगजीन के मुताबिक इस साल की शुरुआत में जुकरबर्ग की संपत्ति 13.5 अरब डॉलर [करीब 60,750 करोड़ रुपये] आंकी गई थी। जुकरबर्ग की संपत्ति में यह इजाफा फेसबुक में जीएसवी कैपिटल कॉरपोरेशन के निवेश के बाद हुआ है। इस हफ्ते की शुरुआत में जीएसवी कैपिटल ने 29.28 डालर प्रति शेयर के हिसाब से फेसबुक के दो लाख 25 हजार शेयर खरीदे। इससे चर्चित वेबसाइट का मूल्य करीब 70 अरब डॉलर [करीब 3,15,000 करोड़ रुपये] हो गया।
टाइम ने लिखा है, 'नए आकलन के मुताबिक जुकरबर्ग ने गूगल के सर्गी ब्रिन और लैरी पेज को पीछे छोड़ दिया है।' माना जा रहा है कि दोनों की संपत्ति में गिरावट आई है। मार्च के 19.8 अरब डॉलर के मुकाबले उनकी संपत्ति अब 17 अरब डॉलर [करीब 76,500 करोड़ रुपये] आंकी गई है
।

गुरुवार, 30 जून 2011

डाक्टर्स डे पर सभी डाक्टरों को बधाई

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डाक्टर्स डे आज जुलाई की पहली तारीख को है. सभी डाक्टरों को बधाई .साथ ही यह आव्हान भी की वे यह सोचें की मरीजों के साथ उनके भावनात्मक  सम्बन्ध कितने रह गए है. मेडीकल ज्यूरिसप्रूडेंस  में Doctor -Patient bonding  का विस्तृत उल्लेख किया गया है. फिल्म मुन्ना भाई एमबीबी एस  में डीन का यह कहना " मैं मरीज से कभी प्यार नहीं करता. -आखिर क्या दर्शाता है? 
                  अस्पतालों की क्या हालत है? सरकारी डाक्टर और निजी प्रेक्टिस का विवाद जारी है.शासकीय अस्पताल अभी तक सुविधाओं के आभाव से जूझ  रहे है. क्या डाक्टरों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं? प्रोफेशनल होने का क्या यह मतलब होता है की इंसानियत को ताक़ पर रख दिया जाये? इन्डियन मेडिकल एसोसियेशन पूरी तरह निष्क्रिय है? झोला छाप डाक्टरों के विज्ञापन अखबारों में छप रहे है. चिकित्सकीय सुविधाएँ पर्याप्त हैं या नहीं इसे कोई भी नहीं देख रहा है.
                               Medical representative  और डाक्टरों के बिजनेस रिश्ते मरीजों की जेब पर डाका डाल रहे है.दवाइयों की कीमतें अनाप-शनाप वसूली जा रही हैं .जेनेरिक दवाइयों और मल्टीनेशनल कंपनियों की दवाओं में कुश्तियां जारी हैं .मार्जिन २००-३०० फीसदी खींच रही हैं  कम्पनियाँ. कोई  देखनेवाला नहीं.
                 छत्तीसगढ़ का हाल  देखिये. रायपुर ,बिलासपुर, जगदलपुर मेडिकल कालेज और अस्पतालों में पिछले तीन महीनों से दवाइयाँ नहीं हैं. करोड़ों का बजट है पर दवा नहीं खरीदी जा रही है. मरीज परेशान है,वे भाड़ में जाएँ किसी को क्या फरक पड़ता है? स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल कहते हैं की हम पता लगाते है... बहरहाल डाक्टरों को अपने पेशे में पारदर्शिता बरतनी चाहिए. पैसा तो जरूर कमायें पर कुछ नैतिकता बचाकर रखें. डाक्टर्स डे पर उन्हें हार्दिक बधाइयाँ....
                                                               किशोर दिवसे 

