सोमवार, 17 जनवरी 2011

आदमी वो है जो खेला करे तूफानों से

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" सभी कार्यों में सफलता पूर्व तैयारी पर निर्भर करती है.पूर्व तैयारी के बगैर निश्चित रूप से असफलता हाथ लगती है."- कन्फ्यूशियस 
यह कथन मुझे सौ फीसदी खरा उस समय लगा जब मैंने पीएस सी की परीक्षा पास करने वाले होनहार युवक-युवतियों के इंटरव्यू अखबारों में पढ़े थे.रोक्तिमा राय ,फरिहा मतीन,दीपक अग्रवाल,अरविन्द पतले ,सोनल खंडूजा,सुनील चौधरी ,आदित्य शर्मा और सुनील सिंह के अलावा अनेक नौजवान ,मेहनतकश पढ़ाकुओं ने सिविल सेवाओं के लिए परीक्षा यों ही नहीं पास कर ली होगी.बेशक इनकी सफलता के पीछे लक्ष्य,बेहतर कोचिंग , गहरा मार्गदर्शन ,सही विषय चयन और नए ट्रेंड की जानकारी के साथ ही ज़माने की नब्ज को भी पहचानने की बात रही होगी.
                         इन सबके साथ ही गायत्री सिंह,निवेदिता पाल,नेहा पाण्डे, रेणुका श्रीवास्तव ,मीनाक्षी शुक्ल,और सोनिया नायक जैसी करियर कांशस युवतियों की फेहरिस्त भी है जिनके बुलंद हौसलों और सही अकादमिक रणनीति ने उन्हें सफलता बक्शी.उन्हें मैंने उसी वक्त बधाइयों के गुलदस्ते भेजे थे.मन में यह बात उठती है की क्या उनसे बाकी हम-उम्र युवा कोई सीख नहीं ले सकते! निश्चित तौर पर उन सभी के रास्तों में भी कठिनाइयाँ आई होंगी पर समस्याओं के तूफानों से लड़ने की जिद ही तो सफलता के कदम चूमने का मौका देती है.शैलेन्द्र ने क्या खूब गया था-
         बात इतनी सी है कह दो कोई दीवानों से 
        आदमी वो है जो खेला करे तूफानों से 
तमाम प्रोफेशनल कालेजों और नौकरियों के लिए  चयन स्पर्धाओं में सफल होने वाले मुकद्दर के सिमंदारों और शिकस्त खाने वाले , दोनों के लिए ही नए सफर का आगाज शुरू होना चाहिए .सफलता की ख़ुशी तब सार्थक होती है  जब सफल प्रतियोगी अपनी रणनीति का खुलासा साथियों के बीच करते हैं.वैसे यह जिम्मेदारी कोचिंग सेंटरों की है जहाँ पर वे पढ़ते रहे.जो असफल रहते है उन्हें अपनी रणनीति का पुनरावलोकन करना चाहिए.इमर्सन ने कहा है ," सफलता का पहला रहस्य है आत्म विश्वास."
यानी  हम विफल हुए तो अपनी कमजोरियों को दूर कर दोबारा मेहनत करें.
                           सफल परीक्षार्थियों  ने यकीनी तौर पर खुशियाँ मनाई होंगी पर मै असफल शहसवारों की हौसलाफजाई इन शब्दों में करना चाहूँगा.-          वो देख चिरागों के शोले मंजिलों से इशारा करते हैं 
                                          तू हिम्मत हार के बैठ गया, हिम्मत कहीं हारा करते हैं ?
अपनी असफलताओं से मत घबराइए.सफल होने के लिए तुरंत फैसला करने की शक्ति आवश्यक है.सफल इंसान उस गुलदस्ते की तरह होता है जिसे जिन्दगी का घूमता चाक अच्छे कुम्हार(मार्गदर्शक )की मदद से गढ़ता है.वैसे देखा जाए तो हालिया नौजवानों की पीशी ने सचमुच यह साबित कर दिया है के करियर बनाने में " अकादमिक विरासत " की कहीं कोई मोह्ताज्गी नहीं है.
                       पर हमारे ज़माने में करियर बनाने के मौके भी कम थे, माता-पिता और बच्चों के बीच दूरियां भी इतनी थी की जनरेशन गैप की वजह से हमें उतना मार्ग दर्शन नहीं मिला जितना आज की पीढ़ी को मिल रहा है." दद्दू ने अतीत की याद कर अपनी बात कही.बात तो ठीक कह रहे हो दद्दू,मैंने कहा ," आज अवसरों का खजाना सामने है ,बच्चे माता-पिता के दोस्त बन गए है.दूरियों की दहशत समाप्त हो गई हैऔर पालकों ने भी अच्छी तरह सीख लिया है " जनरेशन-मैनेजमेंट" .बेहतर  और अपडेटेड मार्गदर्शन करने और जुटाने में भी आज पालक सक्षम हैं.
तफरीह करते हुए मै और दद्दू जब पान ठेले के सामने से गुजरते है .... चार  युवा खड़े हैं जिनकी  बाते हमारे कानों से टकराती हैं.-सिगरेट फूंकता पहला युवा शिक्षा पद्धति को कोसता है.गुटका मुहं में ठूंसकर दूसरे ने कहा," यार !पैसे देकर भी मामला नही जमा.तीसरा बोला, मैंने तो हरे नोट देकर मामला सलटा लिया है.चौथा बिगड़ा  नवाब है ."अबे झंडू बाम! बाप किसके लिए कमा रहा है!" पान ठेले के थोड़ी ही दूर टिमटिमाते दिए की रोशनी में झोपड़ी के भीतर एक मजदूर का बेटा सुरेश मन लगाकर पढ़ रहा है.दसवी की  बोर्ड परीक्षा में उसने टॉप किया था.सुरेश जैसे ही जोशीले हिम्मत वालों के लिए कहा गया है-
                        सफर मैं मुश्किलें  आए तो जुरअत और बढ़ती है 
                         कोई जब रास्ता  रोके तो  हिम्मत और बढती है 
नौजवान पीढ़ी को हिम्मत और लग्न से लक्ष्य तक की सीढियां चढ़नी होंगी..मुसीबतें सहनी होंगी क्योंकि  "  शिकायतें गर न हों तो जिन्दगी मोहकम  नहीं होती"  इसलिए जोश और होश वाले नौजवान दोस्तों , जब भी हम लक्ष्य के सफर पर चलना शुरू करें एक बात हमेशा अपने-आपसे दुहराते रहना जो बशीर बद्र साहब ने आपके और  सभी के लिए कही है-
            जिस दिन से चला हूँ मंजिल पे मेरी नजर है 
             आँखों  ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा 
                                                                          अपना ख्याल रखिए .. खुश रहिए...
                                                                                 किशोर दिवसे


                          

अगर कभी हसबैंड स्टोर खुल गया तो???

