रविवार, 12 जून 2011

तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...

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तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...

 कभी कभी तेरे ओठों की मुस्कुराहट से 
मुझे बहार  की आहट सुनाई देती है

यूं क़ि कितना  करीबी रिश्ता है मुस्कुराहट और बहार की आहट का.अगर ये कहें की किसे पसंद है मनहूस और सूजे हुए चेहरे?यकीनन कोई भी पसंद नहीं करेगा .चलिए ,खड़े हो जाइए आईने के सामने और मुंह लटका लीजिये.फिर मुस्कुराइए... और..थोडा और ...अब तो समझ गए न ! वाकई जैसे ही कोई हमसे मिलता है या हम किसी से मिलते है अपने ओठों पर  मुस्कान उस इबारत पर मुहर होती है जिसमें बिना कुछ लिखे यह लिखा होता है ," आपसे मिलना हमें सचमुच अच्छा लगा."
                       चाहे कोई भी हो किसी भी उम्र का हो कितना अच्छा लगता है जब कोई मुस्कुराता है .खास तौर पर किसी मासूम बच्चे की मुस्कान.पालने में सोया छौना जब नींद में मुस्कुराता है तब उसे देखकर भी लगता है मानों तपती लू में शीतल हवा का झोंका .कितनी मनुहार करते हैं रोते बच्चे के चेहरे पर मुस्कराहट लाने  के लिए ?रोते हुए बच्चे के चेहरे पर तबस्सुम लाने की जिद भी किसी इबादत से कम नहीं.इसीलिए सच कहा गया है -
                     मंदिर और मस्जिद यहाँ से है बहुत दूर
                      चलो किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
जब कोई मुस्कान दिल को छू लेती है तब उसे मिलियन डालर स्माइल कहते हैं.लखटकिया मुस्कान के लिए अब तो बकायदा प्रशिक्षण भी मिलने लगा है.वैसे तो टूथ पेस्ट वालों ने मुस्कुराहट को बिनाका और कोलगेट स्माइल बना दिया है .फिर भी मुस्कान सहज होनी चाहिए,उसे नकली कतई न बनने दें.चुनाव नजदीक आने पर किसी नेता की मुस्कान का अंदाज  भी आपने लगाया होगा.छीछा लेदर करती पब्लिक के सामने नेताओं की मुस्कराहट के छिपे हुए मायने भला आपसे कहाँ छिपे हैं?लेकिन ऐसे भी लोग  हैं जिनके ओठों के तबस्सुम का बोझ आँखें नहीं उठा पातीं और वे आंसू छलकाने लगती हैं.
                          माना की जिंदगी इन दिनों काफी तल्ख़ हो चुकी है.कुछ लोग शिकायती अंदाज में " इस सदी में हंसने वाले को पत्थर का कलेजा"कहकर अपना रोना भी रो लिया करते हैं फिर भी टाप-जींस पहनने वाले बंटी और बबली के हम उम्र दोस्तों का अंदाज -ए- बयां भी यही होता है-
                        तबस्सुम और फिर उनके लबों पर
                        चमन की हर कली शरमा रही है
कलियों के शर्माने या मुस्कुराने का अंदाज वही होता है जो फूल बनने से पहले कली के चटखने का.दिल-ए- आशना की निगाहों में सुबह-सुबह के वक्त चेहरे का तबस्सुम यह कहने पर मजबूर कर देता है ," सुबह के तारों ने भी अपनी जान तक कर दी निसार.( न्यौछावर)".फानी ने अपने खूबसूरत अंदाज में किसी ओठों की मुस्कुराहट को हजरत मूसा के सामने तूर नामक पहाड़ी पर लहराई हुई बिजली की मानिंद बताया है.मुस्कराहट की वजह से खुलने वाले ओठों को धडकते दिलों ने गुलिस्तान ( बगीचा ) कहा है.कुछ लोगों को यह भी कहते सुना है ," हमसे तबस्सुम की ख़ुशी क्या पूछते हो ,हमको तो मुस्कुराये हुए जमाना गुजर गया."
                        दद्दू गए थे अपने बीमार रिश्तेदार को देखने .उसके चेहरे पर मुस्कुराहट देखकर मन ही मन सोचने लगे," मिजाज पूछने वाले की आबरू रख ली."उसे देखकर लौट रहे थे दद्दू .हलके अंधियारे में लैम्प  पोस्ट के नीचे अपनी फटेहाली ओढ़कर एक दिलजला  लुढका हुआ था.सीने के भीतर शीशा-ए-दिल के टुकड़े और फर्श पर शराब की बोतल का चूर चूर शीशा.किताब में रखे हुए सुर्ख गुलाब को हाथों में लिए हुए गुनगुनाने लगा.-
               हमने एक हसरत-ए तबस्सुम को 
               कितने आंसूं पिला के पाला है 

बहरहाल,खुद भी मुस्कुराइए और मुस्कुराते रहने का सन्देश भी दीजिये.मय कशीं में जब   कुछ लोगों के होश फना हो जाते है तब हाथों में शराब का प्याला लिए अपनी रूह के जगमगाने का दावा करते हैं पर हकीकत में होता यह है की उनकी अक्ल सर्द हो चुकी होती है.बागबान को कहते सुना है कि फूलों के खिलने या मुस्कुराने की सजा है मुरझाना .पर यह सच नहीं.मुस्कुराना हँसी की पहली पायदान है जो बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी निहायत जरूरी है.हाँ -एक बात और ...." उनसे " जब कभी तकरार हो जाए तो रूठकर नाराज होने वाले को फ़ौरन कह दीजिये -
                           कितने शीरीं हैं लब तेरे कि
                              गालियाँ खा के भी बेमजा न हुआ.
                                                                                    अपना ख्याल रखिये... मुस्कुराते रहिये...
                                                                                                       किशोर दिवसे 
                            



शनिवार, 11 जून 2011

बोझ को बना लें डैनों का आत्मविश्वास

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बोझ को बना लें डैनों का आत्मविश्वास 