बुधवार, 29 जून 2011

अपनी ही साँसों का कैदी, रेशम का यह शायर

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शहतूत की शाख पे बैठा कोई                                                              
बुनता है रेशम के तागे 
लम्हा-लम्हा खोल रहा है, पत्ता-पत्ता बीन रहा है 
एक-एक सांस बजाकर सुनता है सौदाई
एक-एक सांस को खोल के ,अपने तन पे लिपटाता जाता है
अपनी ही साँसों का कैदी  रेशम का यह शायर एक दिन
अपने दी तागों में घुटकर मर जायेगा
                      शहतूत  की पत्तियों पर बैठे हरे रंग के कीड़े को रेशमी शायरी ओढाने की अद्भुत  कल्पना सिर्फ गुलजार के बस की ही बात  हो सकती है शायद किसी और की  नहीं.रेशम का एक हसीन शायर कहकर शाह्तूती कीड़े को जो इज्जत बक्षी है गुलजार ने उसका अंदाज रेशम विभाग के किसी अफसर ने सपने में भी  सोचा होगा ऐसा नहीं लगता.बिलकुल आसान  नहीं था रेशम बुनने वाले इस अदने से जीव की शब्दों के पवित्र फूलों से सारी जिन्दगी संवार देना.
                           यों तो जिन्दगी का फलसफा जड़-चेतन वस्तुएं ,भूख-प्यास ,प्रेम,ईर्ष्या,मौसम,नजर ,समंदर,रोजा,आग,इंसान,कासिद,तन्हाई,कलाम,हिचकी,जुर्म,अखबार   युद्ध,नेता,सियासत और ऐसे ही अनगिनत विषयों पर कवियों और शायरों ने खूब लिखा है .. लिखते ही रहते है.फिर भी कीड़े -मकोड़ों ,जानवरों या प्राणी जगत पर रचनाएं अपेक्षाकृत  कम ही देखने -पढने को मिलती हैं.हिंदी के कवियों ने जीव-जंतुओं पर काफी कलम चलाई है लेकिन अंग्रेजी के साहित्यकारों ने प्राणी जगत को पंखिल शब्दों  के जादू से जो करिश्माई और गगनचुम्बी ऊंचाई दी है वह सचमुच कमाल की है.
                  किसी भी जंतु अथवा प्राणी की आकृति और चरित्र को यथार्थ और फंतासी के दोहरे नजरिये से महसूस कर कवितायेँ रचना कमाल का हुनर  है.अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद इस करिश्मे का साक्ष्य हैं.
                " मैंने नहीं देखी होती वह पगडण्डी                     
               सफ़ेद पतली और चमकीली
              कभी न कर पाता कल्पना मैं
               धीमी पर निश्चित प्रगति के लिए
                 घोंघे के उस मंथर उन्माद की
                हरी चादर पर रेंगता है एक घोंघा
    घोंघे पर थोमस गन की यह कविता जीवंत चित्रण करने में सक्षम है.एडवर्ड थोमस ने उल्लू पर  लिखा है -
                  

                      निस्तब्ध निशा का वह सन्नाटा 
                     जिसे चीरती  थी कर्कश चीख 
                      उलूक ध्वनी थी कितनी अवसाद भरी 
                     लम्बी चीख पहाड़ी पर गूंजती 
वाय.बी कीट्स ने शिशिर में वनों के राजहंस की कल्पना में प्रकृति का चित्रं करते समय लिखा है -
                 धवल पंखों की थिरकन/वह प्रणय नर्तन
                 हंस युगलों की जलक्रीडा 
               और उनका नया बसेरा
 टेड हग ने अपनी कविता हाक रूस्तिंग   में बाज के खौफ का जिस अंदाज में वर्णन किया है वह निम्न काव्यांश में स्पष्ट है-
                 " और उन्ही पंजों से जकड लिया है/
                   सृष्टि को मैंने
                  बांधे हैं मैंने मृत्यु दंड के आदेश
                  वृहत वर्तुलों के अपने यम् पाशों  से 
                  जब जिस पर चाहूँ देता हूँ फेंक