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अगर कभी हसबैंड स्टोर खुल गया तो???
डोंट बी संतुष्ट... थोडा विश करो.. डिश करो...हालाकि यह पंच लाइन किसी ऐसे विज्ञापन की है जिसमें शाहरूख खान कुछ प्रमोट करना चाहते हैं लेकिन यूं लगता है कि इसकी थीम महिलाओं को मद्दे नजर रखकर सोची गई है".
" बात कुछ हज़म नहीं हुई ... जरा और खुलासा करो" मेरी छोटी सी बुद्धि के खांचे में बात फिट न होने पर मैंने दद्दू से पूछा."यार अखबार नवीस !क्या इस दुनिया में महिला को कोई पूरी तरह संतुष्ट कर सकता है" दद्दू ने सीधा सवाल दागा.सवाल थोडा डेंजरस टाइप लगा इसलिए मैंने दद्दू कि गुगली को "डक"  करना चाहा.. मैंने पूछा," क्या मतलब?"
नहीं  नहीं...इसका वो मतलब नहीं जो आप समझ रहे हो.क्या कोई पुरुष किसी महिला को पूरी तरह खुश रख सकता है?क्योंकि बेचारे पुरुष तो छोटी -छोटी खुशियों में ही बल्ले... बल्ले.. करने लगते हैं .लेकिन महिलाऐं कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती.
" दद्दू यह आपका अनुभव बोल रहा है क्या?इस बार मने जरा चालाकी से सवाल उनकी ही ओर रिबाउंड करते हुए कहा ,"  दद्दू.... वैसे संतुष्टि तो अपने मानने पर होती है लेकिन आप किस मुद्दे पर अपने दिमाग कि लेजर बीम का बटन ऑन कर रहे हो?
                            समझ गए थे दद्दू कि मैंने उनकी नीयत भांप ली है इसलिए मूड में आकर उन्होंने किस्सागोई शुरू की-
मुंबई में एक स्टोर खुला है जहाँ पर "पति " मिलते है.कोई भी विवाह इच्छुक महिला वहाँ पर पति का चुनाव कर सकती है .इस स्टोर के प्रवेश द्वार पर एक तख्ती लगी है जिस पर लिखा है कि आपको यहाँ पर सिर्फ एक बार ही दाखिला मिल सकता है.इस स्टोर में छः मंजिलें हैं.जैसे-जैसे खरीददारी के लिए ऊपर की मंजिल पर पहुँचते जाते हैं पुरुषों के भीतर मौजूद खासियतें बढ़ती जाती हैं.( पाठक युवती व् महिला के शाब्दिक झमेले में न पड़ें , मतलब विवाह योग्य से है.)
                           वैसे इस पति स्टोर की अनिवार्य शर्त यही है कि किसी मंजिल पर एक ही विवाह इच्छुक अपने पति का चुनाव कर सकती है.वहाँ से वापस किसी दूसरी मंजिल पर नहीं जा सकती .उसे सीधे बाहर ही निकलना होगा.
शादी करने की इच्च्छुक एक महिला उस स्टोर में गई.पहली मंजिल में लिखा था-" इन पुरुषों की नौकरी है और वे भगवान पर विश्वास रखते हैं.दूसरी मंजिल की तख्ती-इनके पास नौकरी है,भगवान पर विश्वास है और ये बच्चों से प्यार  करते हैं.तीसरी मंजिल की तख्ती पर लिखा था फ्लोर थ्री -यहाँ रखे गए पतियों की नौकरी है ,भगवान पर विश्वास करते हैं ,बच्चों से प्यार करते है और बेहद सुन्दर है.
                           अरे वाह!विवाह की आकांक्षा रखने वाली वह महिला सोचने लगी.फिर पल भर में उसके मन में विचार आया ," क्यूं न अगली मंजिल में जाकर देख लूं! वह अपने मन के लालच को रोक न सकी.चढ़कर वह सीधे चौथी मंजिल पर पहुंची.चौथे मंजिल की तख्ती में दर्ज था ,इन पुरुषों के पास नौकरी है ,भगवान पर विश्वास ,बच्चों से प्यार, बेहद सुन्दर हैं और घरेलू कामकाज में मदद भी करते हैं.
                  " ओ माई गाड..!कितनी ख़ुशी की बात है वह महिला सोचने लगी लेकिन दूसरे ही पल उसके मन में ख्याल आया ,"  क्यूं न अगली मंजिल में जाकर देख लूं !" मिनटों में वह पाचवी मंजिल पर थी . वहाँ भी थी एक तख्ती.वह पढने लगी ,-फ्लोर नंबर पांच के हाल में मौजूद पुरुषों के पास नौकरी है,भगवान में विश्वास ,बच्चों से प्यार,खूबसूरत है ,घरेलू कामकाज में मददगार है ,एक और खासियत यह की ये बेहद रोमांटिक तबीयत के हैं.."
                      उस महिला के मन में उसी फ्लोर पर रुकने का ख्याल  आया.पर ये दिल है  के मानता नहीं! थोड़ी ही देर में वह छठवी मंजिल पर पहुँच गई.तख्ती यहाँ भी लटक रही थी." फ्लोर सिक्स -आप इस फ्लोर पर आने वाली -899989 वी महिला है.इस मंजिल पर जो हाल है वहाँ पर एक भी पुरुष नहीं है.यह फ्लोर इस बात का सबूत है कि महिलाओं को खुश रखना असंभव है.आपको हसबेंड स्टोर में आने का शुक्रिया.बाहर  निकलते समय आप अपने कदम के बारे में सोचें .आपका दिन शुभ हो.
                      अब बताओ अखबार नवीस! क्या ख्याल है? दद्दू ने फिर चहककर पूछा. देखो दद्दू! संतुष्टि अपनी जगह पर है लेकिन महत्वाकांक्षा अपनी जगह पर.क्योंकि-  AMBITION IS NOT A WEAKNESS UNLESS IT IS DIS-PROPORTIONATE TO THE CAPACITY .TO HAVE MORE AMBITION THAN ABILITY IS TO BE AT ONCE WEAK AND UN-HAPPY.
                        ददू मेरी बात से सहमत थे.बोले-अखबार नवीस... मानता हूँ तुम्हारी बात को ... प़र भूल से भी अगर यह किस्सा लिखोगे तब एक बात जरूर वहा पर दर्ज कर देना---
संवैधानिक चेतावनी...महिलाओं के हसबेंड स्टोर वाले किससे के बारे में घर पर ( अपनी भाभीजी से  ) चुगली नई करने का क्या!!!!!!!
                            शुभ रात्रि.. शब्बा खैर... अपना ख्याल रखिए...
                                                                                      किशोर दिवसे
                        

महंगाई डायन खाए जात है!!!!!!