" बहुत पुरानी बात है जब भगवान ने बहुत सारे बोझ बनाये " दद्दू ने एक किंवदंती सुनाते हुए कहा," वे चाहते थे की  इस तमाम बोझ को धरती पर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाये.लिहाजा भगवन ने सभी जानवरों से इस काम मैं मदद करने को कहा.सभी जानवर भगवान् की इस बात पर ना-नुकुर करने लगे.
                   हाथी अपने-आपको बेहद प्रतिष्ठापूर्ण मानता था अ.और सिंह तो जंगल का राजा होने की वजह से वैसे भी गर्वोन्मत्त था.ऐसा ही रूख अमूमन सभी जानवरों ने प्रदर्शित किया.आखिरकार सभी परिंदे एक साथ मिलकर भगवान् के पास पहुंचे उनहोंने समवेत स्वर में कहा ," भगवान् जी!अगर आप सभी बोझ छोटे-छोटे गट्ठरों में बंधकर रख देंगे तब हम सब उन्हें आप जहाँ चाहते हैं वहां पर पहुंचा सकते हैं.हम लोग दिखने में छोटे जरूर हैं लेकिन आपका काम करने में हमें अत्यंत प्रसन्नता होगी.
                   भगवान् ने परिंदों की बातें बड़े ध्यान से सुनीं और हर परिंदे की पीठ पर छोटे -छोटे बोझ बांध दिए.सारे परिंदे अपने गंतव्य पर रवाना हो गए. रास्ते भर ख़ुशी से वे गाते जा रहे थे . इसलिए  बोझ की  वजह से उनहोंने ज़रा सी भी थकान महसूस नहीं की.दिन-ब- दिन पीठ पर लदा बोझ इन परिंदों को हल्का और हल्का लगने लगा.धीरे-धीरे बोझ लेकर वे आराम से चलने लगे.पहले उन्हें वही बोझ कुछ भारी लग रहा था.जब वे परिंदे निर्दिष्ट गंतव्य स्थल पर पहुंचे  बोझ पीठ से हटाने के बाद उनहोंने देखा की उनके छोटे-छोटे पंख विशाल डैनों में बदल चुके हैं.वे डैने  इतने बड़े थे की परिंदे अब आकाश में बहुत ऊंचाई तक उड़ सकते थे.पेड़ की गगन चुम्बी फुनगियों पर भी बैठने में अब सक्षम थे.
                   परिंदों ने महसूस किया की बोझ अब बिलकुल नहीं रहा छोटे -छोटे बोझ ही डैने बन गए थे.उन डैनों से उड़कर वे भगवान् तक पहुँच सकते थे.प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने जब दद्दू के मुंह से यह किंवदंती सुनी ,बात उनकी समझ में आ गई.उनहोंने कहा," बोझ को अगर हम चाहे तो आत्मविश्वास के डैनों में तब्दील कर सकते है."
                   चाहे कोई काम हो या जिम्मेदारी अगर हम रुचि या रुझान दिखाकर पूरा कर रहे हों तब तहे दिल से किया गया काम हमेशा सफलता की और अग्रसर करता है..बोझ ,डैनों का आत्मविश्वास बनकर इतनी खुशियाँ प्रदान करता है जिसकी पहले हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती है.
                                                आज इतना ही... अपना ख्याल रखे.
                                                                              किशोर दिवसे 
                                                                                      मोबाइल   09827471743

बुधवार, 8 जून 2011

आईला हाट सीट पर गणपति बाप्पा !

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चकाचौंध भरे " कौन बनेगा करोडपति "के फ्लोर पर एक बारगी सुखकर्ता-दुखहर्ता भगवान् श्रीगणेश को देखकर कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता महानायक अमिताभ बच्चन  खुद भौचक थे.बुद्धि के देवता को उनहोंने अंतर्मन से प्रणाम किया और पल भर में फैसला लेकर दर्शकों की ओर मुखातिब हो गए.आम तौर पर स्पर्धा में शामिल लोगों को पसीना छूटता था लेकिन इस बात बात कुछ और थी.
                            " आइये आप और हम मिलकर  खेलते हैं कौन बनेगा करोडपति द्वितीय..." रौबदार खनकती आवाज गूंजी बिग बी की और  हाट सीट पर विराजमान हो गए भगवन.महानायक से जब रहा न गया तब अपनी चुम्बकीय  आँखों की गहराई से झांककर पूछ ही लिया ," सिद्धि  विनायक!आप तो माया -मोह से परे है ,इस धन -राशी का क्या करेंगे?लम्बोदर बोले,"मुझे क्या आवश्यकता  पैसों की ,सारी राशी दुखी जनों की चैरिटी के लिए होगी. 
                         " तो भगवन! बीस हजार की राशी के लिए पहला सवाल ये रहा आपके सामने.... और शुरू हो गया सवालों का सिलसिला.आखिर हाट सीट पर भगवन थे यानी वीआइपी उम्मीदवार सो सवालों की शुरुआत बीस हजार के पहले प्रश्न से ही होनी थी.आडियंस की तालियाँ  भाव विभोर दर्शकों  के उतावलेपन के बीच ही बिग बी बताते रहे kii " कुली" फिल्म की शूटिंग के दौरान जब वे जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे उनहोंने कितना याद किया था भगवन को!खैर ...सवाल होते रहे-बेरोजगारी,नैतिक मूल्यों के पतन ,आबादी विस्फोट,इंसानी दुनिया के दुखों का हल,आस्तिक -नास्तिक,पाखण्ड और बाबा वाद,छद्म धर्म निरपेक्षता और भी कई सवाल.बुद्धि के देवता ने सारे सवालों के तपाक-तपाक जवाब दिए.( अन्तर्यामी जो ठहरे)!
                        चेक जमा होते गए और फिर गूंजी बिग बी की सम्मोहक आवाज," आखिरी सवाल... भगवन, जो आपको दिलाएगा एक  करोड़ की राशी... हम चाहते हैं की यह राशी पीड़ित मानवता की सेवा में काम आये.देशक हर्षातिरेक से गदगद होकर श्री गणेशाय नमः और कुछ तो आरती करने के मूड में आ गए थे. एक नौजवान जोर से जय घोष कर उठा," गणपति बाप्पा मोरया"
                        कम्प्यूटर स्क्रीन पर भगवन! सवाल ये रहा आपके सामने -
दुखी इंसानों का उद्धार करने सबसे सही रास्ता इन चारों में से कौन सा है ए.नेताओं को ईमानदार बनायें.बी.स्वर्ग से देवताओं को बुलाया जाये.सी.इंसानों के लिए मारल  साइंस का कम्पलसरी कोर्स. डी.प्रलय के जरिये मानव समुदाय को सबक सिखाये.आपका समय शुरू होता है अब.
                           घडी की सूइयों की टिक-टिक  के साथ ही बिग बी सोच रहे थे ," सुनामी, कैटरीना भूकंप ,बाढ़ , ज्वालामुखी .. ये सब क्या मिनी  प्रलय नहीं हैं? और  और भी प्रलय की जरूरत है क्या?भगवन श्रीगणेश को सूंड खुजाते देखकर विचारमग्न बिग बी में छिपा एंकर अंदाज में बोल उठा ,आप चाहें तो लाइफ लाइन का इस्तेमाल कर सकते हैं.फिफ्टी फिफ्टी...आडियेंस पोल...फ्लिप और फोन ए फ्रेंड.
                     " अमिताभ मैं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से बात करना चाहूँगा "भगवन श्रीगणेश ने फोन ए फ्रेंड का आप्शन इस्तेमाल करना चाहा ." ब्रह्मा जी!!!कौन बनेगा करोडपति से मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ. ब्रह्मा जी ने आशीर्वाद दिया," आयुष्यमान भाव ."
                          " सृष्टिकर्ता !आज हाट सीट पर स्वतः मंगल मूर्ती विराजमान हैं .वे एक सवाल का जवाब जानना चाहते हैं आपसे .आपका सही जवाब उन्हें दिलाएगा दो करोड़ रूपये जो  दुखी जनों का उद्धार करने वे चैरिटी में प्रदान करेंगे.जवाब के लिए आपको मिलेंगे सिर्फ तीस सेकण्ड.अगली आवाज होगी भगवन श्रीगणेश की और आपका समय शुरू होता है अब-
      भगवन से पूरा सवाल सुनकर ब्रह्माजी ने दूरभाष पर ही विघ्न हरता के कान फूंके ," पार्वती सुत! आप भी कहाँ फस गए  इन इंसानों के मायाजाल में !अच्छे-भले भगवन के ग्रेड  में हो ,सुहाता नहीं क्या?भूल गए!देवताओं को जब श्राप दिया जाता है तब उन्हें मानव योनी में रहने का दंड पृथ्वी लोक पर भुगतना पड़ता है.तत्क्षण ही बुद्धि दाता का माथा ठनका-" बाप रे!!!घोर  कलियुग में   इंसान की जिंदगी जीने का प्रारब्ध!देखते नहीं मनोकामना की तेज आंच से देवता कैसे भागे-भागे फिर रहे हैं!लोगों ने यही समझ रखा है की पाप करो फिर दान-पुन्य के जरिये चढ़ावा डालकर धर्मात्मा होने का सर्टिफिकेट ले लो."
                            अमिताभ की कम्प्यूटर स्क्रीन पर भगवन श्रीगणेश का जवाब उभर चुका था.इसे देखकर वे दो करोड़ का चेक साइन करने लगे थे.ब्रह्मा जी का गुरुमंत्र पाते ही यकायक भगवान् श्रीगणेश अंतर्धान  हो गए.सर उठाकर बिग बी ने जब देखा हाट सीट खाली थी.इसी बीच फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट के प्रतिस्पर्धियों का भी फैसला हो चुका था.सवाल का जवाब सबसे जल्द बजर दबाकर देने वाला जब उठकर आया तब बिग बी ने देखा वीणा की झंकार के साथ ही आवाज गूंजने लगी है नारायण... नारायण....इससे पहले की दो लाख का ईनाम जीतने वाले हाट सीट के अगले प्रतिस्पर्धी  का परिचय वे कराते बजर दब गया यानी शो का समय ख़त्म.और नारायण... नारायण...की आवाज वाले प्रतिभागी दो लाख की राशी लेकर अनजान गंतव्य की और कूच कर गए.
                                      आडियंस में बैठे अखबारनवीस ने ने साफ़ महसूस किया की अपनी महंगी मूर्तियाँ देखकर भगवन श्रीगणेश का मुख कमल आम आदमी की तरह मुरझाया है.यहाँ तक की उनका वाहन मूषकराज भी बेशर्मी से डोनेशन की मांग करते फलते-फूलते कोचिंग सेंटर और  विद्यार्थियों पर चूहे की तरह प्रयोग किये जाने से दुखी था .बिग बी " केबीसी "के एपिसोड की अंतिम औपचारिकतायें पूरी कर रहे थे और अखबार नवीस सोच रहा था ," अगर बुद्धिदाता से कहा जाता अकी सारी दुनिया का चक्कर लगा आओ ,जैस की पौराणिक कथा में हम सबने सुना है ,क्या भगवन श्रीगणेश कम्प्यूटर का एक गोल चक्कर नहीं लगा लेते?
           खैर... दो करोड़ का चेक बिग बी ने कंपनी वालों से बार कर मंदिर त्रस्त को सौप दिया.दो दिन बाद ही सुर्खियाँ अखबारों में छपी.मंदिर के एक ट्रस्टी ने  लिया दो करोड़ के चेक का फर्जी भुगतान.दरअसल उस मंदिर में कुछ बरस  पहले आभूषणों की चोरी हो गयी थी .आखिर तक चोरो का पता नहीं लग पाया था.फर्जी भुगतान लेकर उस ट्रस्टी ने कुछ लोगों के साथ मिलकर आभूषणों का गुप्तदान मंदिर में कर दिया था.
                              और हाँ!भगवन श्रीगणेश ने जो दो करोड़ की राशी के लिए पूछे गए बिग बी के सवाल का जो जवाब दिया वह एंकर के कम्प्यूटर में इस तरह लाक हो गया है  की स्क्रीन पर लाना मुश्किल है.ऐसी स्थिति में अगर जवाब आपके दिमाग की कम्प्यूटर स्क्रीन पर कभी उभरे तो बताइयेगा जरूर.... शुभ रात्रि... शब्बा खैर... एंड प्लीज प्लीज प्लीज डू व्हेरी गुड केयर आफ योर सेल्फ.
                                                     अपना ख्याल रखियेगा.
                                                                    किशोर दिवसे
                                                                          मोबाइल. 09827471743
          