 रहस्यवाद  के आवरण में पीटर पोर्टर ने  बिल्ली पर कल्पना की है कि  वे पतनोंमुखी समाज में पूजित रहीं.वे बैठकर मूत्र विसर्जन करती है और जुगुप्सा भरी है उनकी प्रणय-आराधना.दी .एन. लारेंस ने भी पहाड़ी सिंह पर  लिखी कविता में मानव समाज की और से प्राणी जगत में होने वाले अतिक्रमण की पराकाष्ठा का चित्रण किया 
है.
                    इंसान अधिकारी है खुलेपन का
                     और हम सिमटे है घाटी के धुंधलके में!
घाटी के धुंधलके से लौटते हैं हम अपने घरों में जहाँ हम परेशां हैं मच्छरों से.डेविड हर्बर्ट लारेंस की कविता  में पारभासी पिशाच के   रक्त शोषी चरित्र  से आप  दंशित  हो चुके हैं.विस्तृत कविता  में उल्लिखित बिम्ब और प्रतिमान अद्भुत हैं.अल्फ्रेस लार्ड टेनिन्सन ने उकाब ( ईगल) का वर्णन करते हुए लिखा है-
                 तीक्ष्ण दृष्टि है उसकी शिकार के पीछे
                 झपटता है वह बिजली बनकर नीचे
अपने प्रेमगीतों के लिए मशहूर पर्सी बायसी शैली की लिखी कविता " टू द विडो बर्ड " के काव्यांश  देखिये-
                 बिछड़ी माशूका के गम में मायूस था 
                विरह से व्यथित एक विरही परिंदा
               बैठा था कांपती डाल के कोने पर 
                  गुमसुम यादों के हसीं हिंडोले पर 
हिंडोले से नीचे उतरकर कल्पना कीजिए विलियम कापर के उस खरगोश की जो चिर निद्रा में लीन है.कापर ने अपने शब्दों में दर्द इस तरह से उंडेला है-
                अब अखरोट की छाया तले है 
                 उसका बसेरा ,चिरनिद्रा में लीन
                 मानो  खामोश करता है प्रतीक्षा 
               मेरे पुचकारने की!!!!
पुचकारते हुए शब्दों को वितर बायनर ने सरपट दौड़ते हुए अश्व की अनावृत्त पीठ कहा है." हार्सेस "नामक कविता में शब्दों के लिए अश्व का अद्भुत प्रतीकात्मक उपयोग किया गया है.
               काव्यधारा में वनचरों की आकृति ,चारित्रिक एवं व्यवहारगत विशेषताएं रचना धर्मियों  के लिए प्रेरक हैं.वनचरों को दर्शन से जोड़ने की महारत एक तरह से नए रचनाकारों को उत्तेजित और उकसाती हुई लगनी चाहिए..हिंदी-अंग्रेजी कविताओं के अलावा शायरियों में भी कीट-पतंगे को परवाने की शक्ल में अक्सर याद किया गया है गौर कीजिए-
                    इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
                   जलती है शम्मा मगर नाम है परवाने का
परवाने की बात छोडिये सांप को प्रतीक बनाकर चंदन और दोस्त के साथ अनेकों बार वाहवाही लूटी गई है.कबूतर और जुगनू भी फिल्मी गीतकारों के अजीज रहे है .फिल्मी गीत कबूतर जा  जा  जा और राहत इन्दौरी की यह बात कभी-कभी आपके मन को भी जगमगाती होगी-
                 लाख सूरज से दोस्ताना  रखो 
                चंद जुगनू भी पाल रखा करो 
जुगनुओं की झिलमिल के बीच एक बार  फिर मुझे काव्यधारा में प्रकृति चित्रण के अद्भुत रचयिता विलियम वर्डस्वर्थ की एक कविता " टू द  कक्कू "की याद आ रही है .उनके कूकते हुए शब्दों ने अपनी भावनाएं  कुछ इस तरह से व्यक्त की हैं-
                   ओ ऋतुराज वसंत की प्रियतमा 
                   ओ वसंत दूत ,ओ ऋतू अंकशायिनी
                       अब भी मैं सुनता हूँ वह कूक
                         मदनिका कोयल का रति उन्माद
                    स्मृतियों की इन आम्र मंजरियों से 
                 झंकृत होते है हृदय वीणा के तार 
                                                                                        किशोर दिवसे
( अंग्रेजी से अनुदित कुछेक कविताओ के अंशों पर आधारित)
                     