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 महंगाई डायन खाए जात है...
दोस्तों .. महंगाई डायन खाए जात है. ह़र बन्दा इस हकीकत  को भुगत रहा है.अपने -अपने घरों में बैठकर हम सब बेतहाशा कोस लेते हैं महंगाई को.जन-जिहाद का कहीं पर नाम-ओ- निशाँ तक नही है.आज सुबह से इण्डिया टीवी ने इस मुद्दे को खूब उभारा है. कागजी शेर बने सामाजिक संगठन मिलजुलकर महंगाई के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते क्या? मुझे  धार्मिक आस्था से कोई परहेज नहीं लेकिन  अपने भारत का यह दुर्भाग्य है कि  यहाँ पर मंदिरों में भगदड़ मचती है और सौ से अधिक लोग मर जाते है. ऐसा कई बार हुआ है. महंगाई जैसे भीषण मुद्दे पर समाज "जिन्दा लाशों का समूह बनकर कानों में अंगुलिया डाले बैठा रहता है.
     सरकारों का हाल ये है कि-      चाट  समझ फिर चाट  जाओ देश को
                                               ,आप खाओ और बच्चों को खिलाओ देश को
                                             दूर मंडराते रहे आकाश में फिर एकदम ,
                                                      इक झपट्टा मार पंजों में दबाओ देश को
                                              भाषणों की भस्म नारों की शहद में घोटकर
                                                       ,देश बीमार बतलाकर चटाओ देश को
मुझे लगता है कि सारे  गाँव ..शहर  के लोगों को इस मुद्दे पर शालीन तरीके से सड़कों पर आना चाहिए. समाज के सारे तबके के लोग महंगाई के खिलाफ निजी और सांगठनिक तौर पर अपने विरोध का खुला इजहार करे. इन्टरनेट के चिटठा जगत ... चौपालों पर भी इसपर अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज क़ी जाए . और तो और खुला हस्ताक्षर अभियान  भी चलाया जा सकता है. आप खुद भी सोचिये कि जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से आप महंगाई का विरोध कैसे कर सकते है?सोचिये   क्या ऐसे मुद्दों पर जनता का सामूहिक हस्तक्षेप जरूरी नही? उठिए... अब यह जागकर अपने जिम्मेदार होने का सुबूत देने का सही वक्त है...
                                            

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

फौलाद का टुकड़ा और कपूर की टिकिया

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बरसात की एक रात थी.बिजली गुल थी और घुप्प अँधेरे में शमा जल रही थी.गोया कि मोम के बदन से धागे का जिगर जल रहा था.इधर हवा का एक झोंका आया और तकरार शुरू हो गई उन दोनों के बीच.
"तिल -तिल कर जल रही हूँ मैं.... तभी तो यहाँ पर स्याह लिबास को चीरने के लिए रोशनी है.... लेकिन तुम क्या जानो पल-पल-जलने के दर्द को "- उस धागे ने पूरी तरह ऐठते हुए कहा जिसका जिगर मोम के बदन से ढका हुआ था .
"ठीक है... ठीक है...पर तुम भी यह मत भूलो कि मेरे जिस्म का कतरा-कतरा पिघलता है....क्यूँ भूल गए क्या ?आखिर तुम्हे भी तो मैंने  अपने साथ और अपने भीतर सम्हाल कर रखा है."-पिघलकर गिरती मोम के बदन ने भी अपनी जिद छिपाते हुए कहा भले ही ह़र क्षण उसका बदन घटता जा रहा था.धागा और मोम का बदन दोनों ही अपनी-अपनी अकड में ऐंठ रहे थे.इधर मासूम लौ उनकी इस अहंकार भरी तू-तू,मैं-मैं से थरथरा रही थी.
                        
 लौ के इर्द-गिर्द मंडराता पतंगा बड़े ध्यान से उनकी तकरार सुन रहा था.,सोचने लगा " क्या इनका रिश्ता भी पति-पत्नी की तरह नहीं है ...लेकिन अपना-अपना अहंकार नहीं छोड़ रहे हैं ये दोनों.आखिर पतंगे से रहा न गया और उसने जलती शमा के धागे और मोम के बदन से कहा ," चुप रहो बेवकूफों ...! लड़ो मत!सुनो विक्रम और वेताल की कहानी....तुम दोनों को अपनी कमजोरी समझ में आ जाएगी.और पतंगे ने पर फडफडाते हुए किस्सा यूं शुरू किया....
                                  वेताल का शव कंधे  पर लादकर हमेशा की तरह राजा विक्रमार्क जा रहे थे गंतव्य की ओर.रास्ते में सफ़र काटने की दृष्टि से वेताल ने  किस्सागोई शुरू की.पर साथ में ताकीद भी कि जवाब जानते हुए भी अगर तुमने उत्तर नहीं दिया तो तुम्हारी खोपड़ी के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे.और जवाब दिया तो मैं फिर लटक जाऊँगा अपनी डाल पर.
        