रविवार, 5 जून 2011

बाबा रामदेव, जन और आन्दोलन पर सियासत

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न जाने कितने ही सवाल कौंधते रहे जेहन में जब रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव  का आन्दोलन शुरू हुआ था.तीन और चार जून के दो दिन खासकर मीडिया वालों के लिए  वैसे ही थे जैसे किसी स्टूडेंट के लिए सेमेस्टर एग्जाम होती है.आन्दोलन के पहले ही राजनैतिक बयानबाजियों का दौर चला था.भ्रष्टाचार काला धन,लोकपाल विधेयक जैसे गंभीर मुद्दे जिस संजीदगी से राष्ट्रीय स्तर  पर जेरे बहस के इशू होने चाहिए थे पोलिटिकल अबोर्शन का शिकार हो गए. 
                      शनिवार की रात पुलिसिया तांडव होने के अमूमन दो दिन पहले ही चर्चा में मेरे हमपेशा साथी  इस बात पर भी रजामंद थे की इस आन्दोलन को राजनीतिग्य ऐसी पटकनी देंगे जिसकी कल्पना भी नहीं की होगी.बेशक मुद्दे बेहद गंभीर है.आम आदमी से लेकर सबसे ऊंची प्रोफाइल का बंदा भी इससे प्रभावित/ भागीदार है.मेरा सोचना है कि आस्था, भ्रष्टाचार ,अश्लीलता ,दहेज़,शराबखोरी और दीगर नशे ,विवाहेतर सम्बन्ध और ऐसे ही अनेक  मुद्दे  व्यक्ति की मोरालिटी से सीधे  जुड़े हुए है.इन्हें कानून के डंडे से डील नहीं किया जा सकता.सामाजिक स्तर पर जिन बुराइयों की जड़ें गहरी होती है उन्हें आहिस्ता -आहिस्ता सेल्फ विल पावर विकसित कर व्यक्तिगत स्तर पर ही दूर करने की शुरुआत  समाज में की जा सकती है.
                        रामलीला मैदान की बात.कई सवाल जेहन में उठते है. 1.क्या यह समुच एपिसोड POLITICAL DEBAUCHERY कहा जा सकता है? 2.भ्रष्टाचार जैसे जन मुद्दों का  जनांदोलन या कानून के अलावा तीसरा क्या  विकल्प संभव है? 3.मौजूद हुजूम जब किसी अशांति का संकेत नहीं दे रहा था तब किस सियासी इशारे पर पुलिस का दमनचक्र शुरू हुआ ?4.क्या यह विवेकहीनता की परकाष्ठा नहीं है कि गंभीर मुद्दों को POLITICS OF INTERPRETATIONS  का शिकार बनाकर पार्टियों के बेशर्म सियासी दंगल का काला अध्याय बना दिया जाये?
                        किसी भी सामजिक या राजनैतिक लीडर के पीछे भेडिया धसान  करने वाले हुजूम  को भी यह सोचना होगा कि क्या वे इस्तेमाल की वस्तु हो गए हैं? आशंका इस बात कि भी है कि अन्ना हजारे या बाबा रामदेव भी सियासत बाजों कि शतरंजी बिसात का मोहरा बनने क़ी कगार पर खड़े है या कर दिए जायेंगे!!!राजनैतिक गलियारों में चर्चा इस बात का भी था क़ी भ्रष्टाचार मुद्दे को अपने हाथ में लेने वाली भाजपा ने अन्ना हजारे के समानांतर बाबा रामदेव को खड़ा कर दिया.जनांदोलन के पीछे अगर  किसी तरह का मुखौटा  है वह बाहर होकर पारदर्शी और तथ्य आधारित  जनांदोलन  होना चाहिए क्योंकि 
                      चेहरों पर किस कदर मुखौटा हावी है 
                      पहनो एक मुखौटा देखो दिल्ली में 
                         देशभक्त बन गए जेब में देश रखा 
                     ऐसे आप चिरोटा देखो दिल्ली में
 जनादोलन करने वाले किसी भी नेता की छिछालेदर  करने क़ी बजाये बुद्धिजीवियों  के तबके  सहित देश के नागरिकों को मसले के समाधान केलिए ACTIVE INTERVENTIONS  प्रस्तुत करने चाहिए.   लब्बो-लुबाब ये की आम जनता इतनी सतर्क हो जाये कि वह सामाजिक या सियासी लीडर के निहित स्वार्थ  को सूंघने का स्व-विवेक विकसित कर ले , मोहरा न तो हुजूम बने न ही कोई  सामाजिक अगुवा . PRESIDENTIAL FORM OF GOVT  पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हो सकती है.
                      बहरहाल ,बाबा रामदेव के  एपिसोड के बहाने अन्ना हजारे को नेपथ्य में लाना भी कही कोई चाल तो नहीं? खैर,भ्रष्टाचार व् काला धन जैसे मुद्दे पर जन जागरण जारी रखना ही चाहिए. बाबा रामदेव  या अन्ना हजारे क़ी मुहीम पर मंजिल अभी दूर है. कई  आंधियां  और बौछारें देखनी बाकी है, समय के गर्भ के सवाल का जवाब प्रतीक्षा ही होती है.फिर भी हर सीने में बेहतरी  के लिए परिवर्तन लाने विचारों का ज्वालामुखी धधकता ही रहना चाहिए.
                         