                
                    
       
                
                            
                         .
                         

मंगलवार, 28 जून 2011

ख़ुशी का पैगाम कहीं . कहीं दर्दे जाम लाया .

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शायद इस बूढ़े बाप को मनी आर्डर भेजा हो बेटे ने..मेरा इंटरव्यू काल लेटर होना चाहिए...पप्पू  ने सोचा ... बलम परदेसिया को दुखियारी बिरहन की याद आई हो... उस भाभी का मन कह रहा था जिसके साजन नौकरी -धंधे की जुगत में दूर शहर में रहते हैं... और नजरें चुराकर चांदनी भी देखती है कहीं उसके चकोर ने गुलाबी खत भेजा हो! इधर  निपट देहातन बुढिया की सूनी नजरें भी तक रही है उसी को ...जी आकर चिट्ठी भी बांच देगा.और कोई नहीं वह शख्स जिसे हम कहते हैं पोस्टमैन या डाकिया.
                        अब तो शहर और गाँव के हाल-चाल  भी काफी बदल गए है. फिर भी कई गाँव-शहरों में कम ही सही वह दीखता है अक्सर.याद है पहले कितनी चिट्ठियां लिखा करते थे आप और हम!ख़ुशी और गम के कडवे -मीठे घूँट चिट्ठियां बांचते ही पीने पड़ते थे.मुस्कान और आंसू देने वाली ये इबारतें कभी लिफाफे के भीतर तो कभी अंतर्देशीय  और पोस्ट कार्ड पर.ज़माने की रफ़्तार ने ढेर सारे नए जरिये पैदा कर दिए . डाकिये भी हैं और उनका विकल्प भी हाई टेक युग में आना ही था.मोबाइल.. ए टी एम्  कूरियर से काम हो रहा है .फिर भी कभी -कभार कानों में गूँज जाती है एक आवाज जो बढा देती है हर किसी की धड़कन.
                          डाकिया डाक लाया,...डाकिया डाक लाया 
                          ख़ुशी का पैगाम  कहीं कहीं दर्दे जाम लाया 
याद है आपने पहली बार चिट्ठी कब लिखी थी?वही  डाकिया जो दरवाजे की सांकल या कालबेल बजाकर आवाज लगाता था -पोस्टमैन अब कितनी बार घर आता है?चिट्ठिया लिखना ही काम हो गया है तो मिलेंगी कहाँ से?अब तो चिट्ठी लिखने की आदत भी नहीं रही. लिखने को बैठो तो क्या लिखो  समझ में ही नहीं आता..  मोबाइल से सीधे बात  कर लो. 
                       सारे परिवार का हाल-चाल सुख-दुःख की बातें मान-मनुहार यानी भानमती का पिटारा हुआ करती थी चिट्ठियां.बच्चों को तो अब चिट्ठी लिखना भी नहीं आता. अपने ज़माने में लिखी चिट्ठियां  बच्चों को दिखाई थी उनका मुंह खुला का खुला रह गया था.स्कूल में छुट्टी की अप्लिकेशन लिखना भर आता है उन्हें.गाँव के लड़के लड़कियां तो गंवैया शायरियां लिखा करते थे.शहरी नौजवान तो मैसेज से काम चला लेते है  वो भी रूमानी और बिंदास टाइप के... और खुद को नहीं आता तो नेट पर जुगाड़ कर लीजिये.
                         खैर.. आप में से बहुतों को मालूम है चिट्ठियां लेने  -ले जाने वाला कासिद हुआ करता है.राजा-महाराजाओं के ज़माने में कबूतर भी कासिद हुआ करते थे.जो प्यार  के पैगाम ले जाते रहे..ऐसे ही आशिक राजकुमार के दीदार को तरसती माशूका ने एक ख़त लिखा और तड़पकर कासिद से कहा-
                            नामाबर,ख़त में मेरी आँख भी रखकर ले जा
                           क्या गया ख़त जो देखने वाली न गई!
खतों में गीत ,गजलें शायरियां लिखने का रिवाज भी खूब  चला था.दिल को छू लेने वाली चिट्ठियां लिखना भी एक कला है.पंडित नेहरू,महात्मा गाँधी,अब्राहम लिंकन ,अमृता प्रीतम के  लिखे ख़त ऐतिहासिक दस्तावेज हैं.चित्रकार  विन्सेंट वान गाग ,और उनके भाई थियो के पत्रों पर आधारित उपन्यास लस्ट फार लाइफ अद्भुत रचना है.पत्रों का अनोखा संसार है क्योंकि चिट्ठियां ऐसी पंखदार कासिद हैं जो पूरब से पश्चिम, तक प्यार की राजदूत बनकर जा सकती हैं.ऐसी ही एक चिट्ठी मोर्चे पर डटे जवान को मिलती है और खंदक में ही वह अपने दोस्तों के साथ एक गीत गाता है( फिल्म बार्डर)
                             संदेशे आते हैं,वो पूछे जाते हैकि तुम कब आओगे
                             कि घर कब आओगे,ये घर तुम बिन सूना  है....
  फिल्म पलकों की छांव में डाकिये की भूमिका में राजेश खन्ना ने पर्दे पर दिल  छू लेने वाला गीत गया था -डाकिया डाक लाया.. डाकिया लाया ...फिर ये मेरा प्रेम पात्र पढ़ के ...और ख़त लिख दे सांवरिया के  नाम बाबू....और चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है ..
                         और एक बात है मेरे नौजवान  दोस्तों के लिए-साहित्यकार जीन जैकिस रूसो ने कहा है सबसे अच्छा प्रेम पत्र लिखने, बगैर यह जाने लिखना शुरू कीजिये की आप क्या चाहते हैं और यह जाने बिना ख़त्म कीजिए कि आपने क्या लिखा है.पर जरा गौर तो कीजिए इस  नौजवान    ने एक रुक्के  पर हाले- दिल जिस तरह बयान किया है -
                        मेरे कासिद जब तू पहुंचे मेरे दिलदार के आगे 
                       अदब से सर झुकाना हुस्न की सरकार के आगे 
डाकिये की जिंदगी रील लाइफ जितनी अलहदा है रियल लाइफ में उतनी ही कहीं और संघर्ष पूर्ण.उसकी सायकल के कैरियर पर और झोले में बिल, व्यावसायिक पात्र,अखबार,मैगजीनें या रजिस्टर्ड पार्सल होंगे . पर जज्बातों में डूबी चिट्ठिया अब नहीं होतीं.
          एक  बात जरूर समझ में आ गई कि बदलते वक्त के साथ लोगों के मिजाज भी बदल गए हैं.दद्दू के घर टीवी चैनल पर  एक फ़िल्मी गीत चल रहा है-
                             कबूतर  जा जा जा ... कबूतर जा जा जा 
                             पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ
 नन्ही इबारतों वाले ख़त आज का सच हैं जो मोबाइल नाम के कासिद ले जाते है. उसकी भी क्या जरूरत... अब तो सीधे डायलाग दिए जाते है. पर एक बात का यकीन मानिये अच्छी और प्यारी  खूबसूरत चिट्ठियां  लिखने वाला इंसान ही संजीदा ,संवेदनशील और मुहब्बत भरे दिल का मालिक होता है.चिट्ठी लिखकर अपने भीतर खुद की तलाश  कीजिए.सिर्फ चिट्ठियों के जरिये पूरी तरह अजनबी से किया जाने वाला प्यार प्लेटोनिक लव कहलाता है.
                          एक बार फिर चिट्ठियों ,खतों कासिद और नामाबर की दुनिया के करीब से गुजरकर देखिये .. खुद को तलाशने का एक आइना यह भी  है. एक मिनट...रुकना जरा ...देखूं तो मेरा कासिद " इलेक्ट्रोनिक डाकिया यानि मेरा मोबाइल कौन  सा पैगाम  लेकर आया है?-
                          अगर जिंदगी में जुदाई न होती
                        ,तो कभी किसी की याद न आई होती
                        साथ ही अगर गुजरते हर लम्हे 
                        तो शायद रिश्तों  में ये गहराई न होती 
                                                                                      पुरानी चिट्ठियां  देखिये... दिखाइए.. लिखते रहिये                                                                                                                                  
       
                                                                                                                                          किशोर दिवसे 

                            
                                 

सोमवार, 27 जून 2011

तुम शीशे का प्याला नहीं झील बन जाओ...