 खैर किस्सा कुछ इस तरह से शुरू हुआ ,"  फौलाद का एक  टुकड़ा और कपूर की टिकिया  साथ-साथ रहते थे एक ही आले मैं.रोज दोनों ही एक-दूसरे की बखिया उधेड़ते रहते.एक रोज फौलाद ने कहा ,"जानते हो मेरी अहमियत!सुई से लेकर जहाज तक मुझसे ही बनते हैं... घर -बाहर की अनगिनत चीजें... है न कमाल!"कपूर की टिकिया का स्वर भी तीखा था.उसने भी प्रत्युत्तर दिया,"जानते हो तुम ,जब लौ मुझे जलती है .. खुद जलकर समाप्त हो जाती हूँ पर सारे घर को पवित्र गंध से महका देती हूँ.मेरी वजह से ही ह़र जगह सुगंध है" दोनों ही अपने दंभ में चूर थे,पूरी तरह गर्वोन्मत्त.
                                  बारिश के दिन आये और पानी की बौछारें फौलाद पर पड़ी.रखे-रखे उसमें जंग लग गया और मोर्चे से वह बदशक्ल हो गया.इधर कपूर की टिकिया भी अभिमान से चूर थी.बारिश के बाद की तेज हवाओं ने उसे आहिस्ता-आहिस्ता अस्तित्वहीन कर दिया.फौलाद और कपूर दोनों ही अब उखड़े-उखड़े और कटे-कटे से रहने लगे.वक्त गुजरता गया और कई दिनों बाद-
                                   दोनों के भीतर  से एक-एक रूहानी फ़रिश्ता बाहर निकला .पहले रूहानी फ़रिश्ते ने जंग लगे फौलाद के टुकड़े को गलाकर उसका पूजा का थाल बनाया.इधर दूसरे फ़रिश्ते ने कपूर की टिकिया को खूब समझाया तब कपूर ने स्वतः को पूजा के थाल को समर्पित कर दिया .थाल में रखी चीजों के साथ अब कपूर की टिकिया पूरी तरह सुरक्षित  और खुश थी.पूजा का थाल चमचमाने लगा था .दीया जल रहा था और कपूर की टिकिया खुद जलकर भी समूचे घर को महका रही थी.सारी चीजों को अपने साथ सहेज लिया था उस थाल ने.दोनों ही फ़रिश्ते समझाइश देकर लुप्त हो गए थे.
                       कथा सुनकर वेताल ने राजा विक्रमार्क से पूछा"यह बताओ राजा, फौलाद का टुकड़ा और कपूर की टिकिया वास्तव में कौन थे दोनों में परिवर्तन कैसे आया?राजा विक्रमार्क ने गहरी सांस ली और पल भर रूककर कहना शुरू किया-
" सुनो वेताल!फौलाद का टुकड़ा और कपूर की टिकिया दरअसल पति-पत्नी का रिश्ता है.दोनों के बीच "इगो" अथवा अहम के टकराव तकरार का मुख्य कारण.फौलाद के टुकड़े का का थाल बनना आत्मबोध है और कपूर का थाल को स्वयमेव समर्पण करना अपने मस्तिष्क में बने अहंकार का कुहासा समाप्त करना है.और ... ये जो दोनों फरिश्तों की बात कर रहे हो ना वह दोनों पति-पत्नी का विवेक है.इधर कपूर ने थाल को समर्पित किया तब थाल ने उसे अपने भीतर समेट लिया.फौलाद भी पूजा का थाल तब बना जब उसने अपना अहंकार छोड़ा.दोनों ही बातें साथ-साथ हुईं.दोनों को ,भीतर जड़ें जमाये अहंकार ने निर्जीव और अस्तित्वहीन बना दिया था.यानी पति-पत्नी का रिश्ता मुरझा गया था.जैसर ही यह रिश्ता दर्प-विहीन हुआ सारा घर पूजा के थाल में रखी जलती टिकिया की गमक से महकने लगा..सारे परिवार में खुशयां छा गयीं.
                                    जोरों से अट्टहास कर वेताल ने राजा विक्रमार्क से कहा-राजा!तूने मेरी बातों का सही-सही जवाब दिया और ये मैं चला... वेताल अट्टहास कर फिर जाकर लटक गया उसी वृक्ष की डाल पर जहाँ से राजा विक्रमार्क उसे कंधे पर बिठाकर लाया था.
                                        आज बस इतना ही... अपना ख्याल रखिये...
                                                                              किशोर दिवसे 

                                             
                                            
                                           








सोमवार, 10 जनवरी 2011

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सिर्फ वक्त ही समझता है प्यार में छिपा ऐश्वर्य

