शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

ममता का आँचल

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सच्ची पापा ... मैंने आप में देवदूत को देखा था.... ईश्वर का रूप भी आपसे अलग नहीं समझा था मैंने.... फिर   क्यूँ आपने मुझे नहीं बताया के मैं गोद ली हुई बेटी हूँ! क्या आपकी बेटी इतनी कमजोर थी कि वह इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी या आपके ही मन में कहीं यह डर था मुझे खो देने का? पापा... आपने तो मुझे अपने आंसुओं से सींचा है.इतने सालों बाद भी मेरे मन में कभी यह सवाल नहीं उठा क़ि, मेरे असली पापा कौन होंगे... भले ही मुझे मेरी सहेलियों से पता चल चुका था."
                       स्नेह की डायरी के पन्नों पर लिखी इबारत त्रिलोचन बाबू के आंसुओं से धुंधली हो गई.कांपते हांथों से वह डायरी वहीँ पर गिरी जहाँ दुल्हन के सिंगार में बिदा होती स्नेह की आँखों से आंसुओं के फूल जमीन पर गिरे थे.त्रिलोचन ने आंसुओं से भीगी माटी को पोरों से उठाकर उसी डायरी के पन्नो में सहेज लिया.गोद ली बेटी बिदा हो गई ससुराल पर इस सवाल ने त्रिलोचन के मन में हूक उठा दी थी, " मैंने शादी होते तक स्नेह को यह बताया ही नहीं कि वह मेरी गोद ली हुई बेटी है.मेरा फैसला सही था या गलत..... सचमुच अपनी बेटी को मै अगर खो देता तब!अपनी बेटी को मैंने इतना कमजोर क्यों समझा!क्या वह मेरे स्नेह बंधन में छिपे पश्मीने भाव को नहीं समझ पाती?
                       " त्रिलोचन ,तुमने स्नेह को न बताकर ठीक नहीं किया."   "नहीं...नहीं...मैं बिलकुल गलत नहीं हूँ..." मेज पर रखे आईने में त्रिलोचन को अपनी ही दो शक्लें दिखाई दीं.एक दूसरे से जिरह करती हुईं .और उनसे जवाब मांगता वह सवाल विचारों के खंजर लिए हुए लहूलुहान करता ही रहा त्रिलोचन को.
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तीन से सोलह बरस का सफर ... ट्रेन पूरी रफ़्तार से दौड़ रही है अपने  गंतव्य की ओर.फेयरी क़ी जिंदगी किशोर वेय में ही इतनी " अनफेयर " क्यों हो गई थी?गोद लिए होने का मतलब यह तो नहीं क़ी वर्जनाओं के परबत लाद दिए जाएँ!मम्मी... पापा... भैया....सब मिलकर मुझपर कितनी सख्ती बरतते  हैं!मुझे... मेरे मन को भीतर से समझने क़ी कोशिश कोई क्यों नहीं करता? तीन एजर मन कच्चा लोहा होता है.किसी के भी प्यार का चुम्बक उसे आकर्षित कर लेता है ." खुद को न समझे जाने और अति वर्जनाओं से उपजी अपोजिट रिएक्शन ने फेयरी को गलत रास्ते पर डाल दिया.? साईंकियाट्रिस्ट के कहने पर जब गलती का एहसास हुआ काफी देर हो चुकी थी.
                                   अँधेरी सुरंग से दूर करने फेयरी को " बड़े शहर " भेजा जा रहा है .... बहाना पढने का.काश ! मुझे समझने क़ी कोशिश क़ी गई होती.  माँ... माँ ...फेयरी क़ी आँखों से आंसू उसकी नावेल पर गिरे.मेक्सिम गोर्की  के उस उपन्यास का शीर्षक था " मदर ".ट्रेन क़ी रफ़्तार के साथ ही फेयरी कि माँ भी दौड़ रही  थी पूरे आवेग से .... धक् धक् धक् धक् !
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" निपूती बाँझ कहीं क़ी... अब तो अपने बेटे क़ी शादी किसी दूसरी लड़की से कर दूँगी..."इस तरह के कलेजा छलनी कर देने वाले फिकरे बदलते समय और शिक्षा के प्रभाव से शहरों में तो काम पर गाँव में अब भी सुनने को मिल जाते हैं. समय पर बच्चा गोद लिए जाने क़ी आवश्यकता ,लाभ और सहूलियतों क़ी समाज के भीतर गहराई तक समझाइश दिया जाना आज भी जरूरी है.हकीकत यह है क़ी शहर -गाँव दोनों जगह खुली मानसिकता देखने नहीं मिल रही. लिहाजा इस दिशा में जन जिहाद अमल में लाना होगा.भ्रम और अंतर्द्वंद का घटाटोप बच्चा गोद देने वाली संस्थाओं के रहने पर भी छटता  नहीं है.
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अखबार नवीस!कई विदेशी  ,भारत आकर यहाँ के बच्चों को गोद ले रहे हैं,क्या तकदीर है उनकी! दद्दू के इस हैरत भरे सवाल क़ी तृष्णा को मैंने शांत किया ," विदेशी परिवारों में बच्चे काम रहते हैं.अतृप्त मातृत्व क़ी प्यास वे महिलाऐं बच्चे गोद लेकर और कुत्ते पालकर भी पूरी करती   है.अपने देश में साक्षरता के अभाव में एक तो बच्चे पैदा करना ही  कई जगह " मनोरंजन उद्योग समझने की मजबूरी है .दूसरा जिन नेताओं के ही ८-१० बच्चे हों वे क्या खाक शिक्षा देंगे अवाम को?तीसरा इंसानों के बच्चे कुत्तों क़ी तरह लावारिस और बेसहारा घूमते दिख जाते हैं लेकिन इलीट क्लास के लोग उन बच्चों का भविष्य बनाना सोचने के बजाय कुत्तों को राजकुमार क़ी तरह पालते हैं.सबसे बड़ी विडंबना यह है क़ि निःसंतान दंपत्ति मनोवैज्ञानिक रूप से इतने कमजोर हैं क़ि वे ख़ुदकुशी कर लेते है मगर बच्चा गोद नहीं लेते.. क्यों!!!!
                                  दद्दू कुछ विचार मग्न प्रतीत हो रहे थे क़ि मैंने उन्हें याद दिलाया के मिस  यूनिवर्स  सुष्मिता सेन, अंजेलिना जोली और अनेक अभिनेत्रियों ने खुद कुंवारी रहकर भी बच्चे गोद लिए हैं.उनके बदन उघदूपन के आलोचक इस जज्बे की प्रशंसा क्यों नहीं करते? नव धनाढ्य वर्ग इनदिनों जगराता  और बाबावाद के जरिये अध्यात्म क़ि  जीतोड़ मार्केटिंग कर सकता है. धार्मिक कार्यक्रमों से आपत्ति नहीं पर सामाजिक सरोकार के प्रति वे शतुरमुर्ग बनकर  आँखे क्यों मूँद लेते हैं? लायंस , रोटरी तथा जेसीज जैसी संस्थाएं भी लावारिस बच्चों तथा दीगर बच्चों को गोद लेने जनजागरण कर सकती हैं.
                                  मेरे एक पत्रकार मित्र एक परिवार में सिर्फ यह देखने गए थे क़ि गोद ली हुई बच्ची वयस्क होने के बाद परिवार में कितना मानसिक तौर पर एडजस्टमेंट   कर पाती है .वात्सल्य की  पराकाष्ठ  देखिए महिला की  आँखों  से आंसू झरने लगे थे .उसने यह भी कहा " भगवान के लिए....कोई स्टोरी  नहीं देनी है अख़बार में... उसे पता भी नहीं चलना चाहिए क़ि वह गोद ली हुई है.
                              दद्दू बता रहे थे ," अखबार नवीस ! मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो जिसने  बच्चा गोद लिया पर जिम्मेदारी नहीं समझी." मैंने जब बीच में टोका तब उतावले होकर दद्दू बोले,"पूरी बात तो सुनो ,उसने गैर जिम्मेदारी की  हद कर दी.दारू पीना नहीं छोड़ा और असमय ही खर्च हो गया.?
                              गोद ली हुई एक बच्ची माया आज मेडिकल कालिज में पढ़ रही है.सभी के चेहरे पर हर्षातिरेक... पर यह तभी संभव हुआ जब माता-पिता ने पूरी जिम्मेदारी से माया क़ि परवरिश की.डाक्टर पटेल के गोद लिए बच्चे ने जब सान फ्रांसिस्को से अपने बूढ़े माता- पिता को ख़त लिखा और वाहन आने के लिए हवाई टिकट भेजे उनकी आँखे भर आई.मैं उनसे इतना भर कह पाया," यह तो ऋणानुबंध है डाक्टर साहब!क्या फर्क पड़ा अमित गोद लिया बेटा है!आज जब बच्चे अपने बूढ़े माँ बाप को सहारा देने में कतराते हैं तब गोद लिए बच्चे अनमोल वरदान नहीं तो और क्या हैं?
                                  " लेकिन अखबार नवीस!लोग गोद लिए बच्चों की परवरिश के मामले में भी साईंकियाट्रिस्ट से सलाह लेने में झिझकते क्यों हैं?दद्दू के इस सवाल का जवाब आप भी सोचकर दीजिएगा.और हाँ...बेशक लोग भले ही यह मानने लगे हैं कि गोद लेना अच्छी बात है लेकिन सामाजिक संस्थाएं इस महायग्य के प्रति उदासीन क्यों हैं?गोद लिए बच्चों के परिवार हों या समाज इन यक्ष प्रश्नों का जवाब उनके पास भी नहीं क़ि-गोद लिए बच्चों को क्या बताया जाए क़ि वे "अडाप्ट" किए हुए हैं!बताया जाए तो कब?नहीं बताया जाए तो क्यों नहीं?                        सोचिए  और बताइए...                             
                                                                        किशोर दिवसे 
                                             e-mail             kishore_diwase@yahoo.com

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

दीपाक्षर -3

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किसी के घर में अँधेरा न हो ख्याल रहे... !