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अब तो दादा -दादी या नाना -नानी के मुह से कहानियां सुनने का फैशन ख़त्म ही हो गया है.आज कल के बच्चों  के पास इसके लिए वक्त ही नहीं होता. न वे इसमें रुचि ही लेते हैं.कम्प्यूटर तो बस बहाना है .इन्ही कहानी-किस्सों के जरिये बच्चों के मन में संस्कार डाले जाते थे. फिर भी पढने वाले लोग या तो किताबें लेकर बैठते है  या हाईटेक  पीढ़ी की तरह डिजिटल हो गए हैं..यदा-कदा हम सब किसी बचपन को देखकर लौटते हैं अपने बचपन में तब अनायास ही वे कहानियां याद आने लगती हैं जो कभी हमारे बुजुर्ग सुनाया करते थे  . वे कहानियां कभी-कभार किताबों में भी मिल जाया करती हैं.
                     मुझे याद है की  यह किस्सा सोने के वक्त जिद कर पलकें मूंदते तक सुनने वाला नहीं था.बचपन में ही सही नानी ने मुझसे कहा,"जाओ...शीशे का प्याला लेकर आओ".नानी ने प्याले में पानी डाला और मुझसे कहा ," डाल दो इसमें मुट्ठी भर नमक". मैंने वैसा ही किया.फिर नानी ने मुझसे कहा," बेटा जरा इसका स्वाद बताना"."छी !!!!! कितना नमकीन!.. मैंने मुहं बनाकर थूक दिया.. पिच्च...!
                   नानी ने मुझसे कहा ," चलो बेटा ...जरा झील तक घूम आते हैं".मैं  हाथ पकड़कर उसे झील तक ले गया.फिर उसने कहा,' बेटा !सामने वाली दुकान से मुट्ठी भर नमक ले आना" मैं दौड़कर ले आया.नानी ने मुझसे वह नमक ले लिया और झील में डाल दिया."अब तुम इस झील का पानी पीकर बताओ." नानी ने मुझसे कहा.




                     जैसे ही अंजुली भर तालाब का पानी मैंने पीया नानी ने मुझसे पूछा,बेटा पानी का स्वाद बताना."" अच्छा लग रहा है नानी." मैंने कहा." नमकीन तो नहीं लग रहा है न?" नानी ने पूछा.मैंने जवाब दिया,"बिल्कल नहीं नानी."
                     मैं और नानी झील के किनारे बने मंदिर के चबूतरे पर बैठे थे.नानी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और कहा,"" बेटा! जिन्दगी में जो तकलीफें हैं वे भी इसी नमक की तरह हैं.न ज्यादा न कम.परेशानियाँ अपने जीवन में वही रहती हैं लेकिन उन तकलीफों का अहसास इस पर निर्भर करता है की हमने उन्हें किस नजरिये से देखा है."
                   इसलिए बेटा ... " जब भी जीवन में तुम्हें परेशानियाँ हों तुम सिर्फ  इतना ही करना की जीवन  को समझने का नजरिया व्यापक बना लेना." आसान शब्दों में समझना है तब मैं एक ही बात कहती हूँ,' तुम शीशे का प्याला नहीं झील बन जाओ.!हालाकि उस बात का मतलब मैं उतनी गहराई से नहीं समझ पाया  था क्योंकि उस समय मैं मात्र नौवी का छात्र था.आज इस किस्से को याद कर जिन्दगी के अक्स हकीकत के आईने में दिखाई देते है और ताजा हो जाती है नानी की यादें.

                          ***********
गर्मियों की छुट्टियों में नानी और मैं फुटपाथ से होकर गुजर रहे थे.सड़क पर भीड़ थी.तेज रफ़्तार दौडती गाड़ियों , बाइक और उनके हार्न तथा साइरन  का कानफाडू शोर गूँज रहा था.अचानक नानी ने मुझसे कहा," बेटा!मुझे झींगुर की आवाज सुनाई दे रही है."
                       मैंने कहा," आप भी सठिया गई हो नानी.आप इतने शोर-गुल के बीच झींगुर की आवाज कैसे सुन सकती हो:" नहीं मैं सच कह रही हूँ..नानी ने कहा,"मैंने झींगुर की आवाज सुनी है." " सचमुच.. आपका दिमाग  चल गया है नानी." मैंने मजाक उड़ाया.अचानक मैंने अपने कानों पर जोर दिया और फुटपाथ के कोने में उगी झाड़ी देखी.मैं उसके नजदीक गया तब पता चला की झाड़ी के भीतर एक टहनी पर झींगुर बैठा था." यह तो बड़े कमाल की बात है नानी." मैंने नजरे झुकाकर कहा," लगता है आपके कानों में कोई अलौकिक शक्ति है"
                        " बिलकुल गलत बेटा,यह कोई अलौकिक-वलौकिक शक्ति नहीं है.मेरे कान भी तुम्हारे जैसे ही हैं.मैंने झींगुर की किर्र-किर्र सुन ली.यह तो तुमपर निर्भर करता है की तुम क्या सुनना चाहते  हो.?
                       " लेकिन यह कैसे  हो सकता है नानी!" मैंने हैरत से पूछा," आखिर इतने कानफाडू शोर  में  मैं छोटे से झींगुर की आवाज सुन ही नहीं सकता." " हाँ! ठीक कह रहे हो बेटा." नानी ने मुझे समझाया,"सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है की तुम्हारे लिए क्या महत्वपूर्ण है.देखो...में तुम्हे इसे सच साबित करके बताती हूँ."
                     नानी ने अपनी कमर में खोंसकर रखा नन्हा सा बटुआ निकला.उसमें से कुछ सिक्के निकाले और चुपचाप सड़क के किनारे बगैर किसी के ध्यान में आये डाल दिए." चलो.अब कोने में खड़े रहकर तमाशा देखते हैं." नानी मुझे एक कोने में ले गई.  