"दद्दू अभी मेरे पास नहीं हैं....प्रोफ़ेसर प्यारेलाल शहर से बाहर हैं.बाबू मोशाय कोलकाता गए.चिकनी चाची महिला मंडल में पंचायत कर रही है.दोस्तों के साथ मस्ती के मूड में किसी फास्ट फ़ूड कोर्नर में मस्ती कर रहे होंगे बंटी और बबली.और तो और देवर्षि नारद भी नहीं जो पंखिल शब्दों के बादलों पर सवार होकर मेरे सामने आ जाएँ और कानों में आवाज गूंजने लगे-
      नारायण... नारायण... नारायण... नारायण....
और वे पूछने लग जाएँ ," कैसे हो अखबार नवीस?"फिर शुरू हो जाए गप्पों का सिलसिला . छोडो भी , क्या फर्क पड़ता है ?आप तो हैं मेरे साथ .. फिर क्या जरूरत है किसी तीसरे की ? यानी आज सिर्फ आप और मैं !
               दर असल मैं भावना के बारे में सोच रहा था .मुझे लगता है हम सबको उसके विषय में सोचना चाहिए." क्या मतलब ! वह तो अच्छा -भला एम्.बी.ऍ. कर रही है. प्लेसमेंट होगा एकाध-दो महीने में और जाब लग जाएगा किसी अच्छी कंपनी में .कोई सोचने वाली बात ही नहीं है." ओह शीट!मैं उस भावना की बात नहीं कर रहा हूँ ." मेरे कहने का मतलब उस भावना से है जिसका मायने है फीलिंग या एहसास." अच्छा -अच्छा ... यानी भावना जैसे प्यार ... अमीरी ... ख़ुशी... अनुभव...अहंकार...और अफ़सोस.!" हाँ ...अब बिलकुल ठीक समझे आप.आज आप और मैं हम दोनों ही हैं चलो कहीं कल्पनाओं की उडान उड़ते हैं यानी -" सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ?"" पहले  आप बताइए तो सही की आप कहना क्या चाहते हैं?
                            जरा सोचो की अगर एक द्वीप है जहाँ पर भावना कई  चेहरों में हमारे सामने है और वह द्वीप डूबने लग जाए तब क्या होगा?" आखिर पड़ गए ना सोच में !कुछ सूझ नहीं रहा ? ठीक है जब भी कोई कल्पना सूझे मुझे ई-मेल कर देना.इस वक्त हम दोनों ही साथ हैं इसलिए मैं ही एक किस्सा सुनाए देता हूँ .लेकिन एक शर्त पर ... आपको भी कभी न कभी जरूर सुनाना होगा.
                       आपको मालूम है ... हुआ यूं की एक बड़ा सा द्वीप था जहाँ भावनाओं के कई चेहरे एक साथ नजर आते थे.यानी सारी भावनाएं संग-संग रहती थी.ख़ुशी अहंकार,गम,अनुभव,प्यार  और बाकी भी.एक रोज अचानक यह मुनादी हुई की जल्द ही वह द्वीप डूबने वाला है.इसलिए इसे खाली करना होगा." फिर क्या हुआ ?क्या वे भावनाएं स्त्री और पुरुषों के अलग-अलग चेहरों वाली थीं?
                             ? हाँ.. स्त्री और पुरुष भी.आगे सुनो.... उन सभी ने अपनी नौकाएँ तैयार की और द्वीप छोड़ने की तैयारी कर ली.बाकी सभी भावनाएं बदहवास थीं... एकदम घबराई हुई.उनके चेहरे से पसीने की धार बह रही थी.लेकिन प्यार था  एकदम शांत, गंभीर.वह आखिरी पल तक अडिग लग रहा था.अपने जूनून का पक्का.जब वह द्वीप लगभग डूबने को था प्यार ने मदद चाही.अमीरी एक बड़ी सी नाव में जाने को तैयार थी.प्यार  ने बड़े प्यार से  पूछा" तुम मुझे अपने साथ ले जाओगे?अमीरी के चेहरे पर घमंड था.उसने गर्व से कहा, "नहीं ...बिलकुल नहीं मेरी नाव  में ढेर सारा   सोना ,चांदी  और करेंसी है.प्यार...वहाँ तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं.
                                            प्यार  ने फिर अहंकार से पूछा जो एक खूबसूरत नाव में जाने को तैयार था."अहंकार! तुम मेरी मदद करोगे?-प्यार  का सवाल था.फ़ौरन दो-टूक जवाब देते हुए अहंकार ने खिल्ली उड़ाई ," प्यर !मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता.तुम इतना भीगे हुए हो की मेरी नाव ख़राब हो जाएगी.नजदीक ही दूसरे कोने में था अफ़सोस.प्यार    ने झट से पूछा ,"अफ़सोस !तुम मुझे अपने साथ ले चलो."अफ़सोस ने अपनी ही तन्हाइयों में मायूस चेहरे पर हाथ रखकर कहा,"ओह प्यार!यूं ही अकेला रहने दो अफ़सोस को.मैं अपने टूटे हुए दिल के साथ रहना चाहता हूँ."
                                ख़ुशी की नाव भी प्यार के  नजदीक से गुजरी.प्यार  को आस बंधी थी की वह ख़ुशी के साथ हो लेगा लेकिन ख़ुशी अपनी ख़ुशी में इतनी खुश थी की उसे कहाँ  प्यार  का एहसास होता?ख़ुशी ने तो प्यार की आवाज भी नहीं सुनी.हालाकि प्यार ने उसे कई बार बुलाया भी.
                         प्यार ... प्यार ... प्यार ...! अचानक कानों में गूंजती आवाज से चौंक गया प्यार ." आओ प्यार ... मेरे पास आओ." वह एक बूढी आवाज थी जिसने प्यार से कहा, "आओ प्यार ..मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूँगा.प्यार को यूं लगा मानो उसे किसी ने आशीर्वाद देकर दुलार लिया हो प्यार उस बुजुर्ग के साथ नदी के रेतीले तट पर पहुंचा.लेकिन वह इतना खुश था की उसका नाम पूछना ही भूल गया.भावनाओं के सभी अलहदा चेहरे अमीरी,ख़ुशी,अहंकार .अफ़सोस आदि पहले ही तट पर पहुँच कर अपना-अपना काम भी करने लगे थे.
                                       " अरे!मैं तो उस बुजुर्ग का नाम ही पूछना भूल गया जिसकी नाव पर सवार होकर आया था मैं " -प्यार ने अपने मन में सोचा.उसने नदी के तट पर बड़े से पत्थर पर बैठी पोपले मुहं वाली बूढी मां से पूछा,"मां मुझे नाव में कौन बिठाकर लाया मैं उसका नाम ही पूछना भूल गया."अब आप पूछेंगे की उस मां का नाम क्या था? मां तो बस मां होती है,लेकिन प्यार ! उस मां का नाम था विद्या.विद्या मां ने गंभीर स्नेहिल मुस्कान के साथ प्यार से कहा,"प्यर ,जानते हो, उस बुजुर्ग इंसान का नाम है वक्त." वक्त!" प्यार ने कुछ चौंककर विद्या मां से अपनी जिज्ञासा शांत करनी चाही," लेकिन विद्या मां ! वक्त ने भला मेरी मदद क्यों की?"
                                    मां विद्या की बूढी आँखों में ज्ञान की अलौकिक आभा थी.एक बार मुस्कुराकर मां की ममता भरी मेधा ने पूरे आत्म विश्वास से कहा ,"प्यार! वक्त ने तुम्हारी मदद इसलिए की क्योंकि वक्त ही यह समझ सकता है की कितना महान है प्यार.
                                 अरे! कहाँ खो गए आप?वो देखिए हम दोनों के आस-पास भावना कितने चेहरे बदलकर लोगों के दिलों में बस गई है.मां विद्या तो उस सभी को दुलारती है जो उसकी कद्र करते है लेकिन प्यार को साहिल तक पहुँचाने वाला बूढा वक्त रेत पर अपने क़दमों के अनगिनत निशान छोड़ गया है.लौटता हुआ मांझी गुनगुना रहा है-
                    प्यार है एक निशान क़दमों का 
                     जो मुसाफिर के साथ के साथ रहता है 
                                                                         
                                          खुश रहिए .अपना ख्याल रखिए...
                                                                              किशोर दिवसे 