                              

शनिवार, 4 जून 2011

RISK FACTORS: GLOBAL ENVIRONMENT

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RISK FACTORS: GLOBAL ENVIRONMENT


 
Though some progress has been made in the rich nations in controlling pollution and protecting ecosystems, the situation in the rest of the world is dire. Since the rich countries account for only some 20% of the worlds’ landmass, it can safely be said that the global environment is at risk. A list:
  • Natural ecosystems are disappearing rapidly. If things continue as today, in twenty to thirty years most of the remaining tropical forests, a large part of mountain forests and most of the world’s wetlands will be gone or severely marred by pollution.
  • Air and water pollution are costing millions of lives each year – through acute infections or chronic health problems that lead to premature death. Soil pollution threatens ground water supplies and as such, can develop into a major cause of water pollution and health hazard.
  • Global warming will raise sea levels by several feet in this century, threatening the half of the global population that lives in coastal areas: at sea level, and sometimes below it. Moreover, it leads to increasingly strong and therefore destructive storms and flooding, and upsets ecosystems through the expansion of non-indigenous plant and animal species. In drier areas it also leads to desertification.
  • Desertification and soil erosion, caused by wind and water, and salinization of irrigated areas due to poor water management lead to a steady decrease in the quantity and quality of agricultural land. This is true especially in the most densely populated areas of the world.
  • By 2050 over half the global population, in rich as well as poor countries, is expected to face serious fresh water shortages.



 
Relatively speaking, very little - in spite of the efforts of many environmental organizations. Natural ecosystems continue to disappear, though in some countries the pace has slowed somewhat. On the other hand, in the former Soviet Union the destruction of natural habitats, especially forests, is rapidly increasing. Loss of agricultural land continues and in some cases, accelerates, in spite of minor, mostly local successes. As regards the Greenhouse effect: the world’s nations are hotly debating an agreement, drafted in Kyoto, Japan, that doesn’t even begin to address the problem. Instead of calling for the large- scale replacement of fossil fuel with renewable energy, an essential strategy for reducing greenhouse emissions, it calls for no more than a stabilization of emission levels.

: Governments are unwilling to spend the large sums of money that are needed to effectively address the problems. Powerful interest groups – oil producing nations and companies, loggers – block initiatives to change things around. And most important: short term economic interests are put above the longer term common good.


Politicians give priority to the economy. They are largely pushed to do so by voters, who consider the present contents of their wallet much more important then the problems we will face in thirty years.
Rationalization is used to play down the consequences: nature is more resilient, so it is said, that all those environmental doomsday prophets pretend it to be, and nature, and people, will adapt to the changes.
Ideology is also used to justify inaction: the invisible hand of the market will ensure that everything will turn out all right. When the time comes people, companies and governments, prodded by the right balance between costs and benefits, will take the required action. For example, if oil becomes scarce and therefore, expensive, companies will be stimulated to look for alternatives – and will actively identify, develop and market them. No need to interfere in that process – it is better not to.
Another ideological argument is that presently we, and especially the poor countries, can’t afford to spend much money on the environment. The same argument is used to argue against large scale spending on fighting poverty. It states that first, countries have to create wealth, and only then can they invest in improving the environment – or fighting poverty. That’s what the rich countries did, the poor countries should follow the same path.


Bad economics: Much of the damage being done to the environment will be difficult or impossible to restore. And for what can be restored, the longer we wait, the higher the cost. Mainstream economics, markets, and voters have, unfortunately, a very short time horizon, and do not take account of future costs and damages. In present cost-benefit calculations environmental costs, that is, the cost of damage to the environment, are not counted. Therefore neither the private sector nor markets can be counted upon to remedy the situation: by the time markets will react it will be too late, or the cost of remedying the situation will be astronomical.
Morals: The environment is a public good, and investment in its maintenance and where possible, recuperation is, because of its importance for current as well as future generations, a moral duty. The millions of deaths that occur each year, almost all of them among the (very) poor and mostly, among children under five, are simply unacceptable. Even less acceptable is that, if current trends continue, more suffering and death lie ahead.
The key problem is that there is simply no time to follow the path the rich countries have followed, that is, to first sacrifice the environment on the altar of economic growth, and only then start paying attention to our surroundings. Moreover, what’s the point of making the same mistakes the rich countries made? Contrary to, say, the 19th century and the first 60 to 70 years of the 20th, the knowledge and the technology to produce in an environmentally friendly manner are there. So why not use it?


Pollution control technology is often expensive. It does not as a rule add to production quantity and, with the partial exception of agricultural products, product quality. Therefore, pollution control raises production costs. That reduces profits and makes products less competitive in international markets. Recognizing this, governments, especially of poor countries, tend to avoid bothering their business sector with environmental regulations - until environmental problems become such that action can no longer be delayed. Likewise, in their drive to attract foreign investment governments outdo themselves in trying to outdo governments in offering a favorable investment climate. Environmental regulations that increase production costs are not part of that climate. Thanks to globalization, international business can threaten to set up shop elsewhere if environmental regulations are perceived as too tight. Thus both national and international business push, directly or indirectly, to loosen environmental laws, if not in writing then in enforcement.
Moreover, especially in poor, badly governed countries (the two usually go together), those responsible for causing most of the environmental damage are part of the local economic and political elite, and are thus easily capable to block any measures they see as contrary to their interests.