धन लक्ष्मी का वाहन तैयार है सुसज्जित होकर वैभव की देवी को हम सबके घर लाने के लिए.   .बिजली के बल्बों की झालरें कुछ घरों में सेहरा बनकर  जगमगाने लगी हैं तो कई जगह अब-तब में लग जाएँगी.मिटटी के दीये अपने गोद में तेल का तालाब बनाकर अग्निशिखा से रौशनी बिखेरने कसमसा रहे हैं.करेंसी के रिंग मास्टर बाज़ार के हाथों में किसम -किसम के चाबुक हैं.इसके मायावी सम्मोहन जाल के सामने सारे तर्क और दलीलें फेल! वाह रे बाजार... तेरा जादू चल गया ....और एक बार फिर आप और हम सब अपने दिल-दिमाग को परम्पराओं के वशीकरण में बांधे दीये लेकर स्वागत के लिए तैयार हो रहे हैं कि  कब आएगी -धन लक्ष्मी!
                 कभी फानून में जलता हुआ चिराग हूँ मैं
                 कभी दीया हूँ जो कुटियों में टिमटिमाता हूँ.
फानूस में जलते चिराग या कुटियों में टिमटिमाते दीये यानी अमीर या गरीब में  फर्क नहीं करती  धनलक्ष्मी .हर किसी की देहरी प् भीतर की ओर आते पदचिन्ह बनेंगे लक्ष्मी पूजा के रोज .इन पदान्कनों में छिपी अदृश्य इबारत को हम समझना नहीं चाहते जो यही कहती है " यूँ ही अमीर नहीं बना जाता..कड़ी मेहनत कर आहिस्ता-आहिस्ता बनो अमीर;उनसे सौतिया डाह क्यों करते हो?" ग़रीबों के लिए भी ये पद चिन्ह समझाइश देते हैं ,"तकदीर को कोसने से कुछ नहीं होता.भाग्यलक्ष्मी को भी प्रसन्न करने का ब्रह्मास्त्र श्रम ही है."
                           " अरे! यह क्या... मेरा वाहन कहीं दिखाई नहीं दे रहा...धरती लोंक पर जाने का समय आ गया है ,मैं जाऊं तो कैसे?" महालक्ष्मी ने चौंककर इधर-उधर देखा और कुछ चिंतित हो गईं .इतने में ही वीणा की झंकार के साथ देवर्षि  नारद प्रकट हुए-            नारायण...नारायण... नारायण...नारायण...
"देवर्षि ! इस समय आप यहाँ? आपने मेरा वहां को कहीं देखा है?" महालक्ष्मी का प्रश्न था.किंचित अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ देवर्षि  ने जवाब दिया-" लगता है देवी, बाज़ार युग की चकाचौंध से सम्मोहित आपका वहां उलूक राज भी सपरिवार आपसे पहले धरती पर ही उन्मुक्त विचरण कर रहा है.देवी... एक बात तो मैंने भी महसूस की वो यह की बाजार की ताकत के इशारे पर दुनिया और समाज तो क्या अध्यात्म और तीज-त्यौहार भी चलने लगे हैं." नकेल बाजार के हाथ और धार्मिकता हाशिए तक सीमित .
                               देवी-नारद संवाद के चलते दूर से गूंजती उलूक ध्वनि से देवी समझ गई की उनके वहानोब का काफिला पहुँच रहा है.आते ही उलूक राज ने शिकायत की ," देवी मुझे आपति है ,एक तो इंसान एक-दूसरे को बेवकूफ बनाकर उस पर मेरा ब्रांड-नेम चिपका देता है .दूसरा ,लोग यह क्यूँ कहते हैं के लक्ष्मी की साधना सही तरीके से नहीं करने पर व्यक्ति उसका वाहन बन जाता है ?
                           " आखिर रह गए ना उल्लू के उल्लू !"-देवी ने मन ही मन सोचकर कहा," उलूकराज ,तुम्हारे इन प्रश्नों का उत्तर देवर्षि देंगे.अभी तो चलो,धरती लोंक पर  ,दीप पर्व की तैयारियां देखने का मन कर रहा है ."
देवी और देवर्षि ,उलूकराज के साथ धरती की चकाचौंध देखने कूच कर जाते हैं पर धरती पर उतरने की शुरुआत में पड़ती है एक बस्ती .दीये की लौ को टकटकी लगाकर देख रहे हैं लोग .एक ओर उजियारा है ... जगमग और चकाचौंध- स्टेटस वाले और स्टेटस दिखाने की अंधी दौड़ में शामिल लोग.दीया तले अँधेरे में उलूक राज  को दिखाई दे रहे हैं समाज के सड़े-गले सिस्टम , बैड-गवर्नेंस ,अध्यात्म में छिपी पाखंड की अफीम और लिजलिजे नैतिक मूल्य.!
                            " वत्स ! छोडो भी... यह चिंतन की बेला नहीं.दीपावली आ गई.तेते पांव पसारिए जेती चादर होए .अभी खुशियाँ मनाओ.यह लो अपने मन का दीया,उडेलो संकल्प का तेल और प्रज्ज्वलित करो लक्ष्य  की बाती .समाज के अंधियारे को चीरने उजियारी राह आपकी  प्रतीक्षा कर रही है." देवी ने समझाइश दी.
                                  हर एक घर के भीतर बने पद चिन्हों से देवी ,उनका वाहन और देवर्षि आयेंगे.वे तो शहर के बाजारों में बाद में घूमेंगे पर तब तक आप और हम सब अपनी फूली हुई जेबों के भीतर का माल " खरीदी -यग्य " के चलते बाजारी  स्वाहा कर चुके होंगे .हम सब सुखों के चंद कतरे महसूस करेंगे और लक्ष्मी वहीँ पहुंचेगी जहाँ उसे होना चाहिए.वैसे देखा जाए तो बाजार  की वजह से "फ्लो ऑफ़ मनी" और रोजगार  भी है  जो समाज के लिए बेहद जरूरी है.इस दीपावली की याद के बतौर हर घर में होंगे कुछ नए सामान और खुशियों भरी यादें .वैसे भी महंगाई की लगातार रुलाई के बीच हमें खुशियाँ मनाते रहने की आदत सी पड़ चुकी है.इसीलिए चलिए दीप पर्व पर धनलक्ष्मी के स्वागत में जुट जाएँ. बाज़ार और खरीददारों को शुभकामना देने का वक्त अभी आने को है . फिलहाल एक गुल दस्ता  आपके नाम इस कामना के साथ -
                                      चिराग ऐसा जलाओ कि बेमिसाल रहे
                                      किसी के घरमें अँधेरा न हो ख्याल रहे
                        अपना ख्याल रखिए ... शुभ रात्रि .. शब्बा खैर...
                                                                  किशोर दिवसे
                                                                  मोबाईल;9827471743
                                  

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

दृष्टि दिवस पर विशेष ....

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तुमने देखा एक नजर और दिल तुम्हारा हो गया....