रविवार, 9 जनवरी 2011

सिर्फ वक्त ही समझता है प्यार में छिपा ऐश्वर्य

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"दद्दू अभी मेरे पास नहीं हैं....प्रोफ़ेसर प्यारेलाल शहर से बाहर हैं.बाबू मोशाय कोलकाता गए.चिकनी चाची महिला मंडल में पंचायत कर रही है.दोस्तों के साथ मस्ती के मूड में किसी फास्ट फ़ूड कोर्नर में मस्ती कर रहे होंगे बंटी और बबली.और तो और देवर्षि नारद भी नहीं जो पंखिल शब्दों के बादलों पर सवार होकर मेरे सामने आ जाएँ और कानों में आवाज गूंजने लगे-
      नारायण... नारायण... नारायण... नारायण....
और वे पूछने लग जाएँ ," कैसे हो अखबार नवीस?"फिर शुरू हो जाए गप्पों का सिलसिला . छोडो भी , क्या फर्क पड़ता है ?आप तो हैं मेरे साथ .. फिर क्या जरूरत है किसी तीसरे की ? यानी आज सिर्फ आप और मैं !
               दर असल मैं भावना के बारे में सोच रहा था .मुझे लगता है हम सबको उसके विषय में सोचना चाहिए." क्या मतलब ! वह तो अच्छा -भला एम्.बी.ऍ. कर रही है. प्लेसमेंट होगा एकाध-दो महीने में और जाब लग जाएगा किसी अच्छी कंपनी में .कोई सोचने वाली बात ही नहीं है." ओह शीट!मैं उस भावना की बात नहीं कर रहा हूँ ." मेरे कहने का मतलब उस भावना से है जिसका मायने है फीलिंग या एहसास." अच्छा -अच्छा ... यानी भावना जैसे प्यार ... अमीरी ... ख़ुशी... अनुभव...अहंकार...और अफ़सोस.!" हाँ ...अब बिलकुल ठीक समझे आप.आज आप और मैं हम दोनों ही हैं चलो कहीं कल्पनाओं की उडान उड़ते हैं यानी -" सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ?"" पाहे आप बताइए तो सही की आप कहना क्या चाहते हैं?
                            जरा सोचो की अगर एक द्वीप है जहाँ पर भावना कई  चेहरों में हमारे सामने है और वह द्वीप डूबने लग जाए तब क्या होगा?" आखिर पड़ गए ना सोच में !कुछ सूझ नहीं रहा ? ठीक है जब भी कोई कल्पना सूझे मुझे ई-मेल कर देना.इस वक्त हम दोनों ही साथ हैं इसलिए मैं ही एक किस्सा सुनाए देता हूँ .लेकिन एक शर्त पर ... आपको भी कभी न कभी जरूर सुनाना होगा.
                       आपको मालूम है ... हुआ यूं की एक बड़ा सा द्वीप था जहाँ भावनाओं के कई चेहरे एक साथ नजर आते थे.यानी सारी भावनाएं संग-संग रहती थी.ख़ुशी अहंकार,गम,अनुभव,प्यार  और बाकी भी.एक रोज अचानक यह मुनादी हुई की जल्द ही वह द्वीप डूबने वाला है.इसलिए इसे खाली करना होगा." फिर क्या हुआ ?क्या वे भावनाएं स्त्री और पुरुषों के अलग-अलग चेहरों वाली थीं?
                             ? हाँ.. स्त्री और पुरुष भी.आगे सुनो.... उन सभी ने अपनी नौकाएँ तैयार की और द्वीप छोड़ने की तैयारी कर ली.बाकी सभी भावनाएं बदहवास थीं... एकदम घबराई हुई.उनके चेहरे से पसीने की धार बह रही थी.लेकिन प्यार था  एकदम शांत, गंभीर.वह आखिरी पल तक अडिग लग रहा था.अपने जूनून का पक्का.जब वह द्वीप लगभग डूबने को था प्यार ने मदद चाही.अमीरी एक बड़ी सी नाव में जाने को तैयार थी.प्यार  ने बड़े प्यार से  पूछा" तुम मुझे अपने साथ ले जाओगे?अमीरी के चेहरे पर घमंड था.उसने गर्व से कहा, "नहीं ...बिलकुल नहीं मेरी नाव  में ढेर सारा   सोना ,चांदी  और करेंसी है.प्यार...वहाँ तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं.
                                            प्यार  ने फिर अहंकार से पूछा जो एक खूबसूरत नाव में जाने को तैयार था."अहंकार! तुम मेरी मदद करोगे?-प्यार  का सवाल था.फ़ौरन दो-टूक जवाब देते हुए अहंकार ने खिल्ली उड़ाई ," प्यर !मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता.तुम इतना भीगे हुए हो की मेरी नाव ख़राब हो जाएगी.नजदीक ही दूसरे कोने में था अफ़सोस.प्यार    ने झट से पूछा ,"अफ़सोस !तुम मुझे अपने साथ ले चलो."अफ़सोस ने अपनी ही तन्हाइयों में मायूस चेहरे पर हाथ रखकर कहा,"ओह प्यार!यूं ही अकेला रहने दो अफ़सोस को.मैं अपने टूटे हुए दिल के साथ रहना चाहता हूँ."
                                ख़ुशी की नाव भी प्यार के  नजदीक से गुजरी.प्यार  को आस बंधी थी की वह ख़ुशी के साथ हो लेगा लेकिन ख़ुशी अपनी ख़ुशी में इतनी खुश थी की उसे कहाँ  प्यार  का एहसास होता?ख़ुशी ने तो प्यार की आवाज भी नहीं सुनी.हालाकि प्यार ने उसे कई बार बुलाया भी.
                         प्यार ... प्यार ... प्यार ...! अचानक कानों में गूंजती आवाज से चौंक गया प्यार ." आओ प्यार ... मेरे पास आओ." वह एक बूढी आवाज थी जिसने प्यार से कहा, "आओ प्यार ..मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूँगा.प्यार को यूं लगा मानो उसे किसी ने आशीर्वाद देकर दुलार लिया हो प्यार उस बुजुर्ग के साथ नदी के रेतीले तट पर पहुंचा.लेकिन वह इतना खुश था की उसका नाम पूछना ही भूल गया.भावनाओं के सभी अलहदा चेहरे अमीरी,ख़ुशी,अहंकार .अफ़सोस आदि पहले ही तट पर पहुँच कर अपना-अपना काम भी करने लगे थे.
                                       " अरे!मैं तो उस बुजुर्ग का नाम ही पूछना भूल गया जिसकी नाव पर सवार होकर आया था मैं " -प्यार ने अपने मन में सोचा.उसने नदी के तट पर बड़े से पत्थर पर बैठी पोपले मुहं वाली बूढी मां से पूछा,"मां मुझे नाव में कौन बिठाकर लाया मैं उसका नाम ही पूछना भूल गया."अब आप पूछेंगे की उस मां का नाम क्या था? मां तो बस मां होती है,लेकिन प्यार ! उस मां का नाम था विद्या.विद्या मां ने गंभीर स्नेहिल मुस्कान के साथ प्यार से कहा,"प्यर ,जानते हो, उस बुजुर्ग इंसान का नाम है वक्त." वक्त!" प्यार ने कुछ चौंककर विद्या मां से अपनी जिज्ञासा शांत करनी चाही," लेकिन विद्या मां ! वक्त ने भला मेरी मदद क्यों की?"
                                    मां विद्या की बूढी आँखों में ज्ञान की अलौकिक आभा थी.एक बार मुस्कुराकर मां की ममता भरी मेधा ने पूरे आत्म विश्वास से कहा ,"प्यार! वक्त ने तुम्हारी मदद इसलिए की क्योंकि वक्त ही यह समझ सकता है की कितना महान है प्यार.
                                 अरे! कहाँ खो गए आप?वो देखिए हम दोनों के आस-पास भावना कितने चेहरे बदलकर लोगों के दिलों में बस गई है.मां विद्या तो उस सभी को दुलारती है जो उसकी कद्र करते है लेकिन प्यार को साहिल तक पहुँचाने वाला बूढा वक्त रेत पर अपने क़दमों के अनगिनत निशान छोड़ गया है.लौटता हुआ मांझी गुनगुना रहा है-
                    प्यार है एक निशान क़दमों का 
                     जो मुसाफिर के साथ के साथ रहता है 
                                                                         