 
A global "bottom line" will have to be established, which will oblige business as well as governments and other parties to comply with minimum environmental standards. As was described for the social "bottom line", non-compliance should give complying countries the right to impose trade sanctions. Rather then its current hammering on totally unrestrained trade the World Trade Organization, WTO, should take the lead in establishing and implementing these environmental and social "bottom lines". At the same time, a massive effort should be initiated to provide poor countries with the technology required for effective pollution control. Financing of this effort should take place within the framework of an overall sustainable development program, which should also address the already mentioned issues of adequate land and water management, conservation of natural areas and bio-diversity, and the conversion to clean, renewable fuel.

फिर मत कहना माइकल दारु पी के दंगा करता है

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फिर मत कहना माइकल दारु पी के दंगा करता है 

O सड़क  के किनारे चित्त बेसुध पड़ा इंसान ... नशे में बकबक जारी है.एकाएक एक कुत्ता आया मुंह चाट कर अपनी टांग उठाई और....
O चखना  -चेपटी लेकर दारू भट्टी  के पास पी और छोटी सी बात पर लड़ पड़े दो दोस्त.गुस्से  में आकर निकाली गुप्ती और भोंक दिया.दुसरे दिन सुबह तक एक दोस्त कह  चुका था दुनिया को अलविदा.
O दारू के चक्कर में कर्ज बढ़ता गया ... घर का सामान बेचा और टुन्न होकर रेल क्रासिंग के सामने अपनी समस्या का हल ढूँढा... नतीजा एक आदमी , दो टुकड़े बेजान.बदतमीजी, झगडे टंटे, नशे में कलंकित करने वालिवार्दातें गाँव से लेकर शहरों की क्राइम फ़ाइल बन चुकी है.
                         थू है ऐसी फैशन और अन्धानुकरण पर जिसकी शुरुआत मौज-मस्ती से होकर   सर्वनाश में जाकर ख़त्म  हो.बहाने बनाने में उस्तादी  देखिये-ख़ुशी है तो पी दारू और गमभी है तो पी!!!सुरूर में तो मसलों से मुहं छिपा लिया,उतरने के बाद जस के तस!
                            नशा शराब में होता तो नाचती बोतल!
फिल्म वालों का दिमाग दिवालिया हो गया था जो ऐसा गीत लिखा.न्यू ईयर पार्टी हो या दीगर   दारू पीने कोईच  मांगता.माता -पिता भी (स्टेट्स सिम्बल के जूनून में ओके कह देते है. शराबखोरी पूरी बेशर्मी से स्टेट्स सिम्बल बन चुकी है.
                           हुई महँगी बहुत शराब तो थोड़ी-थोड़ी पिया करो...ला पिला दे साक़िया...शराब चीज ही ऐसी है...सुनकर महफिले सजती है.जिगर छलनी हो  गया... लीवर सिरोसिस ,डीलीरियम ,  अल्कोहलिक टेंडेंसी का शिकार हो गए .घर बाहर वाले सब परेशां लेकिन छूटती  नहीं है काफ़िर मुहं से लगी हुई पहले तो तुमने शराब पी, फिर उसने जिंदगी के बचे हुए लम्हे पीना शुरू किया और बीमार होकर समय से पहले खर्च हो गए.
कईयों को दारू पीना छोड़ते देखा है.कुछ ने  बर्बादी के कगार पर तो कईयों ने   बर्बाद होने के बाद.जो भी हो शराब छोडकर जो इंसान बन गए उन्हें जोरदार सलाम और उन लोगों के लिए सद्बुद्धि की दुआएं जो सांझ ढलते ही यह कहते है की-
                                                मयखाने से शराब,साकी से जाम से 
                                                अपनी तो जिंदगी शुरू होती है शाम से
उस रोज दो रिक्शा वाले टुन्नी में बकर कर रहे थे ," मोर बेटा के तबियत खराब हे,दवा-दारू के इंतजाम करे के हे" एक साथ  दावा-दारू की जोड़ी कितनी अजीब लगती है? सच है की दवा की तरह दारू फायदा करती है लेकिन कई लोग  तो आजकल दवा को दारू की जगह इस्तेमाल कर रहे हैं.अंगूर की बेटी हसीं तो है पर उससे मस्ती करना महंगा पड़ता है.प्यालों के बेताब बादशाह कुछ यूं फरमाते है
                                      पूछिए मयकशों से लुत्फे शराब
                                       यह  मजा पाकबाज क्या जानें!     
" ठीक है सुरूर नहीं जानते पर इतना जरूर जानते है की शराबखोरी कानून से नहीं रुक सकती. इसके लिए मजबूत इच्छा शक्ति चाहिए.आदिवासी संस्कृति में शराब पीना या बनाना जायज है इसे स्थायी बनाने के बदले इसके दुष्परिणाम से अवगत कराया जाये.अब प्रशासन को देखिये चाय-पान के ठेले तो जबरिया पुलिसवाले बंद कर देंगे लेकिन दारू दुकानें खुली रहेंगी. सख्ती बरतनी चाहिए.
                             " कुछ पियोगे! दद्दू को अचानक पूछा तो वे भकुआ गए." दारू नहीं ये काफी की बात है"मैंने कहा तो छेड़खानी के अंदाज  में लगे पूछने ,"तुम शौक नहीं करते? कैसे पत्रकार हो यार!" मैंने दद्दू से कहा," दद्दू! नशा तो हम खूब करते है मगर यह नशा है जिन्दगी जीने  का नशा... अपनापन ... इंसानियत का.. आँखों का... और मुहब्बत का.हालाकि कालेज के ज़माने में  हम भी खूबसूरत चेहरे देखकर कह दिया करते थे-
                                कभी इन मदभरी आँखों से पिया था एक जाम
                                 आज तलक होश नहीं..होश नहीं..होश नहीं
सोच का गंगाजल अब शराब के खतरों से आगाह करता है.वैसे भी जब जीवन जीने का नशा सवार होता है तब मै आपके हाथ में मदुशाला का यह प्याला देने पर मजबूर हो जाता हूँ-
                  धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है ,जिसके अंदर की ज्वाला
                    मंदिर मस्जिद ,गिरिजा सब,तोड़ चुका जो मतवाला
                   पंडित ,मोमिन ,पादरियों के ,फन्दों को काट चुका
                  'कर सकती है आज उसी का,   स्वागत ये मधुशाला 
                                                                     शायद लिखने का सुरूर कुछ ज्यादा हो गया है इसलिए चलता हूँ                                                                                अपना ख्याल रखियेगा... 
                                                                                 किशोर दिवसे 
  
                            
                           

स्वयंभू युगपुरुष

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मेरी स्वरचित कविता

स्वयंभू युगपुरुष
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थर्मोकोल सी बस्तियों में
था जिन्दा लाशों का मरघट
विलाप करती वीणावादिनी के
श्वेत रंग पुते कुछ काले कपूत

कई रंगे सियारों की हुआ-हुआ
चीखते रहे वे स्तब्ध साधक
देख गुलाबों के भेस में केक्ट्स
रक्तिम शब्द और भावनाएं याचक

तभी बेखबर रेत में सर धंसाये
बीच अचानक उन शतुरमुर्गों के
कुकुरमुत्ते की तरह उग आया
एक स्वयंभू महापुरुष

तारसप्तक में गूंजने लगा
स्वनामधन्यों का श्वान विलाप
अभिशप्त सर्जकों पर होने लगा
स्वयंभू युगपुरुष का अट्टहास

नहीं पर अभी बाकी रहा था
वीणा वादिनी का एक अभिशाप
बढ़ने लगा अक्षरों का कोलाहल जब
आँखें तरेरी वैचारिक क्रांति ने तब

अभ्शाप की कोख ने जना आन्दोलन
हुआ ज्ञान तंतुओं का समुद्रमंथन
मिटटी बन गए सारे युगपुरुष
और खिलने लगे सत्यसर्जक पुष्प



शुक्रवार, 3 जून 2011

हमें उनके गुस्से पे प्यार आता है...