" बुरी नजर वाले तेरा मुहं काला" - किसी ट्रक के पिछवाड़े में लिखी यह इबारत क्या पढ़ी की अपने दद्दू शुरू हो गए .वैसे भी अपने दद्दू की खोपडिया में फिट राडार कब किस बात पर सिग्नल  देना शुरू कर दे भगवान मालिक है.क्या यह जरूरी है कि बुरी नजर वाले का मुहं काला ही हो, गोरा भी हो सकता है क्योंकि हमारे फ़िल्मी गाने तो यही कहते हैं, " गोरों की ना कालों की, ये दुनिया है दिलवालों की ". खैर ...दद्दू के लिए मुद्दा था नजर यानी  निगाह का और बहस के कई दौर में वे बचपन से बुढ़ापे तक की हर नजर का पोस्ट मार्टम  करने लगते है.
                                         रह गए लाखों कलेजा थामकर
                                        आँख जिस जानिब तुम्हारी उठ गई
मस्का लगाने जब अपने दद्दू यह शेर ढीलते हैं तब मयारू भौजी समझ जाती है के अंटी ढीली करना है .... हरा नोट हाथ में आया नहीं कि दद्दू हो जाते हैं  फुर्र अपने दोस्तों के साथ. पर इससे पहले ही  भौजी ,दद्दू के हाथ में सब्जी के लिए झोला पकडाती है और दद्दू अपने  चेहरे की खिसियाहट छिपाकर गप्पिस्तान की ओर कूच करने से पहले एक और शेर पेल देते हैं-
                                           दुनिया में वो काम के काबिल नहीं रहा
                                          जिस दिल को तुमने देख लिया ,दिल नहीं रहा
बात देखने की ही तो है.हम मुद्दतों से पालते हैं जिस दिल को अपने पहलू में , हम कुछ भी नहीं? तुम्हारी एक मस्त निगाह क्या पड़ी कि दिल तुम्हारा हो गया! क्या नौजवान, क्या उम्रदराज बात तो सच है लेकिन पड़ोस की चिकनी चाची जब" बुरी नजर "
लगी है कहकर नन्हे मासूम की किसम-किसम से नजर उतारती है .... काला  टीका लगाती है तब दद्दू सर के बचे खुचे बाल नोंचने का असफल प्रयास करने लगते है.डाक्टर के पास ले जाना छोड़कर नजरें   उतारने की कवायद उन्हें बकवास लगती है और रही चिकनी चाची की बात , महरी , बेऔलाद विधवा और सड़क बुहारती जमादारन को चिकनी चाची की खूंख्वार निगाहों की लेजर बीम से गुजरना पड़ता है सो अलग!
                                          हर किसी को एक नजर से देखो  अक्सर यही कहा जाता है.पर " कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना"रखने वालों की बात ही निराली है .मेडिकल  साइंस में इसका तो इलाज है वह एक नजर से देख लेगा .लेकिन रूढ़ियों को महिमामंडित करने वाले झंडा बरदारों का क्या जो निहित स्वार्थों के तईं अगड़ा  -पिछड़ा की सियासत करने बुरी निगाह वाले बन जाते हैं .यही वजह है की नेताओं की नजर कुर्सी से नहीं हटती और चाटुकारों की निगाहें किसी के रहम -ओ - करम से!
                                    लेकिन तल्खियों की कडवी कुनैन से दूर मीठी मुहब्बत में डूबी ... दो जोड़ी निगाहें, कनखियों की मस्ती के बाद जब मिलती हैं... तब झुकी हुई पलकें हौले से कह देती हैं कि दीवार से कुनकुनी धूप नीचे उतर रही है.और नीची निगाहें बयां करने लगती हैं कि सब कुछ है और कुछ भी नहीं ... नीची निगाह में.कभी-कभी नजरें उम्मीदों को बांध लेती हैं और उम्मीद भरे  दिल आपस में गुदगुदाकर गुनगुनाने लगते हैं -
                                            सौ-सौ उम्मीदें बंधती हैं एक-एक निगाह पर
                                            मुझको न ऐसे प्यार से देखा करे कोई
"निगाहें मिलाने को जी चाहता है" अचानक हरफनमौला अंदाज में प्रोफ़ेसर प्यारेलाल ने निगाहें मिलाने  की  बात की और अपनी  यादों को ताज़ा करते हुए कहा कि कई बार नजरें भटकने लगती हैं महज इसलिए कि क्या पता  किस भेस में तू मिल जाए!यह तो हुई प्रोफ़ेसर प्यारेलाल की  बात लेकिन बनती और बबली क़ी उम्र के नौजवान ( अब उम्र का बंधन नहीं रहा) नजरों के इन्तेजार में उनकी नजरें ही कहने लगती हैं-
                                                     कभी तो हमसे मिलाओगे  प्यार से नजरें
                                                    इस उम्मीद पे हम जख्म खाए जाते हैं
जख्म खाकर नजरें चुराने का एक सबब यह भी बयां करता है कोई टूटा हुआ दिल के " तू तो मेरे काबिल है लेकिन मैं तेरे काबिल नहीं."लेकिन सच यही है कि काबिल बनाना है  अगर अपने बच्चों को तो उनपर सतर्क निगाहें रखनी होंगी.इंसान क़ी नजरें जितनी तेज होंगी उसके फैसले उतने ही मजबूत होंगे और काम होगी हादसों क़ी गुंजाईश .अपनी इसी पैनी नजर क़ी वजह से धनुर्धारी अर्जुन को उस वृक्ष क़ी टहनियां नहीं  बल्कि उस पर बैठी चिड़िया क़ी आँख ही नजर आ रही थी.
                                          प्रोफ़ेसर !कहाँ पौराणिक युग में घसीट रहे हो,आज क़ी बात करो .आज हर जगह ,घर-घर हर कोई ब्राड विजन और दूर दृष्टि क़ी बात करता है." दद्दू ने अपना दखल देते हुए कहा ," प्रोफ़ेसर और अख़बार नवीस ! बात जब नजरों क़ी हो रही है तब बार-बार आइना देखने वालों को यह जरूर कह देना-
                                    आपको मैंने निगाहों में बसा रक्खा है
                                     आइना छोडी, आईने में क्या रक्खा है
आईने में ही सब कुछ है ... उस वक्त जब निगाहें आँखों को आइना बना देती हैं.जरा गहराई से झांकिए उन आँखों में -सब कुछ तो है ना उनमें.....मुहब्बत...वफ़ा... जफा...गुस्सा ...शर्म -ओ-हया ...वो नशे का सुरूर .... तबस्सुम...दर्द का रिश्ता....मायूसी...मासूमियत...और खून के डोरों के साथ निगाहें बयां करती हैं आत्मविश्वास क़ी बुलंदी .लेकिन आज भी जब निगाहों या नजरों के बीयाबान में पल भर के लिए ही सही भटक जाते हैं तब हर किसी के दिल का दुष्यंत प्यार  से कहता है -
                               एक जंगल है तेरी आँखों में
                                मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ...
                                      
                                                    अपना  ख्याल रखिए......                                                  
                                                                                             किशोर दिवसे
                                                                    मोबाईल ;९८२७४७१७४३
                                                                     email    kishore_diwase@yahoo.com
                                      

                         

    

दीपाक्षर -2

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....और मैं ही बन गया दीप पर्व का दीप 
  




नारायण... नारायण...
नारायण.... नारायण....
चौंककर नारद जी ने देखा और उनसे रहा न गया.उनहोंने पल भर काबू रहने के बाद पूछ ही लिया " यह क्या त्राटक सीख रहे हो जो जलते दीये कि लौ को एकाग्र होकर घूरे जा रहे हो!किसी के आने का आभास भी नहीं?"
"नहीं देवर्षि ....दीये को जलता हुआ देखकर यों ही मन में विचार आया कि क्या हम भी इस दीये कि तरह नहीं हैं!ऊपर चुंधियाती रौशनी से जगमगाता और तले घुप्प अँधेरा.कथनी और करनी में कितना फर्क हो गया है आज -मन का कल्मष धूर्तता कि चाशनी में लिपटा  मायाजाल बुनने में कितना सक्षम है!महानगर की अट्टालिकाओं के नीचे झुग्गियों का अभिशप्त जीवन ,अमीरी के विष दंतों में पिसते गरीब,बाजारवाद की सूली पर लटकते नैतिक मूल्यों के परखच्चे ," वर्तमान "के चरम भौतिकतावादी दर्शन पर क्रूरतम घात - प्रतिघात करती अतीत और मध्ययुग की सड़ी - गली व्यवस्था .... दीये कि रोशनी को देखकर में फिर सोचने लगता हूँ- उजाले के अट्टहास और अँधेरे के अवसाद के बीच की खाई कभी पटेगी या नहीं?
                               आइये मन में दीप जलाएं ,कर्तृत्व के प्रति आस्था का
रौशनी भी है, अँधेरा भी... सवाल है कि आप किसे देख रहे हैं? जगमगाहट या स्याह! अमीरी-गरीबी ,वर्ण व्यवस्था के उबाऊ मकडजाल पर जबरिया पन्ने रंगना मूर्खता है.कर्तृत्व ही प्रथम व् अंतिम सत्य है.- लाओ अपने मन का दीया,उडेलो  संकल्प का तेल और प्रज्ज्वलित करो लक्ष्य की बाती - उजियारी राह आपकी प्रतीक्षा कर रही है.पर जरा ठहरो -
                                    दर से निकले तो हो,सोचा भी किधर जाओगे?
                                      हर तरफ तेज हवाएं हैं बिखर जाओगे
मगर  घबराइए शायर निदा फाजली की इस धमकी से! उनहोंने ताकीद की है राह पर निकलने से पहले सोचने की.लक्ष्य का दीया अंतस में जलता रहेगा तब आपके साथ होगा स्वविवेक और स्व कर्तृत्व ; पाखंड वाद  तथा अतिवादिता की पिशाच्लीला से आप अछूते ही रहेंगे.
                                      नारायण... नारायण... नारायण... नारायण...
वीना की झंकार से विचार प्रवाह खंडित हुआ." देखो  देखो... शेर और बकरी- देवर्षी ने मुझे टोका. दीये के अंजोर में एक दृश्य स्फटिक की मानिंद उभरता हेई ,सिर्फ मेरे ही नहीं अमूमन हर किसी के सामने- " शेर झपट्टा मरकर बकरी को उदरस्थ कर गया .यह शेर पर निर्भर करता है वह किस तरह अपना पेट भरे.जीने का हक़ बकरी को भी है, उसे इतनी चालाकी बरतनी होगी की शेर के आक्रमण से बच सके.
जंगल का कानून,मेंडेल का नियम -"स्ट्रगल फार एग्जिस्टेंस ,सर्वाइवल आफ डी फिटेस्ट " और अमीबा से लेकर होमो सेपियंस तक सारा विकासवाद विज्ञानं की पुस्तकों के जरिये पल भर में हमारे मस्तिष्क में तरंगित होता है.अचानक दीये की लौ कांपकर फिर स्थिर हो जाती है-इस बार दृश्य बदलता है.आलोक में इस बार मै खुद को पता हूँ.-मेरे दोनों हाथों में मुखोटा है, एक हाथ में शेर का और दूसरे हाथ में बकरी का.जैसे-जैसे घडी कि सूइयां आगे बढती हैं कभी शेर तो कभी बकरी का मुखोटा मेरे चेहरे पर चिपकने लगता है.जरा देखिये... आपका चेहरा पहचानकर भी झूठ मत बोलना!
मैं  खुद दिया बन गया हूँ.माथे पर उभरे स्वेद बिन्दुओं की क़तर देखकर नारद जी मुस्कुराने लग जाते हैं-" वह देखो ल कलमकार!... दीये के आलोक पटल पर सिर्फ तुम ही नहीं सारा समाज ही एक मिनिएचर के रूप में दिखाई दे रहा है." चारों ओर मुखौटों क़ी दुकानों में चल रही छीना-झपटी से कोहराम मचा हुआ है.
        नारायण... नारायण... नारायण... नारायण...
वीना के तंतुओं के झंकृत होते ही देवर्षि अचानक अंतर्धान हो जाते हैं.चौंकता हूँ मैं फिर कुछ सोचकर उस दीये क़ी अग्निशिखा पर केन्द्रित हो जाता हूँ- मोतीचूर का लड्डू है यह समाज ... एक एक दाना यानि " व्यक्ति " हुआ समाज का घटक .मानवता के वैश्विक द्रिस्तिकों पर सोचना ही चाहिए .फ़िलहाल अगर भारत के सन्दर्भ में ही सोचें जातीय ही नहीं भारत में बसा मानव समाज इस दीये क़ी लौ में झांककर देखें क्या ऐसे मूल्यों व् राष्ट्रिय चरित्र का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है ?काश इस दीये क़ी लौ हमारे ठन्डे खून में उबल लाये और जगती आँखों से भी भारत का हर बन्दा पूरी शिद्दत के साथ दिवा स्वप्न साकार करने क़ी दिशा में कुछ इस तरह से सिंह गर्जना कर
सके-         देखा है मैंने जागती आँखों से एक ख्वाब ,वतन हो अपना सारे जहाँ का आफ़ताब
दीये क़ी रौशनी में भारत को विश्व का आफ़ताब क़ी मानिंद देखने के मेरे "विचार-त्राटक "पर अचानक जोरों का ब्रेक लग गया जब देवर्षि बदहवासी क़ी हालत में मेरे समक्ष प्रकट हू
         नारायण... नारायण... नारायण... नारायण...
" मैं जान गया हूँ ... धरती का मानव समुदाय इतना जटिल और खुदगर्ज क्यों हो गया है... सब कुछ इन सियासत बाजों क़ी मक्कारी है जो अवाम का आत्म सम्मान जागने ही नहीं देती.इस दलदल में भी कुछ चेहरे बेहतर सोच क़ी शक्ल वाले " अच्छे चने"हैं लेकिन वे गंदगी से लथपथ सियासी भाड़ को फोड़ने में सक्षम नहीं.सारे सिस्टम ही इतने सड गए है कि आम आदमी के मन में राष्ट्रिय चरित्र का उजियारा क्या खाक लायेंगे जो बालूई बुनियाद कि वजह से खंड-खंड खंडित हो चुके हैं."अवाम को वे बिना रीढ़ का लिजलिजा मांसपिंड बनाये रखना चाहते हैं.
                      अचंभित मैं,देवर्षि के चेहरे में आर्क मिदीज के उन हाव-भाव को पढ़ रहा था जो सापेक्षता के सिद्धांत कि तह तक पहुंचकर दिखाई दिए थे. यूरेका... यूरेका... ... नहीं मै अपने आप में लौटा.... मुनि श्रेष्ठ कह रहे थे -"समाज कि अधोगति का एकमात्र हल सामाजिक चेतना ही है" यह अधोगति मुझसे देखी नहीं जाती.... कहकर देवर्षि अंतर्धान हो गए.
                            पर मुझे अच्छी तरह  ध्यान है अपने अंतस में प्रज्ज्वलित होते दीये का. आइये... दीप पर्व कि इस बेला में मेरे हाथों में रखे इस दीये को आप भी स्पर्श करें ताकि आपके अंतस का दीया भी दीप-दीप मिलकर दीप मलिका बन जाए और सार्थक कर दे यह दीप पर्व....
             अपना ख्याल रखिये    
                                                           किशोर दिवसे 
                                                                            मोबाईल 9827471743
                                           