                                        

                    सड़क पर गुजरती गाड़ियों का कोलाहल अब भी उतना ही था.हम दोनों ने देखा की जो  भी धीमी रफ़्तार से गुजरता उनके अलावा अधिकांश राहगीर अमूमन बीस फीट दूरी से मुड़कर यह देखते की नीचे पड़े चमकने वाले सिक्के कहीं उनकी जेब से तो नहीं गिरे हैं!" क्यों बेटा!बात तुम्हारी समझ में आई?
                   " हाँ नानी ! आप  सच कहती थी.... सब कुछ इस बात पर निर्भर  करता है की सभी बातों के बीच आपकी बुद्धि किस बात को महत्त्व देती है.आपको क्या जरूरी लगता है."नानी की वह बात आज ही मुझे याद है.अरे... वह देखो!!!!सड़क पर गिरे सिक्कों को देखकर न जाने कितने लोगों के हाथ अचानक अपनी जेब छूने लगे हैं!                                            आज बस इतना ही .. शब्बा खैर ... शुभ रात्रि... अपना ख्याल रखिये...
                                                                                   किशोर दिवसे.

हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं...

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धू-धू कर जलती चिता... शोक संतप्त  जनों को ढाढस बंधाते शब्द और मृत्यु को प्राप्त इंसान के जीवन की यादों से जुड़े पहलुओं के बीच ही कहीं से जन्म लेता है शमशान वैराग्य.सच कहें तो मौत के एहसास से चोली-दामन का साथ है जिंदगी का.शायद जीवन के होने का अभिप्राय बोध भी करा जाता है -"मौत " इन  दो शब्दों के भीतर छिपा गूढार्थ .हर अच्छे और बुरे व्यक्ति की सिर्फ अच्छाइयों को याद कर शमशान वैराग्य का प्रवाह हमसे कहलवा जाता है -"बाबू मोशाय.. हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर  ऊपर वाले हाथों में है.कब कौन किस वक्त....
                और यह श्मशान  वैराग्य भी देखिये किस हाई  -टेक हो गया है इन दिनों!बातें शुरू होती है .. मौत तो सिर्फ एक बहाना है भैया.. जिसका समय आ गया उसका खेल ख़त्म .फिर घर परिवार की बात... अचानक मोबाइल घनघनाते है और कोई बिजनेस की बाते करते  है तो कोई अपने धंधे  की.हंसी- मजाक और मसखरी से बोझिल वातावरण हल्का-फुल्का होने लगता है.अच्छा है... यह जरूरी भी है.
                  झूले से लेकर काठी तक ज्यादा देर नहीं लगती ,क्या आप जानते हैं की   कितना फासला है जिंदगी और मौत के बीच! कोई नहीं जनता .पर तय होता है हरेक के लिए की उसे इस नाटक में  कितना अभिनय कहाँ और कैसे करना है.कोई कहता है," जिंदगी प्यार की दो-चार घडी होती  है"किसी दार्शनिक ने यह भी कहा है,LIFE IS TOO LONG  TO LIVE BUT  TOO SHORT TO LOVE"   लेकिन इसे मानने या समझने की कोशिश कौन करता है.जीवन और मृत्यु के बीच चल रहे इस प्रहसन के दौरान अंधी सुरंग में दौड़ रहे हैं हम सब.धन-पिपासा ,उच्चा कांक्षा ,बच्चों के बीच संपत्ति के विवाद  ... गलाकाट रंजिश,सुखों के अनंत  आकाश को समेट लेने की छीना-झपटी के बीच हम सबने कहीं न कहीं पर महसूस किया होगा अपनों को दुत्कारने का सायास षड्यंत्र.लहू लुहान रिश्तों की चीख -पुकार के बीच कभी यह भी हुआ की आम इंसान सोचता रह गया की कोई भरोसा नहीं जिंदगी का क्यों न हम प्यार से रहें और अनायास ही ऊपर वाले ने डोर खींची और कठपुतली लुढ़क गई.         जिंदगी का सफ़र है ये किस सफ़र
               कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं     
जब यह सच मालूम है तब क्यों हम सब गलतियों पर गलतियाँ किये जाते हैं?धन पिपासा  की होड़ में भागते वक्त पल भर रुककर  क्या यह सोचा  होगा की सुख बटोरने की हवस में हम उन सुखों का उपभोग करने के लिए अनफिट तो नहीं हो गए है?इस शहर  में कई लोग ऐसे है जिनके पास बेपनाह दौलत है प़र न चैन से खा -पी सकते हैं न सो सकते हैं बीमारियों ने जकड़ लिया और किसी काम के लायक नहीं रहे-हीरे, मोती, सिक्के और करेंसी चबाकर पेट नहीं भरा जा सकता.एकाएक सुबहअखबारों में पता चलता है दौलतराम चल बसे.न तो उनहोंने सुखों का उपभोग किया .उलटे प्रापर्टी के नाम से परिवार में हो गई कुत्ता घसीटी शुरू!इस पर हम सब सोचते क्यों नहीं'