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हमें उनके गुस्से पे प्यार आता है...


*  क्रोध समझदारी को बाहर निकाल  देता है और दरवाजे की चटखनी लगा देता है -प्लूटार्क 
* क्रोध हंसी की हत्या करता है और ख़ुशी को नष्ट कर देता है -तिरुवल्लुवर 
*क्रोध इतना कारगर नहीं होता जितना साहस-यह एक फ़्रांसिसी कहावत है खैर .. महापुरुषों ने भी यह बात कही है.सच्चाई  की कसौटी पर आपने भी इसे सहज परखा होगा.
                        दद्दू के चेहरे पर हवाइयां  उडती देख हम समझ गए थे कि दाल में कुछ काला है.दुम दबाकर बातचीत करने के अंदाज से जाहिर था सुबह-सुबह भाभीजी ने अच्छा खासा डोज पिला दिया है.शाम को सब्जी और बेटे की पुस्तक लाना भूल गए. गपबाजी  के चक्कर में .गुस्से का बम फटा सुबह और धमाके ने दद्दू को सीधे मेरे घर ला टपकाया.अमूमन ऐसा  ही होता आया है.
                       चाय की चुस्कियों के साथ टोपिक मिल गया था दद्दू को " ढील देने"का." पत्रकार भाई!बीबी का गुस्सा ... कभी बच्चों का गुस्सा सड़कों पर तमाशा करते लोगों का गुस्सा ... इस गुस्से का कोई हल है या नहीं?"दद्दू ने गुस्से  पर बातचीत का न्यौता देते हुए कहा,"मैं कई  बार सोचता हूँ गुस्सा न करुं पर क्या करुं रोक ही नहीं पाता."
" देखो दद्दू!गुस्से के कई  कारण हो सकते हैं.दूसरों की हरकतें या फिर भीतरी तनाव भी.यह अलग बात है कि गुस्से का गुब्बारा फूले रहने की  मियाद हर किसी की अलग-अलग होती है.यही नहीं गुस्सा आने पर कौन कैसी हरकत करता है यह भी रोचक है और कंट्रोल न होने पर दुखदायी किस्से भी बन जाते हैं.अपने घर या बाहर क्रोध के आवेश में की जाने वाली शारीरिक और जुबानी हरकतों पर गौर कीजिए कई बातें समझ में खुद बा  खुद आ जाएँगी."-मैंने दद्दू की बात को आगे बढाया.
                     मै गुस्सा आने पर पहले समझाता हूँ.अग्र्र सामने वाला अपनी बुद्धि के  किवाड़ बंद कर लेता है तो में अपने काम में लग जाता हूं या फिर अखबार या पुस्तक में सर गडा लेता हूँ.आप क्या करते है?कई लोग दुर्वासा मुनि की तरह आग-बबूला होते हैं और महिलाएं ले लेती है दुर्गावतार.गुस्सा  जब पूरी तरह बेकाबू हो जाता है और अपने -अपने फ्यूज उड़ जाते हैं तब मुझे मालूम है कई लोग लड़ने भिड
 जाते हैं .हाथ में रखी हुई चीज फेंक-फांक करते हैं.विधानसभा और संसद में गुस्साए -पगलाए नेताओं की भड़ास टीवी पर आपने देखी होगी.गुस्से में होने वाले अपराधों का जिक्र अखबार पढने वालों से करना बेमानी होगा.गुस्सा अपनी कमजोरी का सुबूत भी है." यह सब तो ठीक है लेकिन गुस्से पर काबू तो नहीं रहता  आखिर  रोकें कैसे?"दद्दू यूं पूछने लगे मानो मैं कोई मनो चिकित्सक हूँ .फिर  भी मेरी एक मनोवैज्ञानिक दोस्त रोजी फर्नांडीज की बातें मुझे याद हैं.वह अक्सर कहा करती है जब भी गुस्सा आये रिएक्ट करने से पहले एक पल रुक जाओ.यदि ऐसा हुआ तो उसी पल उसमें आपका " विवेक" शामिल हो जायेगा.यही विवेक आपको कुछ गलत करने से बचा लेगा."डिप्लोमेसी के जरिये गुस्से से बचा जा सकता है.
                    "बच्चे,औरतें, नौजवान और बूढ़े गुस्से में अलहदा तरीके से प्रतिक्रिया जताते हैं.टीनेजर्स के मन में सबसे अधिक गुस्सा  भरा होता है. . लिहाजा उन्हें सबसे  अधिक  समझने की जरूरत है.रिएक्शन का तरीका घर और बाहर वालों के सामने बदलता रहता है.गुस्सा विध्वंसकारी हो सकता है.लेकिन इसका सुनियोजित रचनात्मक उपयोग भी बखूबी  किया जा सकता है. "-दद्दू इन बातो के साथ अपने इंटेलिजेंट होने का दावा पेश कर रहे थे कि अपने दोस्तों और सहेलियों के साथ टीवी देख रही मेरी बेटी ने आकर पहले तो दद्दू को नमस्ते किया फिर कहा,"पापा! वक्त फिल्म देखी है आपने?अक्षय कुमार को पापा बने अमिताभ बच्चन घर से बाहर निकल देते हैं ताकि वह सुधर जाये.गुस्से में वह कुछ बनने की राह पर चल पड़ता है."
                   मै दद्दू की और देखता हूँ और हम दोनों अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बातचीत में लग जाते हैं.फिल्मों और सामाजिक जीवन में भी गुस्से का गुब्बारा मन में फुलाकर घर से निकल जाने और कुछ बनने का संकल्प पूरा करने के कई एपिसोड सामने आये है.गुस्से ने ही अमिताभ को " एंग्री यंग मैन" की  इमेज के साथ बाक्स ऑफिस पर हिट फ़िल्में दी.अपने मन के भीतर गुस्से का उबाल लिए दुष्यंत ने लिखा है-
                              यहाँ तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग ही बसते है 
                              खुद जाने  यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा
खुदा और भगवन दोनों ने ही समझाइश दी है ," ज्ञानी पुरुष का पतन क्रोध से होता है "और "क्रोध मूर्खता से शुरू होकर पश्ताताप में समाप्त होता है.".पर कोई इन नसीहतों पर  अमल भी तो करे!" गुस्से  का भूत स्वर होते ही इस बात का ध्यान ही कहाँ रह जाता है की इससे किसी को ठेस तो नहीं पहुच रही है!.. और हाँ अगर शारीरिक क्षति हो रही है तब तो निश्चित रूप से ऐसा गुस्सा अपराध है.
                            दद्दू को अचानक याद आ गए गुस्सा पी जाने ,गुस्से से लाल -पीला होने और गुस्से के मारे आँखों में खून उतर आने के मुहावरे.मुझे भी याद  थी वह फिल्म " मुन्ना भाई  एम् बी बी एस"  जिसमें डीन का किरदार निभाने वाले अभिनेता बोमन ईरानी गुस्से में होने पर अलहदा अंदाज में हँसते है.
   इधर मैं और दद्दू कुछ देर ख़बरें टीवी पर देखते रहे और ब्रेक के दरम्यान अचानक कानों में आवाज सुनाई दी .श्रीमती जी अपनी सहेली से कह रही थीं -
                        उनको आता है हमारे प्यार पे गुस्सा
                        हमें उनके गुस्से पे प्यार आता है
  गुस्से और प्यार के रिश्ते के भी अनेक पहलू हैं .फिर भी आईने की तरह साफ़ बात यह है कि गुस्सा अनेक बीमारियों की जड़ है इसलिए इस पर नियंत्रण जरूरी है.आपको गुस्सा अधिक आता है तब मनोचिकित्सक से परामर्श लेने में झिझक मत महसूस कीजिए.अचानक ही बात रोककर दद्दू ने फिर अपनी चोंच खोली,"," पर अखबार नवीस,आप लोग बड़े शातिर हो .सामने  वाले को गुस्सा दिलाकर खूब मजे लेते हो .लेकिन ये नेता  भी कुछ कम नहीं जो दांत निपोरकर कई दफे आपकी चाल से बच निकलते हैं.मैंने कहा " नो कमेन्ट". खैर !... गुस्से में आप क्या करते  है इसका जिक्र जरूर कीजिएगा!!!!!  
                          