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

आईला .....! हॉट सीट पर गणपति बाप्पा ....!

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आईला .....! हॉट सीट पर गणपति बाप्पा ....!
चकाचौंध  भरे  “ कौन  बनेगा  करोडपति  के  फ्लोर  पर  एकबारगी  सुखकर्ता  – दुःख हरता   भगवन  श्रीगणेश  को  देखकर  कार्यक्रम  के  प्रस्तुतकर्ता  महानायक  अमिताभ  बच्चन  खुद  भौचक  थे .बुद्धि    के देवता  को  अपने  आगे  पाकर  उन्हें  अंतर्मन   से  प्रणाम  किया  और  पल  भर  में  फैसला  लेकर  दर्शको  की  ओर  मुखातिब  हो  गए .आम  तौर  पर  स्पर्धा  में  शामिल  लोगो  को  पसीना  छूटता  था  पर  इस  बार  बात  कुछ  अलग  थी .
“ आइये  आप  और  हम  मिलकर  खेलते  है  कौन  बनेगा  करोडपति  …..” रौबदार  खनकती  आवाज़  गूंजी  बिग  बी   की  और  हॉट  सीट  पर  विराजमान  हो  गए  भगवान .महानायक  से  जब  रहा  ना  गया  तब  अपनी  चुम्बकीय   आँखों  की  गहराई   से  झांककर  पूछ  ही  लिया  “ सिद्धि  विनायक ! आप  तो  माया  मोह  से  परे  है , इस  धन  राशि  का  क्या  करेंगे ?” लम्बोदर  बोले ,”मुझे  आवश्यकता  पैसो  की  सारे दुखी   जनों  की  चैरिटी  के  लिए  होगी .”
“तो  भगवन  … बीस  हज़ार  की  राशि  के  लिए  पहला  सवाल  ये  रहा  आपके  सामने … और  शुरू  हो  गया  सवालो  का  सिलसिला .आखिर  हॉट  सीट  पर  भगवन  थे  .. यानी  वी  आई  पी  उम्मीदवार , सो  सवालो  की  शुरुआत  बीस  हज़ार  के  पहले  प्रश्न  से  होनी  तय  थी आडियेंस     की  तालिया  … भाव  विभोर  दर्शको  के  उतावलेपन  के  बीच  ही  बिग  बी  बताते  रहे  की  “ कुली   “ की  शूटिंग  के  दौरान  जब  वे  ज़िन्दगी  और   मौत  से जूझ   रहे  थे  तब  उन्होंने  कितना  याद  किया  था  भगवन  को ! खैर … सवाल  होते  रहे - बेरोजगारी , नैतिक  मूल्यों  के  पतन  , आबादी  विस्फोट  ,इंसानी  दुनिया  के  दुखो  का  हल , आस्तिक - नास्तिक , पाखंड  और  बाबावाद  , छद्म धर्म -  निरपेक्षता  , और  भी  कई  सवाल . बुद्धि  के  देवता  ने  सारे  सवालो  के  जवाब  तपाक - तपाक  से  दिए.
( अन्तर्यामी  जो  ठहरे )!
चेक  जमा  होते  गए  और  फिर  गूंजी  बिग  बी  की सम्मोहक  आवाज़ ” आखिरी  सवाल … भगवन , जो  आपको  दिलाएगा  एक  करोड़  की  राशि … हम  चाहते  है . यह  राशि  पीड़ित  मानवता  की  सेवा  में  काम  आए .दर्शक  हर्षातिरेक  से  गदगद  होकर  श्री  गणेशाय  नमः  और  कुछ  तो  आरती  करने  के  मूड  में  आ  गए  थे .एक  नौजवान  जोरो  से  जयघोष  कर  उठा ,” गणपति  बाप्पा   मोरया !”
कंप्यूटर   स्क्रीन  पर  भगवन  ! सवाल  ये  रहा  आपके  सामने   - “ दुखी  इंसानों  का  उद्धार  करने  सबसे सही रास्ता इन चारो  में से कौन                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          सा  है - ए  .नेताओ  को  ईमानदार  बनाए       बी . स्वर्ग  से  देवताओ  को  बुलाया  जाए  सी . इंसानों  के  लिए  मोरल  सैंस  का  कम्पलसरी   कोर्स  और  डी. पार्लियामेंट  के  जरिये  मानव  समुदाय  को  सबक  सिखाये .आपका  समय   शुरू  होता  है  अब ….!
घडी  की  सुइयों  की  टिक  टिक  के                                                                                                                             साथ  ही  बिग  बी  सोच  रहे  थे  “ सुनामी ,कटरीना  ,भूकंप , बाढ़  ज्वालामुखी   … ये  सब  क्या  मिनी  प्रलय  नहीं  है ?! और  भी  प्रलय  की  जरूरत  है  क्या ?भगवान्  गणेश  को  सूंड  खुजाते  विचारमग्न  देखकर  बिग  बी  में  छिपा  एंकर  शातिराना  अंदाज़  में  बोल  उठा  ,”आप  चाहे  तो  लाइफ  लाइन  इस्तेमाल  कर  सकते  है … फिफ्टी  फिफ्टी , आडियेंस   पोल . फ्लिप  ऑर  फोन  ए  फ्रेंड .
“अमिताभ  मै  सृष्टिकर्ता  ब्रह्मा  से  बात  करना  चाहूँगा ”भगवान्  श्रीगणेश  ने  फोन  इ  फ्रेंड  का  आप्शन  इस्तेमाल  करना  चाहा .” ब्रह्मा  जी ,कौन  बनेगा  करोडपति  प्रोग्राम  से  मै  अमिताभ  बच्चन  बोल  रहा  हू .ब्रह्मा  जी   ने  तत्काल  आशीर्वाद  दिया  “ आयुष्यमान  भव”” सृष्टिकर्ता  !आज  हॉट  सीट  पर  स्वयं  मंगलमूर्ति  विराजमान  है .वे  एक  सवाल  का  जवाब  जानना  चाहते  है  आपसे .आपका  सही  जवाब  उन्हें  दिलाएगा  दो  करोड़  रुपये  जो  दुखी  जनों  का  उद्धार  करने  वे  चैरिटी  में  प्रदान  करेंगे .जवाब  के  लिए   आपको  मिलेंगे  सिर्फ  तीस  सेकण्ड .अगली  आवाज  होगी  भगवन  श्री  गणेश  की  और  आपका  समय  शुरू  होता  है  अब …
भगवन  से  पूरा सवाल  सुनकर  ब्रह्मा  जी  ने  दूरभाष   पर  ही  विघ्नहर्ता  के  कान  फूके  “पार्वती  सुत  ! आप  भी  कहा  फस  गए  इन  इंसानो  के  मायाजाल  में  ? अच्छे  बहले  भगवन  के  ग्रेड  में  हो  ,सुहाता  नहीं  क्या  ? भूल   गए … देवताओ  को  जब  श्राप  दिया    जाता  है  तब  उन्हें  मानव  योनी  में  रहने  का  दंड  पृथ्वी  लोक  पर  भुगतना  पड़ता  है ?तत्काल  ही  बुद्धिदाता  का  माथा  ठनका ,” बाप  रे  !!!! घोर  कलियुग   में  इंसान  की  जिंदगी  जीने  का  प्रारब्ध !  देखते  नहीं मनोकामनाओ  की  तेज  आंच  से  देवता  भी  कैसे  भागे  भागे  फिर  रहे  है ? लोगो  ने  यही  समझ   रखा  है  कि  पाप  करो , फिर  दान  पुण्य  के  बहाने  चढ़ावा  डालकर  धर्मात्मा  होने  का  सर्टिफिकेट  ले  लो .
अमिताभ  की  कंप्यूटर   स्क्रीन  पर  भगवन  श्री  गणेश  का  जवाब  उभर  चुका   था  जिसे  देखकर  वे  दो  करोड़  का  चेक  साइन   करने  लगे  थे. .ब्रह्मा  जी  का  गुरुमंत्र  पाते  ही  एकाएक  भगवन  श्रीगणेश  अंतर्धान   हो  गए .सर  उठाकर  बिग  बी  ने  जब  देखा  हॉट  सीट  खाली  थी .इसी  बीच  फास्टेस्ट  फिंगर   फर्स्ट  स्पर्धा  के  प्रतिभागियों  का  फैसला  भी  हो  चुका   था .सवाल  का  जवाब  सबसे  पहले  बजर  बजाकर  देने  वाला  जब  उठकर  आया  तब  बिग  बी  ने  देखा  वीणा     की  झंकार     के  साथ  ही  आवाज  गूंजने  लगती  है .. नारायण … नारायण …!.इससे  पहले कि दो लाख का ईनाम जीतने वाले हॉट सीट के अगले प्रतिस्पर्धी का परिचय वे कराते बजर बज गया  यानिशो का समय समाप्त.और नारायण... नारायण कि आवाज वाले प्रतिभागी दो लाख कि राशि लेकर अनजान गंतव्य   की  ओर  कूच    कर  गए .
आडियेंस   में  बैठे  बैठे  अखबारनवीस  ने  साफ़  महसूस  किया  मुंबई  की  बाढ़  से  महँगी  मूर्तिया  देखकर  भगवन  श्रीगणेश  का  मुख  कमल  आम   आदमी  की  तरह  मुरझा  गया  है .यहाँ  तक  कि  उनका  वाहन  मूषक  राज  भी  बेशर्मी  से  ड़ोंनेशन   कि  मांग  करते  फलते  फूलते  कोचिंग  संतरे  और  विद्यार्थियों  पर  चूहे  की तरह  प्रयोग  किये  जाने  से  दुखी  था .बिग  बी  केबीसी  के  एपिसोड  की  अंतिम  औपचारिकताये  पूरी  कर  रहे  थे  और  अखबारनवीस  सोच  रहा  था   “ अगर  बुध्हिदाता  से  कहा  जाता  की  सारी  दुनिया  का  चक्कर  लगा  आओ  जैसी   की  पुराण  कथाओ  में  हम  सबने  पढ़ा  है   , क्या  भगवन  श्रीगणेश  कम्पूटर  का  गोल  चक्कर  नहीं  लगा  लेते ?
खैर …दो  करोड़  का  चेक  बिग  बी  ने  कंपनी   वालो  से  बात  कर  मंदिर  ट्रस्ट  को  सौप  दिया . दो  दिन  बाद  ही  सुर्खिया  अखबारों  में  बनी  की  मंदिर  के   एक  तरसती  ने  ले  लिया  दो  करोड़  के  चेक  का  फर्जी  भुगतान .दरअसल   उस  मंदिर  में  कुछ  बरस  पहले  आभूषणों    की  भी  चोरी  हो  गयी  थी  और  चोरो  का  पता भी  आखिर  तक  नहीं  लग  पाया  था .फर्जी   भुगतान  लेकर  उस  ट्रस्टी  ने  कुछ  लोगो  के  साथ  मिलकर  आभूषणों   का  गुप्तदान  मंदिर  में  कर  दिया  था .
और  हाँ … भगवन  श्रीगणेश  जी  ने  जो  दो  करोड़  की  राशी  के  लिए  पूछे  गए  बिग  बी  के  सवाल  का  जो  जवाब  दिया  वह  एंकर  के  कम्पूटर  में  इस  तरह  लाक   हो  गया  की  स्क्रीन  पर  लाना  मुश्किल  है .इसी  स्तिथि  में  अगर  जवाब  आपके  दिमाग   की  कम्पूटर  स्क्रीन  पर  कभी  उभरे  तो  बताइयेगा  जरूर  …
draft
  1:15:

खौफ जदा रहा जब तक जिंदगी से मुहब्बत ना हुई ....

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किसी भी इंसान का मन सागर की तरह होता है .कभी शांत -अबूझ तो कभी भावनाओं का ज्वार - भाटा  उद्दाम लहरों के रूप में जिंदगी की चुनौतियाँ बनकर जूझने पर मजबूर कर देता है.चक्रवात, तूफ़ान,बवंडर .भूडोल और भावनाओं के अनगिनत सुनामी और कटरीना के साथ ही खुशियों की ता- ता-  थैया के अवसर हम सबका मानसिक धरातल सुनिश्चित करते हैं.यही होता है हमारा मेंटल मेक- अप जिसके किसी कोने में छिपे रहते हैं अपने -अपने डर .उहापोह से उपजी झिझक डर बनकर हमारी सोच पर अक्सर हावी होती है.परिवर्तन की चुनौतियों से डरकर खुद को यथा स्थिति में बनाए रखना ही दद्दू और उनके मित्र बुद्धिजीवी के बीच हुई बातचीत का सार है.प्रस्तुत है रिकार्ड की गई उनकी बातों का सारांश .-
 दद्दू:                हर समय भीड़ के बावजूद मेरे मन में अकेलेपन का डर तब तक बना रहा जब तक मैंने स्वयं को पहचानना  
                        नहीं सीख लिया .
बुद्धिजीवी:          मुझे भी हमेशा किसी काम में असफल होने का डर रहता था.लेकिन यह डर उस समय दूर हो गया जब यह एहसास हुआ की मै विफल तभी होता हूँ जब सही कोशिश नहीं करता.
दद्दू:                  लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे इस बात का डर मेरे मान में बना रहता था .यह सोच उस वक्त समाप्त हो गई जब मैंने स्वयं तय किया कि लोग तो अपना-अपना नजरिया रखेंगे ही ,मुझे भी तो आगे बढ़ना ही है.फिर क्या था, लोगों के सोचने का डर ख़त्म!
बुद्धिजीवी:            पहले मुझे इस बात का डर था कि कहीं मैं ठुकरा न दिया जून.जब मेरे मान में आत्मविश्वास बाधा अपने " रिजेक्शन  का डर काफूर हो गया.
ददू:                   कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है.इस लोकोक्ति पर मुझे तब भरोसा हो गया जब मैंने सबसे पहले अपने आप पर ही भरोसा करना  सीखा .आत्मविश्वास से उपजा डर तब मिट गया जब यह सोच बनी " विकास करने के लिए किसी न किसी स्तर पर दर्द या तकलीफें बर्दाश्त करनी पड़ती हैं.
बुद्धिजीवी:              आज के ज़माने कि अनेक सच्चाइयों से मैं पहले तो डरता रहा झूठ के मुखौटे  के भीतर छिपी  बदसूरती का जब अनुभव हुआ मेरे मन में दो-टूक सच कहने का डर जाता रहा.
दद्दू:                       जानते हो बुद्धिजीवी!जिंदगी के रंग अनगिनत हैं.कभी समाप्त नहीं होंगे.चुनौतियों से डरकर में जिंदगी से ही घबराने लगा था.मैंने सखा कि अपने आसपास ही ढेर सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने कड़ी मेहनत से चैलेन्ज  स्वीकारे और उनकी जिंदगी में सुख- सम्पन्नता कि खूबसूरती छा गई है.बस! उसी पास जिंदगी से घबराना छोड़ दिया.
बुद्धिजीवी:                दद्दू ! यूँ ही एक बार मेरे मन में मौत कि अन्जान दहशत समां गई थी.कहीं मैं मर गया तब? लेकिन कुछ पुस्तकें पढने और कुछ अनुभवों से सीखकर यह जान गया कि मौत,जीवन की समाप्ति नहीं यह तो नै जिंदगी की शुरुवात है.अब मेरे मन में यह विचार नहीं आता " मैं अचानक मर गया तब"?   
दद्दू :                         मरने की बात कायर लोग करते हैं.पुराने ज़माने में बुजुर्ग कहा करते थे " पाता नहीं मेरे भाग्य में क्या  लिखा है? कम्युनिकेशन स्किल और व्यक्तित्व विकास के जरिए मैंने कुछ बातें समझीं हैं.अब नई जनरेशन से यही कह सकता हूँ          " अपने भाग्य का विधाता इंसान खुद होता है." मैंने तो भाग्य से डरना  कब से छोड़ दिया है.अपनी जिंदगी बदलने की क्षमता इन्सान में बुनियादी रूप से होती है.आवश्यकता मात्र उसे पहचानने की  है.
बुद्धिजीवी:                   दद्दू!   मैं जवान था तब " प्यार" शब्द से  पहले - पहले घबराता था." उसके  प्यार ने " मेरे दिल में वो रेशमी एहसास जगाया की मेरे भीतर का अँधेरा दूर हो गया और जिंदगी प्यार से तर- ब-तर हो गई.
दद्दू;                         जब मैं छोटा था मुझे लोगों के उपहास का डर था- सोचता था, " कहीं लोग मुझ पर हसेंगे तो नहीं? " यह डर ख़त्म हो गया जब मैंने अपने आप पर हँसना सीख लिया.
बुद्धिजीवी;                अपने अतीत से डरता था में जब भरोसा हो गया के मेरे वर्तमान को वह नुकसान नहीं पहुँचाएगा ,वह आखिरी डर भी समाप्त हो गया.झिलमिलाते सितारों की रौशनी का सौन्दर्य ,चाँद की मौजूदगी में निहारने के बाद ही अब मुझे अँधेरे से जरा भी डर नहीं लगता.अब आप ही बताइए कि अपने बारे में क्या ख्याल है आपका?
                                          अपना ख्याल रखिए           
                                                                                  किशोर दिवसे  
                                                                                  मोबाईल; 9827471743             
                                                     
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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

तुम्हारे वादों पर अब मुझको एतबार नहीं ......

