गुरुवार, 18 सितंबर 2014

" एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते है लोग

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" शेख चिल्ली कही के ... तेरी औक़ात क्या है?अगर तुझमे इतनी ही हिम्मत होती तब खुद को छिपा कर मुझे काहे ओढ़ लेता !"" देख बकवास मत कर... बेगैरत होंगे तुझे ओढने वाले ... मै नहीं फटकता तेरे पास जरा भी. भला किसको नहीं मालूम के अगर किसी ने तुझे नोच लिया तब सब कुछ उजागर हो जायेगा.... दूध का दूध और पानी का पानी...."
चेहरे और मुखौटे के बीच अंतर द्वन्द चल रहा था.दोनों ही एक दूसरे को  नीचा  दिखने पर तुले हुए थे.मुखौटा अपने बहुमत की वजह से दम्भोक्ति कर रहा था और चेहरा मायूसी के सदमे से कुछ पल के लिए पहले मुरझाता फिर अपनी देह के अंतर ताप से ओजस्वी बनकर प्रखर हो उठता.
" मुझे नहीं, .. शर्म तो तुझे आणि चाहिए, यह तो मेरी जिंदगी की व्यावहारिक मजबूरी है जो मुझे तेरा साथ लेना  पड़  रहा है.तू तो सिर्फ वक्त की जरूरत है- यूज एंड थ्रो ! मेरा पारदर्शी पन  कालजयी  है, शाश्वत!  तमतमाया चेहरा पूरे तीखेपन परंतु  सौजन्यता  से मुखौटे पर  वाक्  प्रहार कर रहा था.
                      यकायक दोस्ती का दावा करने वाली एक बड़ी मछली बड़ा सा मुह खोलकर छोटी मछली को निगल जाती है.उसे कोई मोका है नहीं मिलता दोस्त- दुश्मन का मुखौटा  परखने का.बाकी कुछ मछलिया डरी  सहमी सी एक कोने में बाते करने लग जाती है . घर में रखे शीशे के मछली घर से निगाहे हटाकर पल भर के लिए आँखे मूंदने पर सारी दुनिया का रंगमंच जिंदगी  की शक्ल में सामने उभरता है.
  " एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते है लोग"
चेहरे नहीं शायद मुखौटे कहना अधिक सटीक होगा.इस काल खंड का यह क्रानिक फिनामिना लग रहा है . अपनी जरूरतों के हिसाब से चेहरे पर मुखौटा फिट कर लो.हर बेईमान के लिए इमानदार का, पापी के लिए धर्मत्त्मा का,सियार के लिए शेर का मुखौटा या खाल तैयार है.ओढने या ओढाने वाले दोनो किस्म के लोग  है लेकिन 
                         सचाई छुप नहीं सकती  बनावट  के उसूलो से ,के खुश्बू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलो से.
मुखौटों  की बाजारू दुनिया  में परफ्यूम छिडके कागज के फूलो से सुगंध काफूर होने में देर नहीं लगती.ठीक उसी तरह् बनावट के उसूल भी इसे उजागर होते है जैसे पानी में किया गया पाखाना .पर अभी  चेहरे और मुखोटो का संघर्ष चल रहा है.
आज का दिन मेरा है ... गरजकर मुखौटा डरा रहा है चेहरे और चेहरों को... मुखौटों के साथ साथ रहकर कुछ इंसान अपना चेहरा तक भूल गए है."
         " कल मेरा सच जब सामने आएगा जब  मै जगमगाने लगूंगा... चेहरा यह सोचकर मायूसी पर काबू पाने की कोशिश करता है "" घमंडी मुखौटों की सल्तनत अपनी छद्म छवि की आतिशबाजियों पर इतरा रही है " चेहरों का कुनबा अपनी पीड़ा छिपाकर " वो सुबह  कभी तो आएगी " यही सोचकर तमाम लांछन सहकर भी ." ईश्वरीय न्याय के प्रति आश्वस्त है.
चेहरों का सच और मुखौटों के फरेब को समझकर अनदेखा करने वाले इस बात को जान ले की, सच्चाइया दबी कहा है झूठ से  जनाब  , कागज़ की नाव कहिये समंदर में कब चली?
दुनिया के समंदर में भी अपनी- अपनी इमेज या छवि को लेकर भी चेहरों के कुनबे और मुखौटों की सल्तनत में छिड़ी है जंग.घात-प्रतिघात के अनेक मौक़े और यलगार के दृश्य जिंदगी  के केनवास पर रोजाना देख रहे है हम लोग.छवियो को बनाने- बिगाड़ने , धवल और मलिन करने के सायास कर्मकांड दैनन्दिनी के जीवन चलचित्र का अनिवार्य हिस्सा बन चुके है.
     बहरहाल, चेहरे और मुखौटों के बीच जारी है  अनथक  अंतर द्वन्द और इस महासमर के रणबाकुरे है आप और हम सब . सवाल इस बात का है कि  किसके लिए कब, कौन ,कहाँ ,कैसे , और किस तरह का आइना दिखता है.और आइना देखने और सिखाने के बाद चेहरों और मुखौटों के पवित्रीकरण की प्रक्रिया किस तरह शुरू होती है.
        कुनबा और सल्तनत ... निजाम तो दोनों के एक ही है.चेहरे और मुखौटे दोनों ही जिंदगी की सच्चाई है. आईने में अपना चेहरा देखना आज की जरूरत है .फिर भी,... कब जाओगे आईने के सामने?शायद यह बात मन के किसी कोने से गूंजेगी सभी के भीतर
        जाने कैसी उँगलियाँ  है, जाने क्या अंदाज है
        तुमने पत्तो को छुआ था , जड़ हिलाकर फेक दी 

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