                        
                          



गुरुवार, 2 जून 2011

आइना छोडिये आईने में क्या रक्खा है?

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आईना छोडिये आईने में क्या रक्खा है?
"लेकिन वह अफसर ईमानदार था "  दद्दू कहने लगे"दफ्तर में चापलूस और बेईमानों के कुनबे ने लगातार उसके खिलाफ साजिशें रची.फिर होना क्या था ... राजनैतिक दाव-पेंच में फंसाकर उसपर ऐसे आरोप साबित किये गए के नौकरी से हाथ धोना पड़ा था उस नादाँ को."
              " वह तो सीधा आदमी  था लेकिन ऐसे कई लोग हैं जो जहाँ रहते हैं करप्ट रहते है और ऊपर से सीधा दिखने का ढोंग करते है. इन्हें पहचानना भी तो मुश्किल है ... बाजार में ऐसे खोटे सिक्के काफी चल रहे हैं "
"ठीक कह रहे हो  यार!आज के ज़माने में किसी पर भी "सीधे आदमी का ठप्पा न लगे.उसे तेज तर्रार और व्यवहारिक होना ही चाहिए. वर्ना दफ्तरों  की पालिटिक्स खा जायेगी ."
" सबसे बेहतर तो ये है कि अपना काम परफेक्ट हो जिससे कोई  भी अंगुली उठाने की जुरअत न कर सके.. . 
खैर!जब भी सीधे इंसान के साथ बेइंसाफी होती है तब ऐसा लगता है कि-
                         वो कत्ल हो गया बदसूरतों की महफ़िल से 
                        जो सारे शहर के आईने साफ़ करता था 
आइना साफ़ कर जैसे ही मेरी नजर उसपर पड़ी एक पल सोचने लगा था ( शायद आपने भी कभी सोचा होगा , अगर नहीं तो सोचिये)कि- कमबख्त ! मुआ आईना सर के बालों से लेकर पैर के नाखूनों तक अंग-अंग की चुगली किये बगैर नहीं मानता.कहते हैं न आईना सच्चाई बयान करता है और हर किसी के सामने एक आईना जरूर होता है.अगर अपने चेहरे के दाग देखकर दिल में घबराहट होने लगे तब गंभीरता से सोचिये अपने दिल-दिमाग के बारे में.चूंके आईना  हकीकत बयां करता है इसलिए 
                         दाग-धब्बे अपने चेहरे के मिटा 
                        आइना धोने की नादानी ना कर
दरअसल नादान और बेअक्ल वे लोग होते है जो इस बात को समझकर भी अनदेखा करते हैं की भला  या बुरा आईना मुंह पे कह देता है .वही  कहता है जो साफ़ और पारदर्शी होता है .कभी-कभी तो अपने भी परायों सा बर्ताव करने लगते हैं तब तन्हाइयों में आईना देखकर तसल्ली होने लगती है कि इस घर में  हमको कोई जानता भी  है . लेकिन जब दिल में खुशियाँ भरी हों और वह भी लम्बे अरसे तक दुःख बर्दाश्त करने के बाद,तब यकीन मानिये आप आईना देखकर गुनगुनायेंगे 
                     अपना हर अंदाज आँखों को तरो-ताज़ा लगा
                     कितने दिन के बाद मुझको आइना अच्छा लगा
आईने में खुद को देखना उनको बड़ा अच्छा लग रहा था .तभी तो न जाने कितनी देर से क्या बातें कर रहे थे अपनी ही आँखों से! और चुपके से  जब मैंने  झिर्रियों से झाँका तब सदके जाऊं!!!.... वो आईने में ऐसे महसूस  हो रहे थे जैसे कोई तस्वीर अंगड़ाई लेकर मीठी-मीठी बातें करने लगी हो.फिर भला हम कैसे खुद को रोक पायें यह कहने से कि-
                      आईने में वो अपनी अदा देख रहे हैं 
                     मर जाये की जी जाये कोई उनकी बला से 
बला बनकर जब कोई किसी की यादों में होती है तब आईने में उसका अक्स दिखाई देने लगता है.यूं की अगर वह कोई " दिलजला "हो तब आईने में अतीत के अनगिनत लम्हे कैद मिलते है.पत्थर की खदान बन जाता है उस दिल जले का दिल जहाँ से रिसते लहू के बीच तलाश करता है  वह अपना  कातिल.लेकिन फौलादी जिगर के लोगों का हौसला बुलंद  होता है -" मैं वो  बला हूँ जो शीशे से पत्थर को तोड़ता हूँ." वे सीना ठोंकने से नहीं चूकते यह कहकर कि  -
            दुश्मनों में रहकर भी अज्में जवां रखता हूँ मैं
             पत्थर का शहर ,शीशे का   मकान रखता हूँ मैं
वैसे बात न तो पत्थर  के शहर की थी या शीशे के मकान की.दद्दू को चिढ उन  लोगो पर आती है जो आईने में खुद अपना चेहरा नहीं देखते ( या देखकर भी पूरी बेशर्मी से इनकार करते हैं अपनी बदशक्ली से.वे दूसरों को आइना दिखने  की बात करते हैं.खुद बनेंगे धन पिशाच और दूसरों को देंगे सादगी  की शिक्षा.अपने दद्दू कहते हैं" दर्पण झूठ न बोले.आइना हमेशा सच ही बोलेगा.किसी दुसरे को आइना दिखने से पहले अपनी शक्ल आईने में देखना जरूरी है.ठीक उसी तरह जैसे हम जब एक अंगुली किसी की तरफ दिखाते है तब तीन अंगुलियाँ हमारी तरफ  होती है. ब्वायज एंड गर्ल्स... आप लोगों को तो एक-दूसरे की आँखें ही आईना नजर आती है... ऐसा क्यों न हो! उम्र का तकाजा भी है...फ़िल्मी गीतों में कहा गया है- आईना वही रहता है, चेहरे बदल जाते हैं.....कुमार शानू ने अपने खूबसूरत अंदाज में गाया है-
                  आईने के सौ टुकड़े करके हमने देखे हैं
                      एक में  भी तनहा थे सौ में भी अकेले हैं 
                                       खैर इस मांमले में तो कई लोग किसी भी उम्र में हसीं आँखों को आईना बना लेते हैं. फिर भी  हर उम्र का बंदा इस बात को अपने दिल में लाक कर ले कि-
                  किरदार अपना पहले बनाने की बात क़र
                 फिर आइना किसी को दिखने की बात कर
यह आज का सच है - हम लोग नई लाइफ स्टाइल में इतने ब्यूटी कांशस हो गए हैं कि आईने के बगैर काम ही नहीं चल सकता.सजना संवरना भी तो जरूरी है की नहीं... प्रेसेंटेबल भी तो बनाकर रखना होगा न!
                 लो!... भला यह क्या बात हुई ?आईने की बाते क्या चली की आप खुद आईने में अपना ही चेहरा देखने लगे!" क्या कहा? अखबारनवीस  ! आप हमें समझाइश देने वाले कौन होते हो?हम आपके हैं कौन?"अरे अरे.. नाराज क्यों होते हो?मैंने तो आपको अपना समझकर कहा था.यकीन नहीं आता?जरा अपने कान इधर लाना सुनो मैं तुम्हारे कानों में कहता हूँ-
                     आपको मैंने  निगाहों में बसा रक्खा है
                     आइना छोडिये, आईने में क्या रक्खा है?
                                                                                                 