                   क्या यह कम आश्चर्य की बात है की लोगों को लगातार दुनिया से जाते हुए सीखकर भी यह मन संसार की  मोह-माया छोड़ नहीं पाता!-संस्कृत सूक्ति
                  मरने पर छः फुट जमीन हमें काफी हो जाती है लेकिन जीते-जी हम सारी दुनिया को पा लेना चाहते हैं-फिलिप 
                 सभी ने यह मृत्यु दर्शन पढ़ा और सुना है लेकिन शायद समझकर नासमझ बने रहने  का नाम ही जिंदगी है.जिंदगी और मौत के दर्शन पर सारे लोग बातें कर रहे हैं तरह-तरह की.अलविदाई के मौके पर भी मौत के सामने जिंदगी के अनेक रंग बातचीत की शक्ल में उभर रहे हैं .जितने मुहं उतनी बातें पर श्मशान वैराग्य का भाव कहीं न कहीं पर हावी है.यह बात भी उतनी है सच है की छोटे शहरों की सोच अभी तक कर्मकांडों के मामले में उतनी प्रगतिशील नहीं हो पाई है.फिर भी कुछ समाजों ने व्यवहारिक आवश्यकतानुसार इन्हें सीमित करने का प्रशंसनीय कार्य किया है.कुछ परम्पराओं को आज के परिप्रेक्ष में औचित्य की कसौटी पर अपडेट किया जाना  ही चाहिए.बाकी पुरातनपंथी समाजो को सीखना चाहिए उनसे  जो आज के सच को समझ कर चल रहे हैं.
                  हर किसी  को एक न एक दिन जाना ही है.... हम सब क्या लेकर इस दुनिया में आये और क्या लेकर जायेंगे?गीता ,कुरान बाइबल और गुरु ग्रंथ साहिब में जीवन -मृत्यु पर अच्छी बातें लिखी हैं पर इन सबके बीच कडवा सच एक ही है-
                      हंस रहा था अभी वो ,अभी मर गया
                    जीस्त और मौत का फासला देखिये!
  मेरा मानना है की लाख शिकायतें हों जिन्दगी से पर मौत का सच सामने रखकर जिंदगी को यह सोचकर जियो की " जियो और जीने दो"और " जीवन चलने का नाम ,चलते रहो सुबह  शाम" यही नहीं ," कल क्या होगा किसको पता ,अभी जिन्दगी का ले लो मजा". पर मजे लेते वक्त कोई यह न भूले की अनजाने में हम किसी को दुःख  तो नहीं पहुंचा रहे है ? क्योंकि जिंदगी और मौत के बीच का फासला इस कदर अबूझ है की कहीं ऐसा न हो दुःख पहुँचाने  के बाद सुख देने के लिए प्रायश्चित्त करने का मौका भी हाथ से निकल जाये और हाथ मलने के सिवाय कुछ न बचे.
                 अफ़सोस भरे शब्दों में सिर्फ  यही कहना नसीब  में रह जायेगा की काश!हम अपने माता -पिता को प्यार और सम्मान दे पाते....क्यूं भोंक दिया अपने दोस्त की पीठ पर छुरा?...रिश्तों के साथ बेईमानी और बेइंसाफी क्यों की?. मौत की अदृश्य -दृश्य शक्लें देखने के बाद हम सबको कहीं न कहीं यह जरूर लगना चाहिए की जीवन और मौत के बीच हमने क्या किया.समाज और परिवार ही नहीं देश के ऋणानुबंध से क्या हम मुक्त हो पाए?दोस्ती और इंसानियत के सारे फर्ज हमने अपनी जिन्दगी के दौरान पूरे किये या नहीं?क्योंकि मृत्यु शाश्वत है इसलिए -
                      जिंदगी ऐसे जियो जैसे सब तुम्हारा है
                     मरो तो ऐसे  की तुम्हारा कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं और सब कुछ के बीच श्मशान वैराग्य का आखिरी पड़ाव.कर्मकांड पूरे होते है. परम्पराओं और उत्तर आधुनिकता  के बीच दो पीढ़ियों  के द्वंद्व सामने  होते है. रस्म अदायगियां  और " . राम नाम सत्य..ओम शांति . "के बाद जीवन पर मृत्यु का रेड सिग्नल  हरी झंडी में बदल जाता है.ठहरा सा विचार प्रवाह फिर गतिमान होता है हरेक की अपनी जिंदगी के ताने-बाने होते हैं .जीवन -मृत्यु के शाश्वत चक्र के बीच एक ही बात याद रहती है -वक्त हरेक जख्म पर मरहम है.समय ही सारी गुत्थियों का सुलझाव.... जीवन चलने का ही नाम है...चरैवेति... चरैवेति .मैं अपनी आँखों की छल छलाह्त को छिपाकर अपनी भावनाओं  का मन ही मन इजहार कुछ इस तरह से करता हूं.-
                   उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
                    न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये
                                                                                                 खुश रहें और खुश रखें ...
                                                                                                        किशोर दिवसे 
                           