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कब कहाँ किसे देखकर कौन सा ख्याल  मन में आ जाए कोई कुछ नहीं बता सकता.इसलिए कहते हैं पाखी होता है मन और विचारों के पंछी कितनी रफ़्तार से कहाँ तक उड़ान भर लें यह तो सोचने वाले के बस में भी नहीं.बैठे- बैठे यूँ ही शो केस में रखे नन्हे से ताजमहल पर निगाहें पड़ी और सोचने लगा की हसीं ताजमहल को बनाकर शाहजहाँ ने मुहब्बत की अनूठी मिसाल कायम की है.अमूमन हर कोई यही  सोचता है यानी ताज बनाम " मुहब्बत की निशानी "
                               मुझे लगता है की इससे बढ़कर एक और बात तह में छिपी होनी चाहिए -कहीं यह बात " वायदे" की तो नहीं !बादशाह ने अपनी शहजादी मुमताज महल से कोई वायदा तो नहीं किया था?और अगर ऐसी बात है  तब इरफ़ान जलाल्पुरी ने क्या सोचकर लिखा होगा कि-              फिर ताजमहल कोई तामीर नहीं होगा 
                                 हर अहमद कि शहजादी मुमताज नहीं होती 
वायदा... वायदा करना...निभाना...तोडना....वायदा पसंदी और  वायदाखिलाफी , हम सबने उम्र के किसी न किसी दौर में किया है.( याद
 कीजिए न अपने बचपन से अब तक के गुजरे लम्हों का हिसाब )कभी ख़ुशी कभी गम की फेहरिस्त  तय करने के बाद कुछ सवाल हम अपने आपसे भी पूछ सकते हैं - हमने कब किससे क्या वायदे किए ?कितने निभाए और कितने तोड़े?वायदे निभाने की ख़ुशी जरूर हुई होगी पर वायदाखिलाफी करने पर जब कभी आप कटघरे के भीतर खड़े हुए ( अपने जमीर का हो या फिर घरेलू होम -कोर्ट ) यह कहना हमारे आपके लिए कब मजबूरी बना था क़ि -
                                                  कुछ तो मजबूरियां रही होगी 
                                                  यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता 
खैर... सफाई देने भर से वायदाखिलाफी माफ़ नहीं  की जा सकती." जो वादा  किया वो निभाना पड़ेगा"  की तर्ज पर वायदे निभाना और उनपर फौलादी अमल कायम  रखना होगा.उम्र का एक दौर होता है जब किसी के वायदों के सम्मोहन में ही कोई जीने लगता है.... जिए जाता है लेकिन  शर्त यह होती है के उनकी आदत वफ़ा करने की हो.
                                                                   रघुकुल की  रीत रही है ," प्राण जाए पर वचन न जाई"जिसे व्यवहार में कई लोगों ने अपनी जिंदगी में ठीक उल्टा कर रखा है.पर यह सच है कि बगल में छुरी और मुख में राम-राम करने से कम नहीं चलता.वायदों से मुकरने वाले लोगों के झूठ का भेद खुलते देर नहीं लगती .इस तरह की वायदा खिलाफी करने वालों के लिए ही सकीब लखनवी ने कहा है-                                                   साफ कह दीजिए कि वादा ही किया था किसने
                                                           उज्र  क्या चाहिए झूठों को मुकरने कि लिए 
शहद क़ी प्याली और चना जोर गरम का स्वाद होता है मुहब्बत के वायदों में .प्यार , तकरार क़ी खट्टी-मीठी नोंक -झोंक के बीच "उसने" कहा "उससे" - "क्यूँ झूठे कहीं के! आने का वायदा कर नहीं आए !" जवाब मिला, " " मैंने तो वायदा किया था ख्वाबों में आने का '" लेकिन ख्वाबों क़ी रूमानियत से जब हम हकीकत के आईने में देखते हैं कई दफे नेताओं क़ी वायदाखिलाफी पर गुस्सा आता है.चुनाव के समय जनता से किए गए वायदे पूरे नहीं होते इसलिए " वायदाखिलाफी के पुतलों " क़ी खबर अवाम एन चुनाव के वक्त ही लेता है. काश! नेता लोग वायदे निभाना जान जाएँ , फिर शुरू हो जाएगी जमीन से जुड़े नेताओं क़ी नस्ल पैदा होना.वर्ना उन्हें अपने आप  पर कभी तो शर्म आएगी?
                                         सचमुच  शर्म आएगी जब भी  हम वायदों को तोड़ेंगे.इसलिए वायदा कर उसे निभाइए जरूर.वायदे निभाने का सुख " दोनों को भरोसे क़ी मजबूत डोर में कसने लगता है.अरे हाँ.... याद आया , पति- पत्नी के बीच तकरार का एक जबरदस्त मुस्सा होता है वायदे कर भूलने का.इस भुलक्कड़ी क़ी वजह से भी कई बार घर वाले गृह मंत्रालय से जान बचाकर भागने क़ी नौबत आ जाती है.एक बार श्रीमती जी से वायदा किया था किसी बात के लिए , भुलक्कड़ी के चक्कर में बात दिमाग से फिसल गई घर  लौटे तब टीवी चल रहा था और शायर मोहसिन सुहैल पढ़ रहे थे - 
                                          हजार  बार किया वादा और तोड़ दिया 
                                          तुम्हारे वादों पर अब मुझको एतबार नहीं 
मुहं फुलाकर बैठी श्रीमती जी से हमने मान- मनुहार  क़ी और कहा ' गंगा  कसम भागवान ! ड्यूटी  से निकलते  तक याद था पर दोस्तों के चक्कर में भूल गया.चलो अब चलते हैं." वह सब तो ठीक है... पर पहले यह बताओ के वो चुड़ैल गंगा कौन है    !!!!!!!
                                                               अपना ख्याल रखिए... शुभ रात्रि... शब्बा खैर....
                                                                                   किशोर दिवसे   मोबाईल-9827471743