                                                                                  अपना ख्याल रखिये...
                                                                                                  किशोर दिवसे 
             


                     

बुधवार, 1 जून 2011

शहर कागज का है और शोलों की निगहबानी है

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शहर कागज का है और शोलों की निगहबानी है 

अगर तासीर की बात करते हैं तो शहर और इंसान एक बराबर हैं.और, शहर ही क्यों गाँव,शहर और महानगर भी कई दफे इन्सान की जिन्दगी जीते है उनका भी दिल धडकता है. वे भी हँसते हैं... रोते है.. गाते हैं...खिलखिलाते हैं .जब मह्सूंस  करते हैं की उनकी बातें सुनने वाला कोई नहीं है तब खामोश होकर बैठ जाते है गुमसुम किसी " रियल दरवान " के इन्तेजार में.आपकी और हमारी तरह मसीहा के आने की कल्पना में खोए हुए...
                                ढेर सारे रंग होते है इंसान की जिन्दगी में गाँव और शहर के चेहरों पर भी यकीनन उभरते हैं इसी तरह के रंग.-कई खूबसूरत  , कुछ बदसूरत.शहर भी कमोबेश इसी तरह की शख्सियतों  को लेकर जीता है .थर्मोकोल सी-ऊपर से चमकदार पर फूंक मारते ही उड़ जाने वाली -ऐसे कई लोग हैं.कुछ ऐसे भी जो फौलादी हैं पर खोटे सिक्के के बाज़ार में अपनी खनखनाहट गुम कर बैठे है. यकीनन इनमें से ही कुछ अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश करते हैं. जो आत्मकेंद्रित हैं वे मसलों के होने या न होने से कोई सरोकार नहीं रखते.
                                    सरोकार रखने या नहीं रखने से क्या बीहड़ खत्म हो जायेंगे?आम आदमी की जिन्दगी के बीहड़ निजी पारिवारिक मसले हैं जिनकी भूल-भुलैया में खो जाता है वह.अपने शहर में भी कई बीहड़ हैं,अरसे से घनीभूत.किस्म-किस्म की समस्याएँ.पेयजल, पानी की निकासी,सड़कें,बिजली,अपराध,छेड़खानी, धूल-कचरा .सबसे बड़ी समस्या है विकास के प्रति नागरिको का अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना.उलटे अपनी बेशर्मी और निरंकुशता से परेशानियाँ बढ़ाना.अमूमन ये मसले इतने दाहक हैं की सारी जिन्दगी झुलस रही है ... शहर जल रहा है-
                                                        जल रहा सारा शहर और हम खामोश हैं
                                                        जर्रा जर्रा अंगारा और हम खामोश हैं
यातायात बेतरतीब है... सड़कों के इर्द-गिर्द शौपिंग माल  और होटलें बन रही हैं लेकिन पार्किन के मामले में नगर निगम पूरी तरह लापरवाह है. बिल्डिंग बनने के बाद ही उन्हें भी होश आता है, फिर भी कारवाई नहीं होती.
समस्याएँ सहज स्वाभाविक है पर उन्हें सुलझाने की नीयत होनी चाहिए.सड़कों के चौडीकरण  में कई धर्म स्थालियाँ और बूढ़े पेड़ बाधक हैं पर कोई ठोस योजना  नहीं बनती.होना यह चाहिए की शहर में विकास करने के पहले लोगों को " डेवलपमेंट फ्रेंडली " बनाने की सोच विकसित की जाये.समस्याओं के प्रति संवेदनहीनता से हालत यह बनती है की -
                                        अनलहक की सदा अब क्यों गूंजती नहीं फजाओं में 
                                        जुबान रखते हुए भी आज इंसान बेजुबान क्यों है?
नागरिक और प्रशासन - दो धुरियाँ हैं समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में .दोनों को ही सुधरना होगा.दोनों की ही बदमिजाजी पर अंकुश लगाना चाहिए .शहरी समस्याओं के हल में सरकारी आश्रितता के मुद्दे पर भी सोचना होगा.शहरी  लोगो को इस बात का गुरूर है की  अब हम पढ़े-लिखे लोग है. तो खुद या निरंकुश औलादों  की  सरे आम बदतमीजी देखने और करने  के बजाये        _ अनुशासित और सुंदर शहर क्यों नहीं बनने देते. धनाढ्य होने का मतलब यह तो नहीं की शहर किसी के पूज्य पिताजी का हो गया!अपनी जिम्मेदारी के प्रति जागरूकता  जरूरी है क्योंकि -
                                                                               अहले दानिश को इस बात पे हैरानी है
                                                                             शहर कागज का है और शोलों की निगहबानी है   
अक्ल के पीछे डंडा लेकर पिल पड़ने का दौर खत्म करना होगा.तभी माहौल ऐसा बनेगा की समस्याओं के अँधेरे के बीच एक टुकड़ा धूप आसानी से मिलेगा.आस्था रद्दी के बाज़ार में बिकनी बंद हो जाएगी.आज रोते हुए शहर और गाँव को हंसाने की जिम्मेदारी सियासत सहित हम सभी की है  .जो भीतर से इस्पाती सोच के हैं और छ्द्म्वादी  नहीं.सत्यान्वेषी सक्रीय व् कर्मठ मानव बारूद चाहिए अब रंगे सियारों से यह कहने का वक्त खत्म हो गया की -" मूंग की दाल और साग खाना शुरू कर  दो!!!!
                                      जिम्मेदार और जागरूक रहिये
                                                         अपना ख्याल रखें....
                                                                                                                        किशोर दिवसे