                                          खुश रहिए .अपना ख्याल रखिए...
                                                                              किशोर दिवसे 

                                                                                  मोबाइल -09827471743
                                 

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

परिवर्तन है नए वर्ष का सन्देश

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तारीख -३१ दिसंबर
वक्त  दोपहर   ( शाम के बाद समय नहीं मिलेगा इसलिए)
ह़र किसी का अपना अलहदा अंदाज होता है बीते बरस को अलविदा कहने का.वर्ष २०१० की विदाई और २०११ का  स्वागत करने प्लानिंग अमूमन पहले से ही हो जाया करती है.कईयों ने सोचा की आउटिंग कर ऐश करे और रात दारू-शारू के साथ मजे लें. नव- धनाढ्यों  का कुनबा बड़ी होटलों में साल की विदाई पार्टी के साथ "रात रंगीन " करने शराब -शबाब के पॅकेज डील कर चुका होता है.बीते बरस भी ३१ की रात को सुरूर में पहले तो तेज रफ़्तार सडको पर कुछ नौजवान घूमे फिर उनमें से कुछ अस्पताल में भी नजर आए.
                        वर्ष २००९ की रात को भी बारह बजे शहर जवान हो कर मस्ती में बल्ले-बल्ले कर रहा था. अपनी- अपनी सोच और नसीब के चक्कर में बीते साल की विदाई का अंदाज भी मजदूरों, मिडिल क्लास और रईसों की तकदीर- तदबीर के पारदर्शी अक्स दिखा जाता है.कहीं खुशी .. कहीं गम ...कहीं जोश-ऍ- जूनून तो कहीं झुंझलाहट नजर आती है.रात में टीवी के सामने " हात एंड मसाला कार्यक्रमों को देखने वालों का तबका भी होता है.युवा होस्टलों में जश्न का अलग अंदाज तो जिनकी एग्जाम चल रही है वे थोडा  सा एन्जॉय कर ज्यादा टाइम खोटी नहीं करना चाहते.
                               आज रात भी यही सब होगा . पिछले बरस अपने दद्दू ने टिप्पणी कीथी ,"दोस्त! बाजार और नई हवा के इशारे पर ही सही लोग अब अवसरों को बिंदास तरीके से जीने की जीवनशैली अपना चुके हैं.यह बात अलग है ki जिंदगी में मिली सौगातें अपने-अपने पुरुषार्थ और नसीब का मिला-जुला फलादेश है.कुछ लोग नए वर्ष पर जश्न के साथ कोई रिसोलुशन भी लेते हैं . हाँ! कौन निभाता है कौन नहीं यह अपनी जिद की बात है.
                           " संकल्प के लिए नए बरस की शुरुआत की मोह्ताज्गी क्यों ? क्या हम साल भर उत्सव की तरह नए  संकल्पों के साथ नहीं मना सकते? "क्यूँ नहीं!नए वर्ष का सन्देश है परिवर्तन.हमसे जुडी  व्यवस्थाओं के प्रति जाग्रति,सच्चे ज्ञान ,प्रेम और खुशियाँ बाटने का संकल्प  कर हम साल भर उसपर अमल कर सकते हैं.रात गई, बात गई कहकर एक दिनी हुल्लड़ और अय्याशी से कुछ नहीं होने का.फिर भी टेंशन भरी जिंदगी में हम लोग फुल -टू मनोरंजन का कोई भी मौका नहीं चूकते..चूकना भी नहीं चाहिए.
       बीते बरस की विदाई और नए वर्ष के स्वागत को एक दिनी जश्न मानने वालों के अलावा बच्चे से बूढ़े तक के लिए नए वर्ष का समूचा अजेंडा  गुरुदेव रवीन्द्र नाथ  टेगोर की " गीतांजलि" में इन पंक्तियों से प्रतिध्वनित होता है-
                                जहाँ पर मस्तिष्क हो निर्भय,
                                  और भाल सदा गर्वोन्मत्त
                                  जहां  हो ज्ञान का मुक्त भंडार,
                                 जहाँ न हो विश्व विभाजित
                                  संकीर्ण सरहदी दीवारों से
                                    जहाँ सदा जन्म लें अक्षर
                                  ध्रुव सत्य की कोख से
                                 जहाँ अनथक  परिश्रम आतुर हो
                                  उत्कर्ष का आलिंगन करने
                                    जहाँ निरंतर प्रयोजन के स्रोत
                                   स्वार्थ मरू में न हो गए हो लुप्त
                                     जहाँ मेधा इन सत्य पुष्पों से
                                    सदैव हो परिचालित,विचारवान
                                     मेरे पिता!जागने दो मेरे देश  को!
चलिए छोड़िए.... बीते बरस की विदाई में जुट जाएँ  अपने- अपने तरीके से.कल सुबह कोई मंदिर जाएगा  भगवान से आशीर्वाद लेने ... आराध्य  से नया वर्ष सुखद होने की कामना करेंगे.कोई देर सुबह तक उनींदा सा होगा. आप सभी मेरे अपने है. सो .अपनी प्रिय मित्र संज्ञा टंडन का मेरे मोबाइल पर आया यह सन्देश आपतक पहुंचाकर नया वर्ष खूब प्यार और खुशहाली भरा होने की कामना इन शब्दों में करता हूँ
                             क़ल जब किस्मत बटेगी तब ४ इक्के आप के हाथ लगेंगे ----1111  आगत वर्ष की तारीख़ - 1-1-1-1
                                     खुश रहिए ... खुश रखिए...और अपना ख्याल रखिएगा...
                                                                             किशोर दिवसे
                                                                               मोबाईल -09827471743                              
                                      