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

..... कि याद आऊं तो अपने आपको प्यार तुम कर लेना

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हिचकियाँ आ रही थी लगातार....नानी ने कहा," बेटा! लगता है तुझे कोई याद कर रहा है .एक- एक कर उन लोगों के नाम ले जो यहाँ पर नहीं हैं.जैसे ही उसका नाम आएगा जो तुझे याद कर रहा है हिचकियाँ बंद हो जाएँगी.." .नानी की वह बात याद कर अचानक जब मेरे होठों पर मुस्कान तैरने लगी तब तपाक से दद्दू ने मुझसे पूछ लिया ," क्या बात है... अपने आप मुस्कुराये जा रहे हो? " कुछ नहीं. दद्दू ये तो बस यादें  है जिनके दरीचे खुल जाने पर न जाने कहाँ  खो जाते हैं.हम लोग.!
                                      तुम्हारी याद के जब जख्म  भरने लगते हैं
                                       किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं 
समंदर से भी गहरा रिश्ता होता है किसी कि यादों का .जितनी गहराई में उतरते जाते हैं .....भूलने लगते हैं अपने आपको.यूँ कि किसी किसी कि जिंदगी में  उनकी यादें , उनकी तमन्ना और उनका गम है लेकिन पूछो तो कहते हैं " कट रही है जिंदगी आराम से!   दिल के दरवाजे से जब यादों कि बारात निकलती है तब जेहन में शहनाइयों के मीठे सुर गूंजने लगते हैं.तड़पकर इन सुरों की कशिश बीते दिनों को  आवाज देकर बुलाने लगती है.....अपने करीब... और करीब.....
                                       अक्सर तन्हाइयों  में हम अपने सुख- दुखों का हिसाब - किताब लगाने बैठ जाते हैं .परिवार में जब भी कोई बाहर होता है या बिछुड़ जाता है तब बेहिसाब हो जाता है गमें जहाँ का हिसाब -
                                        कर रहा था गमें जहाँ का हिसाब 
                                        आज तुम याद बेहिसाब आए
हम   और तुम के इस नजदीकी  रिश्ते में किरदार बदलते हैं पर धुआं -धुआं शाम और उदास हुस्न की फिजां में हर किसी का दिल अपने अपने गम हो चुकी कहानियों की कटी पतंगों के डोर के सिरों को तलाशता फिरता है.यादें -बचपन की ,जवानी के   ,मुहब्बत की मजार पर आशिक या माशूका की ,अपने रिश्तों  की मां की  लोरी ,नानी या दादी की , स्कूल या कालिज के दोस्त या सहेली की .....कसम से....यासों की तड़प तो सिर्फ तो याद करने वाला दिल ही समझ सकता है.छट पटाहट तो तब होती है जब-                                       जिन्हें हम भूलना चाहें वो अक्सर याद आते हैं 
                                            बुरा हो उस मुहब्बत का वो क्यूँ कर याद आते हैं 
नौजवान दिलों ने अक्सर यादों से बने जख्मों का दर्द महसूस किया है.कुछ लोग सारी जिंदगी काट देते हैं -आधी किसी की याद में , बाकी भुलाने में !यह भी सच है की अगर याद नहीं आती तो बरसों नहीं आती . लेकिन याद आ गई तो अक्सर याद आती है.यादों के दरीचे जब खुलते हैं,तन्हाई में भी अकेलापन महसूस नहीं होता .... न जाने उदासी कहाँ फ़ना हो जाती है .फिर भी जब दो टूटे हुए दिलों को जिंदगी एक -दूसरे की मीठी यादों का तोहफा देती है तब वे दोनों ही  गुन गुनाने लगते हैं -
                                         चलो बाट लेते हैं अपनी सजाएँ /न तुम याद आओ न हम याद आयें 
                                          सभी ने लगाया है चेहरे पे चेहरा / किसे याद रक्खें  किसे भूल जाएँ 
कुछ लोग दावे से कह जरूर देते हैं  क़ि तुम्हारी यादें तुम्हें सौंप देते हैं लेकिन अकेले में पूछकर देखिये अपने दिल से क़ि क्या कभी यह  मुमकिन है ? यादों के जुगनू कभी टिमटिमाना नहीं छोड़ते . और,किसने कहा क़ि यादों को  भुलाना भी जरूरी है?किसी क़ि यादें मीलों दूरी के बावजूद उसकी साँसों और उसके स्पर्श तक का एहसास कराती हैं ... यही है यादों क़ि ताकत.यादों के जरिये ही बनती हैं कहानियां , आत्म कथाएं , यात्रा- संस्मरण और पंखिल कविताओं का संसार .यादें तो यकीनन इंसान का अपना साया है  और इसी लम्हे को जीकर कहा गया है ----
                                          कई साल  बाद आज ऐसा हुआ 
                                           बड़ी देर तक खुद को हम याद आये 
पर खुद को नहीं अपनी जिन्दगी में हर एक इंसान क़ि अच्छाइयों को याद कीजिये .यूँ तो बुरे वक्त के साथियों को याद कौन रखता है? इसलिए तो सुबह होते ही चिरागों को बुझा देते हैं लोग.लेकिन प्यार के दीवानों क़ि आँखों पर एक- दूसरों के प्यार का पर्दा पड़ा रहता है.वे दोनों यही कहते हैं - " देखूं किसी और को भी , तेर चेहरा दिखाई दे"
                                         दद्दू कहते हैं ," फ़रिश्ता भी खुदा को भूल जाता होगा लेकिन इंसान क़ि अपनी यादें रेत पर क़दमों के निशाँ क़ी तरह साथ चलती है.मरने से पहले भी इंसान के सामने सारी जिंदगी यादों क़ी शक्ल में चल-चित्र क़ी तरह घूमने लगती हैं.यादें हर किसी के लिए सहेजकर एक- दूसरे में बाटना या उसे लेखकीय रचनाधर्मिता से जोड़ना अद्भुत अनुभव है.अचानक दद्दू मुझसे बड़ा अजीब सा सवाल करते हैं.,"अखबार नवीस !हर इंसान को एक न एक दिन इस दुनिया  से विदा होना  पड़ता है .क्या तुम बता सकते हो क़ी अपने चाहने वालों को तुम किस तरह याद आना चाहोगे?
                                          भौचक था मैं दद्दू के इस अजीबो-गरीब  और काल्पनिक सवाल पर. फिर भी वाह सवाल तो था ही और जवाब देना भी उतना ही जरूरी.कुछ पल रूककर मैं सोचता रहा और एकाएक दिल क़ी बाट मेरी जुबान पर आ ही गयी.क्या एस होगा यह तो आप खुद ही महसूस करेंगे अपने दिल में .मैंने दद्दू  से कहा---
                                             बस इतनी दाद देना बाद मेरे , मेरी उल्फत को 
                                             क़ी याद आऊं तो अपने आपको प्यार तुम कर लेना.

                                                                                                                                 अपना ख्याल रखना.....
                                                                                                                         किशोर दिवसे 
                                                                                                            मोबाईल;०९८२७४७१७४३                                            
                                                                                                                                          

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

बारूद की फसल अब लहलहाने लगी है

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यूँ तो मजरे , टोले,  गाव , शहर और महानगर की अपनी  तासीर और जिंदगी होती है.बरास्ता इनके ,बाशिंदों के अक्स दिकाते शब्द भी गढ़ लिए गए है- ग्रामीण,शाहरिये,या मेट्रो सेक्सुअल.यकीनी तौर पर् मुहं  में चूसनी वाली  उम्र से , कब्र में पाँव लटकने तक खंदहरी हालत के मौजूदा वक्त के दरमियाँ ( और बरसों पहले भी ) आदिवासी शब्द में कितना फर्क महसूस  किया गया? इंशा अल्ला रौशनी कि चुन्धियाने वाली जगमग से छिटककर चंद लकीरें ही उनपर पहुँच सकी हैं.
                                      छोडिये भी... किस किस को कोसेंगे और किस किस का रोना रोइयेगा... उनकी हालत के लिए ! पर आईने का सच उस लम्हा चीखता है जब साथी शाकिर भाई कि कवितायेँ जमीनी सरोकार कि आतिश बनकर आदिवासियों से गहरा रिश्ता जोड़ लेती हैं
                                  नदी -नाले इन्द्रावती से होकर गोदावरी में / बचे हुए पेड़ पहाड़ बारहों मॉस तक हरे रहते हैं / गनीमत है अभी भी/ बारूद का असला पेड़ों पर नहीं / गोदामों में ही फलते फूलते हैं.
आहा सुन्दर बस्तर ....पर हालत कैसी है ! देखिये, दहशत का मंजर कैसे उभरता है जब कोई अपने पहचान पत्र को सीने से लगा कर रखता था.आशंका यही कि सर कटने का खौफ , पर धड तो पहचाना जायेगा?कब होगी आदिवासी जीवन की दहशत? बस्तर कि जिंदगी का एक लम्हा आशाओं के साथ जीती है यह कविता -ऊंची कूद, लम्बी कूद, लम्बी दौड़ में / सफल होने वाले  उम्मीदवार / चुन लिए गए थे/ उन सबमें अधिकाँश आदिवासी थे. ( सवाल यह है कि पीछा करती मौत उनके निकट है या गलबहियां करने को उतावली जिंदगी ?)
                                          बस्तर कि जिंदगी के केनवास पर कुछ चीथड़े धूसर रंगी हैं. सियासी इच्छा शक्ति और जन जाग्रति के आभाव में विकास के खुश नुमा रंगों के गहरे स्ट्रोक्स नहीं लग रहे हैं.शहरी हाथों का रेला आगे बाधक उन्हें " लुस्त फॉर लाइफ " का किरदार बना सकता है. तेंदूपत्ता तोड़ने जंगल में मत जाना/ अब जंगल में / बाघ भालू  नहीं / बारूदी गंध पीछा करेगी तुम्हारा. / उधर से नगा मारेंगे इधर से दगा!!हमसे दगा करने वालों होशियार. होशियार!!
बजरिये कविता , बस्तर में चेतावनी का खौफ , हालात और मुखबिरी के सर पर मंडराती मौत, वहां की जिंदगी के थर्राने वाले रंगों की ओर इशारा है.
                               विकास के अवसरों को कैसे नंगा कर देती है बस्तर में बदनीयत - बहुत पहले अखबार में छपी थी खबर/ कि बस्तर में यूरेनियम मिला है / लौह अयस्क तिन / और कोरंदम के बाद/ तब से गोपनीय यात्राएँ बढ़ गयी हैं.!!!
शासकीय योजनायें बेहतर मोनिटरिंग से फ्लॉप शो बनने से बच सकती हैं.सचमुच बस्तर कि जिंदगी  को फायरिंग के धमाके नहीं बल्कि वहां की  " सच्ची सफल कहानियों की आतिशबाजी की जरूरत है.यह राजनीतिक दावपेंच नहीं जन जेहाद से ही मुमकिन है. कितना सच है- " डेढ़ सौ बचे , बैगा जन जाती को बछाने के लिए/ डेढ़ सौ करोड़ स्वीकृत किये गए हैं/ और डेढ़ हजार करोड़ / इनकाउन्टर  के लिए रख दिए गए है.
                                     बस्तर  गोली कांड, बहस और स्कूल बंद है... स्थिति मानसिक हालात और स्कूल के माध्यम से बस्तरिया जिंदगी के जिस्म पर दहशत से खड़े रोंगटे दिखने पर मजबूर हैं ." गुरूजी खून से लथपथ गिर पड़े थे , तब से कोंगुद का स्कूल बंद है.!!"कोंटा जाने वाली बस में बैठा ओट्टी दरोगा का बेटा जब देखने जाता है- "पापा ठीक तो हैं ? पापा महीनों से घर नहीं आये हैं.बस्तर कि जिंदगी ( कर्मछारियों कि भी )का मार्मिक पहलू आपके पहलू में डालने कि पहल करता है.
बूझ - अबूझ सब कुछ है बस्तर में.पर नदी धरती और पहाड़ बनकर जीने की जिद किस्में है?बस्तर के हारते हरेपन का हाथ धरकर आगे ले जाना , सहमे जंगल का हौसला बढ़ाना , मौलिक संस्कृति के ह्रास कि दुहाई देकर जीवन स्तर ऊंचा उठाकर आत्मसम्मान के शिखा पर पहुंचाना शेष  समाज की जिम्मेदारी है." पोलिटिक्स आफ इंटर प्रिटशंस  " की भूल भुलैया में आदिवासियों को भटकाए रखने  कि साजिश को बेनकाब करना सोच के तडाग कि मौजू मेराथन होना चाहिए.
                                           साथी शाकिर भाई की कवितायेँ जन जिहाद को उकसाती हैं.हाशिये पर जाते या विलुप्त होती धडकनों को सहिजकर उनका दस्तावेजीकरण  चिर स्थायी तौर पर करने को प्रेरित करती है.वे कहती है - जिद तो करो ... जीतेगा जंगल का आदमी जीतेंगे पहाड़ , जीतेंगी नदियाँ... आँखे खुलेंगी तटस्थ  और लूट में शरीक लोगों की.
काश कवित में शरीक सारे शब्द इंसान बनकर बस्तरिया आदिवासियों से गल बहियाँ कर लें ... सचमुच शब्द भी चाहते हैं तरक्की , ख़ुशी ,उजले पहलुओं पर गौर करना. लेकिन खुशियाँ जब सहम जाती हैं दहशत  से तब,जिंदगी के केनवास पर बिखरे रंग  अल्फाज बनकर खुलने लगते हैं--
                                             कितना आसान खात्मा
                             आदिवासियों को मिटाना कितना आसन होता है
                             इन्हें एक दूसरे से लड़ा दो
                             वे खुद एक- दूसरे को मिटा देंगे
                             एक बाँध बना दो , इसमें वे डूब जायेंगे
                             इनका नामो- निशाँ न   बचेगा प्लांट लगा दो
                             मुआवजा पाने के बाद
                             पी- पीकर वे ख़त्म हो जायेंगे!
                                  