                     

शनिवार, 25 जून 2011

बरगद की बातें करते है गमलों में उगे हुए लोग!!!!

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सारी जिंदगी एक ऐसी  में तब्दील हो चुकी है जिसमें कई लोग अपनी बोली लगाने हद दर्जे तक समझौते कर रहे है in!क्रिकेटरों  की मंडी में सबसे बड़ी बोली लगी थी  और बिक गए सितारा क्रिकेटर.जिसको देखो वही बिकने पर उतारू है.फ़िल्मी सितारे., अफसर, नेता, मीडिया,कर्मचारी ... अमूमन जिंदगी के सभी क्षेत्रों    में बिकाऊपन ठाठें  मार रहा है.यूं कहिये की जिंदगी के आईने में बाजार का सच इस तरह आतिशबाजी बन गया की  उसकी चुन्धियाह्त   से आँखें मुंदती हुई सी लगी.यकीनन इस आतिशबाजी से गहरा धुंआ निकल रहा है .इसके जहर ने  सिद्धांत ,संस्कार और ईमानदारी ( आज के दौर में वाहियात बनती किताबी बाते)की साँसों को  धौंकनी की तरह चलने पर भी मजबूर कर दिया है .
                          फिर भी आज के सच का सामना करने स्वीकारने या   नकारने  की अपनी  -अपनी   पसंद   के अलावा  और कोई  विकल्प  ही नहीं .हाँ इस बात पर जरूर बहस की जानी चाहिए की बाजार जिंदगी का हिस्सा है या जिंदगी ही बाजार बन गई है.और इस बाजार में -
                        क़त्ल इंसा हो रहा है चंद सिक्कों के लिए
                           इस कद्र दौलत का भूखा पहले आदमी न था
यह भी आज का सच है.आँखों की सफेदी पर छाते सुर्ख डोरों ने  पहले ही इशारा  कर  दिया था की अपने दद्दू के अंदाज-ए- बयान में तल्खी आ चुकी है'बाजार के सच पर हैरत जताने वालों के लिए दद्दू कहते है  ," सच है ,पहले किसी को बिकाऊ कह देने पर कोई भी भडक उठता था.आज की जिन्दगी में बिकाऊपन, मार्केट वेल्यू जैसे शब्द स्टेटस सिम्बल बन चुके   है.यह मान लिया जाता है की बिकाऊ ही खरा सिक्का है. चीखते रहने वाला या तो लल्लू  है या फिर उसे बाजार रेट पर बिकने का मौका ही नहीं मिला या उसके लायक ही नहीं!"
                    दरअसल बाजार  युग के  जो लायक है उसने अपनी कीमत तेज कर ली.जिन्होंने मौकों का फायदा नहीं  उठाया या इस सोच को नहीं अपना पाए वे अपनी सोच के आत्मदाह में झुलसकर विधवा विलाप करते रह गए.. रेस से बाहर हो गए, या हो जाते हैं.मौजूदा वक्त की नब्ज पहचान कर संतुलित  तरीके से चलने वाले ही सफल हो रहे हैं.प्रोफेशनलिज्म की फर्राटा रेस में हादसों  की आशंका  के बावजूद ढीले-ढाले भकुवाये बूढ़े घोड़ों को ख़ास जलसों और आयोजनों  की बारात में आवश्यकताओं की धुन पर नाचने की काबिलियत साबित करनी होगी.
                      ये दुनिया है, यहाँ जरदार ही सब कुछनहीं होते
                      किसी का नाम चलता है किसी का दाम चलता है
मीडिया  को भी सेलेबल आइटम की तलाश है.इन संस्थानों में दिखावे या चापलूसी  की छद्म संस्कृति इतनी हावी है की सभी पद नीलामी के चक्रव्यूह में पॅकेज के लिए अपना जमीर बेचने की कवायद चकलाघरों की तरह करने लगे हैं.खुले आम बाजारू होने का नंगा सच ये नहीं  कबूलते.  बजाये जब ये " चुडैलो की सौन्दर्य स्पर्धा के दलाल "ईमानदारी का मुखौटा ओढ़कर नैतिकता के प्रवचन देने  लगते है तब पेशानी पर बल पड  जाते  है क्योंके-
                           मुद्रा पर बिके हुए लोग ,सुविधा पर टिके हुए लोग
                            बरगद की बातें करते है गमलों में उगे हुए लोग






                     
शादी की मंडी में दूल्हा बिकता है.भूख और गरीबी से बच्चे बिकते है.जिस्म और जमीर की बिकवाली के बाजार में हो रहे सीरियल ब्लास्ट से संस्कारों  और सिद्धांतों की धज्जिया उड़ते देखी जा रही हैं. वर्तमान दौर  समाज के लिए नपुंसक तटस्थता का नहीं बल्कि मस्तिष्क में विचारों का जीवित ज्वालामुखी बनाने वाला होना चाहिए.निहित स्वार्थों के लिए औरतो के जीवन मूल्य भी बिकते  देखे जा रहे हैं." गोयबल्स के अवैध संतानों "की हरकतों पर बाजार का एक नजारा यह भी है-
                        कुछ लोग ज़माने को नजर  बेच रहे हैं
                                       अफवाह को कुछ कह के खबर बेच रहे हैं
                                   बीमार को बस अब हवाओं पे छोडिये
                       कुछ लोग दवाओं में जहर बेचते है
सोना अगर  मिटटी के मोल हो तो बदकिस्मती और मिटटी को सोने के मोल बेचना बाजार की चालाकी है.लेकिन जिंदगी के कैनवास पर मसलों का फौरी हल निकलने की झुंझलाहट विचारों  की मुख्य धारा का केंद  क्यों नहीं बनती?सवाल यह है की हम मसलों  के हल या विकल्पों की तलाश किस जिद से करते हैं.यकीनन बाजारवाद ने कुछ बेहतरी भी दी है .फिर भी  उहापोह, असमंजस  ,कन्फ्यूजन और सवालों का बीहड़ घना है.जिंदगी विसंगतियों का नरक न बने इसका फैसला करने वाले आप खुद है क्योंके-
                                          ये जिंदगी भी सवालों का एक जंगल है
                                           हर शख्स भटकता हुआ जवाब लगे है 
                                                                          फिर मिलेंगे.. अगली पोस्ट 
                                                                           पढने के वक्त....
                                                                                        किशोर दिवसे