                                    

                              
                          

                                                            

रविवार, 19 दिसंबर 2010

दुम मरोड़ने का शुक्रिया

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राहुल भाई ,वर्तनी में भद्दी चूक ब्लॉग के ट्रांसलेटर से  रोमन स्क्रिप्ट के जरिए कम्पोज करते वक्त हड़बड़ी में हो जाती हैं. आइन्दा ख्याल  रखूंगा.  ब्रज किशोर सर जी, आपने ठीक कहा,कुछ जगहों पर कुछ चीजें बची हैं अभी. सवाल यह है कि उन्हें सहेजने पर कब कौन कैसे सोचता है. वैसे सर जी,ऐसी परम्पराओं का आवेग कर्नाटक में ही नहीं दीगर कई राज्यों में भी नजर आ  रहा है. छत्तीसगढ़ में भी व्याप्त कुछ कुप्रथाओ पर प्रिंट मीडिया ने बाखबर करने का काम किया है.चैनल वाले यहाँ अभी कुछ लो प्रोफाइल  पर है.हाँ...कब कौन से टीवी चैनल वाले किस मोमेंट को सनसनी के नाम पर अपना हिडन एजेंडा बना लें क्या भरोसा?

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

उनके नाम पर छी... उनके नाम पर थू.!!!!!!!!!!

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     १३ दिसंबर के हिन्दुस्तान टाइम्स में एक रिपोर्ट पढ़ी थी.शनिवार को कोई चैनल भी इसे जोर-शोर से दिखा रहा था. इस रिपोर्ट के मजमून ने रोंगटे खड़े कर दिए.हालाकी हमारे यहाँ कुछ परम्पराएं अच्छी है पर कुछ इतनी हद दर्जे की वाहियात है की उन्हें समूल ख़त्म करने पर समाज जब सोचने की भी जहमत मोल नहीं लेता तब जबरदस्त कोफ़्त  होती है.
                    दक्षिण कर्णाटक के कुक्के सुब्रमनियम मंदिर का नजारा दिखाया जा रहा था चैनल पर.४०० बरस से यह परंपरा जारी है.केले की पत्तियों पर ब्राह्मणों की जूठन पर दलित समाज के गरीब लोट रहे थे.आम मान्यता यह है कि ऐसा करने से उनके शरीर से चर्म रोग दूर हो जाएँगे..हालाकी कुछ संगठनों ने इसका विरोध किया लेकिन बात नहीं बनी.कहना है क़ि इस कुकर्म में सभी समाज के लोग शामिल होते है.मायावती इस कुप्रथा पर प्रतिबन्ध चाहती है लेकिन मंदिर प्रबंधन का दावा है कि वे दबाव नहीं डाल सकते.यह मंदिर यूं पी सरकार के मुजराई विभाग के अंतर्गत है.विभाग के मंत्री वी एस आचार्य के मुताबिक यह आस्था का मामला है, हम कुछ नहीं कर सकते.सुब्रमनियम मंदिर बंगलूरू से सिर्फ ३० की मी दूर है , जो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हब है.
                       कुपराम्पारा से जुदा एक कथानक- सुब्रमनियम ने सर्प देव वासुकी को शरण दी जो कुक्के की गुफामें गरुड़ के आतंक से बचने जा छिपे थे.रोचक तथ्य यह है की सर्प दोष दूर करने यह पर सर्प संस्कार किया जाता है.अनेक ही प्रोफाइल लोग यह आ हुके है जिनमें अमिताभ बच्चन और शिल्पा शेट्टी भी शामिल हैं.शुक्रवार को जब रस्म अद्द्य्गी हो रही थी तब विरोध के स्वर बुलंद भी हुए थे. अब आस्था को हौवा बनाकर आखिर कब तक यह शर्मनाक तमाशा चलता रहेगा और समाज कब तब इसे बर्दाश्त करेगा - परंपराओ के नाम पर , यह सोचने का दारोमदार भी समाज के धार्मिक मठाधीशों और शिक्षित  युवा फ़ोर्स पर है, ऐसा मुझे लगता है. इस बारे में आप क्या सोचते है, बताइयेगा. आज बस इतना ही.
                                                         अपना ख्याल रखिए...
                                                                                   किशोर दिवसे.

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

मैं नाना बन गया...

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    .मेरे प्यारे दोस्तों ,
काफी वक्त बाद आपसे रू-ब-रू हो रहा हूँ.दरअसल मैं नाना बन गया हूँ.बेटी सपना ने बेटे को जन्म दिया हैपिछ्ली  ३ तारीख़ को. व्यस्त था सो आपसे बात नहीं कर पाया. नन्ही जिंदगी के साथ वक्त बिताना अपने और अपने बच्चे के भी बचपन की तमाम यादों के दरीचे को पलटना सा लगता है. नाना बनने का रोमांच अपने साथ न जाने कितनी जिम्मेदारियों का एहसास करा जाता है. याद आ जाती है अपने नाना -नानी के दौर की बाते जो हमने जी थीं . आज जब खुद नाना बन गया हूँ तब लगता है जिंदगी न जाने कितनी करवटें ले चुकी है. खैर , यह तो नियति है ... जन्म चक्र इसी तरह चला करता है.कुल मिलाकर एक ट्रांस महसूस कर रहा हूँ इन दिनों. फिर भी जल्द ही बातचीत शुरू करूंगा.
                                                                      आपका
                                                                                किशोर दिवसे