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

चलो यार बॉस को तेल लगायें...

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चलो यार बॉस को तेल लगायें..
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" तेल तो बड़ा महंगा हो गया है यार!"
" महंगा कैसे न हो ... लोग खाने में कम लगाने में ज्यादा इस्तेमाल कर रहे है."- इतना कहकर मसखरी लाल ने जोरदार ठहाका लगाया.सरकारी दफ्तर की केन्टीन में वह गपोड़ीराम  के साथ बैठा " चा पानी " पी रहा था.वैसे भी इन दफ्तरों के मसखरी और गपोड़ी टेबल पर कम, केन्टीन में अधिक मिला करते हैं.सरकारी, निजी, गैर सरकारी दफ्तरों या चर्ष के अड्डों की ये खासियत रहा करती है.
                           खैर... नए बॉस ने तो सबका तेल निकाल  दिया है.... वो छुट्टी पर हैं तो देखो कैसे सभी कर्मचारियों के चेहरे फुल्के की तरह  ख़ुशी से फूल गए हैं..वर्ना जब देखो तब बगैर इत्तला दफ्तरों की  सर प्राइज चेकिंग !यार... ये साहब लोग क्या हम लोगों को तेली का बैल समझते हैं जो दिन रात पिसते ही रहें?
    गुस्सा थूक दे यार! बॉस को तेल लगाने के फायदे और न लगाने के नुक्सान तू नहीं जानता क्या? कहाँ नहीं है यह बीमारी? टिकट के लिए नेता हाई कमान को तेल लगाता है,पी एच ड़ी करने वाला अपने गाइड को,  ... अगर कोई अपना काम करवाना हो फिर तिल देखो, तेल की धार देखो! हर किसी से पूछ लो तेल लगाने के फायदे!  अगली टेबल पर दद्दू  चाय सुड़क  रहे थे.सोचने लगे वास्तव में जिधर देखो तेल का बोलबाला है.व्यापारियों को देखो तो खुले तेल में मिलावट कर उपभोक्ताओं का    तेल निकल देते हैं.  मिटटी तेल वाला चमकू अपना कोटा पेट्रोल पम्प वालों को बेच देता है.रहा सवाल व्यापारियों का , फ़ूड वालों को तेल लगाने के बाद भला वो कार्रवाई  काहे को करने लगे?
           इधर गपोडीराम ने अपना जनरल नालेज बघारते हुए कहा , " नागपूर  में तो एक तेलवाले ने अपना तेलवाले टाईम्स भी निकाल लिया था.और तेलगी तो कमाल का निकला.स्टाम्प  घोटाला कर महाराष्ट्र  में अच्छे- अच्छों का तेल ही निकाल दिया.  कोर्ट, अस्पताल., थाना, दफ्तर, मार्केट,   अखबार या मैगजीन  का संपादक हो तेल तो लगाना ही पड़ेगा.राष्ट्रीय स्तर पर तो कुछ नारी प्रेमी संपादक तो ऐसे भी होते हैं जिनकी महिला का नाम देखते ही लार टपकने लगती है। (टॉप प्रिओरिटी!)आजकल  देख लो सोशल साइट्स का हाल !खूबसूरत नारी चेहरा देखा नहीं कि "लाइक" की घनघोर बारिश!,यानी अघोषित इजहारे मुहब्बत!  फिर आप तुलना में कितना भी बेहतर क्यों न लिखो ,इक्का दुक्का लाइक मिल जाए तो बहुत। यकायक मसखरी लाल  को कुछ याद आया.वे कहने लगे," यार गपोड़ी ! अपना बड़ा बाबू  है न फाइनेंस  सेक्शन वाला !... अच्छा ..... बी. पी.केलोटा की बात कर रहे हो!
 क्यूं ... क्या उसने भी किसी का तेल निकाल दिया ?  नहीं. यार! बी. पी. केलोटा तो  कर्मचारियों  के सामने  बॉस को ऊल - जलूल बकेगा लेकिन  उनके सामने पूरा टीन खाली कर देगा. और क्या यूनियन लीडर चाबुक परसाद को यह नहीं मालूम ,बिना  तेल डाले  आग नहीं बुझती . वो तो बस पनवा मुहं में दबाकर गुनगुनाएगा. " तेल लगाई ले..
!                                  " काफी  पियोगे  अख्बार  नवीस! कुर्सी पर बैठते ही  दद्दू ने पूछा , " हाँ... भाई ददू..मीडिया में कम्पीटीशन  के चलते एक दूसरे  का तेल निकाल देने की कवायद जोरों से चल रही है.. मसखरी और गपोड़ी का तेल पुराण कानों में पड़ने के बाद जब बात समझ में आई तब ज्ञान चक्षु  खुल गए. , " दद्दू , पेट्रोल को भी चालू भाषा में तेल कहते ही न!  अब दुनिया के चौधरी  अंकल सैम को ही देखो अपनी ताकत के बल पर इरान और कुवैत जैसे तेल के बादशाहों का तेल निकालने पर जब तब उतारू नहीं रहते? सच कह रहे हो ... बाजार के दौर में भी तो मार्केटिंग के फंडे इतने बढ़ गए हैं के वो रेत  से भी तेल निकलना अच्छे से जान गए हैं.
                                       यकायक दद्दू को  बचपन की याद ताज़ा हो आती है.बोले, ," अखबार नवीस ... छठवी की एग्जाम चल रही थी.छाता लेकर पिताजी ने दफ्तर जाने से पहले गुर्रा कर कहा था की  अगर तूने आज पर्चा अच्छा नहीं बनाया तो तेल लगाकर रखना.क्या करता!पिटने के डर से खूब पढ़ा और फर्स्ट क्लास में पास भी हुआ.
                                         तेल लगाने की महिमा के कुछ किस्से अभी बाकी थे.सामने काली सड़क से गुजरते हुए ट्रेक सूट वाले खिलाडी को देखकर मन में विचार आया की गुलेल में तेल , हाकी स्टिक और क्रिकेट की बैट में तेल , अखाड़ों या बॉडी बिल्डिंग स्पर्धा में पट्ठों के कसरती जिस्म पर भी तेल !और ठण्ड के दिनों में भी कुनकुनी धूप में तेल लगाकर बदन सेंकने का सुख ... वाह!  मसखरी और गपोड़ी तो नए बॉस के डर से टेबल खाली कर चले गए अपने दफ्तर की ओर लेकिन मैंने दद्दू को फिर छेड़ने के इरादे से चिकोटी काटी , " दद्दू , रहीम ने पानी की महिमा का खूब बखान किया था.आज के जमाने में अगर वे ज़िंदा होते तो लोगों को तेल लगाने की  आदत को दोहे में किस तरह कहते/?
भाई  सचमुच , दद्दू की हाजिर जवाबी और आशु कवी होने पर हमारा सीना फूल गया.अपने फुल सेन्स आफ ह्यूमर का इस्तेमाल कर उनहोंने दोहे का तेल टपकाने से पहले सोचा , "  काश!कर्मचारियों का " तेलोमेनिया " दूर करने  प्रबंधन  प्रशासन या शासन ही कोई पहल करे.! दद्दू ने दोहे का जोड़- तोड़ कुछ इस तरह  किया-
              रहिमन तेल लगाइए, बिन तेल सब सून
              तेल बिना न ऊबरे नेता, बॉस व् पत्नी सुन !
अखबार के पन्ने पलटने के दौरान नजरें एक विज्ञापन पर टिकती हैं." तेल श्री , तेलरत्न,और तेल विभूषण पुरस्कार वर्ष २०१० के लिए निजी अथवा संगठनों से प्रविष्टियाँ आमंत्रित की जाती है. दो लोगों ली गारंटी अनिवार्य.  अपना पप्पू भी तेल पुराण की महिमा से अभिभूत है.अगरबत्ती जलाकर मन्त्र पढ़ रहा है," तेलम शरणम गच्छामि..." इस बार उसके कोर्स में " तेलोलॉजी " का चेप्टर भी है. कब, किसे, कितना तेल लगाने पर क्या फायदा होगा , पचास नम्बर का पेपर आएगा." तेल पुराण की कुछ प्रतियां  बाहर की रैक  में भी रखी हैं.
                                   " अरे उठो भी ...  ! नौ बज गए और अब तक सो रहे हो? श्रीमती जी के झिंझोड़कर जगाये जाने पर हडबडाकर नींद खुलती है, "  ओह! तो क्या यह सब सपना था! फटाफट तैयार होकर नाश्ते की मेज पर अखबार के पन्ने पलटने लगता हूँ. पड़ोस में रहने वाला पप्पू का दोस्त जीनियस बाथरूम में एक गीत गुनगुना रहा है-
                                       मेहनत हमारा जीवन,  मेहनत  हमारा  नारा
                                       मेहनत से जगमगाए तकदीर का उजियारा.
                                                                                                      मोबाईल-09827471743

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